नहेरु बनाम सावरकर
नहेरु बनाम सावरकर
वीर सावरकर को भारत रत्न देने की चर्चा हो रही है। कांग्रेस और वामपंथी इतिहासकार उन्हें अंग्रेजों से माफी मांगने वाला बताते हैं। जानिए क्या है सच, ताकि दुष्प्रचार करने वालों को तथ्यों के साथ जवाब दे सकें।
जब इस देश में नेहरू बनाम सावरकर की बहस छिड़ ही गई है तो यज्ञ की इस वेदी में कुछ आहुति मेरी तरफ से भी ...
आप नेहरू की तुलना सावरकर से करने की सोच भी कैसे सकते हैं ? इस देश में सावरकर के साथ भी वही हुआ जो सुभाष चंद्र बोस के साथ हुआ। आजादी के बाद नेहरू ने इतिहास को वामपंथियों के पैरों से कुचलवाया है। वामपंथियों ने फिर उस कर्जे को चुकाने के लिए NCRT की किताबों से लेकर BA - MA के सिलेबस तक नेहरू को महान दिखाया, नेताजी सुभाषचंद्र बोस जैसे भारत माँ के वीर सपूतों को गायब ही कर दिया और स्वातंत्र्यवीर सावरकर को कायर और देशद्रोही करार दिया।
मगर वक्त से ऊपर कौन है ??? वक्त सबका हिसाब करता चलता है। वक्त ने एक रोज़ हिसाब करना शुरू किया। मामला आज की पीढ़ी तक पहुंचा और हमने नेहरू को इस देश का सबसे कायर और राष्ट्रविरोधी प्रधानमंत्री कहने की हिम्मत जुटाई।
सच मानिए, इतिहास वो नही है जो नेहरू ने हमें पढ़वाया। इतिहास वो है जो नेहरू ने हमसे साजिश कर छिपाया है। हमको कभी ये पूछने नही दिया कि आखिर जब 1946 को हुए कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव में 15 में से 12 राज्य इकाइयों ने सरदार पटेल का समर्थन किया तो फिर नेहरू को पीएम पद का उम्मीदवार कैसे घोषित कर दिया गया ? क्यों गांधी के माध्यम से पटेल से अन्याय कर नहेरु को PM घोषित करवाया गया? अब यह जानकारी सर्वव्यापी है की 15 में 12 राज्य इकाइयां पटेल के साथ थीं और जो तीन राज्य इकाइयां बाकी बचीं थीं उन्होंने भी नेहरू के नाम का समर्थन नही किया था।
क्या गांधी देवता था ??? - पुष्पेन्द्र कुलश्रेष्ठ
अब सावरकर पर ... जो आदमी नासिक जिले के अंग्रेज कलेक्टर जैक्सन की हत्या के लिए काला पानी सेल्युलर जैल भेजा गया हो, उसे नेहरू काल के दरबारियों ने साजिश के तहत कायर साबित करवाया। जिसने हाथों में हथकड़ियां और पैरों में बेड़ियां डालकर कालेपानी में दस साल काट दिए, उसे एक ऐसे माफीनामे के आधार पर गद्दार बताया गया जो 25-25 सालों के दो कारावास की सजा से मुक्ति पाने की एक रणनीति भर थी। गुलामी के उस दौर में सावरकर जैसे देश प्रेमी काले पानी की भयानक काल कोठरियों की सजा काटते थे और नेहरू जैसे अय्यास लेडी माउंटबेटेन के पुजारी 'A' श्रेणी की कैटेगरी में जेल के भीतर सजा के नाम VVIP जैसी 'मौज' उड़ा रहे थे। क्या लोकमान्य तिळक के शिवाय एक भी कोंग्रेसी मांडले या कालापानी की जेल में गया ???
वीर सावरकर कौन थे..? जिन्हें आज कांग्रेसी और वामपंथी कोस रहे हैं और क्यों..??
ये 25 बातें पढ़कर आपका सीना गर्व से चौड़ा हो उठेगा। इसको पढ़े बिना आज़ादी का ज्ञान अधूरा है!
आइए जानते हैं एक ऐसे महान क्रांतिकारी के बारे में जिनका नाम इतिहास के पन्नों से मिटा दिया गया। जिन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के द्वारा इतनी यातनाएं झेलीं की उसके बारे में कल्पना करके ही इस देश के करोड़ों भारत माँ के कायर पुत्रों में सिहरन पैदा हो जायेगी।
जिनका नाम लेने मात्र से आज भी हमारे देश के राजनेता भयभीत होते हैं क्योंकि उन्होंने माँ भारती की निस्वार्थ सेवा की थी। वो थे हमारे परमवीर सावरकर।
- वीर सावरकर पहले क्रांतिकारी देशभक्त थे जिन्होंने 1901 में ब्रिटेन की रानी विक्टोरिया की मृत्यु पर नासिक में शोक सभा का विरोध किया और कहा कि वो हमारे शत्रु देश की रानी थी, हम शोक क्यूँ करें? क्या किसी भारतीय महापुरुष के निधन पर ब्रिटेन में शोक सभा हुई है.?
- वीर सावरकर पहले देशभक्त थे जिन्होंने एडवर्ड सप्तम के राज्याभिषेक समारोह का उत्सव मनाने वालों को त्र्यम्बकेश्वर में बड़े बड़े पोस्टर लगाकर कहा था कि गुलामी का उत्सव मत मनाओ ...!
- विदेशी वस्त्रों की पहली होली पूना में 7 अक्तूबर 1905 को वीर सावरकर ने जलाई थी…!
- वीर सावरकर पहले ऐसे क्रांतिकारी थे जिन्होंने विदेशी वस्त्रों का दहन किया, तब बाल गंगाधर तिलक ने अपने पत्र केसरी में उनको शिवाजी के समान बताकर उनकी प्रशंसा की थी जबकि इस घटना की दक्षिण अफ्रीका के अपने पत्र ‘इन्डियन ओपीनियन’ में गाँधी ने निंदा की थी…!
- सावरकर द्वारा विदेशी वस्त्र दहन की इस प्रथम घटना के 16 वर्ष बाद गाँधी उनके मार्ग पर चले और 11 जुलाई 1921 को मुंबई के परेल में विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार किया…!
- सावरकर पहले भारतीय थे जिनको 1905 में विदेशी वस्त्र दहन के कारण पुणे के फर्म्युसन कॉलेज से निकाल दिया गया और दस रूपये जुरमाना किया… इसके विरोध में हड़ताल हुई… स्वयं तिलक जी ने ‘केसरी’ पत्र में सावरकर के पक्ष में सम्पादकीय लिखा…!
- वीर सावरकर ऐसे पहले बैरिस्टर थे जिन्होंने 1909 में ब्रिटेन में ग्रेज-इन परीक्षा पास करने के बाद ब्रिटेन के राजा के प्रति वफ़ादार होने की शपथ नहीं ली… इस कारण उन्हें बैरिस्टर होने की उपाधि का पत्र कभी नहीं दिया गया…!
- वीर सावरकर पहले ऐसे लेखक थे जिन्होंने अंग्रेजों द्वारा ग़दर कहे जाने वाले संघर्ष को ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ नामक ग्रन्थ लिखकर सिद्ध कर दिया…!
- सावरकर पहले ऐसे क्रांतिकारी लेखक थे जिनके लिखे ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ पुस्तक पर ब्रिटिश संसद ने प्रकाशित होने से पहले प्रतिबन्ध लगाया था…।
- ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ विदेशों में छापा गया और भारत में भगत सिंह ने इसे छपवाया था जिसकी एक एक प्रति तीन-तीन सौ रूपये में बिकी थी…! भारतीय क्रांतिकारियों के लिए यह पवित्र गीता थी… पुलिस छापों में देशभक्तों के घरों में यही पुस्तक मिलती थी…!
- वीर सावरकर पहले क्रान्तिकारी थे जो समुद्री जहाज में बंदी बनाकर ब्रिटेन से भारत लाते समय आठ जुलाई 1910 को समुद्र में कूद पड़े थे और तैरकर फ्रांस पहुँच गए थे…!
- सावरकर पहले क्रान्तिकारी थे जिनका मुकद्दमा अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय हेग में चला, मगर ब्रिटेन और फ्रांस की मिलीभगत के कारण उनको न्याय नहीं मिला और बंदी बनाकर भारत लाया गया…!
- वीर सावरकर विश्व के पहले क्रांतिकारी और भारत के पहले राष्ट्रभक्त थे जिन्हें अंग्रेजी सरकार ने दो आजन्म कारावास की सजा सुनाई थी…!
- सावरकर पहले ऐसे देशभक्त थे जो दो जन्म कारावास की सजा सुनते ही हंसकर बोले - “चलो, ईसाई सत्ता ने हिन्दू धर्म के पुनर्जन्म सिद्धांत को मान लिया”…!
- वीर सावरकर पहले राजनैतिक बंदी थे जिन्होंने काला पानी की सज़ा के समय 10 साल से भी अधिक समय तक आज़ादी के लिए कोल्हू चलाकर 30 पोंड तेल प्रतिदिन निकाला…!
- वीर सावरकर काला पानी में पहले ऐसे कैदी थे जिन्होंने काल कोठरी की दीवारों पर कंकर कोयले से कवितायें लिखीं और 6000 पंक्तियाँ याद रखी..!
- वीर सावरकर पहले देशभक्त लेखक थे, जिनकी लिखी हुई पुस्तकों पर आज़ादी के बाद कई वर्षों तक प्रतिबन्ध लगा रहा…!
- वीर सावरकर पहले विद्वान लेखक थे जिन्होंने हिन्दू को परिभाषित करते हुए लिखा कि :
‘आसिन्धु सिन्धुपर्यन्ता यस्य भारत भूमिका,
पितृभू: पुण्यभूश्चैव स वै हिन्दुरितीस्मृतः।
अर्थात समुद्र से हिमालय तक भारत भूमि जिसकी पितृभूमि है, जिसके पूर्वज यहीं पैदा हुए हैं व यही पुण्य भूमि है, जिसके तीर्थ भारत भूमि में ही हैं, वही हिन्दू है..!- वीर सावरकर प्रथम राष्ट्रभक्त थे जिन्हें अंग्रेजी सत्ता ने 30 वर्षों तक जेलों में रखा तथा आजादी के बाद 1948 में नेहरु सरकार ने गाँधी हत्या की आड़ में लाल किले में बंद रखा पर न्यायालय द्वारा आरोप झूठे पाए जाने के बाद ससम्मान रिहा कर दिया… देशी-विदेशी दोनों सरकारों को उनके राष्ट्रवादी विचारों से डर लगता था…।
- वीर सावरकर पहले क्रांतिकारी थे जब उनका 26 फरवरी 1966 को उनका स्वर्गारोहण हुआ तब भारतीय संसद में कुछ सांसदों ने शोक प्रस्ताव रखा तो यह कहकर रोक दिया गया कि वे संसद सदस्य नही थे जबकि चर्चिल की मौत पर शोक मनाया गया था…।
- वीर सावरकर पहले क्रांतिकारी राष्ट्रभक्त स्वातंत्र्य वीर थे जिनके मरणोपरांत 26 फरवरी 2003 को उसी संसद में मूर्ति लगी जिसमे कभी उनके निधन पर शोक प्रस्ताव भी रोका गया था…।
- वीर सावरकर ऐसे पहले राष्ट्रवादी विचारक थे जिनके चित्र को संसद भवन में लगाने से रोकने के लिए कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गाँधी ने राष्ट्रपति को पत्र लिखा लेकिन राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम ने सुझाव पत्र नकार दिया और वीर सावरकर के चित्र अनावरण राष्ट्रपति ने अपने कर-कमलों से किया…।
- वीर सावरकर पहले ऐसे राष्ट्रभक्त हुए जिनके शिलालेख को अंडमान द्वीप की सेल्युलर जेल के कीर्ति स्तम्भ से UPA सरकार के मंत्री मणिशंकर अय्यर ने हटवा दिया था और उसकी जगह गांधी का शिलालेख लगवा दिया..।
- वीर सावरकर ने दस साल आजादी के लिए काला पानी में कोल्हू चलाया था जबकि गाँधी ने काला पानी की उस जेल में कभी दस मिनट चरखा नही चलाया..?
- वीर सावरकर माँ भारती के पहले सपूत थे जिन्हें जीते जी और मरने के बाद भी आगे बढ़ने से रोका गया… पर आश्चर्य की बात यह है कि इन सभी विरोधियों के घोर अँधेरे को चीरकर आज वीर सावरकर सभी मे लोकप्रिय और युवाओं के आदर्श बन रहे है।।
क्या वीर सावरकर ने वाकई अंग्रेजों से माफी मांगी थी?
अंग्रेजों से माफी का सच
आजादी की लड़ाई से जुड़े दस्तावेजों में यह साफ है कि सावरकर की बढ़ती लोकप्रियता से अंग्रेज परेशान थे। इसी चलते उन्हें काला पानी भेज दिया गया, जहां उन्हें भयानक यातनाएं दी गईं। अंग्रेज और उस वक्त कांग्रेस के तमाम बड़े नेता भी यही चाहते थे कि वीर सावरकर की मृत्यु उधर ही हो जाए। भयानक शारीरिक, मानसिक यातनाओं और जानवरों की तरह बेड़ी में जकड़कर रखे जाने के कारण वीर सावरकर को कई बीमारियों ने जकड़ना शुरू कर दिया था। इसी दौरान काला पानी जेल के डॉक्टर ने 1913 में ब्रिटिश हुकूमत को रिपोर्ट भेजी कि वीर सावरकर की सेहत बहुत खराब है और वो थोड़े दिन के ही मेहमान हैं। इस रिपोर्ट पर जनता में भारी गुस्सा भड़क उठा। दबाव में आकर गवर्नर जनरल ने रेजिनॉल्ड क्रेडॉक को अपना प्रतिनिधि बनाकर पोर्ट ब्लेयर भेजा। उन्हें डर था कि अगर वीर सावरकर को कुछ हुआ तो इससे अंग्रेजी राज की बदनामी होगी और आजादी की लड़ाई इतनी तेज हो जाएगी कि उसे काबू करना आसान नहीं होगा। वीर सावरकर भी इस तरह से जेल में तिल-तिलकर मरने के बजाय आजादी की लड़ाई को आगे बढ़ाना चाहते थे। लिहाजा अंग्रेजों और वीर सावरकर के बीच एक बीच का फॉर्मूला निकला। इसके तहत एक करार पत्र तैयार किया गया। इसमें लिखा गया था कि:
“मैं (….कैदी का नाम…) आगे चलकर पुनः (….) अवधि न तो राजनीति में भाग लूंगा न ही राज्यक्रांति में। यदि पुनः मुझ पर राजद्रोह का आरोप साबित हुआ तो आजीवन कारावास भुगतने को तैयार हूँ।”
ऐसे ही करारनामे पर दस्तखत करवाकर वीर सावरकर ने उस वक्त अपने जैसे कई और कैदियों को काले पानी से आजादी दिलवाई थी। उनके नाम और दस्तावेज भी अंडमान की सेलुलर जेल में उपलब्ध हैं। अंग्रेजों के चंगुल से निकलने के लिए, ऐसा ही एक माफीनामा फैजाबाद की जेल में बंद शहीद अशफाकउल्ला खां ने भी लिखा था। वो काकोरी ट्रेन लूट कांड के आरोपी थे। अशफाकउल्ला से अंग्रेज इतना डरे हुए थे कि उन्हें फाँसी दे दी। तो क्या अशफाक को भी अंग्रेजों का वफादार, देश का गद्दार मान लिया जाए? कांग्रेसी और वामपंथी इसी दस्तावेज को माफीनामा कहते हैं, जबकि ये माफीनामा नहीं, बल्कि एक तरह का सुलहनामा था। छत्रपति शिवाजी को अपना आदर्श मानने वाले वीर सावरकर के लिए ये सुलहनामा उन्हीं के आदर्शों के मुताबिक था।
अंग्रेजों को सावरकर पर भरोसा नहीं था
इस सुलहनामे के बावजूद अंग्रेजों को वीर सावरकर पर रत्ती भर भरोसा नहीं था। उनकी रिहाई आने वाली मुसीबत से बचने के लिए जरूरी थी। लेकिन अंग्रेज मानकर चल रहे थे कि वो फिर से लड़ाई तेज़ करेंगे। गवर्नर के प्रतिनिधि रेजिनॉल्ड क्रेडोक ने सावरकर के सुलहनामे पर अपनी गोपनीय टिप्पणी में लिखा है कि- “इस शख्स को अपने किए पर जरा भी पछतावा या खेद नहीं है और वह अपने ह्रदय-परिवर्तन का ढोंग कर रहा है। सावरकर सबसे खतरनाक कैदी है। भारत और यूरोप के क्रांतिकारी उसके नाम की कसमें खाते हैं और अगर उसे भारत भेज दिया गया तो वो पक्के तौर पर भारतीय जेल तोड़कर उसे छुड़ा ले जाऍंगे।” इस रिपोर्ट के बाद कुछ अन्य कैदियों को तो रिहा किया गया मगर डर के मारे अंग्रेजों ने वीर सावरकर को जेल में ही रखा। इस दौरान उनका इलाज शुरू हो गया था। करीब 11 साल काला पानी जेल में बिताने के बाद 1921 में वीर सावरकर रिहा हुए। ये वो वक्त था जब आजादी की लड़ाई को नेहरू और गांधी की चौकड़ी ने पूरी तरह कब्जे में ले लिया था। वीर सावरकर इस दौरान लगातार सक्रिय रहे।
रिहाई के बाद भी सक्रिय रहे
1921 में घर लौटने के बाद उन्हें फिर से 3 साल जेल भेज दिया गया था। जेल में उन्होंने हिंदुत्व पर काफी कुछ लिखा। यहां से छूटने के बाद भी वो हिंदुत्व की विचारधारा को लेकर सक्रिय रहे। 1925 में वो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ हेडगेवार के संपर्क में आए। 1931 में उन्होंने मुंबई (तब बंबई) में पतित पावन मंदिर की स्थापना की, जो हिंदुओं में छुआछूत की बुराई को खत्म करने की नीयत से था। इसके बाद उन्होंने बंहई प्रेसीडेंसी में हुए अस्पृश्यता उन्मूलन सम्मेलन की अध्यक्षता की। उनका कहना था कि भारत की एकता के लिए हिंदुओं की एकता जरूरी है और इसके लिए जाति-पाति और छुआछूत का खात्मा जरूरी है। 1937 में वो अहमदाबाद में हिंदू महासभा के अध्यक्ष चुने गए। 22 जून 1941 को वीर सावरकर और नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मुलाकात बेहद खास मानी जाती है। ये वो वक्त था जब उनके लिखे साहित्य पर प्रतिबंध था। उनके कहीं भी आने-जाने पर अंग्रेजी सरकार का कड़ा पहरा रहता था। वो भारत के बंटवारे के सख्त खिलाफ थे। यही कारण है कि कांग्रेसी सरकार ने उनका नाम महात्मा गांधी की हत्या में भी लपेटने की कोशिश की। उनके कहीं भी आने-जाने और लोगों से मिलने जुलने पर पाबंदियां आजादी के बाद भी बनी रहीं। हालांकि इस दौरान उन्हें पुणे विश्वविद्यालय ने डीलिट की मानद उपाधि दी। 1966 में उनकी तबीयत बिगड़नी शुरू हुई। इसके बाद उन्होंने मृत्युपर्यंत उपवास का निर्णय लिया और अपनी इच्छा से 26 फरवरी 1966 को बंबई में प्राणों का त्याग कर दिया।
सावरकर जेल से बाहर आकर भी देश के लिये सक्रिय रहे ... ये इस देश का दुर्भाग्य है कि सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज के पीछे सावरकर और रासबिहारी बोस का योगदान और प्रेरणा का हिस्सा नेहरूवादी इतिहासकारों ने हाजमोला की गोलियां खाकर पचा लिया। उसे सामने आने ही नही दिया। अच्छा है कि वक्त अब न्याय कर रहा है। अच्छा है कि अब हम सच को सच कहने की हिम्मत जुटा रहे हैं।
एक वाक्य में इस सच को बयां करूं तो सावरकर देशभक्ति का शिखर थे और नेहरू इतिहास की ट्रक के पहियों के बोझ से बना हुआ कायरता का गड्ढा। कांग्रेसी चाटुकारिता की कोई भी क्रेन, कितनी भी कोशिश कर ले पर इस गड्ढे को शिखर के बराबर नही ला सकती !
वन्दे मातरम्॥



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