श्री गणेश दर्शन


वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ:। 
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥

विश्व के विविध देशों में भारतीय संस्कृति के अलावा अन्य संस्कृति में विघ्नहर्ता गणपति को अलग अलग नाम एवं विविध स्वरूपमें निर्विवादित भाव से पूजा जाता है। आज गणेश चतुर्थी के पावन पर्व पर हम श्री गणेश के गजानन स्वरूप का तात्विक भावपूजन करने का नम्र प्रयास करेंगे।

कोई माँ अपने पुत्र का रूप नही चाहती होंगी ऐसा श्री गणेशजी का स्वरूप है। फिर भी हमारे दीर्घद्रष्टा ऋषिमुनियों ने प्रत्येक मांगलिक कार्य मे सर्वप्रथम गणपति पूजन का आग्रह रखा है। गणपति की मूर्ति न भी हो तो सुपारी के रूपः मे श्रीफल को प्रस्थापित कर मांगलिक कार्य का श्रीगणेश किया जाता है।

पौराणिक कथा सर्वविदित है की : देवाधिदेव महादेवको अपने ही निवास स्थान के अंदर प्रवेश करते रोकने पर, अनजाने क्रोधावेश में शिवजीने बालक गणेश का शिरच्छेदन कर दिया था। बादमे माँ पार्वती के वास्तविक कथन के पश्चात शिवजी ने अपने गणों को आदेश देकर जो भी प्रथम प्राणी मिले उसे मारकर उसका शिरच्छेदन कर लाने की आज्ञा देकर, लाये हुए गजानन (हाथी) का मस्तक बाल गणेशके धड़ पर प्रस्थापित कर पुनः जीवित किया था। इतनाही नही अपने सब गणों के नायक के रूप में गणपति, गणनायक, गण+ईश = गणेश, विशिष्ट+नायक = विनायक आदि नामों से प्रत्येक मांगलिक कार्य मे विघ्नहर्ता के रूप में प्रथम गणपति पूजन का आदेश एवं आशीर्वाद प्रदान किया था।

यह पौराणिक कथा भारतीय जनमानस में सर्वविदित एवं सर्वमान्य है। लेकिन यहाँ प्रश्न यह उठता है की "शिरच्छेदन" के पश्चात मृत बालक को जीवित करने के लिये कोई भी जानवर का शिरच्छेदन करने का आदेश दिया  तो बालक गणेश का शिर वहीं निचे गिरपडा था उसे उठाकर महादेवजी उसे पुनः प्रस्थापित कर सकते थे। लेकिन गज मस्तक से गजानन बनाने के पीछे पौराणिक भाषा भावगर्भित, सारगर्भित और लक्षणात्मक रूपकों से भरी हुई है। बुद्धिमान अपनी बुद्धि चलाकर भावगर्भित अर्थ निकालकर आनन्द पाते है। और बालकबुद्धि वाले कहानी के रूप में उसका आनंद पाते है।

भगवान शिवजी अगर हाथी का मस्तक धड़ पर बिठा सकते थे है तो बाल गणेश का अपना ही सिर वापस क्यों नही जोड़ सके ?

पुराण हमे समजाते है कि गणपति तत्त्वज्ञान के देवता है और समाज के नेता  गण नायक, गण पति, गण ईश है। तत्ववेत्ता और नेता के पास हाथी जैसा ही मस्तक होना चाहिए। संकुचित वृति का मानव महान तत्ववेत्ता या सफल लोकप्रिय जननेता नही बन सकता।

गण_पति यानी समूह का नेता। यह गुण_पति भी होना चाहिए। नेता और तत्ववेत्ता में कौन कौन से गुण होने चाहिए, उनके स्वरूप द्वारा ही उसका पता चलता है। गणपति के पास बाह्य सौंदर्य न होने पर भी आंतरिक सौंदर्य का वैभव भरा हुआ है।

गणपति का सिर हाथी का है। हाथी सभी प्राणियों में सबसे अधिक बुद्धिमान है। महान जीवन की ऊंचाई पर स्थित शिखरों को सर करनेवाला तत्ववेत्ता भी बुद्धिमान होना।चाहिए।

हाथी के कान #सुप जैसे है। सुप का गुण क्या है ? सुप छिलके को उड़ाकर तत्व रूप अन्न को ही अपने पास रखता है। बाते सबकी सुननी चाहिए लेकिन उनमें से सार ग्रहण करके फालतु बातों को छिलके की तरह उड़ा देना चाहिए। बड़े कान उत्कृष्ट श्रवणभक्ति भी सूचित करते है।

गणपति की हाथी के समान छोटी आंखे मानव को जीवन मे सूक्ष्म दृष्टि रखने की प्रेरणा देती है। हाथी की छोटी आंखे दूरदृष्टि की भी सूचक है। पुराने समय मे जब कोई राजा निःसंतान मर जाता था तब इस दीर्घदृष्टि से हथनी के सूंड में माला रखकर उसे प्रजा के बीच मे घुमाया जाता था। जिसके गले मे हथनी माला पहनाती थी उसे "राजा" नियुक्त किया जाता था।

हाथी की बड़ी नाक दूर तक सूंघने मे समर्थ है। नेता और तत्ववेत्ता में दूरदर्शिता होनी चाहिए। प्रत्येक बात की गंध उन्हें पहले से ही आ जानी चाहिए।

गणपति के दो दांत है एक पूर्ण है, दूसरा आधा है। पूर्ण दांत श्रद्धा का प्रतीक है। और टूटा हुआ दांत मेधा का है। जीवनविकास के लिये आत्मविश्वास और इशविश्वास पूर्ण होना चाहिए। मेधा शायद कम होंगी, चलेंगा।

गणपति के चार हाथ है एक हाथ मे अंकुश, दूसरे हाथ मे पाश, तीसरे में मोदक और चौथे में आशीर्वाद।

अंकुश : वासना विकारों के प्रति संयम अत्यावश्यक है ऐसा सूचित करता है।
पाश : जब कि पाश, जरूरत पड़ने पर इंद्रियों को या अनुयायियों, प्रजा को सजा देने का सामर्थ्य भी तत्ववेत्ता और नेता में होना चाहिए।
मोदक : यानी मोद (आंनद) जिसमे आंनद प्राप्त हो, संतोष हो, ऐसा सात्विक आहार लेना चाहिए। इसका तात्विक अर्थ यह है की प्रत्येक इंद्रियों का सात्विक आहार होना चाहिए। मोदक का बाह्य स्वाद फीका रहता है, परंतु भीतर का सार भाग मधुर होता है। 
आशीर्वाद : जो अपने कर्मयोग का फल रूपी मोदक प्रभु के हाथों में धरता है। उसे प्रभु आशीर्वाद देते है।

गणपति लंबोदर भी कहलाते है। विशाल सुप जैसे कानो से सबकी सुनी हुई बातें अपने विशाल उदर में समाविष्ट कर रखनी है। इस बात का सूचन उनका बड़ा पेट करता है। मानव को सागर-पेट होना चाहिए। 

गणपति के पैर छोटे है। इसलिए शायद वह जल्दी से दौड़ नही सकते। "उतावला सो बावरा, धीर सो गंभीर" बुद्धिमानों के पैर छोटे होते है याने वह स्वयं दौड़ते नही दूसरों को दौड़ाते है। " पृथ्वी प्रदक्षिणा की शर्त में अपने भाई कार्तिकेय को गणेश ने अपनी बुद्धि से ही मात किया था, यह पौराणिक कथा सुविदित है।

गणपति का वाहन चूहा है। बाकी सारे देवीदेवताओं के वाहन विशालकाय है। वह घर के दरवाजे तक रुक जाते है। घरमे प्रवेश नही कर पाते। जबकि गणपति का वाहन उसे आसानी से गृह प्रवेश करा सकता है। महापुरुषों के साधन ऐसे छोटे और नम्र होने चाहिए।

चूहा माया का प्रतीक है। चूहे की तरह माया भी मानव को फूंक फूंककर काटती है। ऐसी फूंक फूंककर काटने वाली माया को केवल तत्वज्ञानी ही अंकुश में रख सकते है। नेता या तत्ववेत्ता को कभी कट्टू वाणी कहने का समय आये तो चूहे के भांति फूंक फूंककर कर कह देते है जिससे सुनने वाले को बुरा न लगे और अपना कार्य भी बन जाय।

गणपति को दूर्वा (दुब) बहुत प्रिय है। जनसामान्य के लिये जिसका।कोई महत्व नही ऐसे।घास को।उन्होंने अपनाया और उसका मूल्य बढ़ाया। दुर्वा का कोई रंग, रूप गंध नही है। जिसका जागतिक-लौकिक दृष्टि से कोई मूल्य नही है ऐसा निष्काम कर्म भी प्रभु को प्रेम से अर्पण करेंगे तो वह दूर्वा रूपी कर्म प्रभु को अच्छा लगेंगा।

गणपति को #लालरंग के फूल प्रिय है। लाल रंग क्रांति का सूचक है। अक्षत (चावल) चढ़ाते है। अक्षत याने जो टूटा नही है, खंडित नही है। भगवान के प्रति अखंड भक्ति का अक्षत चढ़ाने में दर्शन होता है।

गणपति को #वक्रतुंड कहते है। ऋद्धि_सिद्धि से मुंह मोड़कर खड़े रहनेवालो को ही ऋद्धि-सिद्धि प्राप्त होती है। "विक्रांन्तुण्डयती इति वक्रतुंड" अर्थात गलत राह पर चलनेवालों को जो दण्ड देता है वह वक्रतुंड

जैसे महामार्ग पर मार्गदर्शक साइनबोर्ड में बिना कुछ लिखे यह विविध प्रतीक 🚫🚳🚭🚯🚱🚷🚭 हमे मार्ग की आगे की स्थिति का मार्गदर्शन करते है। ठीक उसी तरह हमारे दूरद्रष्टा ऋषिमुनियों ने गणपति के प्रत्येक अवयव से हमे जीवन के प्रति तात्विक दर्शन कराया है। कि समाज का नेता, नायक कैसा होना चाहिए। बाकी गणपति के पूजक भी अपने घर ऐसा बालक जन्मे यह कल्पना तक नही कर सकते।

गणेश चतुर्थी के दिन हम गणपति की मूर्ति लाते है। तत्वतः यह निर्गुण, निराकार को सगुण, साकार रूप में व्यक्त कर भावपूजन करने का त्योहार है। और अंनत चतुर्दशी को उनका विसर्जन करते है। जो शांत है उसे अंनत में, साकार को निराकार में, सगुण को निर्गुण में विलीन करते है।

साकार भगवान मूर्ति में है तो निराकार भगवान सर्वत्र व्याप्त है। उसी तरह जीवन मे उत्तरोत्तर व्यक्तिपूजा से प्रारंभ कर तत्वपूजा तक पहुँचना चाहिए। संक्षिप्त में गणपति का विसर्जन यानी विराट की पूजा का प्रारंभ। पंचमहाभौतिक सगुण साकार को पुनः पंचमहाभूत में विलीन कर स्वयं में निर्गुण निराकार विराट का सृजन यह विसर्जन का भाव है।

वास्तविक गणेश पूजन एक दिन का ही गृह पूजन का त्योहार था। यह तो लोकमान्य बालगंगाधर टिळक ने अंग्रेजों के विरूद्ध लोकमानस को जागरूक करने हेतु इसका सार्वजनिककरण कर लोकमहोत्सव का रूप दिया है। यह बात भी सर्वविदित है।

जिन ऋषियों ने गणपति-पूजन द्वारा जीवन का ऐसा अलौकिक दर्शन दिया और उस दर्शन को जीवन मे चरितार्थ करने के लिए अंनत विघ्नों से लड़ने का सामर्थ्य दिया ऐसे ऋषियों एवं तत्त्ववेत्ता महापुरषों का हमारा अंनत प्रणाम।

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

- पूज्य दादा पांडुरंग शास्त्री आठवले 
- साभार संस्कृति पूजन

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