खिलाफत आंदोलन का काला सच

भारत  छोड़ो आंदोलन और आजादी के नाम से "गजवा _ए _हिंद" के जिहादी एजंडे से चले "खिलाफत आंदोलन" का काला सच 


● क्यो कोंग्रेस बारबार आजादी की लड़ाई में RSS की भूमिका और अंग्रेजों की तरफदारी का आरोप लगाने की वकालत करती है ?

● क्या था वह खिलाफत आंदोलन जिसका तत्कालीन कोंग्रेसी और RSS के संस्थापक डॉ केशव बलिराम हेडगेवार ने विरोध किया था।

●मूलतः कोंग्रेसी विचारधारा के होते हुए डॉ केशव बलिराम हेडगेवार को राष्ट्रभक्त राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अलग संघठन के रूप में स्थापना क्यों करनी पड़ी ?

● खिलाफत आंदोलन के पीछे नहेरु गाँधी की क्या मंसा थी ?

● इसे पढ़ने के पश्चात क्या आप डॉ हेडगेवार की जगह होते तो क्या करते ? 

● क्या आप भारत को गज़वा-ए-हिन्द यानी इस्लामिक देश बनते देखते ?

या फिर डॉ हेडगेवारजी की तरह इसका विरोध करते?

जानने के लिए पूरी पोस्ट को अंत तक अवश्य पढ़ें।

हाल के दिनों में प्रधानमंत्री मोदीजी ने हामिद मियां पर तंज कसते हुए कहा था कि आपके परिवार के लोगों ने खिलाफत आंदोलन में भाग लिया था जिस पर हामिद मियां खींसे निपोरते रह गए, वही खिलाफत आंदोलन जिसका RSS और डॉ हेडगेवार ने विरोध किया था, तो आखिर क्या था खिलाफत आंदोलन? 

जिसे सुनते ही हामिद मियां और कांग्रेस असहज हो उठी? 

खिलाफत जानने से पहले आइए पहले जरा खलीफा को जान लें, खलीफा एक अरबी शब्द है जिसे अंग्रेज़ी में Caliph (खलीफ) या अरबी भाषा मे Khalifah (खलीफा) कहा जाता है, तो कौन होता है खलीफा? खलीफा मुसलमानों का वह धार्मिक शासक (सुल्तान) होता है खलीफा का काम होता है युद्ध कर के पूरे विश्व पर इस्लाम का निज़ाम कायम करना (जो कश्मीर में बुरहान वानी करना चाहता था), यानी इस्लाम की ऐसी हुकूमत कायम करना जिसमे इस्लामिक यानी शरीया कानून चले और जिसमे इस्लाम के अलावा किसी और धर्म की इजाज़त नही होती है, जितने हिस्से या राज्य पर खलीफा राज करता है उसे Caliphate यानी अरबी भाषा में Khilafa (खिलाफा) कहते हैं, खलीफा यानी इस्लामिक सुल्तान और खिलाफा यानी इस्लामिक राज्य ।

● 1919-22 के दौरान Turkey यानी तुर्की में ओटोमन वंश के आखिरी सुन्नी खलीफा अब्दुल हमीद-2 का खिलाफा यानी शासन चल रहा था जो कि जल्दी ही धराशाई होने वाला था, इस आखिरी इस्लामिक खिलाफा (शासन) को बचाने के लिए अब्दुल हमीद-2 ने जिहाद का आवाहन किया ताकि विश्व के मुसलमान एक हो कर इस आखिरी खिलाफा यानी इस्लामिक शासन को बचाने आगे आएं, पूरे विश्व मे इसकी कोई प्रतिक्रिया नही हुई सिवाए भारत के, भारत के अलावा एशिया का कोई भी दूसरा देश इस मुहिम का हिस्सा नही बना, लेकिन भारत के कुछ मुट्ठी भर मुसलमान इस मुहिम से जुड़ गए और लाखों किलोमीटर दूर सात समंदर पार तुर्की के खिलाफा यानी इस्लामिक शासन को बचाने और अंग्रेज़ों पर दबाव बनाने निकल पड़े, जबकि इस समय भारत खुद गुलाम था और अपनी आजादी के लिए संघर्ष कर रहा था, लेकिन अंतः 1922 में तुर्की से सुलतान के इस्लामिक शासन को उखाड़ फेंका गया और वहाँ सेक्युलर लोकतंत्र राज्य की स्थापना हुई और कट्टर मुसलमानों का पूरे विश्व पर राज करने का सपना टूट गया, इसी सपने को संजोए आजकल ISIS काम कर रहा है।

● भारत के चंद मुसलमानों ने अंग्रेज़ी हुकूमत पर दबाव बनाने के लिए बाकायदा एक आंदोलन खड़ा किया जिसका नाम था खिलाफा आंदोलन (Caliphate movement) अब क्योंकि अंग्रेज़ी में लिखे जाने पर इसका हिन्दी उच्चारण खलिफत होता है (अरबी में caliphate को khilafa = खिलाफा लिखते है) तो कांग्रेस ने बड़ी ही चतुराई से इसका नाम खिलाफत आंदोलन रख दिया ताकि देश की जनता को मूर्ख बनाया जा सके और लोगों को लगे कि यह खिलाफत आंदोलन अंग्रेज़ो के खिलाफ है, जबकि इसका असल मकसद purely religious यानी पूर्णतः धार्मिक था, इसका भारत की आज़ादी या उसके आंदोलन से कोई लेना देना नही था, कुछ समझ मे आया? कैसे शब्दों की बाज़ीगरी से जनता को मूर्ख बनाया जा रहा था, कैसे खलिफत को खिलाफत बताया जा रहा था। ठीक वैसे ही जैसे Feroze Khan Ghandi (घांदी) को Feroze Gandhi (फ़िरोज़ गांधी) बना दिया गया)।

उस समय भारत मे इतने पढ़े लिखे लोग और नेता नही थे कि गांधी नेहरू की इस चाल को समझ सकें, लेकिन इन सब के बीच कांग्रेस में एक पढ़ा लिखा शख्स मौजूद था जिसका नाम था डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार, इस शख्स ने इस आंदोलन का जम कर विरोध किया क्योंकि खिलाफा सिर्फ तुर्की तक सीमित नही रहना था, इसका उद्देश्य तो पूरे विश्व पर इस्लाम की हुकूमत कायम करना था जिसमे गज़वा-ए-हिन्द यानी भारत भी शामिल था, डॉ हेडगेवार ने कांग्रेस के गांधी और नेहरू को बहुत समजाने की कोशिश की लेकिन वे नही माने, अंतः डॉ हेडगेवार ने कांग्रेस के इस खिलाफत आंदोलन का विरोध किया और कांग्रेस छोड़ दी, तो अब समझ मे आया मित्रों की कांग्रेसी जो कहते हैं कि RSS ने आज़ादी के आंदोलन का विरोध किया था, तो वो असल मे किस आंदोलन का विरोध था ? 

मित्रो, आपमें से कितने लोगों को खिलाफत आंदोलन का यह सच पता है ?

अक्टूबर 1920, कालीकट (मोपला) आज खिलाफत मंडल की सभा में पंजाब से मौलाना अल्लाहबख्श आए हुए थे, कालीकट के मुसलमानों ने खिलाफत मंडल के नेता रामनारायण नंबूदरी को समझाया की अलाहबख्श के भाषण से पहले हिन्दू-मुस्लिम एकता दिखाने के लिए जुलूस में अल्लाहबख्श की बग्घी को घोड़ों के बजाए हिन्दू नौजवानों द्वारा खिंचवाया जाए।

इससे हिन्दू-मुस्लिम एकता का पूरे मुल्क में सुंदर संदेश जाएगा। नम्बूद्री राम नारायण खुश हुए, बग्घी में अल्लाहबख्श तनकर बादशाहों वाले अंदाज़ में बैठा था ...

● मुस्लिम, सुभान अल्लाह-सुभान अल्लाह और अल्लाह-उ-अकबर का नारा लगाते चलते थे ! 

● हिन्दू, अल्लाहबख्श के ऊपर फूलों की वर्षा कर रहे थे !

● हिन्दू युवक अल्लाहबख्श की बग्घी में घोड़ों की जगह जुते हुए पूरे कालीकट में अल्लाहबख्श को राजा की तरह यात्रा कराते रहे ... मुस्लिम गर्व से छाती फुलाए थे ...

● हिन्दू, ‘हिन्दू-मुस्लिम एकता’ का गीत गाते नहीं थकते थे ...

● बस एक छोटी सी हिंदुओं से गलती यह हो गई , वह यह कि एक नायर के मुंह से अल्लाह-उ -अकबर के बीच‘वंदेमातरम’ का नारा निकल गया ...

● मुस्लिम नौजवानों ने फौरन नायर को जुलूस के बीच से खींचकर निकाल दिया !

● हिन्दू नेताओं ने आदेश दिया कि हिन्दू भी अल्ला – उ – अकबर का नारा लगाएंगे …

● बड़ी मुश्किल से मुस्लिमों की नाराजी दूरकर जुलूस आगे बढ़ा, और महानन्दी अय्यर के घर पहुचा… जहां मीटिंग थी… जिसे सदारत कर रहे थे।

● मौलाना अल्लाहबख्श को महानन्दी अय्यर ने सुझाव दिया कि चूंकि स्वराज आंदोलन भी जोरों पर है, अतः मीटिंग में खिलाफत के साथ-साथ ‘स्वराज’ पर चर्चा हो जाये…. मुल्ला एटखान बेहद नाराज हो गए…. कहने लगे कि यह तो हिंदुओं को मुस्लिमों के ऊपर लादने की साज़िश हो रही है… महानन्दी अय्यर ने अपनी ‘गलती’ की तुरंत क्षमा मांगी…..*

● गांधी जी ने कहा था कि किसी भी हालत में खिलाफत तहरीक को सफल बनाना है …

● सयाने अल्लाहबख्श ने कहा कि हिन्दू अगर सच्चा हिन्दू है, गांधी और खिलाफत तहरीर के लिए दिल से साथ है तो खिलाफत तहरीर के लिए ‘धन और अन्य संसाधन’ हिंदुओं को देने होंगे, क्योकि केरल के मोपला मुसलमान बहुत गरीब हैं।

● सभा मे उपस्थित सभी हिंदुओं ने करतल ध्वनि से इस प्रस्ताव का स्वागत किया।

महानन्दी अय्यर ने कहा की बेशक हिंदुओं को अपनी पत्नियों के ज़ेबर बेचने पड़ जाएं मगर खिलाफत तहरीर के लिए हिन्दू धन की कमीं नहीं होने देंगे ….. मगर चंदे की देखरेख के लिए कोई हिन्दू रखा जाता तो खिलाफत तहरीर में हिंदुओं की सहभागिता और दिखती ….. सभा में मौजूद सभी मुस्लिम क्रोध में आ गये ...

●खिलाफत तहरीर पर पैसों की ताकत से हिन्दू कब्ज़ा करना चाहते हैं ... एक मौलाना खड़े होकर बोलने लगा…

● हिन्दू होने के नाते तुम्हारा हमे जज़िया देने का फर्ज बनता है ! हम इत्तेहाद दिखा रहे हैं तो तुम हिन्दू काफिर हमसे चालबाज़ी दिखा रहे हो….* तुम्हारे गांधी की वजह से हमने हिंदूओ को इस तहरीर में शामिल कर लिया है ...

● महानन्दी अय्यर फिर खड़े हुए उन्होंने अपनी ‘भारी गलती’ के लिए क्षमायाचना की ...

● और तुरंत ही कालीकट के हिंदुओं की तरफ से दस हज़ार रु की रकम मुस्लिमों के हवाले की …

● मौलवी अल्लाहबख्श ने कहा कि महानन्दी सच्चे हिन्दू हैं और आला दर्जे के महापुरुष हैं …

● कुछ दिनों बाद ही महानदी अय्यर सहित हज़ारों हिंदुओं बेरहमी से काट दिये गए, हज़ारों हिन्दू महिलाओं की बलात्कार के बाद हत्या हुई, हज़ारों का धर्म परिवर्तन हुआ …

● देश मे खिलाफत आंदोलन की वजह से ‘हिन्दू-मुसलमान एकता’ कायम हुई ...

● सुन्नी/वहाबी इस्लामी खलीफा साम्राज्य” को खिलाफत कहा जाता है !!

भारतीय इतिहास में खिलाफत आन्दोलन का वर्णन तो है किन्तु कहीं विस्तार से नहीं बताया गया कि खिलाफत आन्दोलन वस्तुत: भारत की स्वाधीनता के लिए नहीं अपितु वह एक राष्ट्र विरोधी व हिन्दू विरोधी आन्दोलन था ... 

● खिलाफत आन्दोलन दूर स्थित देश तुर्की के खलीफा को गद्दी से हटाने के विरोध में भारतीय मुसलमानों द्वारा चलाया गया आन्दोलन था। *तुर्की की “इस्लामिक” जनता ने बर्बर व रूढिवादी इस्लामी कानूनों से तंग आकर एकजुटता से मुस्तफा कमाल पाशा के नेतृत्व में तुर्की के खलीफा को देश निकला दे दिया था, और भारत में मोहम्मद अली जौहर व शौकत अली जौहर दो भाई खिलाफत आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे..!!*

● गांधी चाहते थे कि भारत की ‘आजादी के आंदोलन’ में मुसलमान भी किसी तरह जुड़ जाएं। अत: उन्होंने 1921 में अखिल भारतीय खिलाफत कमेटी से जुडकर ‘खिलाफत आंदोलन’ की घोषणा कर दी, यद्यपि इस आंदोलन की पहली मांग खलीफा पद की पुनर्स्थापना थी।

● पर मुसलमान सुन्नी इस्लामी उम्मत और खलीफा खिलाफत के आगे कुछ नहीं सोचते थे, उन्हे तो बस 786 साल से हिंदुस्तान पर की गई तथा कथित हूकूमत का टिमटिमाहट वाला बुझता दिया इस्लामी रोशनी के साये में उम्मीद जगाने हेतु मिल गया था।

● इस खिलाफत आंदोलन के दौरान ही मोहम्मद अली जौहर ने अफगानिस्तान के शाह अमानुल्ला को तार भेजकर भारत को दारुल इस्लाम बनाने के लिए अपनी सेनाएं भेजने का अनुरोध किया इसी बीच तुर्की के खलीफा सुल्तान अब्दुल माजिद सपरिवार (13 पत्नियों के साथ) माल्टा चले गये।

● आधुनिक विचारों के समर्थक मुस्तफा कमाल पाशा नये शासक बने भारत आकर मोहम्मद अली जौहर ने भारत को दारुल हरब (संघर्ष की भूमि जहाँ काफिर का शासन है) कहकर मौलाना अब्दुल बारी से हिजरत का फतवा जारी करवाया। इस पर हजारों मुसलमान अपनी सम्पत्ति बेचकर अफगानिस्तान चल दिये इनमें उत्तर भारतीयों की संख्या सर्वाधिक थी पर वहां उनके ही तथाकथित मजहबी भाइयों / इस्लामी उल्मा ने ही उन्हें खूब मारा तथा उनकी सम्पत्ति भी लूट ली, वापस लौटते हुए उन्होंने देश भर में दंगे और लूटपाट की, केरल में तो 20,000 हिन्दू धर्मांतरित किये गये, इसे ही ‘मोपला कांड भी कहा जाता है …

● उन दिनों कांग्रेस के अधिवेशन वंदेमातरम के गायन से प्रारम्भ होते थे, 1923 का अधिवेशन आंध्र प्रदेश में काकीनाड़ा नामक स्थान पर था, मोहम्मद अली जौहर उस समय कांग्रेस के अध्यक्ष थे, जब प्रख्यात गायक विष्णु दिगम्बर पलुस्कर ने वन्देमातरम गीत प्रारम्भ किया, तो मोहम्मद अली जौहर ने इसे इस्लाम विरोधी बताकर रोकना चाहा इस पर श्री पलुस्कर ने कहा कि यह कांग्रेस का मंच है, कोर्इ मस्जिद नहीं और उन्होंने पूरे मनोयोग से वन्दे मातरम गाया। इस पर जौहर विरोधस्वरूप मंच से उतर गया था।

● मोहनदास करमचंद गाँधी ने बिना विचार किये ही इस आन्दोलन को अपना समर्थन दे दिया जबकि इससे हमारे देश का कुछ भी लेना-देना नहीं था जब यह आन्दोलन असफल हो गया, जो कि होना ही था, तो *केरल के मुस्लिम बहुल मोपला क्षेत्र में अल्पसंख्यक हिन्दुओं पर अमानुषिक अत्याचार किये गए, माता-बहनों का शील भंग किया गया और हत्याएं की गयीं मूर्खता की हद तो यह है कि गाँधी ने इन दंगों की कभी आलोचना नहीं की और दंगाइयों की गुंडागर्दी को यह कहकर उचित ठहराया कि वे तो अपने धर्म का पालन कर रहे थे सिर्फ मोपला ही नहीं अपितु पूरे तत्कालीन ब्रिटिश भारत में अमानवीय मुस्लिम दंगे, लूटपाट और हिंदू हत्याऐं हुई थी पर गांधी ने उन पर कभी किसी हिंदू हेतु संज्ञान नहीं लिया, उलटे हिंदुओं को ही ईश्वर अल्ला तेरो नाम का गीत सुनाते रहे। 

● गाँधी जी को गुंडे-बदमाशों के धर्म की तो गहरी समझ थी पर हिन्दू माताओं-बहनों के धर्मशीलता को भ्रष्ट करने का ज्ञान नहीं था।

मुसलमानों के प्रति गाँधी के पक्षपात का यह अकेला उदाहरण नहीं है, ऐसे अनेक उदाहरण मिलेंगे।

● भारतमें 1919 में खिलाफत आंदोलन शुरू हुआ था और 1920 में डॉ हेडगेवार ने कांग्रेस छोड़ दी और सभी को इस आंदोलन के बारे में जागरूक किया कि इस आंदोलन का भारत की आज़ादी से कोई लेना देना नही है और यह एक इस्लामिक आंदोलन है, जिसका नतीजा यह हुआ कि यह आंदोलन बुरी तरह फ्लॉप साबित हुआ औए 1922 में आखिरी इस्लामिक हुकूमत धराशाई हो गयी, मुस्लिम नेता इस से बौखला गए और मन ही मन हिन्दुओ और RSS को अपना दुश्मन मानने लगे और इसका बदला उन्होंने 1922-23 में केरल के मालाबार में हिन्दुओ पर हमला कर के लिया और असहाय अनभिज्ञ हिन्दुओ को बेरहमी से काटा गया हिन्दू लड़कियों की इज़्ज़त लूटी गई, जबकि इस आंदोलन का भारत या उसके पड़ोसी देशों तक से कोई लेना देना नही था।

● 1923 के दंगों में गांधी ने हिन्दुओ को दोषी ठहराते हुए हिन्दुओ को कायर और बुजदिल कहा था, गांधी ने कहा हिन्दू अपनी कायरता के लिए मुसलमानों को दोषी ठहरा रहे हैं, अगर हिन्दू अपने जान माल की सुरक्षा नही कर सकता तो इसमें मुसलमानों का क्या दोष ? हिन्दुओ की औरतों की इज़्ज़त लूटी जाती है तो इसमें हिन्दू दोषी है, कहा थे उसके रिश्तेदार जब उस लड़की की इज़्ज़त लूटी जा रही थी ? 

● कुलमिला कर गांधी ने सारा दोष दंगा प्रभावित हिन्दुओ पर मढ़ दिया और कहा कि उन्हें हिन्दू होने पर शर्म आती है, जब हिन्दू कायर होगा तो मुसलमान उस पर अत्याचार करेगा ही।

कोंग्रेस द्वारा आजादी की लड़ाई और भारत छोड़ो आंदोलन में RSS की भूमिका पर बारबार सवाल उठाकर संघ को बदनाम करने की कोशिशें की जाती है।



आजादी की लड़ाई में आरएसएस के योगदान के ये रहे सबूत …



काँग्रेस ने आजादी के इतिहास लिखने में कई क्रांतिकारियों से भेदभाव का षड्यंत्र किया, फिर भी ये रहे सबूत ... आरएसएस का आजादी की लड़ाई में योगदान ...

संघ के संस्थापक और हजारों स्वयंसेवकों का स्वाधीनता संघर्ष में अमूल्य योगदान रहा है ...

RSS का देश की आजादी की लड़ाई में योगदान को लेकर अक्सर प्रश्न उठाये जाते हैं ... जब शोध ओर अध्ययन हुआ तो पता चला आरएसएस के संस्थापक डा. हेडगेवार की देश की आजादी के लिए ,अंग्रेजो से लड़ाई गांधी नेहरू सहित कई बड़े नेताओं से अधिक त्यागमय थी ...

डॉ हेडगेवार जी ने 16 वर्ष की आयु में युवाओं में राष्ट्रीय घटनाओं पर चर्चा और क्रांतिकारी गुणों के विकास के लिए 1901 में चर्चा मण्डल “देशबंधु समाज“ की शुरुआत की पढ़ें- *(आर्म्ड स्ट्रगल फ़ॉर फ्रीडम , पृष्ठ 372 -बी एस हरदास )*

● डॉ हेडगेवार ने इस संगठन में शामिल होने के लिए जो प्रतिज्ञा रखी थी ... करितो संमित्र हो निश्च्च्ये ... अपर्णी देहास देश कारयी ... अर्थात अपना शरीर और आत्मा मातृभूमि की सेवा में अर्पित करता हूँ पढ़ें *(आर्म्ड स्ट्रगल फ़ॉर फ्रीडम , पृष्ठ 374 -बी एस हरदास )*

* डॉ हेडगेवार जी को स्कूल में अंग्रेज अफसर के निरीक्षण के समय “वन्देमातरम”के नारे लगवाने, नागपुर के मॉरिस कालेज सहित 2000 छात्रों की हड़ताल कराने और भरी सभा मे अंग्रेजो से माफी मांगने से इनकार करने पर सर रेजिंलेण्ड क्रडोक के निर्देश पर पुलिस महानिरीक्षक सीआर क्लीवलैंड की अनुशंसा पर स्कूल से निष्काषित कर दिया गया *( पढ़े -द डायरेक्टर क्रिमिनल इंटेलिजेंस जनवरी 1914 पृष्ठ 97 इंडिया हाउस लन्दन ओर समाचार पत्र “केसरी” 5 जुलाई 1914 पृष्ठ 5 ओर गोविंद गणेश आवडे महाराष्ट्र 28 जुलाई 1940 पृष्ठ 12)

* रामपायली आंध्रप्रदेश में सन 1908 में अगस्त माह में डॉ हेडगेवार ने पुलिस चौकी पर बम फेंका, जो निकट के तालाब पर फटा, पर पुलिस के पास कोई सबूत नही था इसलिए गिरफ्तारी से बच गए ... इसी स्थान पर अक्तूबर 1908 में दशहरे के रावण दहन कार्यक्रम में उन्होंने देशभक्ति पूर्ण जोशीला भाषण दिया, पूरी भीड़ वन्देमातरम का नारा लगाने लगी। डॉ हेडगेवार पर अंग्रेजो ने राजद्रोही भाषण आईपीसी धारा 108 में केस दर्ज कर लिया *(पढ़े -पोलिटिकल क्रिमिनल हूज हु पृष्ठ 97)*

* 1909 में डॉ हेडगेवार यवतमाल आ गए यहां भी बांधव समाज की स्थापना, पुलिस चौकी पर बम फटा नाम फिर डॉ हेडगेवार जी का आया ... पर सबूत नही, पर डॉ हेडगेवार जी के विद्यालय को 1908 के अधिनियम 16 के तहत गैरकानूनी करार देकर बन्द कर दिया *( पढ़े फ़ाइल क्रमांक 26 -41 गृह राजनीतिक भाग A जून 1910 राष्ट्रीय अभिलेखागार नई दिल्ली )*

* डॉ हेडगेवार जी का नाम उनकी देशभक्ति को देखकर क्रांतिकारी संगठन “अनुशीलन समिति“ में जोड़ा गया।*( पढ़ें -T *चक्रबर्ती, थर्टी इयर्स इन प्रिजन पृष्ठ 277-78 अल्फा बिटा प्रकाशन कलकत्ता 1963)*

* डॉ हेडगेवार क्रांतिकारियों में “कोकेन ” के नाम से जाने जाते थे ,ओर “एनाटोमी”,उनके शस्त्र का छद्म नाम था, क्रांतिकारियों में उनका सम्मान था। *(पढ़ें-जोगेश चन्द्र चटर्जी ,इन सर्च ऑफ फ्रीडम पृष्ठ 27)*

* प्रसिद्ध क्रांतिकारी श्यामसुंदर चक्रवर्ती की पुत्री के विवाह में लोक सहायता, मौलवी लियाकत हुसेन फेज केप की जगह गांधी टोपी पहनाना उनके उल्लेखनीय कार्य थे।*( पढ़ें अतुल्य रत्न घोष मॉडर्न रिव्यू मार्च 1941)

* रासबिहारी बोस, विपिनचन्द्र पाल, से डॉ हेडगेवार का परिचय था ,हरदास ने उनके बारे में लिखा है कि अपनी देशभक्ति,संगठन कौशल, सात्विक चरित्र से हेडगेवार जी ने क्रांतिकारियों के दिल जीत लिया था। *(पढ़ें-बालशास्त्री हरदास आर्म्ड स्ट्रुगल फ़ॉर फ्रीडम पृष्ठ 373 )*

* डॉ हेडगेवार बंगाल और मध्यप्रान्त के क्रांतिकारियों के बीच की कड़ी थे और नागपुर में शस्त्र छिपाकर लाया करते थे। *(पढ़ें-,जीवी केतकर रनझुनकर पी सी खान खोजे यांचा चरित्र पृष्ठ 12 )*

* राष्ट्रीय मेडिकल कालेजो के छात्रों की क्रांतिकारी भूमिका के कारण यहां की डिग्री अमान्य करने के कारण, नागपुर में डॉ हेडगेवार ने इस बिल के विरोध में प्रस्ताव पारित कराया जिससे अंग्रेजो को अपना निर्णय वापिस लेना पड़ा । *(पढ़ें -हितवाद 12 फरवरी 1916 पृष्ठ 7)*

* डॉ हेडगेवार जी ने प्रथम विश्वयुद्ध के समय अंग्रेजी सेना में युवकों की भर्ती का विरोध किया और जनजागरण किया। *(पढ़ें -हितवाद 29 जून 1918 पृष्ठ 7)*

* डॉ हेडगेवार जी नागपुर ओर वर्धा में सक्रिय गुप्त क्रांतिकारी दल के सक्रिय सदस्य थे। *( पढ़ें -बालाजी हुद्दार the RRS & Netaji द इलेस्ट्रेड वीकली आफ इंडिया 7-13 अक्टूबर 1979 पृष्ठ 23 )*

* देश प्रेम के भाव के कारण डॉ की डिग्री हासिल करने, ओर परिवार की आर्थिक स्थिति दरिद्रता में होने पर भी प्रेक्टिस ओर नोकरी छोड़ दी। *(पढ़ें केसरी 25 जून 1940 )*

* डॉ हेडगेवार असहयोग आंदोलन में कांग्रेस की नागपुर आंदोलन समिति में रहे और 11 नवम्बर 1920 से एक सप्ताह “असहयोग सप्ताह “के रूप में आयोजित कर सरकार के राजस्व को खत्म करने के लिए नशाबंदी आंदोलन चलाया *(पढ़ें “महाराष्ट्र”2 फरवरी 1921)*

* डॉ हेडगेवार पर आम सभाओं में भाग लेने पर अंग्रेजी कोर्ट के निर्देष पर जिला अधीक्षक जेम्स इरविन के साईंन से नोटिस दिया गया ... लेकिन डॉ हेडगेवार ने खुला उल्लंघन किया। *(पढ़ें महाराष्ट्र 20 अप्रेल 1921 पृष्ठ 7)*

* डॉ हेडगेवार पर अक्टूबर 1920 में काटोल ओर भारतवाड़ा की सभाओं में अंग्रेज विरोधी भड़काऊ भाषणों ओर 1908 के उग्र लेखन को लेकर आईपीसी धारा 108 के अंतर्गत मई 1921 में राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया ... डॉ हेडगेवार ने योजना पूर्वक अपनी पैरवी स्वयं की ... उन्हें 1 वर्ष के सश्रम कारावास की सजा हुई। *(पढ़ें-फाइल नं 28 /1921 राजनीतिक भाग 1 पेरा 17 राष्ट्रीय अभिलेखागार नई दिल्ली)*

* डॉ हेडगेवार ने जेल में भी अनेक कष्ट झेलते हुए हिद धर्म की जागृति की, गीता महाभारत का पाठ बंदी साथियो को सुनने और जलियावाला बाग हत्याकांड के विरोध में हड़ताल की, 11जुलाई 1922 को जेल से रिहा हुए। *(पढ़ें पूर्वोक्त )*

*डॉ हेडगेवार ने जेल से बाहर आकर “स्वातंत्र्य” नामक समाचार पत्र का सम्पादन किया और अंग्रेजो के खिलाफ मोर्चा खोल दिया पत्र की पाठक संख्या 1200 हो गयी।

* डॉ हेडगेवार ने पूर्ण स्वतंत्रता की मांग, साइमन कमीशन का विरोध, सविनय अवज्ञा आंदोलन, जंगल सत्याग्रह, पुसद सत्याग्रह में भाग लिया 21जुलाई 1931 को पुनः गिरफ्तार कर आईपीसी की धारा 117 के अंतर्गत उन पर मुकदमा चलाया गया और फिर से 9 महीने के सश्रम कारावास की सजा हुई, 14 फरवरी 1931 को जेल से रिहा हुए।

* डॉ हेडगेवार ने भागानगर सत्याग्रह, रामसेना, जैसे विवादों का सामना किया आरएसएस की स्थापना की।

* संघ को मिले समर्थन को देखकर सरकारी कर्मचारियों के आरएसएस की शाखा में जाने पर अंग्रेजो ने रोक लगा दी थी। *(पढ़ें -फाइल 88/33 ग्रह(राजनीतिक) राष्ट्रीय अभिलेखागार नई दिल्ली)*

* भारत मे अंग्रेजी सरकार के सचिव एम जी हैलेट ने 27 जनवरी 1933 को आरएसएस के बारे में जानकारी लेने एवम गतिविधियों को रोकने के निर्देश दिए ओर डॉ हेडगेवार को संघ का हिटलर कहा *(पढ़े पूर्वोक्त पृष्ठ 3-4)*

* 20 दिसम्बर 1933 को अंग्रेजी मध्य भारत सरकार के स्थानिय स्वशासन विभाग ने नोटिस जारी संघ के कार्यक्रमो को रोकने की कार्यवाही की। *(पढ़ें -,हितवाद 21 दिसम्बर 1933 पृष्ठ 5 )*

डॉ हेडगेवार जी के नेतृत्व में संघ के सामाजिक कार्यो से प्रेरित होकर संघ के समर्थन में नागपुर नगर पालिका ने 10 मार्च 1921 समर्थन भी पारित किया।

नागपुर में 30 दिसम्बर 1938 को संघ के कार्यक्रम में 15000 से अधिक लोग उपस्थित थे *(पढ़ें केसरी 5 जनवरी 1939 )*

* अंग्रेज अधिकारी सांडर्स की हत्या के बाद क्रांतिकारी राजगुरु को भूमिगत रहने एवम अन्य सहायता प्रदान की *(पढ़ें-HM घोड़के, रिवोल्यूशनरी नेशनलिज्म इन वेस्टर्न इंडिया पृष्ठ 173-174)*

* संघ के एक सैनिक संगठन की तरह प्रशिक्षण देने से अंग्रेज चिंतित थे। *( फाइल संख्या 28/08/42 गृह विभाग (I) राष्ट्रीय अभिलेखागार नई दिल्ली)*

* बाला साहेब देवरस भी अंग्रेजो के विरुद्ध गुप्त रूप से संगठन कर रहे थे। *(पढ़ें-केशव स्मरामि सदा (खण्ड 1) पृष्ठ 11-12 सुरुचि साहित्य )*

भारत की आजादी का इतिहास लिखने वालों ने तो भगत सिंह को भी आतंकवादी करार दे दिया। चंद्रशेखर आजाद को भी सम्मान नहीं दिया जो चटगांव से लेकर पेशावर तक क्रांतिकारियों के नेता थे। तमाम प्रकार के क्रांतिकारियों के साथ में भेद भाव अपमानजनक व्यवहार आजादी के बाद भी होता रहा।

आज भाजपा विरोध के कारण संघ विरोधवाद अपनाने वाले न केवल तथ्यों से परहेज कर रहे हैं बल्कि उन हूतआत्माओं के साथ में भी अन्याय है। यह उन शहीदो के साथ में अन्याय है। जिन्होंने आजादी की लडाई में अपना अमूल्य योगदान दिया। लाखों अनाम ऐसे शहीदों ने अपना नाम ना पत्थरों पर ना इतिहास के पन्नों पर लिखवाने की चाह रखी। यह घोषित तथ्य है मात्र नेहरू वंश के लोगों ने ही अपना योगदान आजादी की लड़ाई में नहीं दिया बल्कि लाखों लोगों ने भारत को आजाद कराने का सपना देखा और उसके लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक सुसंगठित अनुशासनबद्ध संगठन अपने जन्म काल से रहा है। परतंत्रता के दौर में यह आवश्यक था कि भारतीय समाज को एकत्र किया जाए। उसे एकसूत्र में बांधा जाए। निश्चित ही भारतीय समाज को एक सूत्र में बांधने का यही सिद्द तरीका था कि भारतीय समाज अपनी भारतीय सांस्कृतिक और अस्मिता के मानबिंदु पहचाने और उन पर गौरव की अनुभूति करे। भारतीय समाज कभी भी राजनीतिक समाज नहीं रहा, सांस्कृतिक समाज रहा है। संस्कृति ही वही तत्व है जो पूरे भारत को एकसूत्र में बांधती है।

संघ आजादी की लड़ाई में अपनी भूमिका समाज की तत्कालीन कमजोरियों और शौर्य के कारणों के आधार पर तय करता रहा। यही कारण है कि ब्रिटिश हुक्मरानों को संघ की योजना की भनक तक नहीं लग पाती थी।

ब्रिटिश गुप्तचर विभाग इस बात से परेशान था कि वह संघ के अंदरुनी मामलों की जानकारी प्राप्त नहीं कर पा रहा है। राष्ट्रीय अभिलेखागार में सुरक्षित ब्रिटिश गुप्तचर विभाग की 1942-43 की रिपोर्ट बताती है कि संघ के इतिहास में पहली बार नागपुर के ग्रीष्म शिविर में एक विशेष सेंसरशिप विभाग की स्थापना की गई।

● बाहर जाने वाली डाक की पूरी तरह जांच-पड़ताल की गयी। मुंबई के संघ कार्यालय में प्रवेश पत्र प्रणाली का गठन किया गया है।

● मेरठ में मई माह में हुए संघ शिक्षा वर्ग में भाषणों के समय दरवाजे बंद कर दिये जाते थे। केवल विशेष पास वालों को ही भीतर प्रवेश दिया जाता था।

● बनारस के अधिकारी शिक्षा शिविर में भी यही सब सावधानियां बरती गईं। यहां शिक्षार्थियों को भाषणों एवं चर्चा के लिखित नोट्स न लेने का आदेश दिया गया।
4 अगस्त को रावलपिंडी में लाल कुंदन लाला कक्कड़ ने स्वयंसेवक भर्ती में चौकस रहने का आग्रह किया, ताकि संघ में अंग्रेजी पुलिस के जासूसों को घुसने का मौका न मिलने पाये।

● 6 सितंबर को अकोला में विदर्भ के प्रमुख कार्यकर्ताओं की एक बैठक दशहरा कार्यक्रम की योजना बनाने के लिए बुलायी गयी। उस बैठक में उपस्थित लोगों के नामों एवं उसकी कार्यवाही को गुप्त रखने के लिए विशेष व्यवस्था की गई।

● अक्टूबर मास में गोरखपुर के डी.ए.वी. स्कूल में लगे एक शिविर में एक सादी वर्दीधारी पुलिस अधिकारी को भीतर जाने से रोक दिया गया।

संघ संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जन्मजात देशभक्त और प्रथम श्रेणी के क्रांतिकारी थे. वे युगांतर और अनुशीलन समिति जैसे प्रमुख विप्लवी संगठनों में डॉ. पाण्डुरंग खानखोजे, अरविन्द जी, वारीन्द्र घोष, त्रैलौक्यनाथ चक्रवर्ती आदि के सहयोगी रहे. रासबिहारी बोस और शचीन्द्र सान्याल द्वारा प्रथम विश्वयुद्ध के समय 1915 में सम्पूर्ण भारत की सैनिक छावनियों में क्रान्ति की योजना में वे मध्यभारत के प्रमुख थे. उस समय स्वतंत्रता आंदोलन का मंच कांग्रेस थी. उसमें भी प्रमुख भूमिका निभाई. 1921 और 1930 के सत्याग्रहों में भाग लेकर कारावास का दण्ड पाया।

1925 में विजयादशमी पर संघ स्थापना करते समय डॉ. हेडगेवार जी का उद्देश्य राष्ट्रीय स्वाधीनता ही था. संघ के स्वयंसेवकों को जो प्रतिज्ञा दिलाई जाती थी, उसमें राष्ट्र की स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए तन-मन-धन और प्रामाणिकता से प्रयत्नपूर्वक आजन्मरत रहने का संकल्प होता था. संघ स्थापना के तुरन्त बाद से ही स्वयंसेवक स्वतंत्रता संग्राम में अपनी भूमिका निभाने लगे थे।

ब्रिटिश गुप्तचर विभाग की 1942-43 की रिपोर्ट के बाद गृह विभाग के एक अधिकारी ई.जे. बेवरिच ने संघ के उद्देश्य पर प्रकाश डालने वाली यह टिप्पणी जोड़ी कि अक्टूबर, 1942 में गृह विभाग ने ग्वालियर के एक संघ स्वयंसेवक का अपने मित्र को लिखा गया एक पत्र जब्त किया था।

उस पत्र में लिखा था कि कुछ दिन पूर्व लखनऊ से उत्तर प्रदेश के संघ प्रचारक (संभवत: भाऊराव देवरस) ने हमें बताया कि अपनी मृत्यु के पूर्व हमारे स्वर्गीय नेता डॉ. हेडगेवार ने संघ के सब कार्यकर्ताओं को शहरों में 3 प्रतिशत और गांवों में एक प्रतिशत भली प्रकार शिक्षित स्वयंसेवक तैयार करने को कहा था। वे कहा करते थे कि ”1942 में भारत में विशाल क्रांति होगी। हमें उसके लिये तैयार रहना चाहिए। तब ही हम स्वराज्य पाने की दिशा में निर्णायक कदम उठा सकेंगे।”

सत्याग्रह आंदोलन

6 अप्रैल, 1930 को दांडी में समुद्र तट पर गांधी जी ने नमक कानून तोड़ा और लगभग 8 वर्ष बाद कांग्रेस ने दूसरा जनान्दोलन प्रारम्भ किया. संघ का कार्य अभी मध्यभारत प्रान्त में ही प्रभावी हो पाया था. यहां नमक कानून के स्थान पर जंगल कानून तोड़कर सत्याग्रह करने का निश्चय हुआ. डॉ. हेडगेवार जी संघ के सरसंघचालक का दायित्व डॉ. परांजपे को सौंप स्वयं अनेक स्वयंसेवकों के साथ सत्याग्रह करने गए।

जुलाई 1930 में सत्याग्रह हेतु यवतमाल जाते समय पुसद नामक स्थान पर आयोजित जनसभा में डॉ. हेडगेवार जी के सम्बोधन में स्वतंत्रता संग्राम में संघ का दृष्टिकोण स्पष्ट होता है. उन्होंने कहा था – स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए अंग्रेजों के बूट की पॉलिश करने से लेकर उनके बूट को पैर से निकालकर उससे उनके ही सिर को लहुलुहान करने तक के सब मार्ग मेरे स्वतंत्रता प्राप्ति के साधन हो सकते हैं. मैं तो इतना ही जानता हूं कि देश को स्वतंत्र कराना है. डॉ. हेडगेवार जी के साथ गए सत्याग्रही जत्थे में अप्पा जी जोशी (बाद में सरकार्यवाह), दादाराव परमार्थ (बाद में मद्रास में प्रथम प्रांत प्रचारक) आदि 12 स्वयंसेवक शामिल थे।

उनको 9 मास का सश्रम कारावास दिया गया. उसके बाद अ.भा. शारीरिक शिक्षण प्रमुख (सर सेनापति) मार्तण्ड जोग जी, नागपुर के जिला संघचालक अप्पा जी ह्ळदे आदि अनेक कार्यकर्ताओं और शाखाओं के स्वयंसेवकों के जत्थों ने भी सत्याग्रहियों की सुरक्षा के लिए 100 स्वयंसेवकों की टोली बनाई, जिसके सदस्य सत्याग्रह के समय उपस्थित रहते थे।

8 अगस्त को गढ़वाल दिवस पर धारा 144 तोड़कर जुलूस निकालने पर पुलिस की मार से अनेक स्वयंसेवक घायल हुए।

विजयादशमी 1931 को डाक्टर जी जेल में थे, उनकी अनुपस्थिति में गांव-गांव में संघ की शाखाओं पर एक संदेश पढ़ा गया, जिसमें कहा गया था – देश की परतंत्रता नष्ट होकर जब तक सारा समाज बलशाली और आत्मनिर्भर नहीं होता, तब तक रे मना ! तुझे निजी सुख की अभिलाषा का अधिकार नहीं।

1942 का भारत छोड़ो आंदोलन

संघ के स्वयंसेवकों ने स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए भारत छोड़ो आंदोलन में भी सक्रिय भूमिका निभाई. विदर्भ के अष्टीचिमूर क्षेत्र में समानान्तर सरकार स्थापित कर दी. अमानुषिक अत्याचारों का सामना किया. उस क्षेत्र में एक दर्जन से अधिक स्वयंसेवकों ने अपना जीवन बलिदान किया. नागपुर के निकट रामटेक के तत्कालीन नगर कार्यवाह रमाकान्त केशव देशपांडे उपाख्य बाळा साहब देशपाण्डे जी को आन्दोलन में भाग लेने पर मृत्युदण्ड सुनाया गया।

आम माफी के समय मुक्त होकर उन्होंने वनवासी कल्याण आश्रम की स्थापना की. देश के कोने-कोने में स्वयंसेवक जूझ रहे थे. मेरठ जिले में मवाना तहसील पर झण्डा फहराते स्वयंसेवकों पर पुलिस ने गोली चलाई, जिसमें अनेक स्वयंसेवक घायल हुए।

आंदोलनकारियों की सहायता और शरण देने का कार्य भी बहुत महत्व का था. केवल अंग्रेज सरकार के गुप्तचर ही नहीं, कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता भी अपनी पार्टी के आदेशानुसार देशभक्तों को पकड़वा रहे थे।

ऐसे में जयप्रकाश नारायण और अरुणा आसफ अली दिल्ली के संघचालक लाला हंसराजगुप्त के यहां आश्रय प्राप्त करते थे. प्रसिद्ध समाजवादी अच्युत पटवर्धन और साने गुरूजी ने पूना के संघचालक भाऊ साहब देशमुख जी के घर पर केन्द्र बनाया था. पत्री सरकार गठित करने वाले प्रसिद्ध क्रान्तिकारी नाना पाटिल को औंध (जिला सतारा) में संघचालक पं. सातवलेकर जी ने आश्रय दिया.
ब्रिटिश सरकार के गुप्तचर विभाग ने 1943 के अन्त में संघ के विषय में जो रपट प्रस्तुत की, वह राष्ट्रीय अभिलेखागार की फाइलों में सुरक्षित है, जिसमें सिद्ध किया है कि संघ योजना पूर्वक स्वतंत्रता प्राप्ति की ओर बढ़ रहा है।

संघ ने 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में संगठन के रूप में भले ही प्रत्यक्ष भाग नही लिया हो लेकिन स्वयंसेवक की इसमें व्यक्तिगत रूप से सहभागिता थी। संघ हिंदु समाज को।संगठित करने का कार्य कर रहा था। तत्कालीन यदि अंग्रेज हुकमत यदि संघ संगठन पर प्रतिबंध लगा देता तो मुश्लिम लीग समाज पर हावी होने का खतरा था। तत्कालीन सरसंघचालक गोलवलकर गुरुजी ने यह परिस्थितियों को देखकर संघ को संगठन के रूप में भारत छोड़ो आंदोलन से दूर रखा था।

भारत छोड़ो आंदोलन में कांग्रेस ने प्रभावी ढंग से प्रयास नहीं किया।

इसके अलावा भारत छोड़ो आंदोलन में तत्कालीन कोंग्रेस अध्यक्ष मौलाना अब्दुल कलाम आजाद और गाँधीजी के मध्य में मतभेद थे। ओर एक कारण यह था कि कांग्रेस ने देश के अन्य संगठनों को जोड़ने का प्रयास नहीं किया।

इस दृष्टि से हमने गुरुजी गोलवलकर की जीवन चरित्रों एवं संघ के इतिहास की पुस्तकों को टटोलने का प्रयास किया। गुरुजी गोलवलकर के 51वीं जन्मतिथि के अवसर पर 1955 में संघ प्रचारक (स्व.) न. ह. पालकर द्वारा रचित ‘श्री गुरु जी-व्यक्ति और कार्य’ पुस्तक सामने आती है। इस पुस्तक में पालकर 1942 में गुरुजी गोलवलकर के वर्ष प्रतिपदा आहवान के फलस्वरूप प्रचारक योजना के आरंभ होने का उल्लेख करते हैं (पृ. 108)। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के संदर्भ में वे लिखते हैं कि, ‘यह समय ऐसा था जब स्वतंत्रता प्राप्ति के लिये प्रयत्नशील सभी संस्थाओं और संगठनों को एक करके, उन सबके संयुक्त बल पर यदि आंदोलन छेड़ा जाता, तो भी संदेह ही था कि अंग्रेजों को देश से बाहर निकालने में पूर्ण सफलता मिलेगी।

कांग्रेस ने आंदोलन आरंभ करते समय देश की अन्य संस्थाओं का सहयोग लेने का कोई प्रयत्न भी नहीं किया था। ऐसी दशा में यदि अंग्रेजों ने उसे शीघ्र ही कठोरता पूर्वक दबा दिया तथा फलस्वरूप वह अपने पूर्व के आंदोलनों से भी फीका पड़ गया, तो आश्चर्य ही क्या है ? (वही, पृष्ठ 111) संक्षेप में पालकर 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन से संघ के अलग रहने का कारण कांग्रेस के अन्य शक्तियों को जोड़ने की दिशा में प्रयास न करने को मानते है।

इसके बाद हम 1984 में प्रकाशित पुणे के एक महत्वपूर्ण संघ कार्यकर्ता हरि विनायक दात्ये की ‘आरती आलोक की : श्री गुरुजी-एक दर्शन’ पुस्तक पर आते हैं। दात्ये भी पालकर के तर्क को आगे बढ़ाते हुए लिखते हैं, ”संग्राम छेड़ने के पहले गांधी जी व कांग्रेसी नेतागण ज्येष्ठता के नाते यदि देश की सभी शक्तियों एवं महत्वपूर्ण व्यक्तियों को अंग्रेजों के विरोध में संगठित करते और इस प्रकार एक राष्ट्रीय मोर्चा बना लेते तो आंदोलन अधिक प्रभावी होता।…. इस दिशा में किसी प्रयास का आभास तक दृष्टिगोचर नहीं होता। ... यह आंदोलन देश पर असमय एवं अपरिपक्व स्थिति में लाया गया था।” (पृ. 121) वे आगे लिखते हैं, ”सन 1942 के आंदोलन को असफल मानना अनुचित होगा। अर्थात उस आधार पर संघ पर आक्षेप लगाना तो और भी अनुचित होगा। ”(वही, पृष्ठ 122)

इस विषय पर अधिक विस्तृत चर्चा करते हुए संघ के मराठी दैनिक ‘तरुण भारत’ के संपादक एवं संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता (स्व.) च. प. भिशीकर ने ‘नवयुग प्रवर्तक श्री गुरुजी’ (लखनऊ, 1999) में लिखा है, ”कांग्रेस ने गांधीजी के नेतृत्व में आंदोलन की घोषणा तो की थी, किंतु आंदोलन के स्वरूप और कार्यक्रमों की कोई योजना स्पष्ट नहीं की। न ही यह प्रयास किया कि देश भर में बिखरी पड़ी शक्तियों को इस राष्ट्रीय आंदोलन में सहभागी बनाने के लिए एक सूत्र में गूंथा जाए।” (पृ. 57)
विभिन्न स्रोतों से (संकलित)

● डॉ हेडगेवार को अब समझ आ चुका था कि सत्ता के भूखे भेड़िये भारत की जनता की बलि देने से नही चूकेंगे, इसलिए उन्होंने हिन्दुओ की रक्षा और उनको एकजुट करने के उद्देश्य से तत्काल एक नया संगठन बनाने का काम शुरू कर दिया और अंतः 1925 में RSS की स्थापना हुई, आज अगर आप होली और दीवाली मानते हैं, आज अगर आप हिन्दू हैं तो सिर्फ उसी खिलाफत आंदोलन के विरोध और RSS की स्थापना की वजह से वरना जाने कब का गज़वा-ए-हिन्द बन चुका होता।


● तो बताइये RSS और डॉ 
हेडगेवार ने खिलाफत आंदोलन का बहिष्कार कर के सही किया या गलत?


● इस संकलित लेख को पढ़ने के बाद बताइये:


● आप डॉ 
हेडगेवारजी की जगह होते तो क्या करते ?

● क्या आप भारत को गज़वा-ए-हिन्द यानी इस्लामिक देश बनते देखते ?

● या फिर डॉ हेडगेवार जी की तरह इसका विरोध करते ?

इस लेख के विषय मे आप सुज्ञ वाचकों की प्रतिक्रिया अपेक्षित है।

Comments

Im_rtn said…
डॉ हेडगेवार जी ने जो भी किया परिसथितियोंवश सबसे उत्तम था क्यूकी अगर वो चाहते तो औरो की तरह अंग्रेजों के चाटुकारों में शामिल हो सकते थे और अच्छा पद प्राप्त कर सकते थे लेकिन उन्होंने अपनी जिंदगी इस देश की गरिमा और अखंडता बचाने में लगा दी 🙏🙏
ऐसे वीर पुरुष को नमन
Unknown said…
आरएसएस दरअसल अंग्रेजों की मुखबिरी के लिए बनी थी इसीलिए समय समय पर स्वतंत्रता संग्राम को कमजोर करने का काम किया, जैसे1942 के quit movement का विरोध करना, आरएसएस ने कभी भी अंग्रेजी सरकार का विरोध नहीं किया। जय भारत

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