षोडश संस्कार एवं विवाह संस्कार

॥श्री गणेशाय नमः॥
॥ षोडश संस्कार ॥

जन्मना जायते शुद्रऽसंस्काराद्द्विज उच्यते।
वेद पाठात्‌ भवेत्‌ विप्रःब्रह्म जानातीति ब्राह्मणः।।
अर्थात - व्यक्ति जन्मतः शूद्र है। संस्कार से वह द्विज बन सकता है। वेदों के पठन-पाठन से विप्र हो सकता है। किंतु जो ब्रह्म को जान ले, वही ब्राह्मण कहलाने का सच्चा अधिकारी है।


हमारे पूर्वज दीर्घद्रष्टा ऋषि, मुनि, मनीषियों ने हर काम बहुत सोच समझकर किया है। जैसे जीवन के चार आश्रम में विभाजन, समाज का चार वर्णों में वर्गीकरण और सोलह संस्कार को अनिवार्य किया जाना। दरअसल, हमारे यहां पर परंपरा बनाने के पीछे कोई गहरी सोच छुपी है। सोलह संस्कार बनाने के पीछे भी हमारे पूर्वजों की गहरी सोच थी. प्राचीन काल से इन सोलह संस्कारों के निर्वहन की परंपरा चली आ रही है। हर संस्कार का अपना अलग महत्व है। जो व्यक्ति इन सोलह संस्कारों का निर्वहन नहीं करता है उसका जीवन अधूरा ही माना जाता है।

संस्कार का अर्थ क्या है ?
इन सोलह संस्कार को जानने से पहले संस्कार के पर्यायवाची शब्दों  को जानना बहुत ही आवश्यक है, क्योकि यहाँ पर संस्कार शब्द का अर्थ अपने आप में बहुत सारे अर्थो को छुपाये हुए है यानि इसका अर्थ व्यापक है, जो निम्नलिखित है :

ठीक करना, दुरुस्ती, सुधार, दोष, त्रुटि का निकाला जाना, शुद्धि, सजाना, धो माँजकर साफ करना, परिष्कृत, बदन की सफाई, शौच, मनोवृत्ति, स्वभाव का शोधन, मानसिक शिक्षासे मन में अच्छी बातों का जमाना, दिल पर जमा हुआ असर, पवित्र करना, धर्म की दृष्टि से शुद्ध करना, संस्कृति, संवर्धन, तहज़ीब, शिष्टता, रिवाज़, धार्मिक कृत्य, रस्म संबंधी, क्रियापद्धति, उपचार इत्यादि।

सोलह संस्कार व्यक्ति को राष्ट्र, समाज और व्यक्तिगत जिम्मेदारी में निपुण या कार्यकुशल बनाती है। जिसे हम आज की साधारण भाषा में प्रशिक्षित कह सकते है। संस्कार हमारे धार्मिक और सामाजिक जीवन की पहचान होते हैं। यह न केवल हमें समाज और राष्ट्र के अनुरूप चलना सिखाते हैं बल्कि हमारे जीवन की दिशा भी तय करते हैं।

भारतीय संस्कृति में मनुष्य को राष्ट्र, समाज और जनजीवन के प्रति जिम्मेदार और कार्यकुशल बनाने के लिए जो नियम तय किए गए हैं उन्हें संस्कार कहा गया है। इन्हीं संस्कारों से गुणों में वृद्धि होती है। हिंदू संस्कृति में प्रमुख रूप से १६ (16) षोडश संस्कार माने गए हैं जो ‘गर्भाधान’ से शुरू होकर ‘अंत्येष्टी’ पर खत्म होते हैं। व्यक्ति पर प्रभाव संस्कारों से हमारा जीवन बहुत प्रभावित होता है। संस्कार के लिए किए जाने वाले कार्यक्रमों में जो पूजा, यज्ञ, मंत्रोचारण आदि होता है उसका वैज्ञानिक महत्व साबित किया जा चुका है।

भौगोलिक परिस्थिति अनुसार इन संस्कारो की संख्या, क्रम या कर्मकांड में बदल संभव है। लेकिन भाव मे साम्यता है। कुछ जगह ४८ (48) संस्कार भी बताए गए हैं। महर्षि अंगिरा ने २५ (25) संस्कारों का उल्लेख किया है। वर्तमान में महर्षि वेद व्यास स्मृति शास्त्र के अनुसार १६ (16) संस्कार प्रचलित हैं। विभिन्न धर्मग्रंथों में संस्कारों के क्रम में थोडा-बहुत अन्तर है, लेकिन प्रचलित संस्कारों के क्रम में गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूडाकर्म, कर्णवेध, विद्यारंभ, यज्ञोपवीत, वेदारम्भ, केशान्त, समावर्तन, विवाह तथा अन्त्येष्टि ही मान्य है।

ऋषि, मुनि, मनीषियों ने हमें सुसंस्कृत तथा सामाजिक बनाने के लिये अपने अथक प्रयासों और शोधों के बल पर ये संस्कार स्थापित किये हैं। इन्हीं संस्कारों के कारण भारतीय संस्कृति अद्वितीय है। हालांकि हाल के कुछ वर्षो में आपाधापी की जिंदगी और अतिव्यस्तता के कारण हिंदु धर्मावलम्बी अब इन मूल्यों को भुलाने लगे हैं और इसके परिणाम भी चारित्रिक गिरावट, असामाजिकता या अनुशासनहीनता के रूप में हमारे सामने आने लगे हैं।

आज के समय में काफी अधिक ऐसे लोग हैं जो इन संस्कारों के विषय में जानते नहीं हैं। या जानते होंगे तो उसका महत्व समजे बगर अनदेखा कर उपेक्षा करते है। तो आइए जानते हैं कि जीवन में इन सोलह संस्कारों को अनिवार्य बनाए जाने का क्या कारण था ?
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1. गर्भाधान संस्कार – Garbhdharan Sanskar :–
यह ऐसा संस्कार है जिससे योग्य, गुणवान और आदर्श संतान प्राप्त होती है। शास्त्रों में मनचाही संतान के लिए गर्भधारण किस प्रकार करें ? इसका विवरण दिया गया है। हमारे शास्त्रों में मान्य सोलह संस्कारों में गर्भाधान पहला संस्कार है। गृहस्थ जीवन में प्रवेश के उपरान्त प्रथम क‌र्त्तव्य के रूप में इस संस्कार को मान्यता दी गई है। गृहस्थ जीवन का प्रमुख उद्देश्य श्रेष्ठ सन्तानोत्पत्ति है। उत्तम संतति की इच्छा रखनेवाले माता-पिता को गर्भाधान से पूर्व अपने तन और मन की पवित्रता के लिये यह संस्कार करना चाहिए।वैदिक काल में यह संस्कार अति महत्वपूर्ण समझा जाता था। शास्त्रों के अनुसार गर्भाधान संस्कार को अति महत्वपूर्ण माना गया है, क्योकि न केवल अपने कुल अपितु यह पूरे समाज व राष्ट्र के लिए भविष्य का निर्माण करने में सहायक है  दम्पत्ति को अपना दायित्व बहुत साबधानी पूर्ण करना चाहिये। इस संस्कार में माता-पिता का तन व मन पूर्ण रूप से स्वस्थ व शुद्ध होना, शुभ समय,उचित स्थान, स्वस्थ आहार-विहार आवश्यक है।

श्रेष्ठ संतान के लिये विधिनुसार करें गर्भाधान
संस्कार का अर्थ संस्करण, परिष्करण, विमलीकरण अथवा विशुद्धिकरण से लिया जाता है। हिंदू धर्म में जातक के जन्म की प्रक्रिया आरंभ होने से लेकर मृत्यु पर्यन्त तक कई संस्कार किये जाते हैं। पहला संस्कार गर्भधान का माना जाता है तो अंतिम संस्कार अंत्येष्टि संस्कार होता है। इस प्रकार मुख्यत: सोलह संस्कार निभाये जाते हैं। इन संस्कारों का महत्व इस प्रकार समझा जा सकता है कि जिस तरह अग्नि में तपा कर सोने को पवित्र और चमकदार बनाया जाता है उसी प्रकार संस्कारों के माध्यम से जातक के पूर्व जन्म से लेकर इस जन्म तक के विकार दूर कर उसका शुद्धिकरण किया जाता है। पहला संस्कार गर्भधान का माना जाता है। इस लेख में हम इसी संस्कार के बारे में बताने वाले हैं। तो आइये जानते हैं गर्भधान संस्कार का महत्व और इसकी विधि।

क्या है गर्भाधान संस्कार :
हिंदू धर्म के सोलह संस्कारों में यह पहला संस्कार माना जाता है। इसी के जरिये सृष्टि में जीवन की प्रक्रिया आरंभ होती है। धार्मिक रूप से गृहस्थ जीवन का प्रमुख उद्देश्य और प्रथम कर्तव्य ही संतानोत्पत्ति माना जाता है। सृष्टि का भी यही नियम है कि मनुष्यों में ही नहीं बल्कि समस्त जीवों में नर व मादा के समागम से संतानोत्पत्ति होती है। लेकिन श्रेष्ठ संतान की उत्पत्ति के लिये हमारे पूर्वज़ों ने अपने अनुभवों से कुछ नियम-कायदे स्थापित किये हैं जिन्हें हिंदू धर्म ग्रंथों में देखा भी जा सकता है। इन्हीं नियमों का पालन करते हुए विधिनुसार संतानोत्पत्ति के लिये आवश्यक कर्म करना ही गर्भधान संस्कार कहलाता है। मान्यता है कि जैसे ही पुरुष व स्त्री का समागम होता है जीव की निष्पत्ति होती है व स्त्री के गर्भ में जीव अपना स्थान ग्रहण कर लेता है। गर्भाधान संस्कार के जरिये जीव में निहित उसे पूर्वजन्म के विकारों को दूर कर उसमें अच्छे गुणों की उन्नति की जाती है। कुल मिलाकर गर्भाधान संस्कार बीज व गर्भ संबंधी मलिनता को दूर करने के लिये किया जाता है।

गर्भाधान संस्कार की विधि :
स्मृतिसंग्रह में गर्भाधान के बारे में बताते हुए लिखा गया है कि -
निषेकाद् बैजिकं चैनो गार्भिकं चापमृज्यते।
क्षेत्रसंस्कारसिद्धिश्च गर्भाधानफलं स्मृतम्॥
अर्थात् : विधि विधान से गर्भाधान करने से अच्छी सुयोग्य संतान जन्म लेती है।

इससे बीज यानि शुक्राणुओं संबंधी पाप अर्थात दोष नष्ट हो जाते हैं व गर्भ सुरक्षित रहता है। यही गर्भाधान संस्कार का फल है।

हिंदूओं में उत्तम संतान की प्राप्ति के लिये गर्भाधान संस्कार किया जाना अत्यावश्य माना गया है। इसके लिये सर्वप्रथम तो संतति इच्छा रखने वाले माता-पिता को गर्भाधान से पहले तन व मन से स्वच्छ होना चाहिये। तन और मन की स्वच्छता उनके आहार, आचार, व्यवहार आदि पर निर्भर करती है। इसके लिये माता पिता को उचित समय पर ही समागम करना चाहिये। दोनों मानसिक तौर पर इस कर्म के लिये तैयार होने चाहिये। यदि दोनों में से यदि एक इसके लिये तैयार न हो तो ऐसी स्थिति में गर्भाधान के लिये प्रयास नहीं करना चाहिये। शास्त्रों में लिखा भी है –

आहाराचारचेष्टाभिर्यादृशोभिः समन्वितौ ।
स्त्रीपुंसौ समुपेयातां तयोः पुतोडपि तादृशः॥
अर्थात् :  स्त्री व पुरुष का जैसा आहार और व्यवहार होता है, जैसी कामना रखते हुए वे समागम करते हैं वैसे गुण संतान के स्वभाव में भी शामिल होते हैं।

गर्भाधान कब करें ?
संतान प्राप्ति के लिये ऋतुकाल में ही स्त्री व पुरुष का समागम होना चाहिये। पुरुष परस्त्रीगमन का त्याग रखे। स्वभाविक रूप से स्त्रियों में ऋतुकाल रजो-दर्शन के 16 दिनों तक माना जाता है। इनमें शुरूआती चार-पांच दिनों तक तो पुरुष व स्त्री को बिल्कुल भी समागम नहीं करना चाहिये। इस अवस्था में समागम करने से गंभीर बिमारियां पैदा हो सकती हैं। धार्मिक रूप से ग्यारहवें और तेरहवें दिन भी गर्भाधान नहीं करना चाहिये। अन्य दिनों में आप गर्भाधान संस्कार कर सकते हैं। अष्टमी, चतुर्दशी, पूर्वमासी, अमावस्या आदि पर्व रात्रियों में स्त्री समागम से बचने की सलाह दी जाती है। रजो-दर्शन से पांचवी, छठी, सातवीं, आठवीं, नौंवी, दसवीं, बारहवीं, चौदहवीं, पंद्रहवीं और सोलहवीं रात्रि में गर्भाधान संस्कार किया जा सकता है। मान्यता है कि ऋतुस्नान के पश्चात स्त्री को अपने आदर्श रूप का दर्शन करना चाहिये अर्थात स्त्री जिस महापुरुष जैसी संतान चाहती है उसे ऋतुस्नान के पश्चात उस महापुरुष के चित्र आदि का दर्शन कर उनके बारे में चिंतन करना चाहिये। गर्भाधान के लिये रात्रि का तीसरा पहर श्रेष्ठ माना जाता है।

गर्भधारण के बाद क्या करें ?
गर्भ में शिशु किसी चैतन्य जीव की तरह व्यवहार करता है - वह सुनता और ग्रहण भी करता है। माता के गर्भ में आने के बाद से गर्भस्थ शिशु को संस्कारित किया जा सकता है। हमारे पूर्वज इन सब बातों से परिचित थे इसलिए उन्होंने गर्भाधान संस्कार के महत्व को बताया है। महर्षि चरक ने कहा है कि मन का प्रसन्न और पुष्ट रहना गर्भधारण के लिए आश्यक है इसलिए स्त्री एवं पुरुष को हमेशा उत्तम भोजन करना चाहिए और सदा प्रसन्नचित्त रहना चाहिए। गर्भ की उत्पत्ति के समय स्त्री और पुरुष का मन उत्साह, प्रसन्नता और स्वस्थ्यता से भरा होना चाहिए।

गर्भाधान कब न करें ?
मलिन अवस्था में, मासिक धर्म के समय, प्रात:काल, संध्या के समय, मन में यदि चिंता, भय, क्रोध आदि मनोविकार हों तो उस अवस्था में गर्भाधान संस्कार नहीं करना चाहिये। दिन के समय गर्भाधान संस्कार वर्जित माना जाता है मान्यता है कि इससे दुराचारी संतान पैदा होती है। श्राद्ध के दिनों में, धार्मिक पर्वों में व प्रदोष काल में भी गर्भाधान शास्त्रसम्मत नहीं माना जाता।

गर्भ पूजन शिक्षण एवं प्रेरणा:
गर्भ कौतुक नहीं, एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। उसे समझा जाए और उस जिम्मेदारी को उठाने की तैयारी मानसिक तथा व्यावहारिक क्षेत्र में की जाए। गर्भ के माध्यम से जो जीव प्रकट होना चाहता है, उसे ईश्वर का प्रतिनिधि मानकर उसके लिए समुचित व्यवस्था बनाकर, उसके स्वागत की तैयारी करनी चाहिए। गर्भ पूज्य है। कोई पूज्य व्यक्ति सामने हो, तो अपने स्वभाव तथा परस्पर के द्वेष-वैर को भुलाकर भी शालीनता का वातावरण बनाया जाता है। गर्भ के लिए भी ऐसा ही किया जाए। गर्भ का पूजन केवल एक सामयिकता औपचारिकता न रह जाए। संस्कारित करने के लिए पूजा उपासना का सतत प्रयोग चले। घर में आस्तिकता का वातावरण रहे। गर्भिणी स्वयं भी नियमित उपासना करे। उसे आहार और विश्राम जितना ही महत्त्वपूर्ण मानकर चलाया जाए। अधिक न बने, तो गायत्री चालीसा पाठ एवं पंचा

क्षरी मन्त्र 'ॐ र्भूभुवः स्वः' का जप ही कर लिया करे।

ॐ सुपर्णोऽसि गरुत्माँस्त्रिवृत्ते शिरो, गायत्रं चक्षुबरृहद्रथन्तरे पक्षौ।
स्तोमऽआत्मा छन्दा स्यंगानि यजूषि नाम।
साम ते तनूर्वामदेव्यं, यज्ञायज्ञियं पुच्छं धिष्ण्याः शफाः।
सुपर्णोऽसि गरुत्मान् दिवं गच्छ स्वःपत॥ -१२.४





2. पुंसवन संस्कार – Punsvan Sanskar :

हिन्दू धर्म में, संस्कार परम्परा के अंतर्गत भावी माता-पिता को यह तथ्य समझाए जाते हैं कि शारीरिक, मानसिक दृष्टि से परिपक्व हो जाने के बाद, समाज को श्रेष्ठ, तेजस्वी नई पीढ़ी देने के संकल्प के साथ ही संतान पैदा करने की पहल करें। गर्भ ठहर जाने पर भावी माता के आहार, आचार, व्यवहार, चिंतन, भाव सभी को उत्तम और संतुलित बनाने का प्रयास किया जाय। उसके लिए अनुकूल वातवरण भी निर्मित किया जाय। गर्भ के तीसरे माह में विधिवत पुंसवन संस्कार सम्पन्न कराया जाय, क्योंकि इस समय तक गर्भस्थ शिशु के विचार तंत्र का विकास प्रारंभ हो जाता है। वेद मंत्रों, यज्ञीय वातावरण एवं संस्कार सूत्रों की प्रेरणाओं से शिशु के मानस पर तो श्रेष्ठ प्रभाव पड़ता ही है, अभिभावकों और परिजनों को भी यह प्रेरणा मिलती है कि भावी माँ के लिए श्रेष्ठ मनःस्थिति और परिस्थितियाँ कैसे विकसित की जाए।

पुंसवन संस्कार उद्देशय :
यह संस्कार गर्भस्थ शिशु के समुचित विकास के लिए गर्भिणी का किया जाता है। कहना न होगा कि बालक को संस्कारवान् बनाने के लिए सर्वप्रथम जन्मदाता माता-पिता को सुसंस्कारी होना चाहिए। उन्हें बालकों के प्रजनन तक ही दक्ष नहीं रहना चाहिए, वरन् सन्तान को सुयोग्य बनाने योग्य ज्ञान तथा अनुभव भी एकत्रित कर लेना चाहिए। जिस प्रकार रथ चलाने से पूर्व उसके कल-पुर्जों की आवश्यक जानकारी प्राप्त कर ली जाती है, उसी प्रकार गृहस्थ जीवन आरम्भ करने से पूर्व इस सम्बन्ध में आवश्यक जानकारी इकट्ठी कर लेनी चाहिए। यह अच्छा होता, अन्य विषयों की तरह आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में दाम्पत्य जीवन एवं शिशु निर्माण के सम्बन्ध में शास्त्रीय प्रशिक्षण दिये जाने की व्यवस्था रही होती। इस महत्त्वपूर्ण आवश्यकता की पूर्ति संस्कारों के शिक्षणात्मक पक्ष से भली प्रकार पूरी हो जाती है। यों तो षोडश संस्कारों में सर्वप्रथम गर्भाधान संस्कार का विधान है, जिसका अर्थ यह है कि दम्पती अपनी प्रजनन प्रवृत्ति से समाज को सूचित करते हैं। विचारशील लोग यदि उन्हें इसके लिए अनुपयुक्त समझें, तो मना भी कर सकते हैं। प्रजनन वैयक्तिक मनोरंजन नहीं, वरन् सामाजिक उत्तरदायित्व है। इसलिए समाज के विचारशील लोगों को निमंत्रित कर उनकी सहमति लेनी पड़ती है। यही गर्भाधान संस्कार है। पूर्वकाल में यही सब होता था।

आधुनिक भारतीय समाज के अन्धाधुन्ध पाश्चात्य सन्स्कृती के अनुसरण के वजह और विवेक की कमी के कारण;वह सन्तानोत्पत्ति को भी वैयक्तिक मनोरंजन का रूप मान लिया गया हैं। इस कारण गर्भाधान संस्कार का महत्त्व कम हो गया। इतने पर भी उसकी मूल भावना को भुलाया न जाए, उस परम्परा को किसी न किसी रूप में जीवित रखना चाहिए। ग्रहस्थ एकान्त मिलन के साथ वासनात्मक मनोभाव न रखें, मन ही मन आदर्शवादी उद्देश्य की पूर्ति के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते रहें, तो उसकी मानसिक छाप बच्चे की मनोभूमि पर अंकित होगी। लुक-छिपकर पाप कर्म करते हुए भयभीत और आशंकाग्रसित अनैतिक समागम-व्यभिचार के फलस्वरूप जन्मे बालक अपना दोष-दुर्गुण साथ लाते हैं। इसी प्रकार उस समय दोनों की मनोभूमि यदि आदर्शवादी मान्यताओं से भरी हुई हो, तो मदालसा, अर्जुन आदि की तरह मनचाहे स्तर के बालक उत्पन्न किये जा सकते हैं।

गर्भाधान संस्कार का प्रयोजन यही है। वस्तुतः वह प्रजनन-विज्ञान का आध्यात्मिक एवं सामाजिक स्थिति का मार्गदर्शन कराने वाला सन्कार ही था। आज संस्कारों का जबकि एक प्रकार से लोप ही हो गया है, गर्भाधान का प्रचलन कठिन पड़ता है, इसलिए उसे आज व्यावहारिक न देखकर उस पर विशेष जोर नहीं दिया गया है, फिर भी उसकी मूल भावना यथावत् है। सन्तान उत्पादन से पूर्व उर्पयुक्त तथ्यों पर पूरा ध्यान दिया जाना चाहिए।

कब करते हैं पुंसवन संस्कार ?
हिन्दू धर्म संस्कारों में पुंसवन संस्कार द्वितीय संस्कार है। पुंसवन संस्कार गर्भ सुनिश्चित हो जाने पर तीन माह पूरे हो जाने तक पुंसवन संस्कार कर देना चाहिए। विलम्ब से भी किया तो दोष नहीं, किन्तु समय पर कर देने का लाभ विशेष होता है। तीसरे माह से गर्भ में आकार और संस्कार दोनों अपना स्वरूप पकड़ने लगते हैं। अस्तु, उनके लिए आध्यात्मिक उपचार समय पर ही कर दिया जाना चाहिए। इस संस्कार के नीचे लिखे प्रयोजनों को ध्यान में रखा जाए। गर्भ का महत्त्व समझें, वह विकासशील शिशु, माता-पिता, कुल परिवार तथा समाज के लिए विडम्बना न बने, सौभाग्य और गौरव का कारण बने। गर्भस्थ शिशु के शारीरिक, बौद्धिक तथा भावनात्मक विकास के लिए क्या किया जाना चाहिए, इन बातों को समझा-समझाया जाए। गर्भिणी के लिए अनुकूल वातावरण खान-पान, आचार-विचार आदि का निर्धारण किया जाए। गर्भ के माध्यम से अवतरित होने वाले जीव के पहले वाले कुसंस्कारों के निवारण तथा सुसंस्कारों के विकास के लिए, नये सुसंस्कारों की स्थापना के लिए अपने संकल्प, पुरुषार्थ एवं देव अनुग्रह के संयोग का प्रयास किया जाए।

क्यों कहते हैं पुंसवन संस्कार ?
पुंसवन संस्कार एक हष्ट पुष्ट संतान के लिये किया जाने वाला संस्कार है। कहते हैं कि जिस कर्म से वह गर्भस्थ जीव पुरुष बनता है, वही पुंसवन-संस्कार है। शास्त्रों अनुसार चार महीने तक गर्भ का लिंग-भेद नहीं होता है। इसलिए लड़का या लड़की के चिह्न की उत्पत्ति से पूर्व ही इस संस्कार को किया जाता है।

धर्मग्रथों में पुंसवन-संस्कार करने के दो प्रमुख उद्देश्य मिलते हैं। पहला उद्देश्य पुत्र प्राप्ति और दूसरा स्वस्थ, सुंदर तथा गुणवान संतान पाने का है। दूसरा पुंसवन-संस्कार का उद्देश्य बलवान, शक्तिशाली एवं स्वस्थ संतान को जन्म देना है। इस संस्कार से मुख्यतः गर्भस्थ शिशु की पुष्टि होती है, गर्भरक्षा होती है तथा उसे उत्तम संस्कारों से पूर्ण बनाया जाता है।

अगर पूत्र की इच्छा हो तो निम्न लिखित मंत्र का जाप करवाए –

पुमानग्निः पुमानिन्द्रः पुमान् देवो बृहस्पतिः।
पुमांसं पुत्रं विन्दस्व तं पुमान्नु जायताम्।।
अर्थात् : अग्निदेवता पुरुष है, इन्द्र भी पुरुष है, गुरु ब्रहस्पति भी पुरुष है तुजे भी पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी|

कैसे करते हैं पुंसवन संस्कार?

  • औषिधि अवघ्राण के लिए वट वृक्ष की जटाओं के मुलायम सिरों का छोटा टुकड़ा, गिलोय, पीपल की कोपल-मुलायम पत्ते लाकर रखे जाएँ। सबका थोड़ा-थोड़ा अंश पानी के साथ सिल पर पीसकर एक कटोरी में उसका घोल तैयार रखा जाए।
  • साबूदाने या चावल की खीर तैयार रखी जाए। जहाँ तक सम्भव हो सके, इसके लिए गाय का दूध प्रयोग करें। खीर गाढ़ी हो। तैयार हो जाने पर निर्धारित क्रम में मंगलाचरण, षट्कर्म, संकल्प, यज्ञोपवीत परिवर्तन, कलावा-तिलक एवं रक्षाविधान तक का यज्ञीय क्रम पूरा करके नीचे लिखे क्रम से पुंसवन संस्कार के विशेष कर्मकाण्ड कराएँ।
औषधि अवघ्राण Drug Ablation :
इस संस्कार में एक विशेष औषधि (वटवृक्ष की कोमल कुंपल का रस) को गर्भवती स्त्री की दांई नासिका के छिद्र से भीतर पहुंचाया जाता है। हालांकि औषधि विशेष ग्रहण करना यह वैधकीय परामर्श का विषय है। विशेष पूजा और मंत्र के माध्यम से भी यह संस्कार किया जाता है। कहते हैं कि तीन माह तक शिशु का लिंग निर्धारण नहीं होता है। इस संस्कार से लिंग को परिवर्तित भी किया जा सकता है।

वट वृक्ष, विशालता और दृढ़ता का प्रतीक है। धीरे-धीरे बढ़ना धैर्य का सूचक है। इसकी जटाएँ भी जड़ और तने बन जाती हैं, यह विकास-विस्तार के साथ पुष्टि की व्यवस्था है, वृद्धावस्था को युवावस्था में बदलने का प्रयास है। गिलोय में वृक्ष के ऊपर चढ़ने की प्रवृत्ति है। यह हानिकारक कीटाणुओं की नाशक है, शरीर में रोगाणुओं, अन्तःकरण के कुविचार-दुर्भावों, परिवार और समाज में व्याप्त दुष्टता-मूढ़ता आदि के निवारण की प्रेरणा देती है। शरीर को पुष्ट कर, प्राण ऊर्जा की अभिवृद्धि कर सत्प्रवृत्तियों के पोषण की सार्मथ्य पैदा करती है। पीपल देवयोनि का वृक्ष माना जाता है। देवत्व के परमार्थ के संस्कार इसमें सन्निहित हैं। उनका वरण, धारण और विकास किया जाए। सूँघने और पान करने का तात्पर्य श्रेष्ठ संस्कारों का वरण करने, उन्हें आत्मसात् करने की व्यवस्था बनाना है। आहार तथा दिनचर्या का निर्धारण ऐसा किया जाए जिससे महापुरुषों के अध्ययन, श्रवण, चिन्तन द्वारा गर्भिणी अपने में, अपने गर्भ में श्रेष्ठ संस्कार पहुँचाए। इस कार्य में परिजन उसका सहयोग करें।

क्रिया भावना :
औषधि की कटोरी गर्भिणी के हाथ में दी जाए। वह दोनों हाथों में उसे पकड़े। मन्त्र बोला जाए, गर्भिणी नासिका के पास औषधि को ले जाकर धीरे-धीरे श्वास के साथ उसकी गन्ध धारण करे। भावना की जाए कि औषधियों के श्रेष्ठ गुण और संस्कार खींजे जा रहे हैं। वेद मन्त्रों तथा दिव्य वातावरण द्वारा इस उद्देश्य की पूर्ति में सहयोग मिल रहा है।

शिक्षण एवं प्रेरणा:
गर्भ के माध्यम से प्रकट होने वाले जीव को अपेक्षा होती है कि उसे विकास के लिए सही वातावरण मिलेगा। जिस सत्ता ने गर्भ प्रदान किया है, वह भी उस उत्तरदायित्व को पूरा होते देखना चाहती है। दोनों को आश्वस्त किया जाना चाहिए कि उन्हें निराश नहीं होना पड़ेगा। पहला आश्वासन गर्भिणी दे। वह अपने र्कत्तव्य का ध्यान रखे। आहार-विहार, चिन्तन सही रखे। दूसरों के व्यवहार और वातावरण की शिकायत करने में समय और शक्ति न गँवाकर, धैर्यपूर्वक गर्भ को श्रेष्ठ संस्कार देने का प्रयास करे। प्रसन्न रहे, ईष्र्या, द्वेष, क्रोध आदि मनोविकारों से बचती रहे। धैर्यपूर्वक उज्ज्वल भविष्य की कामना करे। दूसरा आश्वासन उसके पति और परिजनों की ओर से होता है। गर्भिणी माता अपने शरीर तथा रक्त-मांस से बालक का शरीर बनाती है, अपना रक्त सफेद दूध के रूप में निकाल-निकाल कर बच्चे का पोषण करती है, उसके मल-मूत्र, स्नान, वस्त्र तथा दिनचर्या की हर घड़ी साज-सॅभाल रखती है। इतना भार तथा त्याग कुछ कम नहीं। माता इतना करके भी अपने हिस्से की जिम्मेदारी का बहुत बड़ा भाग पूरा कर लेती है। अब शिशु को सुसंस्कारी बनाने की उपयुक्त परिस्थितियाँ उत्पन्न करना, पिता का काम रह जाता है। उसे पूरा करने के लिए उतना ही त्याग करना, उतना ही कष्ट सहना और उतना ही ध्यान रखना, पिता का और परिजनों का भी र्कत्तव्य है। सब मिलकर प्रयास करें कि गर्भ पर अभाव और कुसंस्कारों की छाया न पड़ने पाए। गर्भिणी गलत आकांक्षाएँ पास न आने दे। परिजन उसकी उचित आकांक्षाएँ जानें और पूरी करें। क्या खाना चाहती है? यही पूछना पर्याप्त नहीं, कैसा व्यवहार चाहती है? यह भी पूछा जाय, समझा जाए और पूरा किया जाए।

गर्भ पूजनशिक्षण एवं प्रेरणा:
गर्भ कौतुक नहीं, एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। उसे समझा जाए और उस जिम्मेदारी को उठाने की तैयारी मानसिक तथा व्यावहारिक क्षेत्र में की जाए। गर्भ के माध्यम से जो जीव प्रकट होना चाहता है, उसे ईश्वर का प्रतिनिधि मानकर उसके लिए समुचित व्यवस्था बनाकर, उसके स्वागत की तैयारी करनी चाहिए। गर्भ पूज्य है। कोई पूज्य व्यक्ति सामने हो, तो अपने स्वभाव तथा परस्पर के द्वेष-वैर को भुलाकर भी शालीनता का वातावरण बनाया जाता है। गर्भ के लिए भी ऐसा ही किया जाए। गर्भ का पूजन केवल एक सामयिकता औपचारिकता न रह जाए। संस्कारित करने के लिए पूजा उपासना का सतत प्रयोग चले। घर में आस्तिकता का वातावरण रहे। गर्भिणी स्वयं भी नियमित उपासना करे। उसे आहार और विश्राम जितना ही महत्त्वपूर्ण मानकर चलाया जाए। अधिक न बने, तो गायत्री चालीसा पाठ एवं पंचाक्षरी मन्त्र 'ॐ र्भूभुवः स्वः' का जप ही कर लिया करे।

क्रिया और भावना:
गर्भ पूजन के लिए गर्भिणी के घर परिवार के सभी वयस्क परिजनों के हाथ में अक्षत, पुष्प आदि दिये जाएँ। मन्त्र बोला जाए। मंत्र समाप्ति पर एक तश्तरी में एकत्रित करके गर्भिणी को दिया जाए। वह उसे पेट से स्पर्श करके रख दे। भावना की जाए, गर्भस्थ शिशु को सद्भाव और देव अनुग्रह का लाभ देने के लिए पूजन किया जा रहा है। गर्भिणी उसे स्वीकार करके गर्भ को वह लाभ पहुँचाने में सहयोग कर रही है।

ॐ सुपर्णोऽसि गरुत्माँस्त्रिवृत्ते शिरो, गायत्रं चक्षुबरृहद्रथन्तरे पक्षौ।
स्तोमऽआत्मा छन्दा स्यंगानि यजूषि नाम।
साम ते तनूर्वामदेव्यं, यज्ञायज्ञियं पुच्छं धिष्ण्याः शफाः।
सुपर्णोऽसि गरुत्मान् दिवं गच्छ स्वःपत॥ -१२.४

क्रिया और भावना
गर्भिणी अपना दाहिना हाथ पेट पर रखे। पति सहित परिवार के सभी परिजन अपना हाथ गर्भिणी की तरफ आश्वासन की मुद्रा में उठाएँ। मन्त्र पाठ तक वही स्थिति रहे। भावना की जाए कि गर्भिणी गर्भस्थ शिशु तथा दैवी सत्ता को आश्वस्त कर रही है। सभी परिजन उसके इस प्रयास में भरपूर सहयोग देने की शपथ ले रहे हैं। इस शुभ संकल्प में दैवी शक्तियाँ सहयोग दे रही है। इस श्रेष्ठ संकल्प-पूर्ति की क्षमता दे रही हैं।

ॐ यत्ते ससीमे हृदये हितमन्तः प्रजापतौ।
मन्येऽहं मां तद्विद्वांसं, माहं पौत्रमघन्नियाम्॥ - आश्व०गृ०सू० १.१३
आश्वास्तना के बाद अग्नि स्थापन से लेकर गायत्री मन्त्र की आहुतियाँ पूरी करने का क्रम चलाएँ। उसके बाद विशेष आहुतियाँ प्रदान करें।

विशेष आहुति शिक्षण एवं प्रेरणा
यज्ञीय जीवन भारतीय संस्कृति की विशेष उपलब्धि है। जीवन का हर चरण एक आहुति है। कृत्य विशेष को यज्ञमय बनाने के लिए विशेष क्रम बनाने होते हैं। विशेष आहुति उसी बोध को जीवन्त बनाती है। यज्ञ में पोषक, सात्त्विक पदार्थ खीर की आहुति डाली जाती है। इसी प्रकार अंतःकरण में दूध की तरह श्वेत, कलुषरहित भावों का संचार करें। दूध में घी समाया रहता है, अपने चिन्तन एवं आचरण में स्नेह समाया रहे। गर्भिणी स्वयं भी तथा परिवार के परिजन मिलकर गर्भस्थ शिशु के लिए ऐसा ही परमार्थपरक वातावरण बनाएँ।

क्रिया और भावना
गायत्री मन्त्र की आहुतियाँ हो जाने के बाद खीर की पाँच आहुतियाँ विशेष मन्त्र से की जाएँ। भावना की जाय कि दिव्य मन्त्र शक्ति के संयोग से गर्भस्थ शिशु और सभी परिजनों के लिए अभीष्ट मंगलमय वातावरण बन रहा है।

ॐ धातादधातु दाशुषे, प्राचीं जीवातुमक्षिताम्।
वयं देवस्य धीमहि, सुमतिं वाजिनीवतः स्वाहा।
इदं धात्रे इदं न मम॥ -आश्व०गृ०सू० १.१४

चरु प्रदान शिक्षण एवं प्रेरणा
यज्ञ से बची खीर गर्भिणी को सेवन के लिए दी जाती है। यज्ञ से संस्कारित अन्न ही मन में देवत्व की वृत्तियाँ पैदा करता है। स्वार्थ वृत्ति से स्वाद को लक्ष्य करके तैयार किया गया भोजन अकल्याणकारी होता है। आहार प्रभु का प्रसाद बनाकर लिया जाए। बिना भोग लगाये न खाना, संयम की वृत्ति को पैदा करता है, पुष्ट करता है। नित्य का आहार भी यज्ञीय संस्कार युक्त हो, इसके लिए घर में बलिवैश्व परम्परा डाली जानी चाहिए। गर्भिणी विशेष रूप से नित्य बलिवैश्व करके, यज्ञ का प्रसाद बनाकर ही भोजन ले। भोजन में सात्विक पदार्थ हों। उत्तेजक, पेट और वृत्तियों को खराब करने वाले पदार्थ न हों। उन्हीं में रस लिया जाए।

क्रिया और भावना:

विशेष आहुतियों के बाद शेष बची खीर प्रसाद रूप में एक कटोरी में गर्भिणी को दी जाए। वह उसे लेकर मस्तक से लगाकर रख ले। सारा कृत्य पूरा होने पर पहले उसी का सेवन करे। भावना करे कि यह यज्ञ का प्रसाद दिव्य शक्ति सम्पन्न है। इसके प्रभाव से राम-भरत जैसे नर पैदा होते हैं। ऐसे संयोग की कामना की जा रही है।
ॐ पयः पृथिव्यां पयऽओषधिषु, पयो दिव्यन्तरिक्षे पयोधाः।
पयस्वतीः प्रदिशः सन्तु मह्यम्। -यजु० १८.३६

आशीर्वचन
सारा कृत्य पूरा हो जाने पर विसर्जन के पूर्व आशीर्वाद दिया जाए। आचार्य गर्भिणी को शुभ मन्त्र बोलते हुए फल-फूल आदि दें। गर्भिणी साड़ी के आँचल में ले। अन्य बुजुर्ग भी आशीर्वाद दे सकते हैं। सभी लोग पुष्प वृष्टि करें। गर्भिणी एवं उसका पति बड़ों के चरण स्पर्श करें, सबको नमस्कार करें।
विसर्जन और जयघोष करके आयोजन समाप्त किया जाए।

★★


3. सीमन्तोन्नयन संस्कार – Simantonnyan Sanskar :

सीमन्तोन्नयन संस्कार हिन्दू धर्म संस्कारों में तृतीय संस्कार है। सीमन्तोन्नयन को सीमन्तकरण अथवा सीमन्त संस्कार भी कहते हैं। यह संस्कार पुंसवन का ही विस्तार है। इसका शाब्दिक अर्थ है- "सीमन्त" अर्थात् 'केश और उन्नयन' अर्थात् 'ऊपर उठाना'। संस्कार विधि के समय पति अपनी पत्नी के केशों को संवारते हुए ऊपर की ओर उठाता था, इसलिए इस संस्कार का नाम 'सीमंतोन्नयन' पड़ गया। यह संस्कार गर्भ के छठे या आठवें महीने में किया जाता है। इस संस्कार का फल भी गर्भ की शुद्धि ही है। इस समय गर्भ में पल रहा बच्चा सीखने के काबिल हो जाता है। उसमें अच्छे गुण, स्वभाव और कर्म आएं, इसके लिए माँ उसी प्रकार आचार-विचार, रहन-सहन और व्यवहार करती है। महाभक्त प्रह्लाद को देवर्षि नारद का उपदेश तथा अभिमन्यु को चक्रव्यूह प्रवेश का उपदेश इसी समय में मिला था। अतः माता-पिता को चाहिए कि वे इन दिनों विशेष सावधानी के साथ योग्य आचरण करें।

सीमन्तोन्नयन का अभिप्राय है सौभाग्य संपन्न होना। गर्भपात रोकने के साथ-साथ गर्भस्थ शिशु एवं उसकी माता की रक्षा करना भी इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य है। इस संस्कार के माध्यम से गर्भिणी स्त्री का मन प्रसन्न रखने के लिये सौभाग्यवती स्त्रियां गर्भवती की मांग भरती हैं।

सनातन धर्म में स्त्रियों को शिक्षित होना अनिवार्य है इसी समय गर्भिणी को वेद एवं शास्त्रों का अध्ययन कराया जाता है। जब गर्भिणी शिक्षित, मानसिक बल एवं सकारात्मक विचारों  से युक्त होगी तभी शिशु भी शक्तिशाली व विद्वान होगा क्योंकि शिशु का लगभग 90 % बौद्धिक विकास गर्भ में हो जाता है।

विधि :
इस संस्कार को करते समय शास्त्रवर्णित गूलर वनस्पति द्वारा गार्भिणी पत्नी के सीमंत (मांग) का  पृथक् करणादि क्रियाएं करते हुए पति को निम्नलिखित मंत्रोच्चारण करना चाहिए -

ॐ भूर्विनयामि, ॐ भूर्विनयामि, ॐ भूर्विनयामि,
येनादितेः सीमानं नयाति प्रजापतिर्महते सौभगाय।
तेनाहमस्यौ सीमानं नयामि प्रजामस्यै जरदष्टिं कृणोमि॥
अर्थात् : जिस प्रकार देवमाता अदिति का सीमंतोन्नयन प्रजापति ने किया था, उसी प्रकार मैं इस गार्भिणी का सीमंतोन्नयन करके इसके पुत्र को जरावस्थापर्यंत दीर्घजीवी करता हूं।

संस्कार के अंत में वृद्धा ब्राह्मणियों, अथवा परिवार या आस-पड़ोस की बुजूर्ग महिला का आशीर्वाद लेना चाहिये। आशीर्वाद के पश्चात गर्भवती महिला को खिचड़ी में अच्छे से घी मिलाकर खिलाये जाने का विधान भी है। इस बारे में एक उल्लेख भी शास्त्रों में मिलता है - परिवार की महिलाओं द्वारा पत्नी को आशीर्वाद दिलवाएं। सीमंतोन्नयन-संस्कार में पर्याप्त घी मिली खिचड़ी खिलाने का विधान है। इसका उल्लेख गोभिल गृहयसूत्र में इस प्रकार किया गया है।

किं पश्यास्सीत्युक्तवा प्रजामिति वाचयेत् तं सा स्वयं।
भुज्जीत वीरसूर्जीवपत्नीति ब्राह्मण्यों मंगलाभिर्वाग्भि पासीरन्॥

अर्थात् : खिचड़ी खिलाते समय स्त्री से सवाल किया गया कि क्या देखती हो तो वह जवाब देते हुए कहती है कि संतान को देखती हूं इसके पश्चात वह खिचड़ी का सेवन करती है। संस्कार में उपस्थित स्त्रियां भी फिर आशीर्वाद देती हैं कि तुम्हारा कल्याण हो, तुम्हें सुंदर स्वस्थ संतान की प्राप्ति हो व तुम सौभाग्यवती बनी रहो।
इसमें कोई संदेह नहीं की गर्भस्थशिशु बहुत ही संवेदनशील होता है। सती मदालसा के बारे में कहा जाता है की वह अपने बच्चे के गुण, कर्म और स्वभाव की पूर्व घोषणा कर देती थी, फिर उसी प्रकार निरंतर चिंतन, क्रिया-कलाप, रहन-सहन, आहार-विहार और बर्ताव अपनाती थी, जिससे बच्चा उसी मनोभूमि ढल जाता है, जैसा कि वह चाहती थी।

उदाहरण : -
  • भक्त प्रह्लाद की माता कयाधू को देवर्षि नारद भगवदभक्ति के उपदेश दिया करते थे, जो प्रहलाद ने गर्भ में ही सुने थे।
  • व्यासपुत्र शुकदेव ने अपनी माँ के गर्भ में सारा ज्ञान प्राप्त कर लिया था।
  • अर्जुन ने अपनी गर्भवती पत्नी सुभद्रा को चक्रव्यूहभेदन की जो शिक्षा दी थी, वह सब गर्भस्थशिशु अभिमन्यु सीख ली थी | उसी शिक्षा के आधार पर सोलह वर्ष की आयु में ही अभिमन्यु ने अकेले सात महारथियों से युद्ध कर चक्रव्यूह-भेदन किया
अलग अलग जगह इस संस्कार को अलग अलग नाम से जाना जाता है। 

★★★

4.जातकर्म संस्कार Jatkarm Sanskar : -
हिंदू धर्म में चतुर्थ संस्कार है जातकर्म । हिंदू धर्म के 16 संस्कारों पर आधारित लेखों की श्रृंखला में हम अभी तक आपको पहले तीन संस्कारों के बारे में बता चुके हैं। पहले के तीनों संस्कार गर्भाधान से लेकर गर्भावस्था तक शिशु में संस्कारों का संचार करने व गर्भ को सुरक्षित व स्वस्थ रखने के लिये किये जाते हैं। इन तीनों संस्कारों के नाम हैं गर्भाधान जो गर्भधारण के समय किया जाता है इसके पश्चात पुंसवन संस्कार किया जाता है जो कि गर्भ धारण के तीसरे माह में किया जाता है। तीसरा संस्कार सीमंतोन्नयन है जो कि चौथे, छठे या आठवें महीने में किया जाता है। आमतौर पर इसे आठवें महीने में ही किया जाता है। जैसे ही शिशु का जन्म होता है तो उस समय भी एक संस्कार किया जाता है इस संस्कार को कहा जाता है जातकर्म संस्कार। आइये जानते हैं हिंदू धर्म में किये जाने वाले चतुर्थ संस्कार जातकर्म के बारे में।

जातकर्म : 
जन्म के बाद नवजात शिशु के नालच्छेदन (यानि नाल काटने) से पूर्व इस संस्कार को करने का विधान है। इस दैवी जगत् से प्रत्यक्ष सम्पर्क में आनेवाले बालक को मेधा, बल एवं दीर्घायु के लिये स्वर्ण खण्ड से मधु एवं घृत गुरु मंत्र के उच्चारण के साथ चटाया जाता है। दो बूंद घी तथा छह बूंद शहद का सम्मिश्रण अभिमंत्रित कर चटाने के बाद पिता बालक के बुद्धिमान, बलवान, स्वस्थ एवं दीर्घजीवी होने की प्रार्थना करता है। इसके बाद माता बालक को स्तनपान कराती है।(यह स्तनपान विज्ञान  के अनुसार जन्म होने के आधे घंटे  अन्तर्गत कराये जाने वाला स्तनपान है, जिसको हिन्दू धर्म में हजारो वर्ष पहले से बताया जा चूका है।)

जातकर्म संस्कार का महत्व :
गर्भस्थ बालक के जन्म होने पर यह संस्कार किया जाता है - 'जाते जातक्रिया भवेत्।' इसमें सोने की शलाका से विषम मात्रा में घृत और मधु घिस करके बालक को चटाया जाता है। इससे माता के गर्भ में जो रस पीने का दोष है, वह दूर हो जाता है और बालक की आयु तथा मेधाशक्ति को बढ़ाने वाली औषधि बन जाती है। सुवर्ण वातदोष को दूर करता है। मूत्र को भी स्वच्छ बना देता है और रक्त के ऊर्ध्वगामी दोष को भी दूर कर देता है। मधु लाला (लार)-का संचार करता है और रक्त का शोधक होने के साथ-साथ बलपुष्टिकारक भी है।

जातकर्म संस्कार की विधि :
इस संस्कार में जातक के जन्म लेते ही कई प्रकार की क्रियाएं की जाती हैं। सर्वप्रथम सोने की श्लाका से विषम मात्रा में घी और शहद को विषम मात्रा में मिलाकर उसे शिशु को चटाया जाता है। मान्यता है कि यह नवजात शिशु के लिये एक प्रकार कि औषधि का काम भी करता है। शिशु के जन्म लेने पर पिता को अपने कुल देवता व घर के बड़े बुजूर्गों को नमस्कार करने के पश्चात ही पुत्र का मुख देखना चाहिये। इसके तुंरत बाद किसी नदी या तालाब या किसी पवित्र धार्मिक स्थल पर उत्तर दिशा में मुख कर स्नान करना चाहिये। मान्यता यह भी है कि यदि शिशु का जन्म मूल-ज्येष्ठा या फिर किसी अन्य अशुभ मुहूर्त में हुआ हो तो पिता को शिशु का मुख देखे बिना ही स्नान करना चाहिये।

जातकर्म संस्कार के दौरान की जाने वाली क्रियाएं :
इस संस्कार में बच्चे को स्नान कराना, मुख आदि साफ करना, मधु व घी चटाना, स्तनपान, आयुप्यकरण आदि कर्म किये जाते हैं। क्योंकि जातक के जन्म लेते ही घर में सूतक माना जाता है इस कारण इन कर्मों को संस्कार का रूप दिया जाता है। मान्यता है कि इस संस्कार से माता के गर्भ में रस पान संबंधी दोष, सुवर्ण वातदोष, मूत्र दोष, रक्त दोष आदि दूर हो जाते हैं व जातक मेधावी व बलशाली बनता है।
स्नान : शिशु के जन्म के पश्चात बच्चे के शरीर पर उबटन लगाया जाता है। उबटन में चने का बारीक आटा यानि बेसन की बजाय मसूर या मूंग का बारीक आटा सही रहता है। इसके पश्चात शिशु का स्नान किया जाता है।

मुख साफ करना
मान्यता है कि गर्भ में शिसु श्वास नहीं लेता और न ही मुख खुला होता है। प्राकृतिक रूप से ये बंद रहते हैं और इनमें कफ भरी होती है। लेकिन जैसे ही शिशु का जन्म होता है तो कफ को निकाल कर मुख साफ करना बहुत आवश्यक होता है। इसके लिये मुख को ऊंगली से साफ कर शिशु को वमन कराया जाता है ताकि कफ बाहर निकले इसके लिये सैंधव नमक बढ़िया माना जाता है। इसे घी में मिलाकर दिया जाता है।

तालु में तेल या घी लगाना
तालु की मज़बूती के लिये नवजात क तालु पर घी या तेल लगाया जाता है। मान्यता है कि जिस तरह कमल के पत्ते पर पानी नहीं ठहरता उसी प्रकार स्वर्ण खाने वाले को विष प्रभावित नहीं करता। अर्थात संस्कार से शिशु की बुद्धि, स्मृति, आयु, वीर्य, नेत्रों की रोशनी या कहें कुल मिलाकर शिशु को संपूर्ण पोषण मिलता है व शिशु सुकुमार होता है।

उपरोक्त उपचार व प्रयोग प्रचलित मान्यताओं पर आधारित हैं। शिशु जन्म पर कोई भी क्रिया करने से पहले चिकित्सकीय परामर्श अवश्य लें।
★★★★

5. नामकरण संस्कार Namkaran Sanskar
ना मकरण संस्कार कई जगह इसे छठ्ठी के नाम से जाना जाता है। यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि मनुष्य को जिस तरह के नाम से पुकारा जाता है, उसे उसी प्रकार की छोटी सी अनुभूति होती रहती है। यदि किसी को कूड़ेमल, घूरेमल, नकछिद्दा, नत्थो, घसीटा आदि नामों से पुकारा जायेगा, तो उसमें हीनता के भाव ही जाएगी। नाम सार्थक बनाने की कई हलकी, अभिलाषाएँ मन में जगती रहती है। पुकारने वाले भी किसी के नाम के अनुरूप उसके व्यक्तित्व की हल्की या भारी कल्पना करते हैं। इसलिए नाम का अपना महत्त्व है। उसे सुन्दर ही चुना और रखा जाए।

बालक का नाम रखते समय निम्न बातों का ध्यान रखें। गुणवाचक नाम रखे जाएँ, पुत्र एवं पुत्री के नामों की एक बड़ी सूची बनाई जा सकती है। उसी में से छाँटकर लड़के और लड़कियों के उत्साहवर्धक, सौम्य एवं प्रेरणाप्रद नाम रखने चाहिए। समय-समय पर बालकों को यह बोध भी कराते रहना चाहिए कि उनका यह नाम है, इसलिए गुण भी अपने में वैसे ही पैदा करने चाहिए।

नक्षत्र या राशियों के अनुसार नाम रखने से लाभ यह है कि इससे जन्मकुंडली बनाने में आसानी रहती है। नाम भी बहुत सुन्दर और अर्थपूर्ण रखना चाहिये। अशुभ तथा भद्दा नाम कदापि नहीं रखना चाहिये।

शिशु कन्या है या पुत्र, इसके भेदभाव को स्थान नहीं देना चाहिए। भारतीय संस्कृति में कहीं भी इस प्रकार का भेद नहीं है। शीलवती कन्या को दस पुत्रों के बराबर कहा गया है । ‘दश पुत्र-समा कन्या यस्य शीलवती सुता। इसके विपरीत पुत्र भी कुल धर्म को नष्ट करने वाला हो सकता है।

आमतौर से यह संस्कार जन्म के दसवें दिन किया जाता है। उस दिन जन्म सूतिका का निवारण-शुद्धिकरण भी किया जाता है। यह प्रसूति कार्य घर में ही हुआ हो, तो उस कक्ष को लीप-पोतकर, धोकर स्वच्छ करना चाहिए। शिशु तथा माता को भी स्नान कराके नये स्वच्छ वस्त्र पहनाये जाते हैं। यदि दसवें दिन किसी कारण नामकरण संस्कार न किया जा सके। तो अन्य किसी दिन, बाद में भी उसे सम्पन्न करा लेना चाहिए। घर पर, प्रज्ञा संस्थानों अथवा यज्ञ स्थलों पर भी यह संस्कार कराया जाना उचित है।

कई कर्मकांडी का मानना है कि जन्म के ग्यारहवें दिन यह संस्कार होता है। हमारे धर्माचार्यो ने जन्म के दस दिन तक अशौच (सूतक) माना है। इसलिये यह संस्कार ग्यारहवें दिन करने का विधान है। महर्षि याज्ञवल्क्य का भी यही मत है, लेकिन अनेक कर्मकाण्डी विद्वान इस संस्कार को शुभ नक्षत्र अथवा शुभ दिन में करना उचित मानते हैं।

नामकरण संस्कार संपन्न करने के संबंध में अलग-अलग स्थानों पर समय की विभिन्नताएं सामने आई हैं। जन्म के १०वें दिन सूतिका का शुद्धिकरण यज्ञ कराकर नामकरण संस्कार कराया जाता है। गृह्यसुत्र परामर्श अनुसार दशम्यामुत्थाप्य पिता नामकरनम करोति अर्थात् दसवें दिन सूतक निवृति के बाद नामकरण संस्कार कर देना चाहिए। किसी किसी ग्रन्थ में १०० वें दिन या एक वर्ष के अंदर इस संस्कार को करने का विधान है। 

गोभिल गृह्यसुत्र के अनुसार
जननादृशरात्रे व्युष्टे शतरात्रे संवत्सरे वा नामधेयकरणम्  अर्थात जन्म के 10 वें दिन में 100 वें दिन में या 1 वर्ष के अंदर जातक का नामकरण संस्कार कर देना चाहिए।

आयुर्वेडभिवृद्धिश्च सिद्धिर्व्यवहतेस्तथा।
नामकर्मफलं त्वेतत् समुद्दिष्टं मनीषिभिः॥
अर्थात नामकरण-संस्कार से तेज़ तथा आयु की वृद्धि होती है। लौकिक व्यवहार में नाम की प्रसिद्धि से व्यक्ति का अस्तित्व बनता है।

इसके पश्चात् प्रजापति, तिथि, नक्षत्र तथा उनके देवताओं, अग्नि तथा सोम की आहुतियां दी जाती हैं। तत्पश्चात् पिता, बुआ या दादी शिशु के दाहिने कान की ओर उसके नाम का उच्चारण करते हैं। इस संस्कार में बच्चे को शहद चटाकर और प्यार-दुलार के साथ सूर्यदेव के दर्शन कराए जाते हैं।

नामकरण संस्कार का सनातन धर्म में अधिक महत्व है। हमारे मनीषियों ने नाम का प्रभाव इसलिये भी अधिक बताया है क्योंकि यह व्यक्तित्व के विकास में सहायक होता है। तभी तो यह कहा गया है राम से बड़ा राम का नाम हमारे धर्म विज्ञानियों ने बहुत शोध कर नामकरण संस्कार का आविष्कार किया। ज्योतिष विज्ञान तो नाम के आधार पर ही भविष्य की रूपरेखा तैयार करता है।

इस अवसर पर कामना की जाती है कि बच्चा सूर्य की प्रखरता एवं ते‍जस्विता धारण करे। गुलाब की पंखुरियां उस पर बरसा कर स्वस्ति वाचन किया जाता है। ध्यान रखें बच्चे पर चावल न बरसाएं, छोटा बच्चा बहुत नाजुक होता है चावल से उसे परेशानी हो सकती है साथ ही आंख, कान में चावल जा सकते हैं। गुलाब पंखुरियां भी सावधानी से ही बरसाएं।
★★★★★


6. निष्क्रमण संस्कार Nishkrman Sanskaar

हिंदू धर्म में छठा संस्कार है। हिंदू धर्म में जातक के जन्म से लेकर मृत्यु तक कई संस्कार किये जाते हैं। मुख्यत: सोलह संस्कार जीवन पर्यंत किये जाते हैं। पहला संस्कार गर्भधारण के दौरान किया जाता है तो अंतिम संस्कार अंत्येष्टि होता है। संस्कार आधारित लेखों में पांच संस्कारों के बारे में हमने बताया है जो गर्भधारण से लेकर जातक का नामकरण होने तक किये जाते हैं। नामकरण पांचवां संस्कार है इसके पश्चात आता है निष्क्रमण संस्कार। यह संस्कार तब आयोजित किया जाता है जब जातक को पहली बार घर से बाहर निकाला जाता है। निष्क्रमण का अर्थ ही बाहर निकालना होता है। आइये जानते हैं इस संस्कार के बारे में।

निष्क्रमण संस्कार का महत्व :
निष्क्रमणादायुषो वृद्धिरप्युदृष्टा मनीषिभि
हिंदू धर्म में किये जाने वाले सभी संस्कारों का अपना खास महत्व होता है। इन संस्कारों का उद्देश्य जातक में सद्गुणों का संचार करना तो होता ही है साथ ही जातक के बेहतर स्वास्थ्य की कामना भी होती है। कुछ संस्कार आध्यात्मिक रूप से जुड़े होते हैं। निष्क्रमण संस्कार जातक के स्वास्थ्य व उसकी दीर्घायु की कामना के लिये किया जाता है। धार्मिक ग्रंथों में वर्णन भी मिलता है

कब किया जाता है निष्क्रमण संस्कार
निष्क्रमण संस्कार जातक के जन्म के चौथे मास में किया जाता है। मान्यता है कि जातक के जन्म लेते ही घर में सूतक लग जाता है। जन्म के ग्याहरवें दिन नामकरण संस्कार किया जाता है हालांकि यह कुछ लोग १०० वें दिन या जातक के जन्म के एक वर्ष के उपरांत भी करते हैं। लेकिन जन्म के कुछ दिनों तक बालक को घर के बाहर नहीं निकाला जाता। माना जाता है कि इस समय जातक को सूर्य के प्रकाश में नहीं लाना चाहिये क्योंकि इससे जातक के स्वास्थ्य पर कुप्रभाव पड़ सकता है, विशेषकर आंखों को नुक्सान पंहुचने की संभावनाएं अधिक होती हैं। इसलिये जब जातक शारीरिक रूप से स्वस्थ हो जाये तो ही उसे घर से बाहर निकालना चाहिये यानि निष्क्रमण संस्कार करना चाहिये।

निष्क्रमण संस्कार की विधि
निष्क्रण संस्कार के दिन प्रात:काल उठकर तांबे के एक पात्र में जल लेकर उसमें रोली, गुड़, लालपुष्प की पंखुड़ियां आदि का मिश्रण करें व इस जल से सूर्यदेवता को अर्घ्य देते हुए बालक को आशीर्वाद देने के लिये उनका आह्वान करें। संस्कार के प्रसाद में सबसे पहले गणेश जी, गाय, सूर्यदेव, व अपने पितरों, कुलदेवताओं आदि के लिये भोजन की थाली अलग से निकाल लें। संस्कार क्रिया के पश्चात लाल बैल को सवा किलो गेंहू व सवा किलो गुड़ भी खिलाना चाहिये। सूर्यास्त के समय ढ़लते सूरज को भी प्रणाम कर शिशु को आशीर्वाद देने के लिये सूर्य देवता का धन्यवाद करना चाहिये। इस पश्चात चंद्रमा के दर्शन भी विधिपूर्वक करवाने चाहिये।
इस संस्कार से संबंधित निम्न मंत्र भी अथर्ववेद में मिलता है –

शिवे ते स्तां द्यावापृथिवी असंतापे अभिश्रियौ।
शं ते सूर्य आ तपतुशं वातो वातु ते हृदे।
शिवा अभि क्षरन्तु त्वापो दिव्या: पयस्वती:॥
इसका अभिप्राय है कि बालक के निष्क्रमण के समय देवलोक से लेकर भू लोक तक कल्याणकारी, सुखद व शोभा देने वाला रहे। सूर्य का प्रकाश शिशु के लिये कल्याणकारी हो व शिशु के हृद्य में स्वच्छ वायु का संचार हो। पवित्र गंगा यमुना आदि नदियों का जल भी तुम्हारा कल्याण करें।
★★★★★★


7. अन्नप्राशन संस्कार – Annaprashan Sanskar:

धर्म संस्कारों में अन्नप्राशन संस्कार सप्तम संस्कार है | इस संस्कार में बालक को अन्न ग्रहण कराया जाता है | अब तक तो शिशु माता का दुग्धपान करके ही वृद्धि को प्राप्त होता था, अब आगे स्वयं अन्न ग्रहण करके ही शरीर को पुष्ट करना होगा, क्योंकि प्राकृतिक नियम सबके लिये यही है | अब बालक को परावलम्बी न रहकर धीरे-धीरे स्वावलम्बी बनना पड़ेगा | केवल यही नहीं, आगे चलकर अपना तथा अपने परिवार के सदस्यों के भी भरण-पोषण का दायित्व संम्भालना होगा | यही इस संस्कार का तात्पर्य है |

हमारे धर्माचार्यो ने अन्नप्राशन के लिये जन्म से छठे महीने को उपयुक्त माना है। छठे मास में शुभ नक्षत्र एवं शुभ दिन देखकर यह संस्कार करना चाहिए। खीर और मिठाई से शिशु के अन्नग्रहण को शुभ माना गया है। अमृत: क्षीरभोजनम् हमारे शास्त्रों में खीर को अमृत के समान उत्तम माना गया है।

अन्नप्राशन संस्कार का महत्व
“अन्नाशनान्मातृगर्भे मलाशाद्यपि शुद्धयति” इसका अर्थ है कि माता के गर्भ में रहते हुए जातक में मलिन भोजन के जो दोष आते हैं उनके निदान व शिशु के सुपोषण हेतु शुद्ध भोजन करवाया जाना चाहिये। छह मास तक माता का दूध ही शिशु के लिये सबसे बेहतर भोजन होता है इसके पश्चात उसे अन्न ग्रहण करवाना चाहिये इसलिये अन्नप्राशन संस्कार का बहुत अधिक महत्व है। शास्त्रों में भी अन्न को ही जीवन का प्राण बताया गया है। अन्न से ही मन का निर्माण बताया जाता है इसलिये अन्न का जीवन में बहुत अधिक महत्व है। कहा भी गया है कि आहारशुद्धौ सत्वशुद्धि

कब करना चाहिए अन्नप्राशन संस्कार
अन्नप्राशन संस्कार जन्म के बाद छठे या सातवें महीने में किया जाता है। दरअसल 6 महीने तक बच्चे को मां का दूध ही देने चाहिए। बच्चा सातवें में महीने में जाकर हल्का भोजन पचाने में सक्षम हो जाता है, इसके अलावा इसी समय से बच्चे के दांत भी निकलने लगते हैं। ऐसे में यह संस्कार सांतवें महीने में करना चाहिए। संस्कार के लिए शुभ नक्षत्र तिथि निकलवानी चाहिए। वैसे कई जगह लड़के का अन्नप्राशन सम माह यानी जन्म के छठे या आठवें माह में किया जाता है, जबकि लड़कियों का अन्नप्राशन संस्कार विषम माह यानी जन्म के पांचवें या सातवें माह में किया जाता है।

मंदिर या घर कहीं भी कर सकते हैं अन्नप्राशन संस्कार इस संस्कार को लेकर कई लोग सिर्फ इसलिए कंफ्यूज रहते हैं कि आखिर इसे कहां करना चाहिए। आयोजन को लेकर हर जगह अलग-अलग मान्यता है। कोई इसे मंदिर में मनाता है तो कोई घर में ही मनाता है। विद्वानों कहते हैं कि इसे घर, मंदिर या कम्यूनिटी सेंटर कहीं भी मनाया जा सकता है। बस पैरेंट्स इसकी विधि का ठीक से पालन करें।

ऐसे किया जाता है अन्नप्राशन संस्कार
इस संस्कार के दौरान शिशु को भात, दही, शहद और घी आदि को मिलाकर खिलाया जाता है। संस्कार के लिए पंडित से शुभमुहूर्त देखकर उसमें देवताओं की पूजा करें। देवताओं की पूजा के बाद चांदी के चम्मच से खीर आदि का प्रसाद शिशु को मंत्रोच्चारण के साथ चटाएं।

अन्नप्राशन संस्कार के दौरान ज्यादा भीड़ न जुटाएं। हो सकता है अधिक लोगों को देखकर आपका बच्चा परेशान हो जाए। इस कार्यक्रम के दौरान बच्चे को भारी-भरकम ड्रेस पहनाने से बचें। इससे बच्चा असहज महसूस करने लगता है। इसके अलावा उसके शरीर पर रेशेज की समस्या भी हो सकती है। इसलिए बच्चे को हल्के व ढीले कपड़े पहनाएं। इस संस्कार के दौरान कई जगह कई लोग बच्चे को खाना खिलाते हैं। इस मौके पर आपको थोड़ा अलर्ट होने की जरूरत है। दरअसल छोटी उम्र में बच्चा बहुत ज्यादा भोजन पचा नहीं सकता, इसलिए उसे ज्यादा खिलाने से बचें।
★★★★★★★

8.चूड़ाकर्म (मुंडन) संस्कार MUNDAN SANSKAR :

शिशु जब माता के गर्भ से बाहर आता है तो उस समय उसके केश अशुद्ध होते हैं। शिशु के केशों की अशुद्धि दूर करने की क्रिया ही चूड़ाकर्म संस्कार कही जाती है। दरअसल हमारा सिर में ही मस्तिष्क (दिमाग) भी होता है इसलिये इस संस्कार को मस्तिष्क की पूजा करने का संस्कार भी माना जाता है। जातक का मानसिक स्वास्थ्य अच्छा रहे व वह अपने दिमाग को सकारात्मकता के साथ सार्थक रुप से उसका सदुपयोग कर सके यही चूड़ाकर्म संस्कार का उद्देश्य भी है। इस संस्कार से शिशु के तेज में भी वृद्धि होती है।

मुंडन से लाभ - 
बाल कटवाने से शरीर की अनावश्यक गर्मी निकल जाती है, दिमाग व सिर ठंडा रहता है व बच्चों में दांत निकलते समय होने वाला सिर दर्द व तालु का कांपना बंद हो जाता है। शरीर पर और विशेषकर सिर पर विटामिन-डी (धूप के रूप) में पड़ने से कोशिकाएं जाग्रत होकर खून का प्रसारण अच्छी तरह कर पाती हैं जिनसे भविष्य में आने वाले केश बेहतर होते हैं।

कब करें मुंडन संस्कार
मनुस्मृति के अनुसार द्विजातियों को प्रथम अथवा तृतीय वर्ष में यह संस्कार करना चाहिये। अन्नप्राशन संस्कार के कुछ समय पश्चात प्रथम वर्ष के अंत में इस संस्कार को किया जा सकता है। लेकिन तीसरे वर्ष यह संस्कार किया जाये तो बेहतर रहता है। इसका कारण यह है कि शिशु का कपाल शुरु में कोमल रहता है जो कि दो-तीन साल की अवस्था के पश्चात कठोर होने लगता है। ऐसे में सिर के कुछ रोमछिद्र तो गर्भावस्था से ही बंद हुए होते हैं। चूड़ाकर्म यानि मुंडन संस्कार द्वारा शिशु के सिर की गंदगी, कीटाणु आदि दूर हो जाते हैं। इससे रोमछिद्र खुल जाते हैं और नये व घने मजबूत बाल आने लगते हैं। यह मस्तिष्क की रक्षा के लिये भी आवश्यक होता है। कुछ परिवारों में अपनी कुल परंपरा के अनुसार शिशु के जन्म के पांचवे या सातवें साल भी इस संस्कार को किया जाता है।

चूड़ाकर्म संस्कार की विधि 
चूड़ाकर्म संस्कार किसी शुभ मुहूर्त को देखकर किया जाना चाहिये। इस संस्कार को को किसी पवित्र धार्मिक तीर्थ स्थल पर किया जाता है। इसके पिछे मान्यता है कि जातक पर धार्मिक स्थल के दिव्य वातावरण का लाभ मिले। एक वर्ष की आयु में जातक के स्वास्थ्य पर इसका दुष्प्रभाव पड़ने के आसार होते हैं इस कारण इसे पहले साल के अंत में या तीसरे साल के अंत से पहले करना चाहिये। मान्यता है कि शिशु के मुंडन के साथ ही उसके बालों के साथ कुसंस्कारों का शमन भी हो जाता है व जातक में सुसंस्कारों का संचरण होने लगता है। शास्त्रों में लिखा भी मिलता है कि “तेन ते आयुषे वपामि सुश्लोकाय स्वस्त्ये”। इसका तात्पर्य है कि मुंडन संस्कार से जातक दीर्घायु होता है। यजुर्वेद तो यहां तक कहता है कि दीर्घायु के लिये, अन्न ग्रहण करने में सक्षम करने, उत्पादकता के लिये, ऐश्वर्य के लिये, सुंदर संतान, शक्ति व पराक्रम के लिये चूड़ाकर्म अर्थात मुंडन संस्कार करना चाहिये।

नि वर्त्तयाम्यायुषेड्न्नाद्याय प्रजननाय।
रायस्पोषाय सुप्रजास्त्वाय सुवीर्याय॥
अर्थात हे बालक! मैं तेरी दीर्घायु के लिए, तुझे अन्न-ग्रहण करने में समर्थ बनाने के लिए, उत्पादन शाक्ति प्राप्ति के लिए, ऐश्वर्य वृद्धि के लिए, सुंदर संतान के लिए एवं बल तथा पराक्रम प्राप्ति के योग्य होने के लिए तेरा चूडाकर्म संस्कार (मूडंन) करता हूं।

संस्कार कर्म :
सर्व प्रथम शिशु अथवा बालक को गोद में लेकर उसका चेहरा हवन की अग्नि के पश्चिम में किया जाता है। पहले कुछ केश पंडित के हाथ से और फिर नाई द्वारा काटे जाते हैं। इस अवसर पर गणेश पूजन, हवन, आयुष्य होम आदि पंडित जी से करवाया जाता है। फिर बाल काटने वाले को, पंडित आदि को आरती के पश्चात्‌ भोजन व दान दक्षिणा दी जाती है।
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9. कर्णवेधन संस्कार Karn Vedhan Sanskar:

कर्णवेध का अर्थ है कर्ण यानि कान और वेधन का मतलब छेदना अर्थात कान को छेदना। कर्णवेध हिन्दू धर्म में वर्णित 16 संस्कारों में से 9वां संस्कार है। यह क्रमशः अन्नप्राशन और मुंडन संस्कार के बाद किया जाता है। बच्चों को शारीरिक व्याधि से बचाने और श्रवण व बौद्धिक शक्ति को मजबूत बनाने के लिए यह संस्कार किया जाता है। यह संस्कार 3, 5 और 7वें साल में या फिर अपनी कुल परंपरा के अनुसार किया जाता है। इसमें बालकों का दायाँ और बालिकाओं का बायाँ कान छेदने की परंपरा है।

कर्णवेध संस्कार के लाभ और महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कर्णवेध संस्कार के बौद्धिक और शारीरिक लाभ बताये गये हैं इसलिए इसे विद्यारंभ संस्कार से पहले ही कराने की सलाह दी जाती है ताकि बच्चे की बौद्धिक शक्ति का विकास हो और वह अच्छे से विद्या ग्रहण कर सके।
  • मान्यता है कि कान छिदवाने की वजह से श्रवण शक्ति में वृद्धि होती है और बालक प्रखर व बुद्धिमान होता है।
  • कर्णवेध के बाद कानों में कुंडल पहनने से सौंदर्यता बढ़ती है और बच्चे के तेज में वृद्धि होती है।
  • कर्णवेध के प्रभाव से हार्निया और लकवा जैसी बीमारियों से बचाव होता है। इसके अलावा अंडकोष की सुरक्षा भी होती है।
कब करें कर्णवेध संस्कार :
बच्चों के कर्णवेध संस्कार के लिए शुभ लग्न, तिथि, माह और नक्षत्र का विशेष महत्व है।
  • धर्म सिन्धु के अनुसार कर्णवेध संस्कार शिशु जन्म के बाद दसवें, बारहवे, सोलहवे दिन या छठे, सातवे, आठवे, दसवे और बारहवे माह में करना चाहिए। इसके बाद यह संस्कार विषम वर्षों जैसे १, ३ और ५ वें वर्ष में करना चाहिए।
  • कुल परंपरा के अनुसार भी शिशु जन्म के बाद उसका कर्णवेध संस्कार विषम वर्षों में किया जाता है।
  • वहीं बालिकाओं का कर्णवेध संस्कार विषम वर्षों में किया जाना चाहिए। कान छिदवाने के साथ-साथ बालिकाओं की नाक छिदवाने की भी परंपरा है।
  • कार्तिक, पौष, चैत्र, फाल्गुन मास कर्णवेध के लिए शुभ माने गये हैं।
  • कर्णवेध संस्कार के समय वृषभ, धनु, तुला और मीन लग्न में बृहस्पति हो तो, यह समय इस संस्कार के लिए सबसे श्रेष्ठ माना गया है।
  • सोमवार, बुधवार, गुरुवार और शुक्रवार का दिन कर्णवेध संस्कार के लिए शुभ माना गया है।
  • चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी और अमावस्या की तिथि को छोड़कर अन्य तिथियों में कर्णवेध संस्कार करना चाहिए।
  • कर्णवेध संस्कार खर मास यानि (जिस समय सूर्य धनु और मीन राशि में हो), क्षय तिथि, देवशयनी से देवउठनी एकादशी, जन्म मास और भद्रा में कर्णवेध संस्कार नहीं करना चाहिए।
कैसे करें कर्णवेध संस्कार :
  • शुभ मुहूर्त में पवित्र स्थान पर बैठकर देवी-देवताओं का पूजन करने के बाद सूर्य के सामने मुख करके चांदी, सोने या लोहे की सुई से बालक या बालिका के कानों में निम्न मंत्र बोलना चाहिए :भद्रं कर्णेभिः क्षृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः। स्थिरैरंगैस्तुष्टुवां सस्तनूभिर्व्यशेमहि देवहितं यदायुः॥
  • मंत्र पढ़ने के बाद पहले बालक के दाहिने कान में और फिर बाएँ कान में सुई से छेद करें और उनमें कुंडल पहनाएँ।
  • वहीं बालिका के संदर्भ में पहले बाएँ कान में फिर दाहिने कान में छेद करें तथा बायीं नाक में भी छेद करके आभूषण पहनाएँ।
  • मस्तिष्क के दोनों हिस्सों को विद्युत के प्रभावों से सशक्त बनाने के लिए नाक और कान में छिद्र करके सोना पहनना लाभकारी माना गया है।
  • नाक में नथुनी धारण करने से नासिका से संबंधित रोग नहीं होते हैं और सर्दी-खांसी में राहत मिलती है।
  • वहीं कानों में सोने के झुमके या कुंडल पहनने से बालिकाओं को मासिक धर्म से संबंधित कोई विकार नहीं होते हैं, साथ ही हिस्टीरिया रोग में भी लाभ मिलता है।
कर्णवेध के संदर्भ में धार्मिक मान्यता है कि सूर्य की किरणें कानों के छिद्र से प्रवेश करके बच्चों को शक्ति और ऊर्जा प्रदान करती है। इससे बच्चों की बौद्धिक शक्ति में वृद्धि होती है। वहीं शास्त्रों में कर्णवेध रहित पुरुषों को पितरों के श्राद्ध का अधिकारी नहीं माना गया है, इसलिए कर्णवेध संस्कार बहुत महत्वपूर्ण और अनिवार्य माना जाता है।

संस्कारों का वैज्ञानिक महत्व :
हमारे मनीषियों ने सभी संस्कारों को वैज्ञानिक कसौटी पर कसने के बाद ही प्रारम्भ किया है। कर्णवेध संस्कार का आधार बिल्कुल वैज्ञानिक है। बालक की शारीरिक व्याधि से रक्षा ही इस संस्कार का मूल उद्देश्य है। प्रकृति प्रदत्त इस शरीर के सारे अंग महत्वपूर्ण हैं। कान हमारे श्रवण द्वार हैं। कर्ण वेधन से व्याधियां दूर होती हैं तथा श्रवण शक्ति भी बढ़ती है। दर्शनशास्त्री मानते हैं कि इससे स्मरण की शक्ति बढ़ती है। जबकि डॉक्टरों का मानना है कि इससे बोली अच्छी होती है और कानों से होकर दिमाग तक जाने वाली रक्त शिरा (Blood vein) का रक्त संचार नियंत्रित रहता है।  इसके साथ ही कानों में आभूषण हमारे सौन्दर्य बोध का परिचायक भी है।
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10. विद्यारंभ संस्कार Vidhyarambh Sanskar
बच्चों में दिव्य संस्कारों के बीजारोपण के लिए गणेश उत्सव में ऐसे करायें विद्यारम्भ संस्कार

विद्यारंभ संस्कार यह दसवें उपनयन संस्कार का एक उप संस्कार है।
श्री गणेशजी को बुद्धि के दाता कहा जाता हैं और अगर छोटे बच्चों का विद्यारंभ संस्कार गणेश उत्सव में कराया जात हैं तो बच्चें संस्कारित होने के साथ बुद्धिवान भी बनते हैं । प्रत्येक अभिभावक का यह परम पुनीत धर्म कर्त्तव्य है कि बालक को जन्म देने के साथ - साथ आई हुई जिम्मेदारियों में से भोजन, वस्त्र आदि की शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति होने पर उसकी शिक्षा- दीक्षा का प्रबन्ध करें । हर अभिभावक को अपने हर बच्चे की शिक्षा का चाहे वह लड़की हो या लड़का, अपनी सामर्थ्यानुसार पूरा- पूरा प्रबन्ध करना होता है । विद्यारम्भ संस्कार द्वारा बालक- बालिका में उन मूल संस्कारों की स्थापना का प्रयास किया जाता है, जिनके आधार पर उसकी शिक्षा मात्र ज्ञान न रहकर जीवन निर्माण करने वाली हितकारी विद्या के रूप में विकसित हो सके।

विद्यारम्भ संस्कार के लिए सामग्री
१. पूजन के लिए गणेशजी एवं माँ सरस्वती के चित्र या प्रतिमाएँ ।
२. पट्टी, दवात और लेखनी, पूजन के लिए । बच्चे को लिखने में सुविधा हो, इसके लिए स्लेट, खड़िया भी रखी जा सकती है ।
३. गुरु पूजन के लिए प्रतीक रूप में नारियल रखा जा सकता है । बालक के शिक्षक प्रत्यक्ष में हों, तो उनका पूजन भी कराया जा सकता है।

गणेश एवं सरस्वती पूजन :
श्री गणेशजी को विद्या और देवी सरस्वती जी को शिक्षा का प्रतीक माना गया है। विद्या और शिक्षा एक दूसरे के पूरक हैं। एक के बिना दूसरी अधूरी है। शिक्षा उसे कहते हैं कि जो स्कूलों में पढ़ाई जाती है। भाषा, लिपि, गणित, इतिहास, शिल्प, रसायन, चिकित्सा, कला, विज्ञान आदि विभिन्न प्रकार के भौतिक ज्ञान इसी क्षेत्र में आते हैं। शिक्षा से मस्तिष्क की क्षमता विकसित होती है और उससे लौकिक सम्पत्तियों, सुविधाओं, प्रतिष्ठाओं एवं अनुभूतियों का लाभ मिलता है।

विद्या के देव गणेशजी हैं। विद्या का अर्थ है विवेक एवं सद्भाव की शक्ति। सद्गुण उचित और अनुचित का, कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य का विवेक विद्वानों को ही होता है। विचारों और वर्णों को सुव्यवस्थित बनाने के लिए किया हुआ श्रम - गणेश की आराधना के लिए किया गया तप ही माना जाता हैं। बच्चें के मस्तिष्क पर सदैव विवेक का नियन्त्रण बना रहे, इस तथ्य को हृदय में प्रतिष्ठापित करने के लिए ही विद्यारम्भ के समय गणेशजी का पूजन किया जाता है।

॥ गणेश पूजन ॥
क्रिया और भावना : घर या किसी गणेश मंदिर में बालक के हाथ में अक्षत, पुष्प, रोली देकर नीचे दिये गणेश मन्त्र का उच्चारण करते हुए गणपति जी की मूर्ति या चित्र के सामने अर्पित करते हुए माता-पिता भावना करें कि इस आवाहन- पूजन के द्वारा विवेक के अधिष्ठाता से बालक की भावना का स्पर्श हो रहा है। गणेश जी के अनुग्रह से भविष्य में बालक मेधावी और विवेकशील बनेगा।

ॐ गणानां त्वा गणपति हवामहे, प्रियाणां त्वा प्रियपति हवामहे, निधीनां त्वा निधिपति हवामहे, वसोमम।
आहमजानि गर्भधमात्वमजासि गर्भधम्। ॐ गणपतये नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि॥

॥ सरस्वती पूजन ॥
क्रिया और भावना : बालक के हाथ में अक्षत, पुष्प, रोली आदि देकर मन्त्र बोलकर माँ सरस्वती के चित्र के आगे पूजा भाव से समर्पित कराएँ। भावना करें कि यह बालक कला, ज्ञान, संवेदना की देवी माता सरस्वती के स्नेह का पात्र बन रहा है । उनकी छत्रछाया का रसास्वादन करके यह ज्ञानार्जन में सतत रस लेता हुआ आगे बढ़ सकेगा।
ॐ पावका नः सरस्वती, वाजेभिर्वाजिनीवती। यज्ञं वष्टुधियावसुः।
ॐ सरस्वत्यै नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि॥
गणेश और सरस्वती पूजन के बाद, दवात, कलम और पट्टी का पूजन वेदमन्त्रों से अभिमन्त्रित किया जाता है, ताकि उनका प्रारम्भिक प्रभाव कल्याणकारी हो सके।

॥ लेखनी पूजन ॥
शिक्षण और प्रेरणा : विद्यारम्भ करते हुए पहले कलम हाथ में लेनी पड़ती है। कलम की देवी धृति का भाव है ' अभिरुचि'। विद्या प्राप्त करने वाले के अन्तःकरण में यदि उसके लिए अभिरुचि होगी, तो प्रगति के समस्त साधन बनते चले जायेंगे।
ॐ पुरुदस्मो विषुरूपऽ इन्दुः, अन्तर्महिमानमानञ्जधीरः।
एकपदीं द्विपदीं त्रिपदीं चतुष्पदीम्, अष्टापदीं भुवनानु प्रथन्ता स्वाहा॥

॥ दवात पूजन ॥
शिक्षण और प्रेरणा - कलम का उपयोग दवात के द्वारा होता है। स्याही या खड़िया के सहारे ही कलम कुछ लिख पाती है। इसलिए कलम के बाद दवात के पूजन का नम्बर आता है। दवात की अधिष्ठात्री देवी‘पुष्टि’हैं। पुष्टि का भाव है: एकाग्रता। एकाग्रता से अध्ययन की प्रक्रिया गतिशील अग्रगामिनी होती है। पूजा वेदी पर स्थापित दवात पर बालक के हाथ से मन्त्रोच्चार के साथ पूजन सामग्री अर्पित कराई जाए। भावना की जाए कि पुष्टि शक्ति के सान्निध्य से बालक में बुद्धि की तीव्रता एवं एकाग्रता की उपलब्धि हो रही है।

ॐ देवीस्तिस्रस्तिस्रो देवीर्वयोधसं, पतिमिन्द्रमवर्द्धयन्।
जगत्या छन्दसेन्द्रिय शूषमिन्द्रे, वयो दधद्वसुवने वसुधेयस्य व्यन्तु यज॥

॥ पट्टी पूजन॥
बालक द्वारा मन्त्रोच्चार के साथ पूजा स्थल पर स्थापित पट्टी पर पूजन सामग्री अर्पित कराई जाए। भावना की जाए कि इस आराधना से बालक तुष्टि शक्ति से सम्पर्क स्थापित कर रहा है। उस शक्ति से परिश्रम, साधना करने की क्षमता का विकास होगा।

ॐ सरस्वती योन्यां गर्भमन्तरश्विभ्यां, पत्नी सुकृतं बिभर्ति।
अपा रसेन वरुणो न साम्नेन्द्र, श्रियै जनयन्नप्सु राजा॥

॥ गुरु पूजन ॥
शिक्षण और प्रेरणा - जिस प्रकार गौ अपने बछड़े को दूध पिलाती है, उसी तरह गुरु अपने शिष्य को विद्या रूपी अमृत पिलाते हैं। इस पूजन का प्रयोजन है कि शिक्षार्थी अपने शिक्षकों के प्रति पिता जैसी श्रद्धा रखे, उन्हें समय- समय पर प्रणाम, अभिवादन करे, समुचित शिष्टाचार बरते, अनुशासन माने और जैसा वे निर्देश करें, वैसा आचरण करे । मन्त्र के साथ बालक द्वारा गुरु के अभाव में उनके प्रतीक का पूजन कराया जाए।
ॐ बृहस्पते अति यदर्योऽ, अर्हाद्द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु, 
यद्दीदयच्छवसऽ ऋतप्रजात, तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्।
उपयामगृहीतोऽसि बृहस्पतये, त्वैष ते योनिर्बृहस्पतये त्वा॥
ॐ श्री गुरवे नमः । आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि ।

॥ अक्षर लेखन एवं पूजन ॥
अब पट्टी पर बालक के हाथ से‘ॐ श्रीगणेशाय नमः एवं ॐ भूर्भुवः स्वः ' शब्द लिखाया जाए। अक्षर लेखन करा लेने के बाद उन पर अक्षत, पुष्प छुड़वाएँ । ज्ञान का उदय अन्तःकरण में होता है, पर यदि उसकी अभिव्यक्ति करना न आए, तो भी अनिष्ट हो जाता है।
ॐ नमः शम्भवाय च मयोभवाय च, नमः शंकराय च मयस्कराय च, नमः शिवाय च शिवतराय च।

॥ विशेष आहुति॥
हवन सामग्री में कुछ मिष्टान्न मिलाकर पांच + पांच आहुतियाँ निम्न मन्त्रों से कराएँ । भावना करें, यज्ञीय ऊर्जा बालक के अन्दर संस्कार द्वारा पड़े प्रभाव को स्थिर और बलिष्ठ बना रही है।

1. ॐ श्रीगणेशाय नमः ।।
2. ॐ सरस्वती मनसा पेशलं वसु, नासत्याभ्यां वयति दर्शतं वपुः। रसं परिस्रुता न रोहितं, नग्नहुर्धीरस्तसरं न वेम स्वाहा। इदं सरस्वत्यै इदं न मम।
उपरोक्त पूजा क्रम सम्पन्न होन के बाद बच्चे के उपर आशीर्वचन स्वरूप पुष्प की वर्षा कर आशीर्वाद दें।
वर्तमान में तो उपनयन ही नहीं बल्कि सभी संस्कारों का स्वरूप बदल चुका है लेकिन उपनयन संस्कार में बहुत बदलाव आया है। इसका कारण यह है कि अब विद्या ग्रहण करना सबका अधिकार है और जैसे ही बच्चा सोचने समझने चलने फिरने बोलने के लायक होता है माता-पिता उसे शिक्षा ग्रहण करने के लिये आंगनवाड़ी केंद्र, प्ले स्कूल आदि में दाखिल करवा देते हैं। निजि स्कूलों में 3-4 साल की आयु में ही बच्चे का दाखिला कर लिया जाता है तो राजकीय विद्यालयों में भी 6 वर्ष की आयु से बच्चों की शिक्षा आरंभ हो जाती है। फिर भी हिंदू धर्म को मानने वाले कुछ समुदायों में इस संस्कार को भी विधि-विधान से किया जाता है। 
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10. उपनयन संस्कार Upnayan Sanskar

हिंदू धर्म का दसवा मुख्य संस्कार है यज्ञोपवीत। उपनयन या कहें यज्ञोपवीत या विद्याध्ययन आरंभ करने का संस्कार भी कह सकते हैं। हिंदू धर्म में यह बहुत ही महत्वपूर्ण संस्कार है। सोलह संस्कारों में इसे दसवां संस्कार कहा जा सकता है। क्योंकि यह नवम संस्कार कर्णभेद के पश्चात किया जाता है। इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य जातक की भौतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करना होता है। आइये जानते हैं हिंदू धर्म के दसवें संस्कार उपनयन के बारे में।

उपनयन संस्कार का महत्व :
उपनयन संस्कार को नवम संस्कार कर्णभेद यानि कर्णभेदन संस्कार के पश्चात किया जाता है। प्राचीन समय में वर्णाश्रम व्यवस्था के तहत भिन्न वर्णों के लिये भिन्न समयानुसार उपनयन संस्कार करने का विधान रहा है।
ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायताम॥ अर्थात ब्राह्मण ब्रह्म (ईश्वर) तेज से युक्त हो।

ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं, प्रजापतेयर्त्सहजं पुरस्तात्।
आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं, यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥ - पार. गृ.सू. 2.2.11।
जनेऊ को उपवीत, यज्ञसूत्र, व्रतबन्ध, बलबन्ध, मोनीबन्ध और ब्रह्मसूत्र भी कहते हैं। जनेऊ धारण करने की परम्परा बहुत ही प्राचीन है। वेदों में जनेऊ धारण करने की हिदायत दी गई है। इसे उपनयन संस्कार कहते हैं।
उपनयन का अर्थ है, पास या सन्निकट ले जाना । किसके पास ? ब्रह्म ईश्वर और ज्ञान के पास ले जाना। हिन्दू धर्म के १६ संस्कारों में से एक उपनयन संस्कार के अंतर्गत ही जनेऊ पहनी जाती है जिसे यज्ञोपवीत संस्कार भी कहा जाता है। मुंडन और पवित्र जल में स्नान भी इस संस्कार के अंग होते हैं।

यज्ञोपवीत धारण करने वाले व्यक्ति को सभी नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है। एक बार जनेऊ धारण करने के बाद मनुष्य इसे उतार नहीं सकता। मैला होने पर उतारने के बाद तुरंत ही दूसरा जनेऊ धारण करना पड़ता है। आओ जानते हैं जनेऊ के धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व के साथ ही उसके स्वास्थ लाभ के बारे  में।

कौन कर सकता है जनेऊ धारण...
हर हिन्दू का कर्तव्य : हिन्दू धर्म में प्रत्येक हिन्दू का कर्तव्य है जनेऊ पहनना और उसके नियमों का पालन करना। हर हिन्दू जनेऊ पहन सकता है बशर्ते कि वह उसके नियमों का पालन करे।

ब्राह्मण ही नहीं समाज का हर वर्ग जनेऊ धारण कर सकता है। जनेऊ धारण करने के बाद ही द्विज बालक को यज्ञ तथा स्वाध्याय करने का अधिकार प्राप्त होता है। द्विज का अर्थ होता है दूसरा जन्म।

ब्रह्मचारी और विवाहित : वह लड़की जिसे आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करना हो, वह जनेऊ धारण कर सकती है। ब्रह्मचारी तीन और विवाहित छह धागों की जनेऊ पहनता है। यज्ञोपवीत के छह धागों में से तीन धागे स्वयं के और तीन धागे पत्नी के बतलाए गए हैं।

जनेऊ क्या है : आपने देखा होगा कि बहुत से लोग बाएं कांधे से दाएं बाजू की ओर एक कच्चा धागा लपेटे रहते हैं। इस धागे को जनेऊ कहते हैं। जनेऊ तीन धागों वाला एक सूत्र होता है। जनेऊ को संस्कृत भाषा में 'यज्ञोपवीत' कहा जाता है। यह सूत से बना पवित्र धागा होता है, जिसे व्यक्ति बाएं कंधे के ऊपर तथा दाईं भुजा के नीचे पहनता है। अर्थात इसे गले में इस तरह डाला जाता है कि वह बाएं कंधे के ऊपर रहे।

तीन सूत्र क्यों : जनेऊ में मुख्य रूप से तीन धागे होते हैं। प्रथम यह तीन सूत्र त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक होते हैं। द्वितीय यह तीन सूत्र देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण के प्रतीक होते हैं और तृतीय यह सत्व, रज और तम का प्रतीक है। चतुर्थ यह गायत्री मंत्र के तीन चरणों का प्रतीक है। पंचम यह तीन आश्रमों का प्रतीक है। संन्यास आश्रम में यज्ञोपवीत को उतार दिया जाता है।

नौ तार : यज्ञोपवीत के एक-एक तार में तीन-तीन तार होते हैं। इस तरह कुल तारों की संख्या नौ होती है। एक मुख, दो नासिका, दो आंख, दो कान, मल और मूत्र के दो द्वारा मिलाकर कुल नौ होते हैं। हम मुख से अच्छा बोले और खाएं, आंखों से अच्छा देंखे और कानों से अच्छा सुने।

पांच गांठ : यज्ञोपवीत में पांच गांठ लगाई जाती है जो ब्रह्म, धर्म, अर्ध, काम और मोक्ष का प्रतीक है। यह पांच यज्ञों, पांच ज्ञानेद्रियों और पंच कर्मों का भी प्रतीक भी है।

जनेऊ की लंबाई : यज्ञोपवीत की लंबाई 96 अंगुल होती है। इसका अभिप्राय यह है कि जनेऊ धारण करने वाले को 64 कलाओं और 32 विद्याओं को सीखने का प्रयास करना चाहिए। चार वेद, चार उपवेद, छह अंग, छह दर्शन, तीन सूत्रग्रंथ, नौ अरण्यक मिलाकर कुल 32 विद्याएं होती है। 64 कलाओं में जैसे- वास्तु निर्माण, व्यंजन कला, चित्रकारी, साहित्य कला, दस्तकारी, भाषा, यंत्र निर्माण, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, दस्तकारी, आभूषण निर्माण, कृषि ज्ञान आदि।

जनेऊ धारण वस्त्र : जनेऊ धारण करते वक्त बालक के हाथ में एक दंड होता है। वह बगैर सिला एक ही वस्त्र पहनता है। गले में पीले रंग का दुपट्टा होता है। मुंडन करके उसके शिखा रखी जाती है। पैर में खड़ाऊ होती है। मेखला और कोपीन पहनी जाती है।

मेखला, कोपीन, दंड : मेखला और कोपीन संयुक्त रूप से दी जाती है। कमर में बांधने योग्य नाड़े जैसे सूत्र को मेखला कहते हैं। मेखला को मुंज और करधनी भी कहते हैं। कपड़े की सिली हुई सूत की डोरी, कलावे के लम्बे टुकड़े से मेखला बनती है। कोपीन लगभग 4 इंच चौड़ी डेढ़ फुट लम्बी लंगोटी होती है। इसे मेखला के साथ टांक कर भी रखा जा सकता है। दंड के लिए लाठी या ब्रह्म दंड जैसा रोल भी रखा जा सकता है। यज्ञोपवीत को पीले रंग में रंगकर रखा जाता है।

कैसे करते हैं जनेऊ धारण...
जनेऊ धारण : बगैर सिले वस्त्र पहनकर, हाथ में एक दंड लेकर, कोपीन और पीला दुपट्टा पहनकर विधि-विधान से जनेऊ धारण की जाती है। जनेऊ धारण करने के लिए एक यज्ञ होता है, जिसमें जनेऊ धारण करने वाला लड़का अपने संपूर्ण परिवार के साथ भाग लेता है। यज्ञ द्वारा संस्कार किए गए विशिष्ट सूत्र को विशेष विधि से ग्रन्थित करके बनाया जाता है। तीन सूत्रों वाले इस यज्ञोपवीत को गुरु दीक्षा के बाद हमेशा धारण किया जाता है। अपवित्र होने पर यज्ञोपवीत बदल लिया जाता है।

गायत्री मंत्र : यज्ञोपवीत गायत्री मंत्र से शुरू होता है। गायत्री- उपवीत का सम्मिलन ही द्विजत्व है। यज्ञोपवीत में तीन तार हैं, गायत्री में तीन चरण हैं। ' तत्सवितुर्वरेण्यं ' प्रथम चरण,‘भर्गोदेवस्य धीमहि’ द्वितीय चरण,‘धियो यो न: प्रचोदयात्’ तृतीय चरण है। गायत्री महामंत्र की प्रतिमा- यज्ञोपवीत, जिसमें 9 शब्द, तीन चरण, सहित तीन व्याहृतियां समाहित हैं।

यज्ञोपवीत धारण करने का मन्त्र है :
यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्।
आयुष्यमग्रं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥
ऐसे करते हैं संस्कार : यज्ञोपवित संस्कार प्रारम्भ करने के पूर्व बालक का मुंडन करवाया जाता है। उपनयन संस्कार के मुहूर्त के दिन लड़के को स्नान करवाकर उसके सिर और शरीर पर चंदन केसर का लेप करते हैं और जनेऊ पहनाकर ब्रह्मचारी बनाते हैं। फिर होम करते हैं। फिर विधिपूर्वक गणेशादि देवताओं का पूजन, यज्ञवेदी एवं बालक को अधोवस्त्र के साथ माला पहनाकर बैठाया जाता है। फिर दस बार गायत्री मंत्र से अभिमंत्रित करके देवताओं के आह्‍वान के साथ उससे शास्त्र शिक्षा और व्रतों के पालन का वचन लिया जाता है।
फिर उसकी उम्र के बच्चों के साथ बैठाकर चूरमा खिलाते हैं फिर स्नान कराकर उस वक्त गुरु, पिता या बड़ा भाई गायत्री मंत्र सुनाकर कहता है कि आज से तू अब ब्राह्मण हुआ अर्थात ब्रह्म (सिर्फ ईश्वर को मानने वाला) को माने वाला हुआ।

इसके बाद मृगचर्म ओढ़कर मुंज (मेखला) का कंदोरा बांधते हैं और एक दंड हाथ में दे देते हैं। तत्पश्चात्‌ वह बालक उपस्थित लोगों से भीक्षा मांगता है। शाम को खाना खाने के पश्चात्‌ दंड को साथ कंधे पर रखकर घर से भागता है और कहता है कि मैं पढ़ने के लिए काशी जाता हूं। बाद में कुछ लोग शादी का लालच देकर पकड़ लाते हैं। तत्पश्चात वह लड़का ब्राह्मण मान लिया जाता है।

कब किया जाता है जनेऊ धारण :
कब पहने जनेऊ : जिस दिन गर्भ धारण किया हो उसके आठवें वर्ष में बालक का उपनयन संस्कार किया जाता है। जनेऊ पहनने के बाद ही विद्यारंभ होता है, लेकिन आजकल गुरु परंपरा के समाप्त होने के बाद अधिकतर लोग जनेऊ नहीं पहनते हैं तो उनको विवाह के पूर्व जनेऊ पहनाई जाती है। लेकिन वह सिर्फ रस्म अदायिगी से ज्यादा कुछ नहीं, क्योंकि वे जनेऊ का महत्व नहीं समझते हैं।

॥ यथा-निवीनी दक्षिण कर्णे यज्ञोपवीतं कृत्वा मूत्रपुरीषे विसृजेत॥
अर्थात : अशौच एवं मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ रखना आवश्यक है। हाथ पैर धोकर और कुल्ला करके ही इसे उतारें।

  • किसी भी धार्मिक कार्य, पूजा-पाठ, यज्ञ आदि करने के पूर्व जनेऊ धारण करना जरूरी है।
  • विवाह तब तक नहीं होता जब तक की जनेऊ धारण नहीं किया जाता है।
  • जब भी मूत्र या शौच विसर्जन करते वक्त जनेऊ धारण किया जाता है।
जनेऊ संस्कार का समय : माघ से लेकर छ: मास उपनयन के लिए उपयुक्त हैं। प्रथम, चौथी, सातवीं, आठवीं, नवीं, तेरहवीं, चौदहवीं, पूर्णमासी एवं अमावस की तिथियां बहुधा छोड़ दी जाती हैं। सप्ताह में बुध, बृहस्पति एवं शुक्र सर्वोत्तम दिन हैं, रविवार मध्यम तथा सोमवार बहुत कम योग्य है। किन्तु मंगल एवं शनिवार निषिद्ध माने जाते हैं।

मुहूर्त : नक्षत्रों में हस्त, चित्रा, स्वाति, पुष्य, घनिष्ठा, अश्विनी, मृगशिरा, पुनर्वसु, श्रवण एवं रवती अच्छे माने जाते हैं। एक नियम यह है कि भरणी, कृत्तिका, मघा, विशाखा, ज्येष्ठा, शततारका को छोड़कर सभी अन्य नक्षत्र सबके लिए अच्छे हैं।

जनेऊ के नियम :
  • यज्ञोपवीत को मल-मूत्र विसर्जन के पूर्व दाहिने कान पर चढ़ा लेना चाहिए और हाथ स्वच्छ करके ही उतारना चाहिए। इसका स्थूल भाव यह है कि यज्ञोपवीत कमर से ऊंचा हो जाए और अपवित्र न हो। अपने व्रतशीलता के संकल्प का ध्यान इसी बहाने बार-बार किया जाए।
  • यज्ञोपवीत का कोई तार टूट जाए या 6 माह से अधिक समय हो जाए, तो बदल देना चाहिए। खंडित प्रतिमा शरीर पर नहीं रखते। धागे कच्चे और गंदे होने लगें, तो पहले ही बदल देना उचित है।
  • जन्म-मरण के सूतक के बाद इसे बदल देने की परम्परा है। जिनके गोद में छोटे बच्चे नहीं हैं, वे महिलाएं भी यज्ञोपवीत संभाल सकती हैं; किन्तु उन्हें हर मास मासिक शौच के बाद उसे बदल देना पड़ता है।
  • यज्ञोपवीत शरीर से बाहर नहीं निकाला जाता। साफ करने के लिए उसे कण्ठ में पहने रहकर ही घुमाकर धो लेते हैं। भूल से उतर जाए, तो प्रायश्चित की एक माला जप करने या बदल लेने का नियम है।
  • देव प्रतिमा की मर्यादा बनाये रखने के लिए उसमें चाबी के गुच्छे आदि न बांधें। इसके लिए भिन्न व्यवस्था रखें। बालक जब इन नियमों के पालन करने योग्य हो जाएं, तभी उनका यज्ञोपवीत करना चाहिए।
जनेऊ का धार्मिक महत्व : यज्ञोपवीत को व्रतबन्ध कहते हैं। व्रतों से बंधे बिना मनुष्य का उत्थान सम्भव नहीं। यज्ञोपवीत को व्रतशीलता का प्रतीक मानते हैं। इसीलिए इसे सूत्र (फार्मूला, सहारा) भी कहते हैं। धर्म शास्त्रों में यम-नियम को व्रत माना गया है।

बालक की आयुवृद्धि हेतु गायत्री तथा वेदपाठ का अधिकारी बनने के लिए उपनयन (जनेऊ) संस्कार अत्यन्त आवश्यक है। धार्मिक दृष्टि से माना जाता है कि जनेऊ धारण करने से शरीर शुद्घ और पवित्र होता है। शास्त्रों अनुसार आदित्य, वसु, रुद्र, वायु, अग्नि, धर्म, वेद, आप, सोम एवं सूर्य आदि देवताओं का निवास दाएं कान में माना गया है। अत: उसे दाएं हाथ से सिर्फ स्पर्श करने पर भी आचमन का फल प्राप्त होता है। आचमन अर्थात मंदिर आदि में जाने से पूर्व या पूजा करने के पूर्व जल से पवित्र होने की क्रिया को आचमन कहते हैं। इस्लाम धर्म में इसे वजू कहते हैं।

द्विज : स्वार्थ की संकीर्णता से निकलकर परमार्थ की महानता में प्रवेश करने को, पशुता को त्याग कर मनुष्यता ग्रहण करने को दूसरा जन्म कहते हैं। शरीर जन्म माता-पिता के रज-वीर्य से वैसा ही होता है, जैसा अन्य जीवों का। आदर्शवादी जीवन लक्ष्य अपना लेने की प्रतिज्ञा करना ही वास्तविक मनुष्य जन्म में प्रवेश करना है। इसी को द्विजत्व कहते हैं। द्विजत्व का अर्थ है दूसरा जन्म।

जनेऊ का वैज्ञानिक महत्व : वैज्ञानिक दृष्टि से जनेऊ पहनना बहुत ही लाभदायक है। यह केवल धर्माज्ञा ही नहीं, बल्कि आरोग्य का पोषक भी है, अत: इसको सदैव धारण करना चाहिए।
  • चिकित्सकों अनुसार यह जनेऊ के हृदय के पास से गुजरने से यह हृदय रोग की संभावना को कम करता है, क्योंकि इससे रक्त संचार सुचारू रूप से संचालित होने लगता है।
  • जनेऊ पहनने वाला व्यक्ति नियमों में बंधा होता है। वह मल विसर्जन के पश्चात अपनी जनेऊ उतार नहीं सकता। जब तक वह हाथ पैर धोकर कुल्ला न कर ले। अत: वह अच्छी तरह से अपनी सफाई करके ही जनेऊ कान से उतारता है। यह सफाई उसे दांत, मुंह, पेट, कृमि, जीवाणुओं के रोगों से बचाती है। इसी कारण जनेऊ का सबसे ज्यादा लाभ हृदय रोगियों को होता है।
  • मल-मूत्र विसर्जन के पूर्व जनेऊ को कानों पर कस कर दो बार लपेटना पड़ता है। इससे कान के पीछे की दो नसें, जिनका संबंध पेट की आंतों से होता है, आंतों पर दबाव डालकर उनको पूरा खोल देती है, जिससे मल विसर्जन आसानी से हो जाता है तथा कान के पास ही एक नस से मल-मूत्र विसर्जन के समय कुछ द्रव्य विसर्जित होता है। जनेऊ उसके वेग को रोक देती है, जिससे कब्ज, एसीडीटी, पेट रोग, मूत्रन्द्रीय रोग, रक्तचाप, हृदय के रोगों सहित अन्य संक्रामक रोग नहीं होते।
  • चिकित्सा विज्ञान के अनुसार दाएं कान की नस अंडकोष और गुप्तेन्द्रियों से जुड़ी होती है। मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ लपेटने से शुक्राणुओं की रक्षा होती है।
  • वैज्ञानिकों अनुसार बार-बार बुरे स्वप्न आने की स्थिति में जनेऊ धारण करने से इस समस्या से मुक्ति मिल जाती है।
  • कान में जनेऊ लपेटने से मनुष्य में सूर्य नाड़ी का जाग्रण होता है।
  • कान पर जनेऊ लपेटने से पेट संबंधी रोग एवं रक्तचाप की समस्या से भी बचाव होता है।
  • माना जाता है कि शरीर के पृष्ठभाग में पीठ पर जाने वाली एक प्राकृतिक रेखा है जो विद्युत प्रवाह की तरह काम करती है। यह रेखा दाएं कंधे से लेकर कमर तक स्थित है। जनेऊ धारण करने से विद्युत प्रवाह नियंत्रित रहता है जिससे काम-क्रोध पर नियंत्रण रखने में आसानी होती है।
  • जनेऊ से पवित्रता का अहसास होता है। यह मन को बुरे कार्यों से बचाती है। कंधे पर जनेऊ है, इसका मात्र अहसास होने से ही मनुष्य भ्रष्टाचार से दूर रहने लगता है।
  • विद्यालयों में बच्चों के कान खींचने के मूल में एक यह भी तथ्य छिपा हुआ है कि उससे कान की वह नस दबती है, जिससे मस्तिष्क की कोई सोई हुई तंद्रा कार्य करती है। इसलिए भी यज्ञोपवीत को दायें कान पर धारण करने का उद्देश्य बताया गया है।
सभी धर्मों में यज्ञोपति का संस्कर : संस्कार दूसरे धर्म में आज भी किसी न किसी रूप में ‍जीवित है। इस आर्य संस्कार को सभी धर्मों में किसी न किसी कारणवश अपनाया जाता रहा है। मक्का में काबा की परिक्रमा से पूर्व यह संस्कार किया जाता है।

सारनाथ की अति प्राचीन बुद्ध की प्रतिमा का सूक्ष्म निरीक्षण करने से उसकी छाती पर यज्ञोपवीत की सूक्ष्म रेखा दिखाई देती है। जैन धर्म में भी इस संस्कार को किया जाता है। वित्र मेखला अधोवसन (लुंगी) का सम्बन्ध पारसियों से भी है।

जनेऊ संबंधित रोचक तथ्य :
  • ब्राह्मण वर्ण के जातकों का आठवें वर्ष।
  • क्षत्रिय जातकों का ग्यारहवें वर्ष।
  • वैश्य जातकों का उपनयन बारहवें वर्ष में किया जाता था।
  • जनेऊ यानि दूसरा जन्म (पहले माता के गर्भ से दूसरा धर्म में प्रवेश से ) माना गया है।
  • उपनयन यानी ज्ञान के नेत्रों का प्राप्त होना, यज्ञोपवीत याने यज्ञ – हवन करने का अधिकार प्राप्त होना
  • जनेऊ धारण करने से पूर्व जन्मों के बुरे कर्म नष्ट हो जाते है।
  • जनेऊ धारण करने से आयु, बल, और बुद्धि मे वृद्धि होती है।
  • जनेऊ धारण करने से शुद्ध चरित्र और जप, तप, व्रत की प्रेरणा मिलती है।
  • जनेऊ से नैतिकता एवं मानवता के पुण्य कर्तव्यों को पूर्ण करने का आत्म बल मिलता है।
  • जनेऊ के तीन धागे माता - पिता की सेवा और गुरु भक्ति का कर्तव्य बोध कराते है।
  • यज्ञोपवीत संस्कार बिना – विद्या प्राप्ति, पाठ, पूजा, अथवा व्यापार करना सभी निर्थरक है।
  • जनेऊ के तीन धागों में 9 लड़ होती है, फलस्वरूप जनेऊ पहनने से 9 ग्रह प्रसन्न रहेते है।

वेदारम्भ संस्कार – Vedarambh Sanskar :

संस्कार के क्रम और संख्या के विषय मे भिन्नता संभव है। प्राचीन काल से हमारे प्रत्येक कार्य संस्कार से प्रारंभ होते थे। उस समय संस्कारों की संख्या भी ४० थी। जैसे जैसे समय बढ़ते गया और व्यस्तता बढ़ती गई कुछ संस्कार स्वतः विलुप्त होते गये। इस प्रकार संस्कारों की संख्या और क्रम में संशोधन होते गये। गौतम स्मृति में ४० संस्कारों का उल्लेख है। महर्षि अंगिरा ने इनका अंतर्भाव २५ संस्कारों में किया। व्यास स्मृति में १६ संस्कारों का वर्णन हुआ है। वर्तमान में जो संस्कार प्रचलित है उसकी विवेचना हम कर रहे है।

वेदारंभ संस्कार भी ' उपनयन संस्कार ' का उपसंस्कार है। वर्तमान में यह संस्कार गुरुकुलों में किया जाता है। अन्यथा यह संस्कार विद्यारंभ संस्कार के समान ही है। इसके अंतर्गत व्यक्ति को वेदों का ज्ञान दिया जाता है। ज्ञानार्जन से सम्बन्धित है यह संस्कार। वेद का अर्थ होता है ज्ञान और वेदारम्भ के माध्यम से बालक अब ज्ञान को अपने अन्दर समाविष्ट करना शुरू करे यही अभिप्राय है इस संस्कार का। शास्त्रों में ज्ञान से बढ़कर दूसरा कोई प्रकाश नहीं समझा गया है। स्पष्ट है कि प्राचीन काल में यह संस्कार मनुष्य के जीवन में विशेष महत्व रखता था। यज्ञोपवीत के बाद बालकों को वेदों का अध्ययन एवं विशिष्ट ज्ञान से परिचित होने के लिये योग्य आचार्यो के पास गुरुकुलों में भेजा जाता था। वेदारम्भ से पहले आचार्य अपने शिष्यों को ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने एवं संयमित जीवन जीने की प्रतिज्ञा कराते थे तथा उसकी परीक्षा लेने के बाद ही वेदाध्ययन कराते थे। असंयमित जीवन जीने वाले वेदाध्ययन के अधिकारी नहीं माने जाते थे। हमारे चारों वेद ज्ञान के अक्षुण्ण भंडार हैं।

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11. केशान्त संस्कार :

•हिन्दू धर्म संस्कारों में केशान्त संस्कार एकादश संस्कार है।
•बालक का प्रथम मुंण्डन प्रायः पहले या तीसरे वर्ष में हो जाता है। यह बात पहले ही कही जा चुकी है।
•प्रथम मुंण्डन का प्रयोजन केवल गर्भ के केशमात्र दूर करना होता है।
•उसके बाद इस केशान्त संस्कार में भी मुंण्डन करना होता है।

जिससे बालक वेदारम्भ तथा क्रिया-कर्मों के लिए अधिकारी बन सके अर्थात वेद-वेदान्तों के पढ़ने तथा यज्ञादिक कार्यों में भाग ले सके। इसलिए कहा भी है कि शास्त्रोक्त विधि से भली-भाँति व्रत का आचरण करने वाला ब्रह्मचारी इस केशान्त-संस्कार में सिर के केशों को तथा दाढ़ी-मुच्छ (श्मश्रु) के बालों को कटवाता है।

केशान्त संस्कार वेदारंभ के पश्चात् और समावर्तन संस्कार से पहले किया जाता है। जो विद्यार्थी विद्याध्ययन के लिये गुरुकुल अथवा गुरु के आश्रम में जाता है, वह पूरी तरह से ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करता है। विद्याध्ययन की पूर्ण अवधि तक केश नहीं कटवाता और मौजी मेखला आदि धारण करता है। केशांत संस्कार के अंतर्गत विद्याध्ययन पूर्ण हो जाने पर यह ब्रह्मचारी मौजी मेखला का परित्याग करता है और अपने बढ़े हुये केश कटवाता है। केश से तात्पर्य यहां दाढ़ी के केश से लिया जाता है। दाढ़ी का आना युवावस्था का प्रतीक भी माना जाता है। केशांत संस्कार गुरुकुल में ही संपन्न किया किया जाता है।

इस संस्कार में भी सभी विधि-विधान का पालन किया जाता है। अन्य संस्कारों की ही तरह केशांत संस्कार के प्रारंभ में गणेश आदि देवों का पूजन किया जाता है। इसके पश्चात ब्रह्मचारी की दाढ़ी बनाने की क्रिया संपन्न की जाती है। दाढ़ी को श्मश्रु भी कहा जाता है, इसलिये कहीं-कहीं इस संस्कार को श्मश्रु संस्कार भी कहा गया है। इसके बारे में संस्कार दीपक में उल्लेख मिलता है -
केशानाम् अन्तः समीपस्थितः श्मश्रुभाग इति व्युत्पत्त्या केशान्तशब्देन श्मश्रुणामभिधानात् श्मश्रुसंस्कार एवं केशान्तशब्देन प्रतिपाद्यते। अत एवाश्वलायनेनापि ‘श्मश्रुणीहोन्दति’। इति श्मश्रुणां संस्कार एवात्रोपदिष्टः।

इस संस्कार के बारे में कहीं - कहीं पर गोदान संस्कार का नाम भी आया है। केश (बालों) को गौ के नाम से भी जाना जाता है। गोदान संस्कार के बारे में कहा गया है -
गावो लोमानि केशा दीयन्ते खंडयन्तेऽस्मिन्निति व्युत्पत्त्या गोदानं नाम ब्राह्मणादीनां षोडशादिषु वर्षेयु कर्तव्यं केशान्ताख्यं कर्मोच्यते।

तात्पर्य यह है कि गौ अर्थात् लोम-केश जिसमें काट दिये जाते हैं। इस व्युत्पत्ति के अनुसार ब्राह्मण आदि वर्णों के लिये गोदान पद का यहां उल्लेख हुआ है। इन वर्णों के द्वारा सोलहवें वर्ष में करने योग्य केशान्त नामक कर्म का वाचक है। विद्वानों के अनुसार यह संस्कार केवल उत्तरायण में किया जाता है। इस संस्कार को सोलहवें वर्ष में करने का विधान बताया गया है। इस आयु से पूर्व यह संस्कार प्रायः नहीं होता है। इसके पश्चात् ब्रह्मचारी शिक्षार्थी को वापिस अपने घर जाने की आज्ञा मिल जाती है। इसके पश्चात् ही उसे विवाह संस्कार करने का अधिकार भी प्राप्त हो जाता है। 

इस संस्कार का प्रतीकात्मक महत्त्व ही अधिक है अर्थात् ब्रह्मचारी जब अपनी शिक्षा पूर्ण कर लेता था तो उसे एक नया स्वरूप देने के लिये उसके दाढ़ी के बाल काट दिये जाते थे। विद्वान इसका तात्पर्य इस बात से भी लेते हैं कि अब यह व्यक्ति अपने जीवन की दूसरी जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिये पूर्ण रूप से तत्पर है। जब यह व्यक्ति अपने घर लौटता है तो समावर्तन संस्कार के माध्यम से यह निश्चित कर लिया जाता था कि इस व्यक्ति की शिक्षा पूर्ण हो गई है, इसलिये इसे विवाह करके गृहस्थ जीवन जीने की आज्ञा दी जाती है। वर्तमान में इस संस्कार का विशेष महत्त्व नहीं देखा जाता है। संस्कारों के संदर्भ में इसका उल्लेख करना आवश्यक था, इसलिये यहां इस संस्कार का संक्षिप्त परिचय ही दिया गया है।
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 गुरुकुल में समावर्तन संस्कार
विश्वविद्यालय में दीक्षांत समारोह Convocation

12. समावर्तन संस्कार Samavartan Sanskar (दीक्षांत समारोह Convocation)

हिन्दू धर्म संस्कारों में समावर्तन संस्कार द्वादश संस्कार है। यह संस्कार विद्याध्ययनं पूर्ण हो जाने पर किया जाता है। प्राचीन परम्परा में बारह वर्ष तक आचार्यकुल या गुरुकुल में रहकर विद्याध्ययन परिसमाप्त हो जाने पर आचार्य स्वयं शिष्यों का समावर्तन-संस्कार करते थे। उस समय वे अपने शिष्यों को गृहस्थ-सम्बन्धी श्रुतिसम्मत कुछ आदर्शपूर्ण उपदेश देकर गृहस्थाश्रम में प्रवेश के लिए प्रेरित करते थे। जिन विद्याओं का अध्ययन करना पड़ता था, वे चारों वेद हैं।

गुरुकुल से विदाई लेने से पूर्व शिष्य का समावर्तन संस्कार होता था। इस संस्कार से पूर्व ब्रह्मचारी का केशान्त संस्कार होता था और फिर उसे स्नान कराया जाता था। यह स्नान समावर्तन संस्कार के तहत होता था। इसमें सुगन्धित पदार्थो एवं औषधादि युक्त जल से भरे हुए वेदी के उत्तर भाग में आठ घड़ों के जल से स्नान करने का विधान है। यह स्नान विशेष मन्त्रोच्चार के साथ होता था। इसके बाद ब्रह्मच 'विद्या स्नातक' की उपाधि आचार्य देते थे। इस उपाधि से वह सगर्व गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने का अधिकारी समझा जाता था। सुन्दर वस्त्र व आभूषण धारण करता था तथा आचार्यो एवं गुरुजनों से आशीर्वाद ग्रहण कर अपने घर के लिये विदा होता था।

शिष्य को इंद्रिय निग्रह, दान, दया और मानवकल्याण की शिक्षा देता है। ऋग्वेद में लिखा है :
युवा सुवासाः परिवीत आगात् स उ श्रेयान् भवति जायमानः।
तं धीरासः कवय उन्नयन्ति स्वाध्यों 3 मनसा देवयन्तः॥
अर्थात् युवा पुरुष उत्तम वस्त्रों को धारण किए हुए, उपवीत (ब्रह्मचारी) सब विद्या से प्रकाशित जब गृहाश्रम में आता है, तब वह प्रसिद्ध होकर श्रेय मंगलकारी शोभायुक्त होता है। उसको धीर, बुद्धिमान, विद्धान, अच्छे ध्यानयुक्त मन से विद्या के प्रकाश की कामना करते हुए, ऊंचे पद पर बैठाते हैं। 

तैत्तिरीय उपनिषद के शिक्षावल्ली के ११वें अनुवाक में मिलता है कि आचार्य किस प्रकार स्नातक को भावी जीवन का उपदेश करते थे।

समावर्तन संस्कार का उपदेश :
•सत्यं वद : सत्य बोलना।
•धर्मं चर : धर्म के मार्ग पर चलना।
•स्वाध्यायान्मा प्रमदः :  स्वाध्याय करने में आलस्य मत करना (पढ़ना समाप्त हुआ, अब हमको पठन - पाठन से क्या काम, ऐसा मत समझना)
•आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः : आचार्य को उनकी प्रिय वस्तु देना और सन्तान रूपी तन्तु का विच्छेद मत करना (अर्थात सन्तान पैदा करने से मत चूकना)।
•सत्यान्न प्रमदितव्यम् : सत्य (को जानने और बोलने) के प्रति प्रमाद (उपेक्षा) मत करना।
•धर्मान्न प्रमदितव्यम् : धर्म (कर्तव्य) के मार्ग पर चलने से प्रमाद न करना।
•कुशलान्न प्रमदितव्यम् : कल्याणकारी कार्यों को करने से प्रमाद मत करना।
•भूत्यै न प्रमदितव्यम् : संसाधनों के विकास में प्रमाद न करें।
•स्वाध्याय प्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम् : स्वाध्याय और प्रवचन (शिक्षण) में प्रमाद न करें।
•देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम् :  देवकार्य तथा पितृकार्य से प्रमाद नहीं किया जाना चाहिए।
•मातृदेवो भव : माता को देवता मानना।
•पितृदेवो भव : पिता को देवता मानना।
•आचार्यदेवो भव : आचार्य को देवता मानना।
•अतिथिदेवो भव : अतिथि को देवता मानना।
•यान्यनवद्यानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि नो इतराणि : जो अनिन्द्य कर्म हैं (जिन कर्मों का कथन किया जा सके), उन्हीं का सेवन करें, अन्य नहीं। हमारे (आचार्यों के) जो-जो कर्म अच्छे आचरण के द्योतक हों, केवल उन्हीं की उपासना करना, दूसरे कर्मों का नहीं (संकेत है कि गुरुजनों का आचरण सदैव अनुकरणीय हो ऐसा नहीं है, 'आचार्य ने ऐसा किया है' उसका अनुकरण नहीं करना।
•यान्यस्माकं सुचरितानि तानि त्वया उपास्यानि नो इतराणि : जो हमसे अच्छे काम बन पड़े हैं, उन्हीं का अनुकरण करना, हमारे अनुचित कामों का अनुकरण मत करना)।
•ये केचास्मच्छ्रेयांसो ब्राह्मणाः तेषां त्वया आसनेन प्रश्वसितव्यम् : हमसे जो अधिक श्रेष्ठ सच्चरित्र ब्रह्मज्ञानी (विद्वान) मिलें उनकी उपासना करना (अन्धश्रद्धा मत करना; अपनी बुद्धि पर भरोसा करके विवेक से काम करना)।
•श्रद्धया देयम् : श्रद्धापूर्वक दान करना चाहिये।
•अश्रद्धया अदेयम् : बिना श्रद्धा के दान नहीं करना चाहिए।
•श्रिया देयम् : अपनी सामर्थ्य के अनुसार उदारतापूर्वक दान देना चाहिये।
•ह्रिया देयम् : विनम्रतापूर्वक (ह्रिया) दान देना चाहिये।
•भिया देयम् : भय से दान देना चाहिये कि दान नही करूँगा तो भगवान को क्या मुँह दिखाऊँगा।
•संविदा देयम् : विदा (ज्ञानपूर्वक, विधिपूर्वक, आदर एवं उदारतापूर्वक निस्वार्थ भाव से) दान देना चाहिये (प्रमाद से, उपेक्षापूर्वक नही)।

वर्तमान समय में स्कूल कॉलेज में हम जिसे दिक्षांत समारोह कहते हैं वह एक प्रकार से समावर्तन संस्कार का ही आधुनिक और परिवर्तित रूप है।
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13. विवाह संस्कार Vivah Sanskar

हिन्दू धर्म में सद्गृहस्थ की, परिवार निर्माण की जिम्मेदारी उठाने के योग्य शारीरिक, मानसिक परिपक्वता आ जाने पर युवक-युवतियों का विवाह संस्कार कराया जाता है। भारतीय संस्कृति के अनुसार विवाह कोई शारीरिक या सामाजिक अनुबन्ध मात्र नहीं हैं, यहाँ दाम्पत्य को एक श्रेष्ठ आध्यात्मिक साधना का भी रूप दिया गया है। इसलिए कहा गया है 'धन्यो गृहस्थाश्रमः'। सद्गृहस्थ ही समाज को अनुकूल व्यवस्था एवं विकास में सहायक होने के साथ श्रेष्ठ नई पीढ़ी बनाने का भी कार्य करते हैं। वहीं अपने संसाधनों से ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ एवं सन्यास आश्रमों के साधकों को वांछित सहयोग देते रहते हैं। ऐसे सद्गृहस्थ बनाने के लिए विवाह को रूढ़ियों-कुरीतियों से मुक्त कराकर श्रेष्ठ संस्कार के रूप में पुनः प्रतिष्ठित करना आवश्क है। युग निर्माण के अन्तर्गत विवाह संस्कार के पारिवारिक एवं सामूहिक प्रयोग सफल और उपयोगी सिद्ध हुए हैं।

विवाह दो आत्माओं का पवित्र बन्धन है। दो प्राणी अपने अलग-अलग अस्तित्वों को समाप्त कर एक सम्मिलित इकाई का निर्माण करते हैं। स्त्री और पुरुष दोनों में परमात्मा ने कुछ विशेषताएँ और कुछ अपूणर्ताएँ दे रखी हैं। विवाह सम्मिलन से एक-दूसरे की अपूर्णताओं की अपनी विशेषताओं से पूर्ण करते हैं, इससे समग्र व्यक्तित्व का निर्माण होता है। इसलिए विवाह को सामान्यतया मानव जीवन की एक आवश्यकता माना गया है। एक-दूसरे को अपनी योग्यताओं और भावनाओं का लाभ पहुँचाते हुए गाड़ी में लगे हुए दो पहियों की तरह प्रगति-पथ पर अग्रसर होते जाना विवाह का उद्देश्य है। वासना का दाम्पत्य-जीवन में अत्यन्त तुच्छ और गौण स्थान है, प्रधानतः दो आत्माओं के मिलने से उत्पन्न होने वाली उस महती शक्ति का निमार्ण करना है, जो दोनों के लौकिक एवं आध्यात्मिक जीवन के विकास में सहायक सिद्ध हो सके।

विवाह के प्रकार :
1. ब्रह्म विवाह : दोनो पक्ष की सहमति से समान वर्ग के सुयोज्ञ वर से कन्या का विवाह निश्चित कर देना 'ब्रह्म विवाह' कहलाता है। सामान्यतः इस विवाह के बाद कन्या को आभूषणयुक्त करके विदा किया जाता है। आज का "व्यवस्था विवाह" 'ब्रह्म विवाह' का ही रूप है।
2. दैव विवाह : किसी सेवा कार्य (विशेषतः धार्मिक अनुष्टान) के मूल्य के रूप अपनी कन्या को दान में दे देना 'दैव विवाह' कहलाता है।
3. आर्श विवाह : कन्या-पक्ष वालों को कन्या का मूल्य दे कर (सामान्यतः गौदान करके) कन्या से विवाह कर लेना 'अर्श विवाह' कहलाता है।
4. प्रजापत्य विवाह : कन्या की सहमति के बिना उसका विवाह अभिजात्य वर्ग के वर से कर देना 'प्रजापत्य विवाह' कहलाता है।
5. गंधर्व विवाह : परिवार वालों की सहमति के बिना वर और कन्या का बिना किसी रीति-रिवाज के आपस में विवाह कर लेना 'गंधर्व विवाह' कहलाता है। दुष्यंत ने शकुन्तला से 'गंधर्व विवाह' किया था। उनके पुत्र भरत के नाम से ही हमारे देश का नाम "भारतवर्ष" बना।
6. असुर विवाह : कन्या को खरीद कर (आर्थिक रूप से) विवाह कर लेना 'असुर विवाह' कहलाता है।
7. राक्षस विवाह : कन्या की सहमति के बिना उसका अपहरण करके जबरदस्ती विवाह कर लेना 'राक्षस विवाह' कहलाता है।
8. पैशाच विवाह : कन्या की मदहोशी (गहन निद्रा, मानसिक दुर्बलता आदि) का लाभ उठा कर उससे शारीरिक सम्बंध बना लेना और उससे विवाह करना 'पैशाच विवाह' कहलाता है।
षोडश संस्कार में विवाह संस्कार यह मुख्य संस्कार है विस्तृत विवरण के लिए इसी पुस्तक में स्वतंत्र प्रकरण पढ़े

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14. वानप्रस्थ संस्कार
वानप्रस्थ के सबंध में हारीत स्मृतिकार ने लिखा है।
एवं वनाश्रमे तिष्ठान पातयश्चैव किल्विषम् ।
चतुर्थमाश्रमं गच्छेत् सन्न्यासविधिना द्धिजः॥
अर्थात गृहस्थ के बाद वानप्रस्था ग्रहण करना चाहिए। इससे समस्त मनोविकार दूर होते है और वह निर्मलता आती है, जो सन्न्यास के लिए आवश्यक है। मनुस्मृति में वानप्रस्थ के बारे में कहा गया है –
महार्षिपितृदेवानां गत्वाड्ड्नृण्यं यथाविधिः।
पुत्रे सर्वं समासज्य वसेन्माध्यस्थमाश्रितः।।

षोड्स संस्कारों में वानप्रस्थ संस्कार चर्तुदश संस्कार है। वानप्रस्थाश्रम यह हमारी आश्रम व्यवस्था में सांस्कृतिक आधार स्तंभ हैI इस संस्कार / आश्रम में पुत्र का पुत्र अर्थात् पौत्र का मुख देख लेने के पश्चात् पितृ-ऋण चुक जाता है। यदि घर छोड़ने की सम्भावना न हो तो घर का दायित्व ज्येष्ठ पुत्र को सौंपकर अपने जीवन को आध्यात्मिक जीवन में परिवर्तित कर लेना चाहिये। स्वाध्याय, मनन, सत्संग, ध्यान, ज्ञान, भक्ति तथा योगदिक साधना के द्वारा अपने जीवन स्तर को ऊँचा उठाना चाहिये। इससे सन्न्यास धर्म के लिये योग्यता भी आ जाती है। लोकसेवियों की सुयोग्य और समर्थ सेना वानप्रस्थ आश्रम से ही निकलती है। इसलिए चारों आश्रमों में वानप्रस्थ को सबसे महत्त्वपूर्ण माना जाता है। 

वानप्रस्थी राष्ट्र के प्राण, मानवजाति के शुभचिंतक एवं देवस्वरूप होते हैं। गृहस्थ-आश्रम का अनुभव लेने के बाद जब उम्र 50 वर्ष से ऊपर हो जाए तथा संतान की भी संतान हो जाए, तब परिवार का उत्तरदायित्व समर्थ बच्चों पर डाल कर वानप्रस्थ-संस्कार करने की प्रथा प्रचलित है। इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य सेवाधर्म ही है। भारतीय-धर्म और संस्कृति का प्राण वानप्रस्थ-संस्कार कहा जाता है, क्योंकि जीवन को ठीक तरह से जीने की समस्या इसी से हल हो जाती है। जिस देश, धर्म, जाति तथा समाज में हम उत्पन्न हुए है, उसकी सेवा करने, उसके ऋण से मुक्त होने का अवसर भी वानप्रस्थ में ही मिलता है। अतः जीवन का चतुर्थांश परमार्थ में ही व्यतीत करना चाहिए। नदी की तरह वानप्रस्थ का अर्थ है - चलते रहो चलते रहो। रुको मत। अपनी प्रतिभा के अनुदान सबको बांटते चलो।

वानप्रस्थाश्रम हिन्दू मान्यता में व्यक्ति की उत्पत्ति में चौथा काल या आश्रम होता है। हिन्दू धर्म के अनुसार चार प्रकार के काल या आश्रम बताये गये हैं - गर्भाश्रम - जो कि मनुष्य के जन्म से लेकर लगभग आठ वर्ष की उम्र तक अपनी माता के साथ रहने को कहते हैं, ब्रह्मचर्याश्रम – जो कि लगभग आठ से पच्चीस वर्ष की आयु तक होता है और व्यक्ति गुरुकुल में विद्या तथा सांसारिक ज्ञान अर्जित करने में व्यतीत करता है, गृहस्थाश्रम – जो कि लगभग पच्चीस से पचास वर्ष तक की आयु का होता है और व्यक्ति गुरुकुल के गुरु द्वारा आयोजित विवाह के सांसारिक बोध में अपने को समर्पित कर देता है तथा वानप्रस्थाश्रम – जब मनुष्य ईश्वर की उपासना की ओर गतिबद्ध हो जाता है। यहाँ पर भी वह अपने सांसारिक उत्तरदायित्व का निवारण करता है। पाँचवीं अवस्था जो कि वैकल्पिक है, सन्यास की है, जब व्यक्ति सांसारिक मोह माया के परे जाकर केवल भगवत् स्मरण करता है। इस अवस्था के लिए यह अनिवार्य है कि मनुष्य ने अपने सारे उत्तरदायित्व भलि भांति निभा लिए हों। इस अवस्था में मनुष्य अरण्य में जाकर ऋषियों की शरण लेता है।

वानप्रस्थ संस्कार का महत्व
वानप्रस्थ संस्कार का हिंदू धर्म में बहुत अधिक महत्व है। यह संस्कार धार्मिक दृष्टि से तो महत्व है ही लेकिन इसकी सामाजिक महत्ता भी बहुत अधिक होती है। शास्त्रों के अनुसार अपने से तीसरी पीढी यानि दादा बनने के पश्चात व्यक्ति पितृ ऋण से मुक्त हो जाता है। ऐसे में वह अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों को ज्येष्ठ पुत्र या कहें परिवार के समझदार और योग्य व्यक्तियों के हाथ में थमाकर अपने आप को सामाज कल्याण के कार्यों में समर्पित कर सकता है। व्यक्ति द्वारा लिये जाने वाले इसी संकल्प को वानप्रस्थ कहा जाता है। यहां से तीसरे आश्रम की शुरुआत हो जाती है और सन्यास लेने की अवस्था तक का जीवन समाज को समर्पित रहता है। मनु के अनुसार वानप्रस्थी से सन्यास और सन्यास से मोक्ष का मार्ग मिलता है। इसकी सामाजिक महत्ता को देखते हुए ही वानप्रस्थ व्यक्ति को राष्ट्र का प्राण, मनुष्य जाति का शुभचिंतक एवं देवस्वरूप समझा जाता है। 100 वर्ष के प्राकृतिक आयु को 25-25 वर्षों के चार कालों में बांटा गया है जिसमें 50 साल तक व्यक्ति ब्रह्मचर्य औ गृहस्थ जीवन का पालन करता है। वानप्रस्थ संस्कार का मुख्य उद्देश्य सेवाधर्म है। इस अवस्था में व्यक्ति स्वाध्याय, मनन, सत्संग, ध्यान, ज्ञान, भक्ति, योग आदि साधना द्वारा अपने जीवन का आध्यात्मिक विकास भी करता है। प्राचीन समय में समाज कल्याण के लिये समाज सेवियों की फौज वानप्रस्थी ही होते थे। यह अलग बात है कि वर्तमान में यह संस्कार चलन में नहीं है जिससे अंतिम समय तक मनुष्य मोह, माया, लोभ आदि से घिरा रहता है।
स्मृति ग्रंथों में वानप्रस्थ के बारे में लिखा है
एवं वनाश्रमे तिष्ठान पातयश्चैव किल्विषम्।
चतुर्थमाश्रमं गच्छेत् सन्न्यासविधिना द्विज:।।
इसका अभिप्राया है कि गृहस्थ आश्रम के पश्चात वानप्रस्थ ग्रहण करना चाहिये।
यह मनोविकारों को दूर कर निर्मल बनाता है जो सन्यास के लिये जरूरी होती है।
मनुस्मृति भी कहती है कि
महार्षिपितृदेवानां गत्वाड्ड्नृण्यं यथाविधि:।
पुत्रे सर्वं समासज्य वसेन्माध्यस्थमाश्रित:।।
यानि उम्र के ढ़लने के साथ ही पुत्र को गृहस्थी का दायित्व सौंप
वानप्रस्थ ग्रहण करें एवं देव पितृ व ऋषि ऋण से मुक्ति पायें।

वानप्रस्थ संस्कार विधि
वानप्रस्थ संस्कार सामुहिक रूप से भी किया जा सकता है और व्यक्तिगत रूप से भी इसके लिये मंच तैयार कर सामूहिक आयोजन भी किया जा सकता है। अन्य संस्कारों की तरह इस संस्कार को भी पूजा पाठ के साथ संपन्न किया जाता है। इसके लिये वानप्रस्थ ग्रहण करने वाले व्यक्ति को पीले रंग के वस्त्र पहनाये जाते हैं और पंचगव्य का पान करवाकर संकल्प करवाया जाता है। आवश्यक हो तो पीले रंग का यज्ञोपवीत भी धारण करवाया जाता है। कमरबंद के साथ लंगोटी, दंड जिसे धर्मदंड कहा जाता है एवं पीला दुपट्टा भी होना चाहिये। सात कुशाओं को एक साथ बांधकर उनसे ऋषि पूजन करना चाहिये। पीले वस्त्र में कोई पवित्र पुस्तक, वेद आदि की पूजा की जाती है। यज्ञ पूजा कलावा लेपटे हुए नारियल से की जाती है। अभिषेक के लिये कम से कम 5 लोटे या कलश हों, इनकी संख्या 24 हो तो बहुत अच्छा रहता है। कन्याओं अथवा सुयोग्य साधकों से अभिषेक करवाया जाता है। वानप्रस्थी को सर्वप्रथम स्नानादि के पश्चात पीले वस्त्र धारण करने चाहिये इसके पश्चात संस्कार स्थल पर आसन ग्रहण के समय पुष्प अक्षत से मंगलाचरण बोला जाता है। वानप्रस्थी को संस्कार के महत्व व उसके दायित्वों के बारे में उपदेश दिया जाता है। इस प्रक्रिया के पश्चात सकल्प करवाया जाता है और तिलक व रक्षासूत्र बंधन कर उपचार किये जाते हैं।

वानप्रस्थी हाथ में पुष्प, अक्षत एवं जल लेकर वानप्रस्थ व्रत ग्रहण करने की सार्वजनिक घोषणा करते हुए संकल्प लेता है कि उसका जीवन अब उसका अपना या परिवार का न होकर समस्त समाज का है, वह अब समाज की संपत्ति है। अब वह स्वयं या पारिवारिक लाभ के लिये नहीं बल्कि विश्वकल्याण के लिये अपने दायित्वों का निर्वाह करेगा। इस समय जो संकल्प लिया जाता है वह इस प्रकार है - 

ॐ तत्सदद्य श्रीमद् भवगतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवत्तर्मानस्य अद्य श्री ब्रह्मणो द्वितीये पराधेर् श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे भूलोर्के जम्बूद्वीपे भारतवर्षे भरतखण्डे आयार्वत्तैर्क - देशान्तगर्ते ......... क्षेत्रे......... मासानां मासोत्तमेमासे......... पक्षे......... तिथौ......... वासरे......... गोत्रोत्पन्नः......... नामाऽहं स्वजीवनं व्यक्तिगतं न मत्वा सम्पूर्ण- समाजस्य एतत् इति ज्ञात्वा, संयम-स्वाध्याय-उपासनेषु विशेषतश्च लोकसेवायां निरन्तरं मनसा वाचा कमर्णा च संलग्नो भविष्यामि इति संकल्पं अहं करिष्ये।

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16. अन्त्येष्टि संस्कार / श्राद्ध संस्कार – Antyeshti/ Shraddha Sanskar

हिंदूओं में किसी की मृत्यु हो जाने पर उसके मृत शरीर को वेदोक्त रीति से चिता में जलाने की प्रक्रिया को अन्त्येष्टि क्रिया अथवा अन्त्येष्टि संस्कार कहा जाता है। यह हिंदू मान्यता के अनुसार सोलह संस्कारों में से एक संस्कार है।

श्राद्ध, हिन्दूधर्म के अनुसार, प्रत्येक शुभ कार्य के प्रारम्भ में माता-पिता,पूर्वजों को नमस्कार प्रणाम करना हमारा कर्तव्य है, हमारे पूर्वजों की वंश परम्परा के कारण ही हम आज यह जीवन देख रहे हैं, इस जीवन का आनंद प्राप्त कर रहे हैं। इस धर्म मॆं, ऋषियों ने वर्ष में एक पक्ष को पितृपक्ष का नाम दिया, जिस पक्ष में हम अपने पितरेश्वरों का श्राद्ध,तर्पण, मुक्ति हेतु विशेष क्रिया संपन्न कर उन्हें अर्ध्य समर्पित करते हैं। यदि कोई कारण से उनकी आत्मा को मुक्ति प्रदान नहीं हुई है तो हम उनकी शांति के लिए विशिष्ट कर्म करते है।

तो दोस्तों आपने जाना होगा की हमारी संस्कृति या परंपरा कितनी महान हैं। मरणोत्तर (श्राद्ध संस्कार) जीवन का एक अबाध प्रवाह है। काया की समाप्ति के बाद भी जीव यात्रा रुकती नहीं है। आगे का क्रम भी भली प्रकार सही दिशा में चलता रहे, इस हेतु मरणोत्तर संस्कार किया जाता है। सूक्ष्म विद्युत तरंगों के माध्यम से वैज्ञानिक दूरस्थ उपकरण का संचालन (रिमोट ऑपरेशन) कर लेते हैं। श्रद्धा उससे भी अधिक सशक्त तरंगें प्रेषित कर सकती है। उसके माध्यम से पितरों- को स्नेही परिजनों की जीव चेतना को दिशा और शक्ति तुष्टि प्रदान की जा सकती है। मरणोत्तर संस्कार द्वारा अपनी इसी क्षमता के प्रयोग से पितरों की सद्गति देने और उनके आशीर्वाद पाने का क्रम चलाया जाता है।

भारतीय संस्कृति ने यह तथ्य घोषित किया है कि मृत्यु के साथ जीवन समाप्त नहीं होता, अनन्त जीवन शृंखला की एक कड़ी मृत्यु भी है, इसलिए संस्कारों के क्रम में जीव की उस स्थिति को भी बाँधा गया है। जब वह एक जन्म पूरा करके अगले जीवन की ओर उन्मुख होता है, कामना की जाती है कि सम्बन्धित जीवात्मा का अगला जीवन पिछले की अपेक्षा अधिक सुसंस्कारवान् बने। इस निमित्त जो कर्मकाण्ड किये जाते हैं, उनका लाभ जीवात्मा को क्रिया- कर्म करने वालों की श्रद्धा के माध्यम से ही मिलता है। इसलिए मरणोत्तर संस्कार को श्राद्धकर्म भी कहा जाता है। यों श्राद्धकर्म का प्रारम्भ अस्थि विसर्जन के बाद से ही प्रारम्भ हो जाता है। कुछ लोग नित्य प्रातः तर्पण एवं सायंकाल मृतक द्वारा शरीर के त्याग के स्थान पर या पीपल के पेड़ के नीचे दीपक जलाने का क्रम चलाते रहते हैं। मरणोत्तर संस्कार अन्त्येष्टि संस्कार के तेरहवें दिन किया जाता है। जिस दिन अन्त्येष्टि (दाह क्रिया) होती है, वह दिन भी गिन लिया जाता है। कहीं- कहीं बारहवें दिन की भी परिपाटी होती है। बहुत से क्षेत्रों में दसवें दिन शुद्धि दिवस मनाया जाता है, उस दिन मृतक के निकट सम्बन्धी क्षौर कर्म कराते हैं, घर की व्यापक सफाई- पुताई शुद्धि तक पूर्ण कर लेते हैं, जहाँ तेरहवीं ही मनायी जाती है, वहाँ यह सब कर्म श्राद्ध संस्कार के पूर्व कर लिये जाते हैं।

अन्त्येष्टि के १३वें दिन मरणोत्तर संस्कार किया जाता है। यह शोक- मोह की पूर्णाहुति का विधिवत् आयोजन है। मृत्यु के कारण घर में शोक- वियोग का वातावरण रहता है, बाहर के लोग भी संवेदना- सहानुभूति प्रकट करने आते हैं- यह क्रम तेरह दिन में पूरा हो जाना चाहिए, ताकि भावुकतावश शोक का वातावरण लम्बी अवधि तक न खिंचता जाए। कर्तव्यों की ओर पुनः ध्यान देना आरम्भ कर दिया जाए। मृतक के शरीर से अशुद्ध कीटाणु निकलते हैं। इसलिए मृत्यु के उपरान्त घर की सफाई करनी चाहिए। दीवारों की पुताई, जमीन की धुलाई- लिपाई, वस्त्रों की गरम जल से धुलाई, वस्तुओं की घिसाई, रँगाई आदि का ऐसा क्रम बनाना पड़ता है कि कोई छूत का अंश न रहे। यह कार्य दस से १३ दिन की अवधि में पूरा हो जाना चाहिए। तेरहवें दिन मरणोत्तर संस्कार की वैसी ही व्यवस्था की जाए, जैसी अन्य संस्कारों की होती है।

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॥ विवाह  संस्कार 
॥ श्री गणेशाय नमः॥

सानन्दं सदनं सुताश्च सुधियः कान्ता प्रियभाषिणी
सन्मित्रं सधनं स्वयोषिति रतिः चाज्ञापराः सेवकाः ।
आतिथ्यं शिवपूजनं प्रतिदिनं मिष्टान्नपानं गृहे
साधोः सङ्गमुपासते हि सततं धन्यो गृहस्थाश्रमः ॥
अर्थात् : घर में आनंद हो, पुत्र बुद्धिमान हो, पत्नी प्रिय बोलनेवाली हो, अच्छे मित्र हो, धन हो, पति-पत्नी में प्रेम हो, सेवक आज्ञापालक हो, जहाँ अतिथि सत्कार हो, ईशपूजन होता हो, रोज अच्छा भोजन बनता हो, और सत्पुरुषों का संग होता हो – ऐसा गृहस्थाश्रम धन्य है।

हिन्दू धर्म में सद्गृहस्थ की, परिवार निर्माण की जिम्मेदारी उठाने के योग्य शारीरिक, मानसिक परिपक्वता आ जाने पर युवक-युवतियों का विवाह संस्कार कराया जाता है। भारतीय संस्कृति के अनुसार विवाह कोई शारीरिक या सामाजिक अनुबन्ध मात्र नहीं हैं, यहाँ दाम्पत्य को एक श्रेष्ठ आध्यात्मिक साधना का भी रूप दिया गया है। इसलिए कहा गया है 'धन्यो गृहस्थाश्रमः'। सद्गृहस्थ ही समाज को अनुकूल व्यवस्था एवं विकास में सहायक होने के साथ श्रेष्ठ नई पीढ़ी बनाने का भी कार्य करते हैं। वहीं अपने संसाधनों से ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ एवं सन्यास आश्रमों के साधकों को वांछित सहयोग देते रहते हैं। ऐसे सद्गृहस्थ बनाने के लिए विवाह को रूढ़ियों-कुरीतियों से मुक्त कराकर श्रेष्ठ संस्कार के रूप में पुनः प्रतिष्ठित करना आवश्क है। युग निर्माण के अन्तर्गत विवाह संस्कार के पारिवारिक एवं सामूहिक प्रयोग सफल और उपयोगी सिद्ध हुए हैं।

संस्कार प्रयोजन
विवाह दो आत्माओं का पवित्र बन्धन है। दो प्राणी अपने अलग-अलग अस्तित्वों को समाप्त कर एक सम्मिलित इकाई का निर्माण करते हैं। स्त्री और पुरुष दोनों में परमात्मा ने कुछ विशेषताएँ और कुछ अपूणर्ताएँ दे रखी हैं। विवाह सम्मिलन से एक-दूसरे की अपूर्णताओं की अपनी विशेषताओं से पूर्ण करते हैं, इससे समग्र व्यक्तित्व का निर्माण होता है। इसलिए विवाह को सामान्यतया मानव जीवन की एक आवश्यकता माना गया है। एक-दूसरे को अपनी योग्यताओं और भावनाओं का लाभ पहुँचाते हुए गाड़ी में लगे हुए दो पहियों की तरह प्रगति-पथ पर अग्रसर होते जाना विवाह का उद्देश्य है। वासना का दाम्पत्य-जीवन में अत्यन्त तुच्छ और गौण स्थान है, प्रधानतः दो आत्माओं के मिलने से उत्पन्न होने वाली उस महती शक्ति का निमार्ण करना है, जो दोनों के लौकिक एवं आध्यात्मिक जीवन के विकास में सहायक सिद्ध हो सके।

विवाह का स्वरूप
आज विवाह वासना-प्रधान बनते चले जा रहे हैं। रंग, रूप एवं वेष-विन्यास के आकर्षण को पति-पत्नि के चुनाव में प्रधानता दी जाने लगी है, यह प्रवृत्ति बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। यदि लोग इसी तरह सोचते रहे, तो दाम्पत्य-जीवन शरीर प्रधान रहने से एक प्रकार के वैध-व्यभिचार का ही रूप धारण कर लेगा। पाश्चात्य जैसी स्थिति भारत में भी आ जायेगी। शारीरिक आकषर्ण की न्यूनाधिकता का अवसर सामने आने पर विवाह जल्दी-जल्दी टूटते-बनते रहेंगे। अभी पत्नी का चुनाव शारीरिक आकषर्ण का ध्यान में रखकर किये जाने की प्रथा चली है, थोड़े ही दिनों में इसकी प्रतिक्रिया पति के चुनाव में भी सामने आयेगी। तब असुन्दर पतियों को कोई पतनी पसन्द न करेगी और उन्हें दाम्पत्य सुख से वंचित ही रहना पड़ेगा।

समय रहते इस बढ़ती हुई प्रवृत्ति को रोका जाना चाहिए और शारीरिक आकषर्ण की उपेक्षा कर सद्गुणों तथा सद्भावनाओं को ही विवाह का आधार पूवर्काल की तरह बने रहने देना चाहिए। शरीर का नहीं आत्मा का सौन्दयर् देखा जाए और साथी में जो कमी है, उसे प्रेम, सहिष्णुता, आत्मीयता एवं विश्वास की छाया में जितना सम्भव हो सके, सुधारना चाहिए, जो सुधार न हो सके, उसे बिना असन्तोष लाये सहन करना चाहिए। इस रीति-नीति पर दाम्पत्य जीवन की सफलता निर्भर है। अतएव पति-पतनी को एक-दूसरे से आकषर्ण लाभ मिलने की बात न सोचकर एक-दूसरे के प्रति आत्म-समपर्ण करने और सम्मिलित शक्ति उत्पन्न करने, उसके जीवन विकास की सम्भावनाएँ उत्पन्न करने की बात सोचनी चाहिए। चुनाव करते समय तक साथी को पसन्द करने न करने की छूट है। जो कुछ देखना, ढूँढ़ना, परखना हो, वह कार्य विवाह से पूर्व ही समाप्त कर लेना चाहिए। जब विवाह हो गया, तो फिर यह कहने की गुंजाइश नहीं रहती कि भूल हो गई, इसलिए साथी की उपेक्षा की जाए। जिस प्रकार के भी गुण-दोष युक्त साथी के साथ विवाह बन्धन में बँधें, उसे अपनी ओर से कर्त्तव्यपालन समझकर पूरा करना ही एक मात्र मार्ग रह जाता है। इसी के लिए विवाह संस्कार का आयोजन किया जाता है। समाज के सम्भ्रान्त व्यक्तियों की, गुरुजनों की, कुटुम्बी-सम्बन्धियों की, देवताओं की उपस्थिति इसीलिए इस धर्मानुष्ठान के अवसर पर आवश्यक मानी जाती है कि दोनों में से कोई इस कत्तर्व्य-बन्धन की उपेक्षा करे, तो उसे रोकें और प्रताड़ित करें।

पति-पतनी इन सभ्रांत व्यक्तियों के सम्मुख अपने निश्चय की, प्रतिज्ञा-बन्धन की घोषणा करते हैं। यह प्रतिज्ञा समारोह ही विवाह संस्कार है। इस अवसर पर दोनों की ही यह भावनाएँ गहराई तक अपने मन में जमानी चाहिए कि वे पृथक् व्यक्तियों की सत्ता समाप्त कर एकीकरण की आत्मीयता में विकसित होते हैं। कोई किसी पर न तो हुकूमत जमायेगा और न अपने अधीन-वशवर्ती रखकर अपने लाभ या अहंकार की पूर्ति करना चाहेगा। वरन् वह करेगा, जिससे साथी को सुविधा मिलती हो। दोनों अपनी इच्छा आवश्कता को गौण और साथी की आवश्यकता को मुख्य मानकर सेवा और सहायता का भाव रखेंगे, उदारता एवं सहिष्णुता बरतेंगे, तभी गृहस्थी का रथ ठीक तरह आगे बढ़ेगा। इस तथ्य को दोनों भली प्रकार हृदयंगम कर लें और इसी रीति-नीति को आजीवन अपनाये रहने का व्रत धारण करें, इसी प्रयोजन के लिए यह पुण्य-संस्कार आयोजित किया जाता है। इस बात को दोनों भली प्रकार समझ लें और सच्चे मन से स्वीकार कर लें, तो ही विवाह-बन्धन में बँधें। विवाह संस्कार आरम्भ करने से पूर्व या विवाह वेदी पर बिठाकर दोनों को यह तथ्य भली प्रकार समझा दिया जाए और उनकी सहमति माँगी जाए। यदि दोनों इन आदर्शों को अपनाये रहने की हार्दिक सहमति-स्वीकृति दें, तो ही विवाह संस्कार आगे बढ़ाया जाए।

विवाह के प्रकार  :
हिन्दू विवाह संस्कार कई प्रकार के होते हैं। पूर्ण विवाह इनमें से कुछ को मिलाकर बनता है।
1. ब्रह्म विवाह
दोनो पक्ष की सहमति से समान वर्ग के सुयोज्ञ वर से कन्या का विवाह निश्चित कर देना 'ब्रह्म विवाह' कहलाता है। सामान्यतः इस विवाह के बाद कन्या को आभूषणयुक्त करके विदा किया जाता है। आज का "Arranged Marriage" 'ब्रह्म विवाह' का ही रूप है।
2. दैव विवाह
किसी सेवा कार्य (विशेषतः धार्मिक अनुष्टान) के मूल्य के रूप अपनी कन्या को दान में दे देना 'दैव विवाह' कहलाता है।
3. आर्श विवाह
कन्या-पक्ष वालों को कन्या का मूल्य दे कर (सामान्यतः गौदान करके) कन्या से विवाह कर लेना 'अर्श विवाह' कहलाता है।
4. प्रजापत्य विवाह
कन्या की सहमति के बिना उसका विवाह अभिजात्य वर्ग के वर से कर देना ' प्रजापत्य विवाह ' कहलाता है।
5. गंधर्व विवाह
परिवार वालों की सहमति के बिना वर और कन्या का बिना किसी रीति-रिवाज के आपस में विवाह कर लेना 'गंधर्व विवाह' कहलाता है।
6. असुर विवाह
कन्या को खरीद कर (आर्थिक रूप से) विवाह कर लेना 'असुर विवाह' कहलाता है।
7. राक्षस विवाह
कन्या की सहमति के बिना उसका अपहरण करके जबरदस्ती विवाह कर लेना 'राक्षस विवाह' कहलाता है।
8. पैशाच विवाह
कन्या की मदहोशी (गहन निद्रा, मानसिक दुर्बलता आदि) का लाभ उठा कर उससे शारीरिक सम्बंध बना लेना और उससे विवाह करना 'पैशाच विवाह' कहलाता है। इसमें कन्या के परिजनों की हत्या तक कर दी जाती है।

विवाह संस्कार - पाणिग्रहण संस्कार
वैदिक विवाह संस्कार पद्धति षोडश संस्कारों में विवाह संस्कार १३ वा सबसे महत्वपूर्ण संस्कार है। हिंदू शास्त्रों में इसको करने की विस्तृत पध्धति दी गई है। आज के समय में इसकी जानकारी बहुत कम रह गई है। अतः यह पध्धति विस्तृत रूप में यहां पर पेश कर रहे हैं जिससे पुत्र / पुत्री का विवाह विधिवत पूर्ण किया जा सके। सगाई और विवाह पध्धति में संस्कार के आलावा रित-रिवाज, पध्धति, मिलनी, परस्पर भेट सोगाद, लेनदेन वगेरे में अलग अलग प्रदेश ज्ञाति, समाज, संप्रदाय अनुसार भिन्नता रहना संभव हैI इसलिए यहाँ विवाह संस्कार में इसका उल्लेख देना जरूरी नही समजा हैI महत्व केवल संस्कार को ही दिया हैI प्रचलित पद्धति का ही उल्लेख किया हैI इसमें भी भिन्नता हो सकती हैI यहाँ बताये गये अर्थघटन भी पूर्ण नही हैI व्यक्तिगत मर्यादा भिन्न भिन्न पध्धति के कारण मतभेद भी संभव हैI प्रस्तुत संस्कार मुख्यतः प्राजाप्रत्य विवाह पध्धति के आधार पर हैI

वाग्दान (सगाई):
चयन : प्रथम जब वर / कन्या के चयन की प्रक्रिया प्रारंभ की जाती है तो कुंडली मिलान किसी योग्य पंडित / ज्योतिषाचार्य द्वारा करा लेना चाहिए। लेकिन यदि कुंडली मिलान ठीक है तो इसको प्रथम बिंदू नहीं बनाना चाहिए, अर्थात जन्मपत्री मिलान में अधिक गुण मिल रहे हैं तो उसको अधिक मान्यता दी जाए यह आवश्यक नहीं है। दोनों परिवारों में समभाव, वर कन्या के कद, शिक्षा, आय आदि में समभाव होना अधिक आवश्यक है। जब वर / कन्या का चयन हो जाए तो सगाई वाग्दान संस्कार करना चाहिये।

वाग्दान संस्कार (सगाई) : कोई शुभ मुहूर्त शोधकर कन्या का पिता वाग्दान (कन्या दान का वचन) करें। इसके लिए प्रथम कन्या के पिता वर के पिता को आमंत्रित करें। सर्वप्रथम गणेश पूजन पश्चात षोडशोपचार सहित इन्द्राणि पूजन का महत्व है। तदुपरांत नारियल व फल मिष्टान्न सम्मुख रख तीन पीढ़ियों के नाम उच्चारण सहित वर को स्वीकार करें। यज्ञोपवीत, फल, स्वर्ण अंगूठी, वस्त्र, द्रव्य वर के पिता को दें। वर के बुजुर्ग व बड़ों का द्रव्य (मिलनी) द्वारा मान करें। वर की ओर से सुहागिन स्त्रियां वस्त्र, स्वर्ण अंगूठी, चूड़ी, शृंगार का सामान व खिलौने कन्या को दें और उसका शृंगार करें। ब्राह्मण को तिलक कर दक्षिणा प्रदान करें। अंत में भोज व संगीत के साथ कार्यक्रम को पूर्ण करें।

विवाह से पूर्व 'तिलक' का संक्षिप्त विधान इस प्रकार है-
वर पूर्वाभिमुख तथा तिलक करने वाले (पिता, भाई आदि) पश्चिमाभिमुख बैठकर निम्नकृत्य सम्पन्न करें- मंगलाचरण, षट्कर्म, तिलक, कलावा, कलशपूजन, गुरुवन्दना, गौरी-गणेश पूजन, सर्वदेव नमस्कार, स्वस्तिवाचन आदि इसके बाद कन्यादाता वर का यथोचित स्वागत-सत्कार (पैर धुलाना, आचमन कराना तथा हल्दी से तिलक करके अक्षत लगाना) करें। ‍तदुपरान्त 'वर' को प्रदान की जाने वाली समस्त सामग्री (थाल-थान, फल-फूल, द्रव्य-वस्त्रादि) कन्यादाता हाथ में लेकर संकल्प मन्त्र बोलते हुए वर को प्रदान कर दें- अंत में भोज व संगीत के साथ कार्यक्रम को पूर्ण करें।

लग्न मुहर्त
विवाह का दिन सुनिश्चित करने के उपरान्त विवाह का लग्न निर्धारित किया जाता है। विवाह लग्न अर्थात् जिस समय पाणिग्रहण संस्कार सम्पन्न किया जाता है। विवाह में लग्न का विशेष महत्व होता है। शास्त्रों में विवाह लग्न का चूकना एक गंभीर दोष माना गया है। विवाह लग्न का शोधन अत्यंत सावधानी से किया जाना चाहिए। विवाह लग्न निश्चित करते समय विद्वान् पंडित से लग्न मुहूर्त निर्धारति करवाना चाहिए

गणपति स्थापना: विवाह के दिन से 2, 3 या 5 दिन पहले विवाह के कार्यक्रम शुरू हो जाते हैं। सर्वप्रथम गौरी गणेश का पूजन कर घर में उन्हें स्थापित किया जाता है और उनसे प्रार्थना की जाती है कि संस्कार में कोई विघ्न न आए। इनकी स्थापना के पश्चात वर या कन्या को घर से बाहर नहीं निकलने दिया जाता है।

लग्न पत्रिका: गणपति स्थापना पश्चात कन्या के घर पर पंडित द्वारा विवाह का शुभ मुहूर्त लग्न पत्रिका में लिख दिया जाता है। साथ ही कन्या व वर की राशी अनुसार उनके तेलवान की संख्या का विवरण भी लिख दिया जाता है। लग्न पत्रिका में साथ में सुपारी, हल्दी, अक्षत, चांदी का सिक्का आदि बांधकर वर के घर कन्या का भाई या अन्य रिश्तेदार लेकर जाते है। इस प्रकार कन्या पक्ष द्वारा वर पक्ष को बारात सहित आने का निमंत्रण दिया जाता है। वर के घर पंडित द्वारा इसको पढ़कर निमंत्रण स्वीकार किया जाता है।

रस्म हल्दी / तेलवान: लग्न पत्रिका में निर्दिष्ट तेल संख्यानुसार हल्दी, तेल, दही मिश्रित मंगल द्रव्य से वर व कन्या का अभिषेक कराया जाता है। यह क्रिया घर में उपस्थित सुहागिन स्त्रियों द्वारा संपन्न की जाती है।
मेहंदी: सभी स्त्रियां कन्या को मेहंदी लगाती हैं। माना जाता है कि वधू की मेहंदी जितनी अच्छी हो भविष्य में उतना ही अच्छा उनका वैवाहिक जीवन रहेगा।

संगीत व जगरता: वर व वधू दोनों के घरों में देर रात तक संगीत कार्यक्रम रखा जाता है।

भात / मायरा / मामेरा: वर व वधू के मामा के घर से लोगों को उपहार आदि भेंट दी जाती है। वर व कन्या को वस्त्र आदि भी मामा द्वारा दिए जाते हैं। सर्वप्रथम कृष्ण जी ने सुदामा की लड़की को भात दिया था। तभी से यह प्रथा प्रचलित है।

तोरण पताका: घर के द्वार को तोरण द्वारा सजाया जाता है। वर इस तोरण को एक सींक / डंडी से छू कर आने वाली वधू के लिए बुरी नजरों से बचाने का टोटका करता है।

सेहराबंदी: बारात लेकर जाने से पहले लड़के को नवीन वस्त्रों से सजाकर उसकी आरती की जाती है। वर की बहन उसको सेहरा बांधती है। शुभ भाग्य के लिए वर को टीका कर द्रव्य प्रदान किया जाता है। वर की भाभी बुरी नजर से बचाव के लिए उसे सुरमा लगाती है। वर का सबसे छोटा भाई, भतीजा या भांजा भी वर की तरह से सजाकर उसके साथ सरबला के रूप में बैठाया जाता है।

बारात प्रस्थान: वर एवं सरबला को घर से बाहर निकाला जाता है। इस समय वर की बहनें रास्ता रोककर नेग लेती हैI और भाई को अच्छी सी भाभी लाने की दुआएं देती हैं। घोड़ी पर बैठने के पश्चात घोड़ी को चने की दाल का भोजन कराया जाता है। गरीबों को द्रव्य दान दिया जाता है। वर को पहले मंदिर ले जाकर प्रभु से निर्विघ्न यात्रा की कामना की जाती है। यहां से बारात विवाह स्थल के लिए प्रस्थान हो जाती है।

बारात स्वागत: विवाह स्थल पर बारात एकत्रित हो, वर पुनः घोड़ी पर सवार हो सभी बरातियों सहित ढोल-बाजे के साथ वधू के द्वार पहुंचते हैं। वधू की मां वर की आरती उतार कर स्वागत करती है। वधू के पिता व अन्य रिश्तेदार वर के पिता व अन्य का फूलों द्वारा स्वागत करते हैं।

द्वार पूजन : परम्परागत विवाह आयोजनों में मुख्य संस्कार से पूर्व द्वारचार (द्वार पूजा) की रस्म होती है, वहाँ यदि हो-हल्ला के वातावरण को संस्कार के उपयुक्त बनाना सम्भव करे I

विवाह हेतु बारात जब द्वार पर आती है, तो सर्वप्रथम 'वर' का स्वागत-सत्कार किया जाता है, जिसका क्रम इस प्रकार है- 'वर' के द्वार पर आते ही आरती की प्रथा हो, तो कन्या की माता आरती कर लें। तत्पश्चात् 'वर' और कन्यादाता परस्पर अभिमुख बैठकर षट्कर्म, कलावा, तिलक, कलशपूजन, गुरुवन्दना, गौरी-गणेश पूजन, सर्वदेवनमस्कार, स्वस्तिवाचन करें। इसके बाद कन्यादाता वर सत्कार के सभी कृत्य आसन, अर्घ्य, पाद्य, आचमन, मधुपर्क आदि (विवाह संस्कार से) सम्पन्न कराएँ। तत्पश्चात्

ॐ गन्धद्वारां दुराधर्षां.........  तिलक लगाएँ तथा
ॐ अक्षन्नमीमदन्त ...... अक्षत लगाएँ।
माल्यार्पण एवं कुछ द्रव्य 'वर' को प्रदान करना हो, तो निम्नस्थ मन्त्रों से सम्पन्न करा दें-
माल्यापर्ण मन्त्र-
ॐ मंगलं भगवान विष्णुः .........
द्रव्यदान मन्त्र -
ॐ हिरण्यगर्भः समवत्तर्ताग्रे .......

विवाह संस्कार का विशेष कमर्काण्ड :
विवाह वेदी पर वर और कन्या दोनों को बुलाया जाए, प्रवेश के साथ मंगलाचरण 'भद्रं कणेर्भिः.......' मन्त्र बोलते हुए उन पर पुष्पाक्षत डाले जाएँ। कन्या दायीं ओर तथा वर बायीं ओर बैठे। कन्यादान करने वाले प्रतिनिधि कन्या के पिता, भाई जो भी हों, उन्हें पत्नी सहित कन्या की ओर बिठाया जाए। पत्नी दाहिने और पति बायीं ओर बैठें। सभी के सामने आचमनी, पंचपात्र आदि उपकरण हों। पवित्रीकरण, आचमन, शिखा-वन्दन, प्राणायाम, न्यास, पृथ्वी-पूजन आदि षट्कर्म सम्पन्न करा लिये जाएँ। वर-सत्कार- (अलग से द्वार पूजा में वर सत्कार कृत्य हो चुका हो, तो दुबारा करने की आवश्यकता नहीं है।) अतिथि रूप में आये हुए वर का सत्कार किया जाए। (१) आसन (२) पाद्य (३) अर्ध्य (४) आचमन (५) नैवेद्य आदि निधार्रित मन्त्रों से समपिर्त किए जाएँ।

दिशा और प्रेरणा वर का अतिथि के नाते सत्कार किया जाता है। गृहस्थाश्रम में गृहलक्ष्मी का महत्त्व सवोर्परि होता है। उसे लेने वर एवं उसके हितैषी परिजन कन्या के पिता के पास चल कर आते हैं। श्रेष्ठ उद्देश्य से सद्भावनापूर्वक आये अतिथियों का स्वागत करना कन्या पक्ष का कत्तर्व्य हो जाता है। दोनों पक्षों को अपने-अपने इन सद्भावों को जाग्रत् रखना चाहिए।

वर का अर्थ होता है- श्रेष्ठ, स्वीकार करने योग्य। कन्या-पक्ष वर को अपनी कन्या के अनुरूप श्रेष्ठ व्यक्ति मानकर ही सम्बन्ध स्वीकार करें, उसी भाव से श्रेष्ठ भाव रखते हुए सत्कार करें और भगवान से प्राथर्ना करें कि यह भाव सदा बनाये रखने में सहायता करें।

वर पक्ष सम्मान पाकर निरर्थक अहं न बढ़ाएँ। जिन मानवीय गुणों के कारण श्रेष्ठ मानकर वर का सत्कार करने की व्यवस्था ऋषियों ने बनाई है, उन शालीनता, जिम्मेदारी, आत्मीयता, सहकारिता जैसे गुणों को इतना जीवन्त बनाकर रखें कि कन्या पक्ष की सहज श्रद्धा उसके प्रति उमड़ती ही रहे। ऐसा सम्भव हो, तो पारिवारिक सम्बन्धों में देवोपम स्नेह-मधुरता का संचार अवश्य होगा।

इन दिव्य भावों के लिए सबसे अधिक घातक है, संकीर्ण स्वाथर्परक लेन-देन का आग्रह। दहेज, चढ़ावा आदि के नाम पर यदि एक-दूसरे पर दबाव डाले जाते हैं, तो सद्भाव तो समाप्त हो ही जाती है, द्वेष और प्रतिशोध के दुर्भाव उभर आते हैं। वर-वधू के सुखद भविष्य को ध्यान में रखकर ऐसे अप्रिय प्रसंगों को विष मानकर उनसे सवर्था दूर रहना चाहिए। ध्यान रखें कि सत्कार में स्थूल उपचारों को नहीं हृदयगत भावों को प्रधान माना जाता है। उन्हीं के साथ निधार्रित क्रम पूरा किया-कराया जाए। क्रिया और भावना- स्वागतकत्तार् हाथ में अक्षत लेकर भावना करें कि वर की श्रेष्ठतम प्रवृत्तियों का अचर्न कर रहे हैं। देव-शक्तियाँ उन्हें बढ़ाने-बनाये रखने में सहयोग करें।

निम्न मन्त्र बोलें- ॐ साधु भवान् आस्ताम्। अचर्यिष्यामो भवन्तम्। -पार०गृ० १.३1४

वर दाहिने हाथ में अक्षत स्वीकार करते हुए भावना करें कि स्वागतकत्तार् की श्रद्धा पाते रहने के योग्य व्यक्तित्व बनाये रखने का उत्तरदायित्व स्वीकार कर रहे हैं। बोलें- 'ॐ अचर्य।' आसन- स्वागतकत्तार् आसन या उसका प्रतीक (कुश या पुष्प आदि) हाथ में लेकर निम्न मन्त्र बोलें। भावना करें कि वर को श्रेष्ठता का आधार-स्तर प्राप्त हो। हमारे स्नेह में उसका स्थान बने।

ॐ विष्टरो, विष्टरो, विष्टरः प्रतिगृह्यताम्। -पार०गृ०सू० १.३.६ वर कन्या के पिता के हाथ से विष्टर (कुश या पुष्प आदि) लेकर कहें-
वर यह मंत्र बोलकर ॐ प्रतिगृह्णामि। - पार०गृ०सू० १.३.७ (कुश या पुष्प आदि से बनाये) आसन बिछाकर बैठ जाए

इस क्रिया के साथ निम्न मन्त्र बोला जाए-
ॐ वष्मोर्ऽस्मि समानानामुद्यतामिव सूयर्ः।
इमन्तमभितिष्ठामि, यो मा कश्चाभिदासति॥ - पार०गृ०सू० १.३.८ पाद्य- स्वागतकर्ता पैर धोने के लिए छोटे पात्र में जल लें। भावना करें कि ऋषियों के आदर्शों के अनुरूप सद्गृहस्थ बनने की दिशा में बढ़ने वाले पैर पूजनीय हैं।
कन्यादाता कहें- ॐ पाद्यं, पाद्यं, पाद्यं, प्रतिगृह्यताम्। - पार०गृ०सू०१.३.६
वर कहें- ॐ प्रतिगृह्णामि। - पार०गृ०सू०१.३.७ भावना करें कि आदर्शों की दिशा में चरण बढ़ाने की उमंग इष्टदेव बनाये रखें।

पद प्रक्षालन की क्रिया के साथ यह मन्त्र बोला जाए।
ॐ विराजो दोहोऽसि, विराजो दोहमशीय मयि, पाद्यायै विराजो दोहः। - पार०गृ०सू० १.३.१२
अर्घ्य- स्वागतककर्ता चन्दन युक्त सुगन्धित जल पात्र में लेकर भावना करे कि सत्पुरुषार्थ में लगने का संस्कार वर के हाथों में जाग्रत् करने हेतु अर्ध्य दे रहे हैं। कन्यादाता कहे- ॐ अर्घो, अर्घो, अर्घः प्रतिगृह्यताम्। - पार०गृ०सू०१.३.६

जल पात्र स्वीकार करते हुए वर कहे- ॐ प्रतिगृह्णामि। - पार०गृ०सू०१.३.७ भावना करें कि सुगन्धित जल सत्पुरुषार्थ के संस्कार दे रहा है। जल से हाथ धोएँ । क्रिया के साथ निम्न मन्त्र बोला जाए।
ॐ आपःस्थ युष्माभिः, सवार्न्कामानवाप्नवानि।
ॐ समुद्रं वः प्रहिणोमि, स्वां योनिमभिगच्छत।
अरिष्टाअस्माकं वीरा, मा परासेचि मत्पयः। - पार०गृ०सू० १.३.१३-१४
आचमन- स्वागतकर्ता आचमन के लिए जल पात्र प्रस्तुत करें। भावना करें कि वर-श्रेष्ठ अतिथि का मुख उज्ज्वल रहे, उसकी वाणी उसका व्यक्तित्व तदनुरूप बने। कन्यादाता कहे- ॐ आचमनीयम्, आचमीयनम्, आचमीनयम्, प्रतिगृह्यताम्॥
ॐ प्रतिगृह्णामि। (वर कहे) -पार०गृ०सू० १.३.६ भावना करें कि मन, बुद्धि और अन्तःकरण तक यह भाव बिठाने का प्रयास कर रहे हैं। तीन बार आचमन करें। यह मन्त्र बोला जाए।
ॐ आमागन् यशसा, स सृज वचर्सा।
तं मा कुरु प्रियं प्रजानामधिपतिं, पशूनामरिष्टिं तनूनाम्। - पार०गृ०सू० १.३.१५
नैवेद्य- एक पात्र में दूध, दही, शकर्रा (मधु) और तुलसीदल डाल कर रखें। स्वागतकर्त्ता वह पात्र हाथ में लें। भावना करें कि वर की श्रेष्ठता बनाये रखने योग्य सात्विक, सुसंस्कारी और स्वास्थ्यवधर्क आहार उन्हें सतत प्राप्त होता रहे।
कन्यादाता कहे- ॐ मधुपकोर्, मधुपकोर्, मधुपर्कः प्रतिगृह्यताम्। - पार०गृ०सू० १.३.६

वर पात्र स्वीकार करते हुए कहे- ॐ प्रतिगृह्णामि। वर मधुपर्क का पान करे। भावना करें कि अभक्ष्य के कुसंस्कारों से बचने, सत्पदार्थों से सुसंस्कार अजिर्त करते रहने का उत्तरदायित्व स्वीकार रहे हैं। पान करते समय यह मन्त्र बोला जाए। ॐ यन्मधुनो मधव्यं परम रूपमन्नाद्यम्। तेनाहं मधुनो मधव्येन परमेण, रूपेणान्नाद्येन परमो मधव्योऽन्नादोऽसानि। - पार०गृ०सू० १.३.२०

तत्पश्चात् जल से वर हाथ-मुख धोए। स्वच्छ होकर अगले क्रम के लिए बैठे। इसके बाद चन्दन धारण कराएँ। यदि यज्ञोपवीत धारण पहले नहीं कराया गया है, तो यज्ञोपवीत प्रकरण के आधार पर संक्षेप में उसे सम्पन्न कराया जाए। इसके बाद क्रमशः कलशपूजन, नमस्कार, षोडशोपचार पूजन, स्वस्तिवाचन, रक्षाविधान आदि सामान्य क्रम करा लिए जाएँ। रक्षा-विधान के बाद संस्कार का विशेष प्रकरण चालू किया जाए।

विवाह घोषणा - लग्न पत्रिका वांचन
विवाह घोषणा की एक छोटी-सी संस्कृत भाषा की शब्दावली है, जिसमें वर-कन्या के गोत्र पिता-पितामह आदि का उल्लेख और घोषणा है कि यह दोनों अब विवाह सम्बन्ध में आबद्ध होते हैं। इनका साहचर्य धर्म-संगत जन साधारण की जानकारी में घोषित किया हुआ माना जाए। बिना घोषणा के गुपचुप चलने वाले दाम्पत्य स्तर के प्रेम सम्बन्ध, नैतिक, धामिर्क एवं कानूनी दृष्टि से अवांछनीय माने गये हैं। जिनके बीच दाम्पत्य सम्बन्ध हो, उसकी घोषणा सवर्साधारण के समक्ष की जानी चाहिए। समाज की जानकारी से जो छिपाया जा रहा हो, वही व्यभिचार है। घोषणापूवर्क विवाह सम्बन्ध में आबद्ध होकर वर-कन्या धर्म परम्परा का पालन करते हैं।

स्वस्ति श्रीमन्नन्द नन्दन चरणकमल भक्ति सद् विद्या विनीत निजकुलकमल कलिकाप्रकाशनैकभास्कार सदाचार सच्चरित्र सत्कुल सत्प्रतिष्ठा गरिष्ठस्य .........गोत्रस्य ........ महोदयस्य प्रपौत्रः .......... महोदयस्य पौत्र.......... महोदयस्य पुत्रः॥ ....... महोदयस्य प्रपौत्री, ........ महोदयस्य पौत्री .........महोदयस्य पुत्री प्रयतपाणिः शरणं प्रपद्ये। स्वस्ति संवादेषूभयोवृर्द्धिवर्रकन्ययोश्चिरंजीविनौ भूयास्ताम्। (खाली स्थान में वर वधु पक्ष के दादा, पिता, वर / वधु का नाम)

मंगलाष्टक
विवाह घोषणा के बाद, सस्वर मंगलाष्टक मन्त्र बोलें जाएँ। इन मन्त्रों में सभी श्रेष्ठ शक्तियों से मंगलमय वातावरण, मंगलमय भविष्य के निमार्ण की प्रार्थना की जाती है। पाठ के समय सभी लोग भावनापूर्वक वर-वधू के लिए मंगल कामना करते रहें। एक स्वयं सेवक उनके ऊपर पुष्पों की वर्षा करता रहे।

ॐमत्पंकजविष्टरो हरिहरौ, वायुमर्हेन्द्रोऽनलः।
चन्द्रो भास्कर वित्तपाल वरुण, प्रताधिपादिग्रहाः।
प्रद्यम्नो नलकूबरौ सुरगजः, चिन्तामणिः कौस्तुभः,
स्वामी शक्तिधरश्च लांगलधरः, कुवर्न्तु वो मंगलम्॥ (१)

गंगा गोमतिगोपतिगर्णपतिः, गोविन्दगोवधर्नौ,
गीता गोमयगोरजौ गिरिसुता, गंगाधरो गौतमः।
गायत्री गरुडो गदाधरगया, गम्भीरगोदावरी,
गन्धवर्ग्रहगोपगोकुलधराः, कुवर्न्तु वो मंगलम्॥ (२)

नेत्राणां त्रितयं महत्पशुपतेः अग्नेस्तु पादत्रयं,
तत्तद्विष्णुपदत्रयं त्रिभुवने, ख्यातं च रामत्रयम्।
गंगावाहपथत्रयं सुविमलं, वेदत्रयं ब्राह्मणम्,
संध्यानां त्रितयं द्विजैरभिमतं, कुवर्न्तु वो मंगलम्॥ (३)

बाल्मीकिः सनकः सनन्दनमुनिः, व्यासोवसिष्ठो भृगुः,
जाबालिजर्मदग्निरत्रिजनकौ, गर्गोऽ गिरा गौतमः।
मान्धाता भरतो नृपश्च सगरो, धन्यो दिलीपो नलः,
पुण्यो धमर्सुतो ययातिनहुषौ, कुवर्न्तु वो मंगलम्॥ (४)

गौरी श्रीकुलदेवता च सुभगा, कद्रूसुपणार्शिवाः,
सावित्री च सरस्वती च सुरभिः, सत्यव्रतारुन्धती।
स्वाहा जाम्बवती च रुक्मभगिनी, दुःस्वप्नविध्वंसिनी,
वेला चाम्बुनिधेः समीनमकरा, कुवर्न्तु वो मंगलम्॥ (५)

गंगा सिन्धु सरस्वती च यमुना, गोदावरी नमर्दा,
कावेरी सरयू महेन्द्रतनया, चमर्ण्वती वेदिका।
शिप्रा वेत्रवती महासुरनदी, ख्याता च या गण्डकी,
पूर्णाः पुण्यजलैः समुद्रसहिताः, कुवर्न्तु वो मंगलम्॥ (६)

लक्ष्मीः कौस्तुभपारिजातकसुरा, धन्वन्तरिश्चन्द्रमा,
गावः कामदुघाः सुरेश्वरगजो, रम्भादिदेवांगनाः।
अश्वः सप्तमुखः सुधा हरिधनुः, शंखो विषं चाम्बुधे,
रतनानीति चतुदर्श प्रतिदिनं, कुवर्न्तु वो मंगलम्॥ (७)

ब्रह्मा वेदपतिः शिवः पशुपतिः, सूयोर् ग्रहाणां पतिः,
शुक्रो देवपतिनर्लो नरपतिः, स्कन्दश्च सेनापतिः।
विष्णुयर्ज्ञपतियर्मः पितृपतिः, तारापतिश्चन्द्रमा,
इत्येते पतयस्सुपणर्सहिताः, कुवर्न्तु वो मंगलम्॥ (८)

परस्पर उपहार 
वर पक्ष की ओर से कन्या को और कन्या पक्ष की ओर से वर को वस्त्र-आभूषण भेंट किये जाने की परम्परा है। यह कार्य अपनी शक्ति श्रद्धानुरूप पहले ही हो जाता है। वर-वधू उन्हें पहनाकर ही संस्कार में बैठते हैं। यहाँ प्रतीक रूप से पीले दुपट्टे एक-दूसरे को भेंट किये जाएँ। यही ग्रन्थि बन्धन के भी काम आ जाते हैं। आभूषण पहिनाना हो, तो अँगूठी या मंगलसूत्र जैसे शुभ-चिह्नों तक ही सीमित रहना चाहिए। दोनों पक्ष भावना करें कि एक-दूसरे का सम्मान बढ़ाने, उन्हें अलंकृत करने का उत्तरदायितव समझने और निभाने के लिए संकल्पित हो रहे हैं। नीचे लिखे मन्त्र के साथ परस्पर उपहार दिये जाएँ।

ॐ परिधास्यै यशोधास्यै, दीघार्युत्वाय जरदष्टिरस्मि। शतं च जीवामि शरदः, पुरूचीरायस्पोषमभि संव्ययिष्ये। - पार०गृ०सू० २.६.२०

पुष्पोहार (माल्यापर्ण) वर-वधू एक-दूसरे को अपने अनुरूप स्वीकार करते हुए, पुष्प मालाएँ अपिर्त करते हैं। हृदय से वरण करते हैं। भावना करें कि देव शक्तियों और सत्पुरुषों के आशीर्वाद से वे परस्पर एक दूसरे के गले के हार बनकर रहेंगे। मन्त्रोच्चार के साथ पहले कन्या वर को फिर वर-कन्या को माला पहिनाएँ।
ॐ यशसा माद्यावापृथिवी, यशसेन्द्रा बृहस्पती। यशो भगश्च मा विदद्, यशो मा प्रतिपद्यताम्। - पार०गृ०सू० २.६.२१, मा०गृ०सू० १.९.२७

हस्तपीतकरण - हाथ पीले करना 

शिक्षा एवं प्रेरणा
कन्यादान करने वाले कन्या के हाथों में हल्दी लगाते हैं। हरिद्रा मंगलसूचक है। अब तक बालिका के रूप में यह लड़की रही। अब यह गृहलक्ष्मी का उत्तरदायित्व वहन करेगी, इसलिए उसके हाथों को पीतवर्ण-मंगलमय बनाया जाता है। उसके माता-पिता ने लाड़-प्यार से पाला, उसके हाथों में कोई कठोर कत्तर्व्य नहीं सौंपा। अब उसे अपने हाथों को नव-निमार्ण के अनेक उत्तरदायित्व सँभालने को तैयार करना है, अतएव उन्हें पीतवर्ण मांगलिक-लक्ष्मी का प्रतीक-सृजनात्मक होना चाहिए। पीले हाथ करते हुए कन्या परिवार के लोग उस बालिका को यही मौन शिक्षण देते हैं कि उसे आगे सृजन शक्ति के रूप में प्रकट होना है और इसके लिए इन कोमल हाथों को अधिक उत्तरदायी, मजबूत और मांगलिक बनाना है।

क्रिया और भावना
कन्या दोनों हथेलियाँ सामने कर दे। कन्यादाता गीली हल्दी उस पर मन्त्र के साथ मलें। भावना करें कि देव सान्निध्य में इन हाथों को स्वाथर्परता के कुसंस्कारों से मुक्त कराते हुए त्याग परमार्थ के संस्कार जाग्रत् किये जा रहे हैं।
ॐ अत्रिव भोगैः पयेर्ति बाहंु, ज्याया हेतिं परिबाधमानः।
हस्तघ्नो विश्वा वयुनानि विद्वान्, पुमान् पुमा सं परिपातु विश्वतः। - २९.५१

कन्यादान


कन्यादान : पिता अपनी कन्या का हाथ वर के हाथ में देता है।

कन्यादान का अर्थ है, अभिभावकों के उत्तरदायित्वों का वर के ऊपर, ससुराल वालों के ऊपर स्थानान्तरण होना। अब तक माता-पिता कन्या के भरण-पोषण, विकास, सुरक्षा, सुख-शान्ति, आनन्द-उल्लास आदि का प्रबंध करते थे, अब वह प्रबन्ध वर और उसके कुटुम्बियों को करना होगा। कन्या नये घर में जाकर विरानेपन का अनुभव न कर पाये, उसे स्नेह, सहयोग, सद्भाव की कमी अनुभव न हो, इसका पूरा ध्यान रखना होगा। कन्यादान स्वीकार करते समय-पाणिग्रहण की जिम्मेदारी स्वीकार करते समय, वर तथा उसके अभिभावकों को यह बात भली प्रकार अनुभव कर लेनी चाहिए कि उन्हें उस उत्तरदायित्व को पूरी जिम्मेदारी के साथ निभाना है। कन्यादान का अर्थ यह नहीं कि जिस प्रकार कोई सम्पत्ति, किसी को बेची या दान कर दी जाती है, उसी प्रकार लड़की को भी एक सम्पत्ति समझकर किसी न किसी को चाहे जो उपयोग करने के लिए दे दिया है। हर मनुष्य की एक स्वतन्त्र सत्ता एवं स्थिति है। कोई मनुष्य किसी मनुष्य को बेच या दान नहीं कर सकता। फिर चाहे वह पिता ही क्यों न हो। व्यक्ति के स्वतन्त्र अस्तित्व एवं अधिकार से इनकार नहीं किया जा सकता, न उसे चुनौती दी जा सकती है। लड़की हो या लड़का अभिभावकों को यह अधिकार नहीं कि वे उन्हें बेचें या दान करें। ऐसा करना तो बच्चे के स्वतन्त्र व्यक्तित्व के तथ्य को ही झुठलाना हो जाएगा।

विवाह उभयपक्षीय समझौता है, जिसे वर और वधू दोनों ही पूरी ईमानदारी और निष्ठा के साथ निर्वाह कर सफल बनाते हैं। यदि कोई किसी को खरीदी या बेची सम्पत्ति के रूप में देखें और उस पर पशुओं जैसा स्वामित्व अनुभव करें या व्यवहार करें, तो यह मानवता के मूलभूत अधिकारों का हनन करना ही होगा। कन्यादान का यह तात्पर्य कदापि नहीं, उसका प्रयोजन इतना ही है कि कन्या के अभिभावक बालिका के जीवन को सुव्यवस्थित, सुविकसित एवं सुख-शान्तिमय बनाने की जिम्मेदारी को वर तथा उसके अभिभावकों पर छोड़ते हैं, जिसे उन्हें मनोयोगपूवर्क निभाना चाहिए। पराये घर में पहुँचने पर कच्ची उम्र की अनुभवहीन भावुक बालिका को अखरने वाली मनोदशा में होकर गुजरना पड़ता है। इसलिए इस आरम्भिक सन्धिवेला में तो विशेष रूप से वर पक्ष वालों को यह प्रयास करना चाहिए कि हर दृष्टि से वधू को अधिक स्नेह, सहयोग मिलता रहे। कन्या पक्ष वालों को भी यह नहीं सोच लेना चाहिए कि लड़की के पीले हाथ कर दिये, कन्यादान हो गया, अब तो उन्हें कुछ भी करना या सोचना नहीं है। उन्हें भी लड़की के भविष्य को उज्ज्वल बनाने में योगदान देते रहना है। क्रिया और भावना- कन्या के हाथ हल्दी से पीले करके माता-पिता अपने हाथ में कन्या के हाथ, गुप्तदान का धन और पुष्प रखकर संकल्प बोलते हैं और उन हाथों को वर के हाथों में सौंप देते हैं। वह इन हाथों को गंभीरता और जिम्मेदारी के साथ अपने हाथों को पकड़कर स्वीकार-शिरोधार्य करता है। भावना करें कि कन्या वर को सौंपते हुए उसके अभिभावक अपने समग्र अधिकार को सौंपते हैं। कन्या के कुल गोत्र अब पितृ परम्परा से नहीं, पति परम्परा के अनुसार होंगे। कन्या को यह भावनात्मक पुरुषार्थ करने तथा पति को उसे स्वीकार करने या निभाने की शक्ति देवशक्तियाँ प्रदान कर रही हैं। इस भावना के साथ कन्यादान का संकल्प बोला जाए। संकल्प पूरा होने पर संकल्पकर्ता कन्या के हाथ वर के हाथ में सौंपते हुए कहे :

अद्येति.........नामाहं.........नाम्नीम् इमां कन्यां/भगिनीं सुस्नातां यथाशक्ति अलंकृतां, गन्धादि - अचिर्तां, वस्रयुगच्छन्नां, प्रजापति दैवत्यां, शतगुणीकृत, ज्योतिष्टोम-अतिरात्र-शतफल-प्राप्तिकामोऽहं ......... नाम्ने, विष्णुरूपिणे वराय, भरण-पोषण-आच्छादन-पालनादीनां, स्वकीय उत्तरदायित्व-भारम्, अखिलं अद्य तव पतनीत्वेन, तुभ्यं अहं सम्प्रददे।

वर उन्हें स्वीकार करते हुए कहें- ॐ स्वस्ति।

गुप्तदान
कन्यादान के समय कुछ अंशदान देने की प्रथा है। आटे की लोई में छिपाकर कुछ धन कन्यादान के समय दिया जाता है। दहेज का यही स्वरूप है। बच्ची के घर से विदा होते समय उसके अभिभावक किसी आवश्यकता के समय काम आने के लिए उपहार स्वरूप कुछ धन देते हैं, पर होता वह गुप्त ही है। अभिभावक और कन्या के बीच का यह निजी उपहार है। दूसरों को इसके सम्बन्ध में जानने या पूछने की कोई आवश्यकता नहीं। दहेज के रूप में क्या दिया जाना चाहिए, इस सम्बन्ध में ससुराल वालों को कहने या पूछने का कोई अधिकार नहीं। न उसके प्रदशर्न की आवश्यकता है, क्यों कि गरीब-अमीर अपनी स्थिति के अनुसार जो दे, वह चर्चा का विषय नहीं बनना चाहिए, उसके साथ निन्दा-प्रशंसा नहीं जुड़नी चाहिए। एक-दूसरे का अनुकरण करने लगें, प्रतिस्पर्द्धा पर उतर आएँ, तो इससे अनर्थ ही होगा। कन्या-पक्ष पर अनुचित दबाव पड़ेगा और वर-पक्ष अधिक न मिलने पर अप्रसन्न होने की धृष्टता करने लगेगा। इसलिए कन्यादान के साथ कुछ धनदान का विधान तो है, पर दूरर्दशी ऋषियों ने लोगों की स्वाथर्परता एवं दुष्टता की सम्भावना को ध्यान में रखते हुए यह नियम बना दिया है कि जो कुछ भी दहेज दिया जाए, वह सर्वथा गुप्त हो, उस पर किसी को चर्चा करने का अधिकार न हो।

आटे में साधारण तया एक रुपया इस दहेज प्रतीक के लिए पयार्प्त है। यह धातु का लिया जाए और आटे के गोले के भीतर छिपाकर रखा जाए।

गोदान

गौ पवित्रता और परमार्थ परायणता की प्रतीक है। कन्या पक्ष वर को ऐसा दान दें, जो उन्हें पवित्रता और परमार्थ की प्रेरणा देने वाला हो। सम्भव हो, तो कन्यादान के अवसर पर गाय दान में दी जा सकती है। वह कन्या के व उसके परिवार के लोगों के स्वास्थ्य की दृष्टि से उपयुक्त भी है। आज की स्थिति में यदि गौ देना या लेना असुविधाजनक हो, तो उसके लिए कुछ धन देकर गोदान की परिपाटी को जीवित रखा जा सकता है। क्रिया और भावना- कन्यादान करने वाले हाथ में सामग्री लें। भावना करें कि वर-कन्या के भावी जीवन को सुखी समुन्नत बनाने के लिए श्रद्धापूवर्क श्रेष्ठ दान कर रहे हैं। मन्त्रोच्चार के साथ सामग्री वर के हाथ में दें।
ॐ माता रुद्राणां दुहिता वसूनां, स्वसादित्यानाममृतस्य नाभिः।
प्र नु वोचं चिकितुषे जनाय मा, गामनागामदितिं वधिष्ट॥ -ऋ०८.१०.१.१५, पार०गृ०सू० १.३.२७

मर्यादाकरण
कन्यादान-गोदान के बाद कन्यादाता वर से सत् पुरुषों और देव शक्तियों की साक्षी में मर्यादा की विनम्र अपील करता है। वर उसे स्वीकार करता है। कन्या का उत्तरदायित्व वर को सौंपा गया है। ऋषियों द्वारा निधार्रित अनुशासन विशेष लक्ष्य के लिए हैं। अधिकार पाकर उस मयार्दा को भुलकर मनमाना आचरण न किया जाए। धर्म, अर्थ और काम की दिशा में ऋषि प्रणीत मयार्दा का उल्लंघन अधिकार के नशे में न किया जाए। यह निवेदन किया जाता है, जिसे वर प्रसन्नतापूवर्क स्वीकार करता है।

क्रिया और भावना
कन्यादान करने वाले अपने हाथ में जल, पुष्प, अक्षत लें। भावना करें कि वर को मयार्दा सौंप रहे हैं। वर मयार्दा स्वीकार करें, उसके पालन के लिए देव शक्तियों के सहयोग की कामना करे।
ॐ गौरीं कन्यामिमां पूज्य! यथाशक्तिविभूषिताम्।
गोत्राय शमर्णे तुभ्यं, दत्तां देव समाश्रय॥
धमर्स्याचरणं सम्यक्, क्रियतामनया सह।
धमेर् चाथेर् च कामे च, यत्त्वं नातिचरेविर्भो॥

वर कहें - नातिचरामि।
पाणिग्रहण
दिशा एवं प्रेरणा
वर द्वारा मर्यादा स्वीकारोक्ति के बाद कन्या अपना हाथ वर के हाथ में सौंपे और वर अपना हाथ कन्या के हाथ में सौंप दे। इस प्रकार दोनों एक दूसरे का पाणिग्रहण करते हैं। यह क्रिया हाथ से हाथ मिलाने जैसी होती है। मानों एक दूसरे को पकड़कर सहारा दे रहे हों। कन्यादान की तरह यह वर-दान की क्रिया तो नहीं होती, फिर भी उस अवसर पर वर की भावना भी ठीक वैसी होनी चाहिए, जैसी कि कन्या को अपना हाथ सौंपते समय होती है। वर भी यह अनुभव करें कि उसने अपने व्यक्तित्व का अपनी इच्छा, आकांक्षा एवं गतिविधियों के संचालन का केन्द्र इस वधू को बना दिया और अपना हाथ भी सौंप दिया। दोनों एक दूसरे को आगे बढ़ाने के लिए एक दूसरे का हाथ जब भावनापूर्वक समाज के सम्मुख पकड़ लें, तो समझना चाहिए कि विवाह का प्रयोजन पूरा हो गया।

क्रिया और भावना
नीचे लिखे मन्त्र के साथ कन्या अपना हाथ वर की ओर बढ़ाये, वर उसे अँगूठा सहित (समग्र रूप से) पकड़ ले। भावना करें कि दिव्य वातावरण में परस्पर मित्रता के भाव सहित एक-दूसरे के उत्तरदायित्व स्वीकार कर रहे हैं।
ॐे यदैषि मनसा दूरं, दिशोऽ नुपवमानो वा।
हिरण्यपणोर् वै कणर्ः, स त्वा मन्मनसां करोतु असौ॥ - पार०गृ०सू० १.४.१५

ग्रन्थि-बन्धन
दिशा और प्रेरणा
वर-वधू द्वारा पाणिग्रहण एकीकरण के बाद समाज द्वारा दोनों को एक गाँठ में बाँध दिया जाता है। दुपट्टे के छोर बाँधने का अर्थ है-दोनों के शरीर और मन से एक संयुक्त इकाई के रूप में एक नई सत्ता का आविर्भाव होना। अब दोनों एक-दूसरे के साथ पूरी तरह बँधे हुए हैं। ग्रन्थि-बन्धन में धन, पुष्प, दूर्वा, हरिद्रा और अक्षत यह पाँच चीजें भी बाँधते हैं। पैसा इसलिए रखा जाता है कि धन पर किसी एक का अधिकार नहीं रहेगा। जो कमाई या सम्पत्ति होगी, उस पर दोनों की सहमति से योजना एवं व्यवस्था बनेगी। ‍दूर्वा का अर्थ है- कभी निजीर्व न होने वाली प्रेम भावना। दूर्वा का जीवन तत्त्व नष्ट नहीं होता, सूख जाने पर भी वह पानी डालने पर हरी हो जाती है। इसी प्रकार दोनों के मन में एक-दूसरे के लिए अजस्र प्रेम और आत्मीयता बनी रहे। चन्द्र-चकोर की तरह एक-दूसरे पर अपने को न्यौछावर करते रहें। अपना कष्ट कम और साथी का कष्ट बढ़कर मानें, अपने सुख की अपेक्षा साथी के सुख का अधिक ध्यान रखें। अपना आन्तरिक प्रेम एक-दूसरे पर उड़ेलते रहें। हरिद्रा का अर्थ है- आरोग्य, एक-दूसरे के शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य को सुविकसित करने का प्रयतन करें। ऐसा व्यवहार न करें, जिससे साथी का स्वास्थ्य खराब होता हो या मानसिक उद्वेग पैदा होता हो। अक्षत, सामूहिक-सामाजिक विविध-विध उत्तरदायित्वों का स्मरण कराता है। कुटुम्ब में कितने ही व्यक्ति होते हैं। उन सबका समुचित ध्यान रखना, सभी को सँभालना संयुक्त पति-पत्नी का परम पावन कत्तर्व्य है। ऐसा न हो कि एक-दूसरे को तो प्रेम करें, पर परिवार के लोगों की उपेक्षा करने लगें। इसी प्रकार परिवार से बाहर भी जन मानस के सेवा की जिम्मेदारी हर भावनाशील मनुष्य पर रहती है। ऐसा न हो कि दो में से कोई किसी को अपने व्यक्तिगत स्वार्थ सहयोग तक ही सीमित कर ले, उसे समाज सेवा की सुविधा न दे। इस दिशा में लगने वाले समय व धन का विरोध करे। अक्षत इसी का संकेत करता है कि आप दोनों एक-दूसरे के लिए ही नहीं बने हैं, वरन् समाजसेवा का व्रत एवं उत्तरदायित्व भी आप लोगों के ग्रन्थि-बन्धन में एक महत्त्वपूर्ण लक्ष्य के रूप में विद्यमान है। पुष्प का अर्थ है, हँसते-खिलते रहना। एक-दूसरे को सुगन्धित बनाने के लिए यश फैलाने और प्रशंसा करने के लिए तत्पर रहें। कोई किसी का दूसरे के आगे न तो अपमान करे और न तिरस्कार। इस प्रकार दूर्वा, पुष्प, हरिद्रा, अक्षत और पैसा इन पाँचों को रखकर दोनों का ग्रन्थिबन्धन किया जाता है और यह आशा की जाती है कि वे जिन लक्ष्यों के साथ आपस में बँधे हैं, उन्हें आजीवन निरन्तर स्मरण रखे रहेंगे। ‍

क्रिया और भावना-
ग्रन्थि-बन्धन, आचार्य या प्रतिनिधि या कोई मान्य व्यक्ति करें। दुपट्टे के छोर एक साथ करके उसमें मंगल-द्रव्य रखकर गाँठ बाँध दी जाए। भावना की जाए कि मंगल द्रव्यों के मंगल संस्कार सहित देवशक्तियों के समथर्न तथा स्नेहियों की सद्भावना के संयुक्त प्रभाव से दोनों इस प्रकार जुड़ रहे हैं, जो सदा जुड़े रहकर एक-दूसरे की जीवन लक्ष्य यात्रा में पूरक बनकर चलेंगे-
ॐ समंजन्तु विश्वेदेवाः, समापो हृदयानि नौ।
सं मातरिश्वा सं धाता, समुदेष्ट्री दधातु नौ॥ - ऋ०१०.८५.४७, पार०गृ०सू० १.४.१४



वर-वधू की प्रतिज्ञाएँ

दिशा और प्रेरणा
किसी भी महत्त्वपूर्ण पद ग्रहण के साथ शपथ ग्रहण समारोह भी अनिवार्य रूप से जुड़ा रहता है। कन्यादान, पाणिग्रहण एवं ग्रन्थि-बन्धन हो जाने के साथ वर-वधू द्वारा और समाज द्वारा दाम्पत्य सूत्र में बँधने की स्वीकारोक्ति हो जाती है। इसके बाद अग्नि एवं देव-शक्तियों की साक्षी में दोनों को एक संयुक्त इकाई के रूप में ढालने का क्रम चलता है। इस बीच उन्हें अपने कर्त्तव्य धर्म का महत्त्व भली प्रकार समझना और उसके पालन का संकल्प लेना चाहिए। इस दिशा में पहली जिम्मेदारी वर की होती है। अस्तु, पहले वर तथा बाद में वधू को प्रतिज्ञाएँ कराई जाती हैं।

क्रिया और भावना-
वर-वधू स्वयं प्रतिज्ञाएँ पढ़ें, यदि सम्भव न हो, तो आचार्य एक-एक करके प्रतिज्ञाएँ व्याख्या सहित समझाएँ।

वर की प्रतिज्ञाएँ
धमर्पत्नीं मिलित्वैव, ह्येकं जीवनामावयोः।
अद्यारम्भ यतो में त्वम्, अर्द्धांगिनीति घोषिता ॥ (१)
आज से धमर्पत्नी को अर्द्धांगिनी घोषित करते हुए, उसके साथ अपने व्यक्तित्व को मिलाकर एक नये जीवन की सृष्टि करता हूँ। अपने शरीर के अंगों की तरह धमर्पतनी का ध्यान रखूँगा।

स्वीकरोमि सुखेन त्वां, गृहलक्ष्मीमहन्ततः।
मन्त्रयित्वा विधास्यामि, सुकायार्णि त्वया सह॥ (२)
प्रसन्नतापूर्वक गृहलक्ष्मी का महान अधिकार सौंपता हूँ और जीवन के निधार्रण में उनके परामर्श को महत्त्व दूँगा।

रूप-स्वास्थ्य-स्वभावान्तु, गुणदोषादीन् सवर्तः।
रोगाज्ञान-विकारांश्च, तव विस्मृत्य चेतसः॥ (३)
रूप, स्वास्थ्य, स्वभावगत गुण दोष एवं अज्ञानजनित विकारों को चित्त में नहीं रखूँगा, उनके कारण असन्तोष व्यक्त नहीं करूँगा। स्नेहपूर्वक सुधारने या सहन करते हुए आत्मीयता बनाये रखूँगा।

सहचरो भविष्यामि, पूणर्स्नेहः प्रदास्यते।
सत्यता मम निष्ठा च, यस्याधारं भविष्यति॥ (४)
पत्नी का मित्र बनकर रहूँगा और पूरा-पूरा स्नेह देता रहूँगा। इस वचन का पालन पूरी निष्ठा और सत्य के आधार पर करूँगा।

यथा पवित्रचित्तेन, पातिव्रत्य त्वया धृतम्।
तथैव पालयिष्यामि, पतनीव्रतमहं ध्रुवम्॥ (५)
पत्नी के लिए जिस प्रकार पतिव्रत की मर्यादा कही गयी है, उसी दृढ़ता से स्वयं पतनीव्रत धर्म का पालन करूँगा। चिन्तन और आचरण दोनों से ही पर नारी से वासनात्मक सम्बन्ध नहीं जोडूँगा।

गृहस्याथर्व्यवस्थायां, मन्त्रयित्वा त्वया सह।
संचालनं करिष्यामि, गृहस्थोचित-जीवनम्॥ (६)
गृह व्यवस्था में धर्म-पत्नी को प्रधानता दूँगा। आमदनी और खर्च का क्रम उसकी सहमति से करने की गृहस्थोचित जीवनचयार् अपनाऊँग।

समृद्धि-सुख-शान्तीनां, रक्षणाय तथा तव।
व्यवस्थां वै करिष्यामि, स्वशक्तिवैभवादिभि॥ (७)
धमर्पत्नी की सुख-शान्ति तथा प्रगति-सुरक्षा की व्यवस्था करने में अपनी शक्ति और साधन आदि को पूरी ईमानदारी से लगाता रहूँगा।

यतनशीलो भविष्यामि, सन्मागर्ंसेवितुं सदा।
आवयोः मतभेदांश्च, दोषान्संशोध्य शान्तितः॥ (८)
अपनी ओर से मधुर भाषण और श्रेष्ठ व्यवहार बनाये रखने का पूरा-पूरा प्रयतन करूँगा। मतभेदों और भूलों का सुधार शान्ति के साथ करूँगा। किसी के सामने पतनी को लांछित-तिरस्कृत नहीं करूँगा।

भवत्यामसमथार्यां, विमुखायांच कमर्णि।
विश्वासं सहयोगंच, मम प्राप्स्यसि त्वं सदा॥ (९)
पत्नी के असमर्थ या अपने कर्त्तव्य से विमुख हो जाने पर भी अपने सहयोग और कर्त्तव्य पालन में रत्ती भर भी कमी न रखूँगा।

कन्या की प्रतिज्ञाएँ
स्वजीवनं मेलयित्वा, भवतः खलु जीवने।
भूत्वा चाधार्ंगिनी नित्यं, निवत्स्यामि गृहे सदा॥ (१)
अपने जीवन को पति के साथ संयुक्त करके नये जीवन की सृष्टि करूँगी। इस प्रकार घर में हमेशा सच्चे अर्थों में अर्द्धांगिनी बनकर रहूँगी।

‍शिष्टतापूवर्कं सवैर्ः, परिवारजनैः सह।
औदायेर्ण विधास्यामि, व्यवहारं च कोमलम्॥ (२)
पति के परिवार के परिजनों को एक ही शरीर के अंग मानकर सभी के साथ शिष्टता बरतूँगी, उदारतापूवर्क सेवा करूँगी, मधुर व्यवहार करूँगी।

त्यक्त्वालस्यं करिष्यामि, गृहकायेर् परिश्रमम्।
भतुर्हर्षर्ं हि ज्ञास्यामि, स्वीयामेव प्रसन्नताम्॥ (३)
आलस्य को छोड़कर परिश्रमपूवर्क गृह कार्य करूँगी। इस प्रकार पति की प्रगति और जीवन विकास में समुचित योगदान करूँगी।

श्रद्धया पालयिष्यामि, धमर्ं पातिव्रतं परम्।
सवर्दैवानुकूल्येन, पत्युरादेशपालिका॥ (४)
पतिव्रत धर्म का पालन करूँगी, पति के प्रति श्रद्धा-भाव बनाये रखकर सदैव उनके अनूकूल रहूँगी। कपट-दुराव न करूँगी, निदेर्शों के अविलम्ब पालन का अभ्यास करूँगी।

सुश्रूषणपरा स्वच्छा, मधुर-प्रियभाषिणी।
प्रतिजाने भविष्यामि, सततं सुखदायिनी॥ (५)
सेवा, स्वच्छता तथा प्रियभाषण का अभ्यास बनाये रखूँगी। ईर्ष्या, कुढ़न आदि दोषों से बचूँगी और सदा प्रसन्नता देने वाली बनकर रहूँगी।

‍मितव्ययेन गाहर्स्थ्य-संचालने हि नित्यदा।
प्रयतिष्ये च सोत्साहं, तवाहमनुगामिनी॥ (६)
मितव्ययी बनकर फिजूलखर्ची से बचूँगी। पति के असमर्थ हो जाने पर भी गृहस्थ के अनुशासन का पालन करूँगी।

‍देवस्वरूपो नारीणां, भत्तार् भवति मानवः।
मत्वेति त्वां भजिष्यामि, नियता जीवनावधिम्॥ (७)
नारी के लिए पति, देव स्वरूप होता है- यह मानकर मतभेद भुलाकर, सेवा करते हुए जीवन भर सक्रिय रहूँगी, कभी भी पति का अपमान न करूँगी।

पूज्यास्तव पितरो ये, श्रद्धया परमा हि मे।
सेवया तोषयिष्यामि, तान्सदा विनयेन च॥ (८)
जो पति के पूज्य और श्रद्धा पात्र हैं, उन्हें सेवा द्वारा और विनय द्वारा सदैव सन्तुष्ट रखूँगी।

विकासाय सुसंस्कारैः, सूत्रैः सद्भाववद्धिर्भिः।
परिवारसदस्यानां, कौशलं विकसाम्यहम्॥ (९)
परिवार के सदस्यों में सुसंस्कारों के विकास तथा उन्हें सद्भावना के सूत्रों में बाँधे रहने का कौशल अपने अन्दर विकसित करूँगी।

प्रायश्चित होम
दिशा एवं प्रेरणा
गायत्री मन्त्र की आहुति के पश्चात् पाँच आहुतियाँ प्रायश्चित होम की अतिरिक्त रूप से दी जाती है। वर और कन्या दोनों के हाथ में हवन सामग्री दी जाती है। प्रायश्चित होम की आहुतियाँ देते समय यह भावना दोनों के मन में आनी चाहिए कि दाम्पत्य जीवन में बाधक जो भी कुसंस्कार अब तक मन में रहे हों, उन सब को स्वाहा किया जा रहा है। किसी से गृहस्थ के आदर्शों के उल्लंघन करने की कोई भूल हुई हो, तो उसे अब एक स्वप्न जैसी बात समझकर विस्मरण कर दिया जाए। इस प्रकार की भूल के कारण कोई किसी को न तो दोष दे, न सन्देह की दृष्टि से देखे। इसी प्रकार कोई अन्य नशेबाजी जैसा दुर्व्यसन रहा हो या स्वभाव में कठोरता, स्वाथर्परता, अहंकार जैसी कोई त्रुटि रही हो, तो उसका त्याग कर दिया जाए। साथ ही, उन भूलों का प्रायश्चित करते हुए भविष्य में कोई ऐसी भूल न करने का संकल्प भी करना है, जो दाम्पत्य जीवन की प्रगति में बाधा उत्पन्न करे।

क्रिया और भावना
वर-वधू हवन सामग्री से आहुति करें। भावना करें कि प्रायश्चित आहुति के साथ पूर्व दुष्कृत्यों की धुलाई हो रही है। स्वाहा के साथ आहुति डालें, इदं न मम के साथ हाथ जोड़कर नमस्कार करें I

ॐ त्वं नो अग्ने वरुणस्य विद्वान्, देवस्य हेडो अव यासिसीष्ठाः।
यजिष्ठो वह्नितमः शोशुचानो, विश्वा द्वेषा सि प्र मुमुग्ध्यस्मत् स्वाहा। इदमग्नीवरुणाभ्यां इदं न मम॥ -२१.३
ॐ स त्वं नो अग्नेऽवमो भवोती, नेदिष्ठो अस्या ऽ उषसो व्युष्टौ।
अव यक्ष्व नो वरुण रराणो, वीहि मृडीक सुहवो न ऽ एधि स्वाहा। इदमग्नीवरुणाभ्यां इदं न मम॥ -२१.४
ॐ अयाश्चाग्नेऽस्य, नभिशस्तिपाश्च, सत्यमित्वमयाऽ असि।
अया नो यज्ञं वहास्यया, नो धेहि भेषज स्वाहा। इदमग्नये अयसे इदं न मम। -का०श्रौ०सू० २५.१.११
ॐ ये ते शतं वरुण ये सहस्रं, यज्ञियाः पाशा वितता महान्तः,
तेभिनोर्ऽअद्य सवितोत विष्णुः, विश्वे मुंचन्तु मरुतः स्वकार्ः स्वाहा।
इदं वरुणायसवित्रे विष्णवे विश्वेभ्यो देवेभ्यो मरुद्भ्यः स्वकेर्भ्यश्च इदं न मम। -का०श्रौ० सू० २५.१.११
ॐ उदुत्तमं वरुण पाशमस्मदवाधमं, विमध्यम श्रथाय।
अथा वयमादित्य व्रते तवानागसो, अदितये स्याम स्वाहा। इदं वरुणायादित्यायादितये च इदं न मम। -१२.१२

शिला-रोहण
दिशा एवं प्रेरणा
शिला-रोहण के द्वारा पत्थर पर पैर रखते हुए प्रतिज्ञा करते हैं कि जिस प्रकार अंगद ने अपना पैर जमा दिया था, उसी तरह हम पत्थर की लकीर की तरह अपना पैर उत्तरदायित्वों को निबाहने के लिए जमाते हैं। यह धर्मकृत्य खेल-खिलौने की तरह नहीं किया जा रहा, जिसे एक मखौल समझकर तोड़ा जाता रहे, वरन् यह प्रतिज्ञाएँ पत्थर की लकीर की तरह अमिट बनी रहेंगी, ये चट्टान की तरह अटूट एवं चिरस्थाई रखी जायेंगी।

क्रिया और भावना
मन्त्र बोलने के साथ वर-वधू अपने दाहिने पैर को शिला पर रखें, भावना करें कि उत्तरदायित्वों के निवार्ह करने तथा बाधाओं को पार करने की शक्ति हमारे संकल्प और देव अनुग्रह से मिल रही है।

ॐ आरोहेममश्मानम् अश्मेव त्वं स्थिरा भव।
अभितिष्ठ पृतन्यतोऽ, वबाधस्व पृतनायतः॥ पार०गृ०सू० १.७.१

लाजाहोम एवं परिक्रमा (फेरे)
प्रायश्चित आहुति के बाद लाजाहोम और यज्ञाग्नि की परिक्रमा (फेरे) का मिला-जुला क्रम चलता है। लाजाहोम के लिए कन्या का भाई एक थाली में खील (भुना हुआ धान) लेकर पीछे खड़ा हो। एक मुट्टी खील अपनी बहिन को दे। कन्या उसे वर को सौंप दे। वर उसे आहुति मन्त्र के साथ हवन कर दे। इस प्रकार तीन बार किया जाए। कन्या तीनों बार भाई के द्वारा दिये हुए खील को अपने पति को दे, वह तीनों बार हवन में अपर्ण कर दे। लाजाहोम में भाई के घर से अन्न (खील के रूप में) बहिन को मिलता है, उसे वह अपने पति को सौंप देती है। कहती है बेशक मेरे व्यक्तिगत उपयोग के लिए पिता के घर से मुझे कुछ मिला है, पर उसे मैं छिपाकर अलग से नहीं रखती, आपको सौंपती हूँ।‍ अलगाव या छिपाव का भाव कोई मन में न आए, इसलिए जिस प्रकार पति कुछ कमाई करता है, तो पत्नी को सौंपता है, उसी प्रकार पत्नी भी अपनी उपलब्धियों को पति के हाथ में सौंपती है। पति सोचता है, हम लोग हाथ-पैर से जो कमायेंगे, उसी से अपना काम चलायेंगे, किसी के उदारतापूर्वक दिये हुए अनुदान को बिना श्रम किये खाकर क्यों हम किसी के ऋणी बनें। इसलिए पति उस लाजा को अपने खाने के लिए नहीं रख लेता, वरन् यज्ञ में होम देता है। जन कल्याण के लिए उस पदार्थ को वायुभूत बनाकर संसार के वायुमण्डल में बिखेर देता है। 

इस क्रिया में यहाँ महान मानवीय आदर्श सन्निहित है कि मुफ्त का माल या तो स्वीकार ही न किया जाय या मिले भी तो उसे लोकहित में खर्च कर दिया जाए। लोग अपनी-अपनी निज की पसीने की कमाई पर ही गुजर-बसर करें। मृतक भोज के पीछे भी यही आदर्शवादिता थी कि पिता के द्वारा उत्तराधिकार में मिले हुए धन को लड़के अपने काम में नहीं लेते थे, वरन् समाजसेवी ब्राह्मणों के निर्वाह में या अन्य पुण्यकार्यों में खर्च कर डालते थे। यही दहेज के सम्बन्ध में भी ठीक है। पिता के गृह से उदारतापूवर्क मिला, सो उनकी भावना सराहनीय है, पर आपकी भी तो कुछ भावना होनी चाहिए। मुफ्त का माल खाते हुए किसी कमाऊ मनुष्य का गैरत आना स्वाभाविक है। उसका यह सोचना ठीक ही है कि बिना परिश्रम का धन, वह भी दान की उदार भावना से दिया हुआ उसे पचेगा नहीं, इसलिए उपहार को जन मंगल के कायर् में, परमार्थ यज्ञ में आहुति कर देना ही उचित है। इसी उद्देश्य से पत्नी के भाई के द्वारा दिये गये लाजा को वह यज्ञ कार्य में लगा देता है। दहेज का ठीक उपयोग यही है, प्रथा भी है कि विवाह के अवसर पर वर पक्ष की ओर से बहुत सा दान-पुण्य किया जाता है। अच्छा हो जो कुछ मिले, वह सबको ही दान कर दे। विवाह के समय ही नहीं, अन्य अवसरों पर भी यदि कभी किसी से कुछ ऐसा ही बिना परिश्रम का उपहार मिले, तो उसके सम्बन्ध में एक नीति रहनी चाहिए कि मुफ्त का माल खाकर हम परलोक के ऋणी न बनेंगे, वरन् ऐसे अनुदान को परमार्थ में लगाकर उस उदार परम्परा को अपने में न रोककर आगे जन कल्याण के लिए बढ़ा देंगे। 

कहाँ भारतीय संस्कृति की उदार भावना और कहाँ आज के धन लोलुपों द्वारा कन्या पक्ष की आँतें नोच डालने वाली दहेज की पैशाचिक माँगें, दोनों में जमीन-आसमान का अंतर है। जिसने अपने हृदय का, आत्मा का टुकड़ा कन्या दे दी, उनके प्रति वर पक्ष का रोम-रोम कृतज्ञ होना चाहिए और यह सोचना चाहिए कि इस अलौकिक उपहार के बदले में किस प्रकार अपनी श्रद्धा-सद्भावना व्यक्त करें। यह न होकर उल्टे जब कन्या पक्ष को दबा हुआ समझ कर उसे तरह-तरह से सताने और चूसने की योजना बनाई जाती है, तो यही समझना चाहिए कि भारतीय परम्पराएँ बिल्कुल उल्टी हो गयीं। धर्म के स्थान पर अधर्म, देवत्व के स्थान पर असुरता का साम्राज्य छा गया। लाजाहोम वतर्मान काल की क्षुद्र मान्यताओं को धिक्कारता है और दहेज के सम्बन्ध में सही दृष्टिकोण अपनाने की प्रेरणा देता है।

परिक्रमा – फेरे
अग्नि की वर-वधु परिक्रमा करें। बायें से दायें की ओर चलें। पहली चार परिक्रमाओं में कन्या आगे रहे और वर पीछे। चार परिक्रमा हो जाने पर लड़का आगे हो जाए और लड़की पीछे। परिक्रमा के समय परिक्रमा मन्त्र बोला जाए तथा हर परिक्रमा पूरी होने पर एक-एक आहुति वर-वधू गायत्री मन्त्र से करते चलें, इसका तात्पयर् है- घर-परिवार के कार्यों में लड़की का नेतृत्व रहेगा, उसके परामर्श को महत्त्व दिया जाएगा, वर उसका अनुसरण करेगा, क्योंकि उन कामों का नारी को अनुभव अधिक होता है। बाहर के कार्यों में वर नेतृत्व करता है और नारी उसका अनुसरण करती है, क्योंकि व्यावसायिक क्षेत्रों में वर का अनुभव अधिक होता है। जिसमें जिस दिशा की जानकारी कम हो, दूसरे में उसकी जानकारी बढ़ाकर अपने समतुल्य बनाने में प्रयतनशील रहें। भावना क्षेत्र में नारी आगे हैं, कर्म क्षेत्र में पुरुष। दोनों पक्ष अपने-अपने स्थान पर महत्त्वपूर्ण हैं। कुल मिलाकर नारी का वचर्स्व, पद, गौरव एवं वजन बड़ा बैठता है। इसलिए उसे चार परिक्रमा करने और नर को तीन परिक्रमा करने का अवसर दिया जाता है। गौरव के चुनाव के ४ वोट कन्या को और ३ वोट वर को मिलते हैं। इसलिए सदा नर से पहला स्थान नारी को मिला है। सीताराम, राधेश्याम, लक्ष्मीनारायण, उमामहेश  आदि युग्मों में पहले नारी का नाम है, पीछे नर का।

क्रिया और भावना
लाजा होम और परिक्रमा का मिला-जुला क्रम चलता है। शिलारोहण के बाद वर-वधू खड़े-खड़े गायत्री मन्त्र से एक आहुति समर्पित करें। अब मन्त्र के साथ परिक्रमा करें। वधू आगे, वर पीछे चलें। एक परिक्रमा पूरी होने पर लाजाहोम की एक आहुति करें। आहुति करके दूसरी परिक्रमा पहले की तरह मन्त्र बोलते हुए करें। इसी प्रकार लाजाहोम की दूसरी आहुति करके तीसरी परिक्रमा तथा तीसरी आहुति करके चौथी परिक्रमा करें। इसके बाद गायत्री मन्त्र की आहुति देते हुए तीन परिक्रमाएँ वर को आगे करके परिक्रमा मन्त्र बोलते हुए कराई जाएँ। आहुति के साथ भावना करें कि बाहर यज्ञीय ऊर्जा तथा अंतःकरण में यज्ञीय भावना तीव्रतर हो रही है। परिक्रमा के साथ भावना करें कि यज्ञीय अनुशासन को केन्द्र मानकर, यज्ञाग्नि को साक्षी करके आदर्श दाम्पत्य के निवार्ह का संकल्प कर रहे हैं।

लाजाहोम
ॐ अयर्मणं देवं कन्या अग्निमयक्षत।
स नोऽअयर्मा देवः प्रेतो मुंचतु, मा पतेः स्वाहा। इदम् अयर्म्णे अग्नये इदं न मम॥
ॐ इयं नायुर्पब्रूते लाजा नावपन्तिका।
आयुष्मानस्तु में पतिरेधन्तां, ज्ञातयो मम स्वाहा। इदम् अग्नये इदं न मम॥
ॐ इमाँल्लाजानावपाम्यग्नौ, समृद्धिकरणं तव।
मम तुभ्यं च संवननं, तदग्निरनुमन्यतामिय स्वाहा। इदं अग्नये इदं न मम॥ -पार०गृ०सू० १.६.२ ॥ परिक्रमा मन्त्र॥
ॐ तुभ्यमग्ने पयर्वहन्त्सूयार्ं वहतु ना सह।
पुनः पतिभ्यो जायां दा, अग्ने प्रजया सह॥ -ऋ०१०.८५.३८, पार०गृ०सू० १.७.३



सप्तपदी
दिशा और प्रेरणा
फेरे फिर लेने के उपरान्त सप्तपदी की जाती है। सात बार वर-वधू साथ-साथ कदम से कदम मिलाकर फौजी सैनिकों की तरह आगे बढ़ते हैं। सात चावल की ढेरी या कलावा बँधे हुए सकोरे रख दिये जाते हैं, इन लक्ष्य-चिह्नों को पैर लगाते हुए दोनों एक-एक कदम आगे बढ़ते हैं, रुक जाते हैं और फिर अगला कदम बढ़ाते हैं। इस प्रकार सात कदम बढ़ाये जाते हैं। प्रत्येक कदम के साथ एक-एक मन्त्र बोला जाता है।

पहला कदम अन्न के लिए, दूसरा बल के लिए, तीसरा धन के लिए, चौथा सुख के लिए, पाँचवाँ परिवार के लिए, छठवाँ ऋतुचर्या के लिए और सातवाँ मित्रता के लिए उठाया जाता है। विवाह होने के उपरान्त पति-पतनी को मिलकर सात कायर्क्रम अपनाने पड़ते हैं। उनमें दोनों का उचित और न्याय संगत योगदान रहे, इसकी रूपरेखा सप्तपदी में निधार्रित की गयी है।

प्रथम कदम : अन्न वृद्धि के लिए है। आहार स्वास्थ्यवर्धक हो, घर में चटोरेपन को कोई स्थान न मिले। रसोई में जो बने, वह ऐसा हो कि स्वास्थ्य रक्षा का प्रयोजन पूरा करे, भले ही वह स्वादिष्ट न हो। अन्न का उत्पादन, अन्न की रक्षा, अन्न का सदुपयोग जो कर सकता है, वही सफल गृहस्थ है। अधिक पका लेना, जूठन छोड़ना, बतर्न खुले रखकर अन्न की चूहों से बबार्दी कराना, मिचर्-मसालो की भरमार उसे तमोगुणी बना देना, स्वच्छता का ध्यान न रखना, आदि बातों से आहार पर बहुत खर्च करते हुए भी स्वास्थ्य नष्ट होता है, इसलिए दाम्पत्य जीवन का उत्तरदायित्व यह है कि आहार की सात्त्विकता का समुचित ध्यान रखा जाए।

दूसरा कदम : शारीरिक और मानसिक बल की वृद्धि के लिए है। व्यायाम, परिश्रम, उचित एवं नियमित आहार-विहार से शरीर का बल स्थिर रहता है। अध्ययन एवं विचार-विमर्श से मनोबल बढ़ता है। जिन प्रयतनों से दोनों प्रकार के बल बढें, दोनों अधिक समर्थ, स्वस्थ एवं सशक्त बनें-उसका उपाय सोचते रहना चाहिए।

तीसरा कदम : धन की वृद्धि के लिए है। अर्थ व्यवस्था बजट बनाकर चलाई जाए। अपव्यय में कानी कौड़ी भी नष्ट न होने पाए। उचित कार्यों में कंजूसी न की जाए- फैशन, व्यसन, शेखीखोरी आदि के लिए पैसा खर्च न करके उसे पारिवारिक उन्नति के लिए सँभालकर, बचाकर रखा जाए। उपार्जन के लिए पति-पत्नी दोनों ही प्रयतन करें। पुरुष बाहर जाकर कृषि, व्यवसाय, नौकरी आदि करते हैं, तो स्त्रियाँ सिलाई, धुलाई, सफाई आदि करके इस तरह की कमाई करती हैं। उपार्जन पर जितना ध्यान रखा जाता है, खर्च की मर्यादाओं का भी वैसा ही ध्यान रखते हुए घर की अर्थव्यवस्था सँभाले रहना दाम्पत्य जीवन का अनिवार्य कत्तर्व्य है।

चौथा कदम : सुख की वृद्धि के लिए है। विश्राम, मनोरंजन, विनोद, हास-परिहास का ऐसा वातावरण रखा जाए कि गरीबी में भी अमीरी का आनन्द मिले। दोनों प्रसन्नचित्त रहें। मुस्कराने की आदत डालें, हँसते-हँसाते जिन्दगी काटें। चित्त को हलका रखें, 'सन्तोषी सदा सुखी' की नीति अपनाएँ।

पाँचवाँ कदम : परिवार पालन का है। छोटे बड़े सभी के साथ समुचित व्यवहार रखा जाए। आश्रित पशुओं एवं नौकरों को भी परिवार माना जाए, इस सभी आश्रितों की समुचित देखभाल, सुरक्षा, उन्नति एवं सुख-शान्ति के लिए सदा सोचने और करने में लापरवाही न बरती जाए।

छठा कदम : ऋतुचर्या का है। सन्तानोत्पादन एक स्वाभाविक वृत्ति है, इसलिए दाम्पत्य जीवन में उसका भी एक स्थान है, पर उस सम्बन्ध में मयार्दाओं का पूरी कठोरता एवं सतर्कता से पालन किया जाए, क्योंकि असंयम के कारण दोनों के स्वास्थ्य का सर्वनाश होने की आशंका रहती है, गृहस्थ में रहकर भी ब्रह्मचर्य का समुचित पालन किया जाए। दोनों एक दूसरे का भी सहयोगी मित्र की दृष्टि से देखें, कामुकता के सर्वनाशी प्रसंगों को जितना सम्भव हो, दूर रखा जाए। सन्तान उत्पन्न करने से पूर्व हजार बार विचार करें कि अपनी स्थिति सन्तान को सुसंस्कृत बनाने योग्य है या नहीं। उस मर्यादा में सन्तान उत्पन्न करने की जिम्मेदारी वहन करें।

सातवाँ कदम : मित्रता को स्थिर रखने एवं बढ़ाने के लिए है। दोनों इस बात पर बारीकी से विचार करते रहें कि उनकी ओर से कोई त्रुटि तो नहीं बरती जा रही है, जिसके कारण साथी को रुष्ट या असंतुष्ट होने का अवसर आए। दूसरा पक्ष कुछ भूल भी कर रहा हो, तो उसका उत्तर कठोरता, कर्कशता से नहीं, वरन् सज्जनता, सहृदयता के साथ दिया जाना चाहिए, ताकि उस महानता से दबकर साथी को स्वतः ही सुधरने की अन्तःप्रेरणा मिले। बाहर के लोगों के साथ, दुष्टों के साथ दुष्टता की नीति किसी हद तक अपनाई जा सकती है, पर आत्मीयजनों का हृदय जीतने के लिए उदारता, सेवा, सौजन्य, क्षमा जैसे शस्त्र की काम में लाये जाने चाहिए।

सप्तपदी में सात कदम बढ़ाते हुए इन सात सूत्रों को हृदयंगम करना पड़ता है। इन आदर्शों और सिद्धान्तों को यदि पति-पत्नी द्वारा अपना लिया जाए और उसी मार्ग पर चलने के लिए कदम से कदम बढ़ाते हुए अग्रसर होने की ठान ली जाए, तो दाम्पत्य जीवन की सफलता में कोई सन्देह ही नहीं रह जाता।

क्रिया और भावना
वर-वधू खड़े हों। प्रत्येक कदम बढ़ाने से पहले देव शक्तियों की साक्षी का मन्त्र बोला जाता है, उस समय वर-वधू हाथ जोड़कर ध्यान करें। उसके बाद चरण बढ़ाने का मन्त्र बोलने पर पहले दायाँ कदम बढ़ाएँ। इसी प्रकार एक-एक करके सात कदम बढ़ाये जाएँ। भावना की जाए कि योजनाबद्ध-प्रगतिशील जीवन के लिए देव साक्षी में संकल्पित हो रहे हैं, संकल्प और देव अनुग्रह का संयुक्त लाभ जीवन भर मिलता रहेगा।

(१) अन्न वृद्धि के लिए पहली साक्षी- ॐ एको विष्णुजर्गत्सवर्ं, व्याप्तं येन चराचरम्। हृदये यस्ततो यस्य, तस्य साक्षी प्रदीयताम्॥ पहला चरण- ॐ इष एकपदी भव सा मामनुव्रता भव। विष्णुस्त्वानयतु पुत्रान् विन्दावहै, बहूँस्ते सन्तु जरदष्टयः॥१

(२) बल वृद्धि के लिए दूसरी साक्षी- ॐ जीवात्मा परमात्मा च, पृथ्वी आकाशमेव च। सूयर्चन्द्रद्वयोमर्ध्ये, तस्य साक्षी प्रदीयताम्॥२ दूसरी चरण- ॐ ऊजेर् द्विपदी भव सा मामनुव्रता भव। विष्णुस्त्वानयतु पुत्रान् विन्दावहै, बहूँस्ते सन्तु जरदष्टयः॥२

(३) धन वृद्धि के लिए तीसरी साक्षी- ॐ त्रिगुणाश्च त्रिदेवाश्च, त्रिशक्तिः सत्परायणाः। लोकत्रये त्रिसन्ध्यायाः, तस्य साक्षी प्रदीयताम्। तीसरा चरण- ॐ रायस्पोषाय त्रिपदी भव सा मामनुव्रता भव। विष्णुस्त्वानयतु पुत्रान् विन्दावहै, बहूँस्ते सन्तु जरदष्टयः॥३

(४) सुख वृद्धि के लिए चौथी साक्षी- ॐ चतुमर्ुखस्ततो ब्रह्मा, चत्वारो वेदसंभवाः। चतुयुर्गाः प्रवतर्न्ते, तेषां साक्षी प्रदीयताम्। चौथा चरण- ॐ मायो भवाय चतुष्पदी भव सा मामनुव्रता भव। विष्णुस्त्वानयतु पुत्रान् विन्दावहै, बहूँस्ते सन्तु जरदष्टयः॥४

(५) प्रजा पालन के लिए पाँचवी साक्षी- ॐ पंचमे पंचभूतानां, पंचप्राणैः परायणाः। तत्र दशर्नपुण्यानां, साक्षिणः प्राणपंचधाः॥ पाँचवाँ चरण- ॐ प्रजाभ्यां पंचपदी भव सा मामनुव्रता भव। विष्णुस्त्वानयतु पुत्रान् विन्दावहै, बहूँस्ते सन्तु जरदष्टयः॥५

(६) ऋतु व्यवहार के लिए छठवीं साक्षी- ॐ षष्ठे तु षड्ऋतूणां च, षण्मुखः स्वामिकातिर्कः। षड्रसा यत्र जायन्ते, कातिर्केयाश्च साक्षिणः॥ छठवाँ चरण- ॐ ऋतुभ्यः षट्ष्पदी भव सा मामनुव्रता भव। विष्णुस्त्वानयतु पुत्रान् विन्दावहै, बहूँस्ते सन्तु जरदष्टयः॥६

(७) मित्रता वृद्धि के लिए सातवीं साक्षी- ॐ सप्तमे सागराश्चैव, सप्तद्वीपाः सपवर्ताः। येषां सप्तषिर्पतनीनां, तेषामादशर्साक्षिणः॥ सातवाँ चरण- ॐ सखे सप्तपदी भव सा मामनुव्रता भव। विष्णुस्त्वानयतु पुत्रान् विन्दावहै, बहूँस्ते सन्तु जरदष्टयः॥ ७- पार०गृ०सू० १.८.१-२, आ०गृ०सू० १.७.१९

आसन परिवतर्न
सप्तपदी के पश्चात् आसन परिवतर्न करते हैं। तब तक वधू दाहिनी ओर थी अर्थात् बाहरी व्यक्ति जैसी स्थिति में थी। अब सप्तपदी होने तक की प्रतिज्ञाओं में आबद्ध हो जाने के उपरान्त वह घर वाली अपनी आत्मीय बन जाती है, इसलिए उसे बायीं ओर बैठाया जाता है। बायें से दायें लिखने का क्रम है। बायाँ प्रथम और दाहिना द्वितीय माना जाता है। सप्तपदी के बाद अब पत्नी को प्रमुखता प्राप्त हो गयी। लक्ष्मी-नारायण्, उमा-महेश, सीता-राम, राधे-श्याम आदि नामों में पत्नी को प्रथम, पति को द्वितीय स्थान प्राप्त है। दाहिनी ओर से वधू का बायीं ओर आना, अधिकार हस्तांतरण है। बायीं ओर के बाद पतनी गृहस्थ जीवन की प्रमुख सूत्रधार बनती है।
ॐ इह गावो निषीदन्तु, इहाश्वा इह पूरुषाः।
इहो सहस्रदक्षिणो यज्ञ, इह पूषा निषीदतु॥ - पा०गृ०सू० १.८.१०

पाद प्रक्षालन
आसन परिवतर्न के बाद गृहस्थाश्रम के साधक के रूप में वर-वधू का सम्मान पाद प्रक्षालन करके किया जाता है। कन्या पक्ष की ओर प्रतिनिधि स्वरूप कोई दम्पति या अकेले व्यक्ति पाद प्रक्षालन करे। पाद प्रक्षालीन करने वालों का पवित्रीकरण-सिंचन किया जाए। हाथ में हल्दी, दूवार्, थाली में जल लेकर प्रक्षालन करें। प्रथम मन्त्र के साथ तीन बार वर-वधू के पैर पखारें, फिर दूसरे मन्त्र के साथ यथा श्रद्धा भेंट दें।

ॐ या ते पतिघ्नी प्रजाध्नी पशुघ्नी, गृहघ्नी यशोघ्नी निन्दिता, तनूजार्रघ्नीं ततऽएनांकरोमि, सा जीयर् त्वां मया सह॥ - पार०गृ०सू० १.११
ॐ ब्रह्मणा शालां निमितां, कविभिनिर्मितां मिताम्। इन्द्राग्नी रक्षतां शालाममृतौ सोम्यं सदः॥ - अथवर्० ९.३.१९

ध्रुव-सूर्य ध्यान
ध्रुव स्थिर तारा है। अन्य सब तारागण गतिशील रहते हैं, पर ध्रुव अपने निश्चित स्थान पर ही स्थिर रहता है। अन्य तारे उसकी परिक्रमा करते हैं। ध्रुव दर्शन का अर्थ है- दोनों अपने-अपने परम पवित्र कर्त्तव्यों पर उसी तरह दृढ़ रहेंगे, जैसे कि ध्रुव तारा स्थिर है। कुछ कारण उत्पन्न होने पर भी इस आदर्श से विचलित न होने की प्रतिज्ञा को निभाया जाए, व्रत को पाला जाए और संकल्प को पूरा किया जाए। ध्रुव स्थिर चित्त रहने की ओर, अपने कर्त्तव्यों पर दृढ़ रहने की प्रेरणा देता है। इसी प्रकार सूर्य की अपनी प्रखरता, तेजस्विता, महत्ता सदा स्थिर रहती है। वह अपने निधार्रित पथ पर ही चलता है, यही हमें करना चाहिए। यही भावना पति-पत्नी करें।

सूर्य ध्यान (दिन में)
ॐ तच्चक्षुदेर्वहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्। पश्येम शरदः शतं, जीवेम शरदः शतं, शृणुयाम शरदः शतं, प्रब्रवाम शरदः शतमदीनाः, स्याम शरदः शतं, भूयश्च शरदः शतात्। - ३६.२४
ध्रुव ध्यान (रात में) ॐ ध्रुवमसि ध्रुवं त्वा पश्यामि, ध्रुवैधि पोष्ये मयि। मह्यं त्वादात् बृहस्पतिमर्यापत्या, प्रजावती संजीव शरदः शतम्। - पार०गृ०सू० १.८.१९

शपथ आश्वासन
पति-पत्नी एक दूसरे के सिर पर हाथ रखकर समाज के सामने शपथ लेते हैं, एक आश्वासन देकर अन्तिम प्रतिज्ञा करते हैं कि वे निस्संदेह निश्चित रूप से एक-दूसरे को आजीवन ईमानदार, निष्ठावान् और वफादार रहने का विश्वास दिलाते हैं। पिछले दिनों पुरुषों का व्यवहार स्त्रियों के साथ छली-कपटी और विश्वासघातियों जैसा रहा है। रूप, यौवन के लोभ में कुछ दिन मीठी बातें करते हैं, पीछे क्रूरता एवं दुष्टता पर उतर आते हैं। पग-पग पर उन्हें सताते और तिरस्कृत करते हैं। प्रतिज्ञाओं को तोड़कर आर्थिक एवं चारित्रिक उच्छृंखलता बरतते हैं और पत्नी की इच्छा की परवाह नहीं करते। समाज में ऐसी घटनाएँ कम घटित नहीं होतीं। ऐसी दशा में ये प्रतिज्ञाएँ औपचारिकता मात्र रह जाने की आशंका हो सकती है। सन्तान न होने पर लड़कियाँ होने पर लोग दूसरा विवाह करने पर उतारू हो जाते हैं। पति सिर पर हाथ रखकर कसम खाता है कि दूसरे दुरात्माओं की श्रेणी में उसे न गिना जाए। इस प्रकार पत्नी भी अपनी निष्ठा के बारे में पति को इस शपथ-प्रतिज्ञा द्वारा विश्वास दिलाती है।

ॐ मम व्रते ते हृदयं दधामि, मम चित्तमनुचित्तं ते अस्तु।
मम वाचमेकमना जुषस्व, प्रजापतिष्ट्वा नियुनक्तु मह्यम्। - पार०गृ०सू०१.८.८ ॥

सुमंगली-सिन्दूरदान
मन्त्र के साथ वर अँगूठी से वधू की माँग में सिन्दूर तीन बार लगाए। भावना करें कि मैं वधू के सौभाग्य को बढ़ाने वाला सिद्ध होऊँ-
ॐ सुमंगलीरियं वधूरिमा समेत पश्यत। सौभाग्यमस्यै दत्त्वा याथास्तं विपरेतन।
सुभगा स्त्री सावित्र्याास्तव सौभाग्यं भवतु -पार०गृ०सू० १.८.९

मंगल तिलक
वधू वर को मंगल तिलक करे। भावना करे कि पति का सम्मान करते हुए गौरव को बढ़ाने वाली सिद्ध होऊ
‍ॐ स्वस्तये वायुमुपब्रवामहै, सोमं स्वस्ति भुवनस्य यस्पतिः।
बृहस्पतिं सवर्गणं स्वस्तये, स्वस्तयऽ आदित्यासो भवन्तु नः॥ -ऋ० ५.५१.१२

इसके पश्चात् स्विष्टकृत होम, पूणार्हुति, वसोधार्रा, आरती, घृत-अवघ्राण, भस्म धारण, क्षमा प्रार्थना आदि कृत्य सम्पन्न करें।

‍अभिषेक सिंचन वर-कन्या को बिठाकर कलश का जल लेकर उनका सिंचन किया जाए। भावना की जाए कि जो सुसंस्कार बोये गये हैं, उन्हें दिव्यजल से सिंचित किया जा रहा है। सबके सद्भाव से उनका विकास होगा और सफलता-कुशलता के कल्याणप्रद सुफल उनमें लगेंगे। पुष्प वर्षा के रूप में सभी अपनी शुभकामनाएँ-आश्शीवार्द प्रदान करें-

गणपतिः गिरिजा वृषभध्वजः, षण्मुखो नन्दीमुखडिमडिमा।
मनुज-माल-त्रिशूल-मृगत्वचः, प्रतिदिनं कुशलं वरकन्ययोः॥१॥
रविशशी-कुज इन्द्र-जगत्पतिः, भृगुज-भानुज-सिन्धुज-केतवः।
उडुगणा-तिथि-योग च राशयः, प्रतिदिनं कुशलं वरकन्ययोः॥२॥
वरुण-इन्द्र कुबेर-हुताशनाः, यम-समीरण-वारण-कंुजराः।
सुरगणाः सुराश्च महीधराः, प्रतिदिनं कुशलं वरकन्ययोः॥३॥
सुरसरी-रविनन्दिनि-गोमती, सरयुतामपि सागर-घघर्रा।
कनकयामयि-गण्डकि-नमर्दा, प्रतिदिनं कुशलं वरकन्ययोः॥४॥
हरिपुरी-मथुरा च त्रिवेणिका, बदरि-विष्णु-बटेश्वर-कौशला।
मय-गयामपि-ददर्र-द्वारका, प्रतिदिनं कुशलं वरकन्ययोः॥५॥
भृगुमुनिश्च पुलस्ति च अंगिरा, कपिलवस्तु-अगस्त्य च नारदः।
गुरुवस्ाष्ठ-सनातन-जैमिनी, प्रतिदिनं कुशलं वरकन्ययोः॥६॥
ऋग्वेदोऽथ यजुवेर्दः, सामवेदो ह्यथवर्णः। रक्षन्तु चतुरो वेदा, यावच्चन्द्रदिवाकरौ॥

इसके बाद विसजर्न और आशीवचर्न के पुष्प प्रदान कर कृत्य समाप्त किया जाए।

🙏भाव वंदना 🙏

उपरोक्त ब्लॉग पोस्ट ' षोड़स संस्कार एवं विवाह संस्कार ' यह मेरे मौलिक विचार नही है। इसेमें दी गई संस्कार विषयक जानकारी उपलब्ध माहितियों का संकलन कर इस पोस्ट में प्रस्तुत किया है।

20 वर्ष पूर्व मेरे लग्नजीवन की 25 वी वर्षगाँठ पर मेरे एक स्वाध्यायी मित्र ने एक पुस्तक ' विवाह संस्कार और दैवी संतान ' मुजे भेंट दी थी। हालांकि विवाह जीवन के 25 सालो बाद वह पुस्तक मेरे व्यक्तिगत जीवन के लिये प्रासंगिक नही थी। लेकिन यह पुस्तक एवं पूज्य दादा के #संस्कृति_पूजन पढ़ने के बाद मेरी संस्कारों एवं विशेष कर मुख्यतः १३ वे विवाह संस्कार में वर कन्या की प्रतिज्ञा एवं सप्तपदी के बाबत विशेष रुचि जाग्रत हुई।

विवाह में समारोह से अधिक संस्कारों को महत्व देते हुए लगनमंडप में वर वधु सब के समक स्वमुख से ' #सप्तपदी एवं #वर_वधु_की_प्रतिज्ञा ' लेकर प्रतिज्ञाबद्ध हो यह आग्रह रखा। इसकी शरुआत मैन मेरे घर से अपने संतानों के माध्यम से की है। और समाज मे वह पुस्तक भेंट कर विशेष कर विवाह पूर्व कन्याओं के घरमें जाकर उसे तथा उनके मांबाप को इसका महत्व समजाकर स्वयं स्वमुख से प्रतिज्ञाबद्ध होने के लिये तैयार किया है।

विवाह में ब्राह्मण सप्तपदी और वर वधु की प्रतिज्ञा लेते समय कन्या के प्रति वचन बोलते समय यह भी नही बोलते की ' यह प्रतिज्ञा आप दोनों वर-वधू को परस्पर स्वमुख से लेनी चाहिए, आप दोनों विवाह मंडप में संकोच वश नही बोल पा रहे हो इसलिये आप दोनों के वति मैं यह प्रतिज्ञा बोल रहा हूं ! क्या आपको यह प्रतिज्ञा मंजूर है ? ' लेकिन ब्राह्मण सीधा कन्या को सम्बोधित कर वर की प्रतिज्ञा बोलता है की ' आज से मैं तुझे अपनी अर्धांगिनी के रूपः से स्वीकार करता हूं...... ' !!! तो तकनीकी रूप से कन्या का विवाह किसके  साथ हुआ ??? ( ब्राह्मण का कन्या के साथ !!!)।

मेरा मानना है कि विवाह में आधुनिकता के नाम से संस्कार के अलावा अन्य गलत रीतिरिवाजों के बदले यदि वर-वधु पूर्णतः समजकर आजीवन परस्पर समर्पित भाव से साथ रहने के लिये अग्नि, ब्राह्मण, मांबाप सगे स्नेही के समक्ष वचनबद्ध होंगे तो विवाह पश्चात लग्नविच्छेद की संभावना कम होंगी। और ऐसी परिस्थितियों में उन्हें आजीवन समर्पित।रहने का संकल्प याद दिलवा कर अपनी प्रतिबद्धता का भान करा सकते है। आज समजे बगर कर्मकण्डात्मक विवाह संस्कार हो रहे न वर-वधु को संस्कार की समज या भाव है, न मांबाप, न परिवार जनों को इसका भाव और महत्व है। आज विवाह संस्कार से अधिक समारोह की भव्यता बताकर सामाजिक प्रतिष्ठा कमा ने का व्यापारिक अवसर बन गया है।

केवल इतनाही नही विवाह के पश्चात दैवी संतान हेतु नवदंपति गर्भधारण संस्कार से लेकर भावी संतान के जीवन मे अन्य सभी संस्कार समज पूर्वक करते रहे उसका आग्रह एवं उसके लिए सतत प्रयत्नशील रहा हूं।
इसमें सफलता या परिणाम के तरफ ध्यान न् देकर मैन गीता कथित निष्काम कर्मयोग कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन.... पर विश्वास रखकर प्रयत्न किया है।

वह विवाह संस्कार और दैवी संतान पुस्तक गुजराती भाषा मे थी, और वह एक व्यक्तिगत लेखक ने अल्पसंख्या में छपवाई थी। उपलब्धता न् होने के कारण शरुआत में मैन उस पुस्तक की फोटोकॉपी बनाकर भेंट देने का मेरा उपक्रम चालू रखा। लेकिन आगे यह बात मेरे समज में आई कि गुजराती में शिक्षण के अभाव से विवाह योग्य संतान या उनके मांबाप यह पुस्तक नही पढ़ पा रहे है। इसलिये मैने उस पुस्तक का अनुवाद हिंदी में किया है। और साथ मे इसके अनुरूप विषय वस्तु अन्य पुस्तक और इंटरनेट के माध्यम से खोजकर इन सबका संकलन कर इस ब्लॉग पोस्ट के माध्यम से प्रस्तुत करने का नम्र प्रयास किया है।

इस पोस्ट का विशुद्ध आशय यह है की हमारे समाज मे विलुप्तप्राय हो रहे षोडश संस्कारों को पुनः प्रस्थापित कर ऋषिमुनियों के कर्मयोग को नवजीवन प्रदान कर समाज को सुसंस्कृत बनाना है।

हालांकि कुछ विवाह संस्कार ओर कुछ अन्य संस्कार आज भी कर्मकण्डात्मक रूप से समाज मे जीवित है। इतनाही नही आज गर्भसंस्कार के नाम से कुछ संस्कारों का व्यापारीकरण भी हो रहा है। इसमें भी मेरा विरोध नही है। क्योंकि आज मुफ्त में मिल रही वस्तु या विचार का महत्व नही है। कोई भी माध्यम से ऋषिप्रेरित संस्कार होना चाहिए यह महत्वपूर्ण है। उसमें यह मेरा ब्लॉग पोस्ट किसी जिज्ञासु के लिए मार्गदर्शक बनकर उपियोग शाबित होंगा तो यह मेरा ऋषितर्पण होंगा।

यदि आप को यह ' षोडश संस्कार ' अच्छा लगे तो इसे आगे share करे। विशेष कर विवाह योग्य युवक युवतियों और उनके अभिभावकों से यह ब्लॉगपोस्ट पढ़ने का विशेष आग्रह है। ब्लॉगपोस्ट में कर्मकांडी संस्कार की विधि संस्कृत श्लोकों के साथ लिखा है। जिससे इसकी लम्बाई बढ़ गई है। लेकिन जीवन घड़तर में इसकी महत्वपूर्णता ध्यान में रखकर पढ़ेंगे तो विषय के प्रति उत्सुकता बनी रहेगी।

यह कार्य मेरी महेनत या प्रशंसा के लिये नही है, यह ऋषियों के प्रति मेरी कृतज्ञता है।

इस ब्लॉगपोस्ट में रही हुई क्षतिपूर्ति या सुजाव आमंत्रित है।

भगवत्कृपा
हरि ॐ तत्सत
इदम् न ममः






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