"सत्याग्रह से स्वच्छाग्रह"
"सत्याग्रह से स्वच्छाग्रह
लोकशाही में वैचारिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हमे जरूर मिली है, परन्तु इस स्वतंत्रता के बल पर हम हमारे कल को गालियाँ देकर क्या हम आज अपने वर्तमान को सँवार रहे है ? आज मेरा प्रश्न है उन भड़काऊ लेखकों की Cut, Paste और Share करनेवाले फेसबुकिया, व्हाट्सएपिया पोस्ट करनेवाले से की आजादी के सही मायने क्या है? कैसे मिली है यह आज़ादी? किसने दिलवाई है यह आजादी?
लोकशाही में वैचारिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हमे जरूर मिली है, परन्तु इस स्वतंत्रता के बल पर हम हमारे कल को गालियाँ देकर क्या हम आज अपने वर्तमान को सँवार रहे है ? आज मेरा प्रश्न है उन भड़काऊ लेखकों की Cut, Paste और Share करनेवाले फेसबुकिया, व्हाट्सएपिया पोस्ट करनेवाले से की आजादी के सही मायने क्या है? कैसे मिली है यह आज़ादी? किसने दिलवाई है यह आजादी?
आजादीकी लडाइमे हजारों राष्ट्रभक्त स्वतंत्रता सैनानीयोने अपने अपने तरीके से अपनी विचारधारा, तौरतरीकों, परिस्थितियों एवं अपने निजी जीवन, सुखचैनसे समजोता कर समर्पित भाव से अंग्रेजों के खिलाफ लड़कर अपना बलिदान देकर हमे आजादी दिलवाई है। चाहे वो शहीद भगतसिंह हो या महात्मा गांधी। आज आज़ादी की खुल्ली हवामें साँस लेकर स्वछंदता से किसी देशभक्त परवाने के बलिदान पर आज़ादी के नाम कीचड़ उड़ाने वाले हम लोग आज उस जानलेवा गुलामी की घुटन महशूस कर सकते है? क्या हमारी इतनी औकात है की हम उनकी निष्ठा ओर समर्पण का आकलन कर सके? आज आजादी के 70 साल के बाद भी सरे राह बेटियों की इज्जत लुटनेवाले को रोकने की हिम्मत कितनों में है? घर के बहार पडे कचरे के ढेर को साफ करने करवाने की भी हिम्मत हम मे नही है ओर उँगली उठा रहे है उन महापुरुषो के बलीदान की???
आज गाँधीजयंति पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी पर सोशियल मिडिया पर Post एवं Comments पढ़कर दुखी मन से इस ब्लॉग द्वारा अपनी मनोव्यथा लिखने पर मजबूर हुआ हूं।
गुजरातके सुखी बनिया परिवारमे जन्मे मोहनदास करमचंद गांधी तत्कालीन समाज मे पद, पैसा, प्रतिष्ठा पाने हेतु लंदन से बैरिस्टर बनकर भारत एवं दक्षिण अफ्रीका को कर्मभूमि बनाकर सुखपूर्वक अपना जीवनयापन कर रहे थे। यहाँ तक सब सामान्यतः चल रहा था, लेकिन 7 june1893 दक्षिण अफ्रीका के Pietermaritzburg Railway station, पर बैरिस्टर मोहनदास करमचंद गांधी को अंग्रेज अधिकारी द्वारा धक्का देकर रेलगाड़ी से प्लेटफार्म पर घिराने की घटना से 'महात्मा' का सफर शरू हुआ। यह कहानी नही जीवनका ट्रनिंग पॉइंट था। वापस भारत लौटकर वे आराम से अपना जीवन व्यापन कर सकते थे, फिर उसको क्या जरुरत थी धोती, लंगोट जेल की रोटी खाने की? उस व्यक्ति के अपने जीवन काल मे कभी कोई सता या भोग का लालच नही रखा। आज पुरी दुनिया अगर उसके आगे नत मस्तिष्क हो रही है तो केवल उसके इसी त्याग, बलिदान और सत्याग्रह की वजह से। यह बात अलग है की आज़ादी की लड़ाई में अनगिनित बलिदानियों में सबसे ज्यादा यश कीर्ति मिली है तो गाँधीजीको यह केवल उनके कर्मयोग के कारण नही परंतु राजयोग से भी शक्य हुआ है। आज अगर हम यह खुली हवा मे सास ले रहे तो इनका बलिदान और कर्मयोग नही भुलाना चाहिए।
हालांकि गांधी भी आखीर एक उच्च आदर्शवादी मानव थे, और अपने उन्ही उसूलो की बदोलत कुछ राजनीतिक निर्णय भावनाओ के बहकावे मे आकर कर बेठै थे ऐसा आज हमें समयजाते लग रहा है। ऐसा आज कहा लिखा जा रहा है। वर्तमानके सारे परिणाम केवल उस ईतिहास की भूल नही है। जरूर उनके उच्च आदर्शो की बलि राष्ट्रको चुकानी पड़ी है परंतु उनकी राष्ट्रके प्रति निष्ठा मंशा पर कोई संदेह नही कर सकते। और। गाँधीजीके भावनात्मक निर्णय आज हमें समय जाते जरूर अनुचित लग रहे है। क्योंकि हम प्रतिक्रियावादी लोग, गांधीजीतो क्या पूर्ण पुरषोत्तम प्रभु श्रीराम और श्री कृष्ण पर टिक्काटिप्पणी कर अपने पैमाने से मापकर मूल्यांकन करते है, नया कुछ करने की हिम्मत, बुद्धि या शक्तिहीन, और कुछ नही केवल घटनाओं की प्रतिक्रियाएं अपनी सोच समज अनुशार देकर अपनेआपको धन्य समजते है।
वैसे ही आज कुछ वर्ग नत्थूराम गोडसे के कारण RSS की गाँधीजी एवं आज़ादीकी लड़ाई के प्रति संदेह व्यक्त करता है।
स्वतंत्रता संग्राम में RSS एवं उनके विचारधारा से जुड़े वीर सावरकर श्यामजी कृष्णा वर्मा जैसे अनेक स्वतंत्रता सैनानीयो के बलिदानों से ईतिहास भरा हुआ है। RSS की कार्यप्रणाली और विचारधारा औरो से अलग हो सकती है पर उनकी राष्ट्रनिष्ठा तब और आज निसंदेह है। RSS का विरोध करने वाली कोंग्रेस के लिए स्वतंत्रता संग्राम एक उद्देश्य और माध्यम बना रहा यह जिसके बलबूते पर वह आजतक सत्ताधिष्ठ रही। यह बात गांधीजी, नेहरूजीकी सत्तालोलुपता देख अच्छी तरह जान गए थे। इसके चलते ही उन्होंने तत्कालीन कोंग्रेस पार्टीको बर्खास्त करनेकी इच्छा और आज्ञा दी थी। पीछे ईसी सत्तालोलुप घराने ने गाँधी नामके सहारे अपनी राजनैतिक रोटियां शेकना चालू रखा है।
परिवर्तित समयके बहावमे शिक्षण और टेक्नोलॉजी के मददसे भारत बदलने लगा है। जनता सच्चे इतिहासको समझने लगी 1975 के तानाशाही Emergency के कुचक्र से नेस्तनाबूद होंनेके कगार पर खड़ी RSS की विचारधारा से प्रेरित जनसंघ का जनतापार्टी और बादमे BJP के रूपमे पुनर्जन्म हुआ। शून्य से सत्ता तक के BJP के सफ़रमे यह केवल संयोग या घटना नही थी किंतु कुदरती आपदाओं में सेवा जैसे मानवतावादी एवं वैचारिक क्रांति जैसी राष्ट्रवादी भूमिका रही है।
अपने अस्तित्व को बचाने की जदोजहद में छटपटाते राजनैतिक दलों और देशका दोहन करने वाले NGO पर वर्तमान सरकार ने नकेल कसने के बाद आज विरोधियों और Socalled बुध्दिजीवी Activist येनकेन प्रकरेण BJP और नरेंद्र मोदीजिका विरोध कर देशमे अस्थिरता का माहौल खड़ा करनेका प्रयत्न कर रहे है। लेकिन देश की आम जनता अब जाग चुकी है। वह किसीके जूठे बहकावेमे आने वाली नही है।
यदि नरेंद्र मोदी सत्तालोलुप होते तो
उसे अगर वोट ही लेना होता तो वो कभी नोटबंदी नहीं करता।
उसे वोट ही लेना होता तो वो कभी भी GST नहीं लाता।
उसे वोट ही लेना होता तो वो कभी भी तीन तलाक बैन नहीं करता।
उसे वोट ही लेना होता तो वो कभी सब्सिडियाँ ख़त्म नहीं करता,
उसे वोट ही लेना होता तो वो बीफ बैन नहीं करता,
उसे वोट ही लेना होता तो वो अलगाववादियों के जेबें भर रहा होता।
उसे वोट नहीं लेना हैं,वोट तो पहले भी बहुतो को दिये हैं पर मिला क्या ??
जिस देश में भारत माता की जय बोलने पर विवाद हो जाये,
जिस देश में गौ मांस खाने की हठ दिखाई दे,
जिस देश में पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगते हो,
जिस देश में सुप्रीम कोर्ट के फैसलो को खुली चुनौती मिले,
ऐसे देश में कौन वोट लेना चाहेगा??
*ये तो उसने एक मशाल जलाई हैं मिशाल बन जाने के लिए,ताकि उसके बाद हम रोये उसे याद करके।*
*खुशनसीबी सिर्फ एक बार दरवाजा खटखटाती हैं,परन्तू बदनसीबी तब तक दरवाजा खटखटाती हैं जब तक दरवाजा खुल ना जाये।*
जागो,
चैन से सोना हैं तो जागो वरना पछताओगे,ये चला गया तो
रोहिंग्या भारत में नहीं तुम्हारे घरो में रह रहे होंगे,
तिरंगे पर गाय काटी जाएँगी,
दुर्गा का अपमान और महिषासुर दिवस मनाये जायेंगे।
राष्ट्रनिर्माणके शिल्पयों को गालियां देकर बदनाम कर हम अपने आप का मोरल मत तोडो, मोदीजिके स्वच्छ भारत अभियान में जुड़कर राष्ट्रमे फैले हर प्रकारके कूड़े कचरे को मुक्त करने के सामुहिक कार्यमे योगदान दे।
"सत्याग्रह से स्वच्छाग्रह"
"हमने अपने जिवन मे इससे बेहतर क्या करके दिखाया है जो हम अन्यो का मूल्यांकन करे?"
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