अतुल्य भारत

अतुल्य भारत INCREDIBLE INDIA का ब्रांड एंबेसडर ताजमहल की हमारे भारतीय वास्तुकला के सामने क्या औकात है ???

(सचित्र  लेख)
अखंड भारत की वैश्विक Iconic पहचान एक भारत श्रेष्ठ भारत के स्वप्नद्रष्टा एवं शिल्पी लौहपुरूष भारतरत्न सरदार Statue of Unity बनना चाहिए यही इस महामना को सबसे बड़ी श्रद्धांजलि शाबित होंगी।
 Statue of Unity
Statue of Unity
Statue of Unity
भव्य भारत की ऐसी असंख्य अनुपम अद्वितीय स्थापत्य धरोहरों को नजरअंदाज कर ताजमहल, कुतुबमीनार, हुमायूं मक़बरा और लालकिल्ले जैसे मुग़ल मकबरों को ही विश्वके पर्यटन नक्शे पर प्रमोट करने वाली मुस्लिम परस्त सरकारों की मंशा पर सवाल क्यों न उठे ??? 

एक विवादित ढाँचा क्या टूटा की सारी दुनियां में हाहाकार मचवाने वालों अकेले कश्मीर में 50,000 मंदिरों सहित भारतके लाखों मंदिरों टूटने, लूटने पर चुप्पी क्यों ??? 

खैर ... गयासुद्दीन गाजी और मैमुना बेग़म के वंशजों से और क्या उम्मीदें हो सकती थी !!! उनके लिए भारत का इतिहास मुगलों से शुरू होकर, उन्ही पर समाप्त हो जाता है ... इसीलिए वामपंथी सेकुलर पिल्लों ने कभी आपको ऐसे मंदिरों के विषय मे नहीं बताया ... उनके लिए भारत मे बस एक ही मकबरा है, मुमताज का मकबरा - ताजमहल।

अंधकार में रखकर हमें पढ़ाये गये इतिहास की पोल अब खुल रही है ... काल के गर्त में दबाये गये इतिहास की पर्त दर पर्त खुल रही है ... अभी तो बहोत कुछ अकल्पनीय बातें बहार आना बाकी है ...

सत्यमेव जयते 
अब वक्त बदल रहा है ... सही मायनों में भारत की आझादी की शरुआत अब हो रही है ... इतिहास पर छाए बादल छंट रहे है ... नया सवेरा हो रहा है ... अभी बहोत कुछ करना बाकी है ... केवल सरकारों से अपेक्षा रखना ठीक नही है, हमे सच्चे भारतीय बन कर प्रत्येक क्षेत्र में बदलाव लाना होंगा। 

पर्यटन क्षेत्र में ताजमहल जैसे मुगलकालीन मकबरों को और अधिक महत्व दिये बिना सर्वव्यापी, सर्वस्पर्शी हमारी भव्यदिव्य सांस्कृतिक धरोहरों को अपने पर्यटन लक्ष्य बनाकर विश्व के पर्यटन मानचित्र पर पुनः प्रस्थापित करने में हमारा योगदान प्रदान करना होंगा।

मोदीजी के नेतृत्वमें नये भारत का सच्चा इतिहास लिखा जा रहा है इसमें हमारा भी यत्किंचित योगदान अपेक्षित है। 

अतुल्य भारत का ब्राण्ड अम्बेसेडर अब ताजमहल किसी भी हालात में स्विकार नही है ...

चेन्नाकेशव मंदिर, बेलूर, कर्णाटक
होयसला वंशीय नरेश विष्णुवर्धन का १११७ ई. में बनवाया हुआ चेन्नाकेशव का प्रसिद्ध मन्दिर बेलूर की ख्याति का कारण है। इस मन्दिर को, जो स्थापत्य एवं मूर्तिकला की दृष्टि से भारत के सर्वोत्तम मन्दिरों में है,मुसलमानों ने कई बार लूटा किन्तु हिन्दू नरेशों ने बार-बार इसका जीर्णोद्वार करवाया।

मन्दिर १७८ फुट लम्बा और १५६ फुट चौड़ा है। परकोटे में तीन प्रवेशद्वार हैं,जिनमें सुंदर मूर्तिकारी है। इसमें अनेक प्रकार की मूर्तियाँ जैसे हाथी, पौराणिक जीवजन्तु, मालाएँ, स्त्रियाँ आदि उत्कीर्ण हैं।

मन्दिर का पूर्वी प्रवेशद्वार सर्वश्रेष्ठ है।यहाँ पर रामायण तथा महाभारत के अनेक दृश्य अंकित हैं। मन्दिर में चालीस वातायन हैं।जिनमें से कुछ के पर्दे जालीदार हैं और कुछ में रेखागणित की आकृतियाँ बनी हैं। अनेक खिड़कियों में पुराणों तथा विष्णुवर्धन की राजसभा के दृश्य हैं। मन्दिर की संरचना दक्षिण भारत के अनेक मन्दिरों की भाँति ताराकार है। इसके स्तम्भों के शीर्षाधार नारी मूर्तियों के रूप में निर्मित हैं, और अपनी सुन्दर रचना, सूक्ष्म तक्षण और अलंकरण में भारत भर में बेजोड़ कहे जाते हैं।ये नारी मूर्तियाँ मदनकई (मदनिका) नाम से प्रसिद्ध है।

गिनती में ये ३८ हैं,३४ बाहर और शेष अन्दर। ये लगभग २ फुट ऊँची हैं और इन पर उत्कृष्ट प्रकार की श्वेत पालिश है, जिसके कारण ये मोम की बनी हुई जान पड़ती है। मूर्तियाँ परिधान रहित हैं, केवल उनका सूक्ष्म अलंकरण ही उनका आच्छादान है। यह विन्यास रचना शरीर सौष्ठव तथा नारी के भौतिक तथा आंतरिक सौन्दर्य की अभिव्यक्ति के लिए किया गया है।

मूर्तियों की भिन्न-भिन्न भाव-भंगिमाओं के अंकन के लिए उन्हें कई प्रकार की क्रियाओं में संलग्न दिखाया गया है। एक स्त्री अपनी हथेली पर अवस्थित शुक को बोलना सिखा रही है। दूसरी धनुष संधान करती हुई प्रदर्शित है। तीसरी बाँसुरी बजा रही है, चौथी केश-प्रसाधन में व्यस्त है, पाँचवी सद्यः स्नाता नायिका अपने बालों को सुखा रही है, छठी अपने पति को तांबूल प्रदान कर रही है और सातवीं नृत्य की विशिष्ट मुद्रा में है।

इन कृतियों के अतिरिक्त बानर से अपने वस्त्रों को बचाती हुई युवती, वाद्ययंत्र बजाती हुई मदविह्वला नवयौवना तथा पट्टी पर प्रणय सन्देश लिखती हुई विरहिणी, ये सभी मूर्तिचित्र बहुत ही स्वाभाविक तथा भावपूर्ण हैं। एक अन्य मनोरंजक दृश्य एक सुन्दरी बाला का है, जो अपने परिधान में छिपे हुए बिच्छू को हटाने के लिए बड़े संभ्रम में अपने कपड़े झटक रही है। उसकी भयभीत मुद्रा का अंकन मूर्तिकार ने बड़े ही कौशल से किया है। उसकी दाहिनी भौंह बड़े बाँके रूप में ऊपर की ओर उठ गई है और डर से उसके समस्त शरीर में तनाव का बोध होता है। तीव्र श्वांस के कारण उसके उदर में बल पड़ गए हैं, जिसके परिणामस्वरूप कटि और नितम्बों की विषम रेखाएँ अधिक प्रवृद्ध रूप में प्रदर्शित की गई हैं।

कला की चरमावस्था ... मन्दिर के भीतर की शीर्षाधार मूर्तियों में देवी सरस्वती का उत्कृष्ट मूर्तिचित्र देखते ही बनता है। देवी नृत्यमुद्रा में है जो विद्या की अधिष्ठात्री के लिए सर्वथा नई बात है।इस मूर्ति की विशिष्ट कलाकी अभिव्यजंना इसकी गुरुत्वाकर्षण रेखा की अनोखी रचना में है। यदि मूर्ति के सिर पर पानी डाला जाए तो वह नासिका से नीचे होकर वाम पार्श्व से होता हुआ खुली वाम हथेली में आकर गिरता है।और वहाँ से दाहिने पाँव मे नृत्य मुद्रा में स्थित तलवे (जो गुरुत्वाकर्षण रेखा का आधार है) में होता हुआ बाएँ पाँव पर गिर जाता है। वास्तव में होयसला वास्तु विशारदों ने इन कलाकृतियों के निर्माण में मूर्तिकारी की कला को चरमावस्था पर पहुँचा कर उन्हें संसार की सर्वश्रेष्ठ शिल्पकृतियों में उच्चस्थान का अधिकारी बना दिया है।

जय हो सनातन, जय जय हो भव्य भारतभूमि 🙏 🚩
चेन्नाकेशव मंदिर, बेलूर, कर्णाटक
चेन्नाकेशव मंदिर, बेलूर, कर्णाटक


चेन्नाकेशव मंदिर, बेलूर, कर्णाटक

चेन्नाकेशव मंदिर, बेलूर, कर्णाटक

चेन्नाकेशव मंदिर, बेलूर, कर्णाटक

चेन्नाकेशव मंदिर, बेलूर, कर्णाटक
चेन्नाकेशव मंदिर, बेलूर, कर्णाटक
चेन्नाकेशव मंदिर, बेलूर, कर्णाटक
चेन्नाकेशव मंदिर, बेलूर, कर्णाटक
चेन्नाकेशव मंदिर, बेलूर, कर्णाटक
चेन्नाकेशव मंदिर, बेलूर, कर्णाटक
 चेन्नाकेशव मंदिर, बेलूर, कर्णाटक
चेन्नाकेशव मंदिर, बेलूर, कर्णाटक

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मल्लेश्वरम मंदिर, बंगलूरू

मल्लेश्वरम मंदिर, बंगलूरू
मल्लेश्वरम का यह रहस्यमयी मंदिर 3 साल पहले खोजे जाने तक 3000 से अधिक वर्षों तक जमीन के नीचे रहा था। यद्यपि यह 7,000 वर्षों तक खड़ा होने के लिए कहा गया है, मंदिर केवल हाल ही में 3 साल पहले बैंगलोर शहर में खोजा गया था। हालांकि मंदिर को वर्षों से दफन किया गया था, लेकिन मंदिर में अभी भी एक सुखद खिंचाव है जो अधिक से अधिक अनुयायियों को आकर्षित कर रहा है।

स्थानीय पुजारी कहते हैं, “तीन साल पहले, एक राजनेता ने इस भूखंड को बेचने की कोशिश की थी। लेकिन लोगों ने इस आधार पर आपत्ति जताई कि सबसे पहले यह देखने के लिए जमीन खोदी जानी चाहिए कि क्या उन्हें कुछ मिल सकता है। ”हैरानी की बात यह है कि उन्होंने पाया कि मंदिर पूरी तरह से समतल भूमि के नीचे दबे हुए हैं। अधिक आश्चर्यजनक रूप से, मंदिर मिट्टी की मोटी परतों द्वारा संरक्षित था और अभी भी सही स्थिति में था।

प्राचीन पत्थर के स्तंभों द्वारा समर्थित एक पत्थर के कट आंगन ने मंदिर को घेर लिया था और इसे संरक्षित रखा था। आँगन के दूर छोर पर सुनहरी आँखों के साथ नंदी की एक काले पत्थर की नक्काशी है और उसके मुँह से निचले स्तर पर शिवलिंग की ओर पानी की एक स्पष्ट धारा बहती है। 15 फीट गहरे भँवर के साथ, केंद्र में पूल के लिए जाने वाले कदमों को भी देख सकता था।

हालांकि ऐसा लगता है कि चीजें थोड़ी बदल गई हैं, और कोई भी यह इंगित नहीं कर सकता है कि उस पानी की उत्पत्ति कहां है और पानी नंदी के मुंह से शिवलिंग तक कैसे जाता है। जोड़ने के लिए, कोई भी नहीं जानता कि भँवर कैसे अस्तित्व में आया। सब कुछ अभी भी एक रहस्य है।
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गंगाईकोंडा चोलापुरम बृहदेश्वर मंदिर, अरियालुर, तमिलनाडु
गंगाईकोंडा चोलापुरम बृहदेश्वर मंदिर, अरियालुर, तमिलनाडु
 गंगाईकोंडा चोलापुरम बृहदेश्वर मंदिर, अरियालुर, तमिलनाडु
 गंगाईकोंडा चोलापुरम बृहदेश्वर मंदिर, अरियालुर, तमिलनाडु
गंगाईकोंडा चोलापुरम बृहदेश्वर मंदिर, अरियालुर, तमिलनाडु
बृहदेश्वर मंदिर,
अरियालुर क्षेत्र में राजेंद्र-प्रथम के शासनकाल के दौरान निर्मित सबसे बड़े मंदिर, गंगई कोंडचोलापुरम अरियालुर को  गंगईकोंडचोलिसवरार मंदिर के लिए जाना जाता है। A.D. 1023 में गंगा के मैदानों की विजय के बाद राजेन्द्र- प्रथम ने एक महान शहर का निर्माण किया जिसका नाम गंगाईकोंडचोलापौराम और एक शिव मंदिर गंगाईकोंडचोलिसिवर और एक झील चोल गंगम था। यह स्थान, मंदिर और झील (चोल गंगम) तमिलों की वीरता का जीवंत प्रतीक है, जिन्होंने गंगा नदी के तट पर चोल के बाघ के ध्वज को फहराया था। उन्होंने अपनी राजधानी को थंजावुर से इस नए बने शहर में स्थानांतरित कर दिया। A.D.1279 में चोल परिवार के शासन के अंत तक यह शहर 256 वर्षों की अवधि के लिए चोल साम्राज्य की राजधानी था। इस स्थान पर बना विशाल पत्थर का मंदिर मध्य चोल काल की सुंदर मूर्तियों का समृद्ध भंडार है। यह शहर ओट्टाकुटार के मुवर औला और जयकोंडार के कलिंगट्टुपरानी के साहित्य में मनाया जाता है।

राजेंद्र का गांगेय अभियान उनके 11 वें रीगल वर्ष (A.D.1023) से समाप्त हो गया था। सबसे शुरुआती संदर्भ में गंगईकोंडचोलापुरम शहर का उल्लेख है, जो उसके ए डी 1027 का रिकॉर्ड है। इसलिए यह स्पष्ट है कि शहर ए डी 1023 और 1027 के बीच उनकी महान जीत की याद में बनाया गया था। राजेंद्र के ए डी 1036 के हाल ही में खोजे गए एसमल कॉपर प्लेटें मैं इस बात का ठोस सबूत है कि उन्होंने गंगाईकोंडाचैतरार मंदिर का निर्माण किया था।

गंगईकोंडचोलापुरम में वीरजेंद्र के ए डी 1068 का एक और रिकॉर्ड जो मंदिर में 24 वें वर्ष (ए डी 1036) में राजेन्द्र- I द्वारा गंगाईकोंडचोलिसवरार मंदिर को अनुदान देने के बारे में उल्लेख किया गया है। इन साक्ष्यों से पता चलता है कि शिव मंदिर A.D. 1023 और 1036 के बीच बनाया गया था, हालांकि इस बड़े मंदिर का सबसे पुराना रिकॉर्ड वीरजेंद्र के A. D. 1068 का है।

यह मंदिर राजेंद्र- I के काल से पत्थर में चोलों का जीवंत इतिहास और चोल कला और वास्तुकला की एक सुंदर गैलरी है। आंध्र, कर्नाटक और बंगाल से युद्ध की ट्राफियों के रूप में लाई गई कई मूर्तियां मंदिर और आस-पास के गांवों में भी संरक्षित हैं। चंदेसुर अनुग्रह मूर्ति और सरस्वती मंदिर की सबसे सुंदर मूर्तियां हैं।

वर्तमान में यह ASI और HR & CE के नियंत्रण में है। और हाल ही में UNESCO ने मंदिर को विश्व धरोहर स्मारक के रूप में घोषित किया है।
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बोसवारा मंदिर बुचेश्वरा
बोसवारा मंदिर बुचेश्वरा या बुचेश्वरा भी लिखा जाता है) होयसाल वास्तुकला की 12 वीं शताब्दी का एक सरल लेकिन सुंदर नमूना है। यह हसन शहर या कर्नाटक राज्य, भारत में हसन शहर से 10 किमी दूर, कोरवंगला गाँव में स्थित है। मंदिर 1173 में बनाया गया था। बुसी (या बुचिराजा) नामक एक अमीर अधिकारी ने होयसला राजा वीरा बल्लाला द्वितीय के राज्याभिषेक का जश्न मनाने के लिए बनाया गया है। पास ही दो और मंदिर हैं जो खंडहर में हैं। परिसर के शिलालेखों से, यह स्पष्ट है कि इन दो मंदिरों को बुसी के बड़े भाइयों, गोविंदा और नाका द्वारा बनाया गया था। यह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा राष्ट्रीय महत्व के स्मारक के रूप में संरक्षित है। 
बुचेश्वरा वास्तुकला का एक सुंदर नमूना है। यह हसन शहर या भारत के कर्नाटक राज्य में हसन शहर से 10 किमी दूर, कोरवंगला गाँव में स्थित है।
 बुचेश्वरा मंदिर, हासन, कर्णाटक
 बुचेश्वरा मंदिर, हासन, कर्णाटक
 बुचेश्वरा मंदिर, हासन, कर्णाटक
 बुचेश्वरा मंदिर, हासन, कर्णाटक
 बुचेश्वरा मंदिर, हासन, कर्णाटक
 बुचेश्वरा मंदिर, हासन, कर्णाटक
बुचेश्वरा मंदिर, हासन, कर्णाटक
बुचेश्वरा वास्तुकला का एक सुंदर नमूना है। यह हसन शहर या भारत के कर्नाटक राज्य में हसन शहर से 10 किमी दूर, कोरवंगला गाँव में स्थित है।

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कोपेश्वर मंदिर खिद्रापुर – एक अद्भुत वास्तुकला
महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले में शिरोला तालुका के खिद्रपुर गाँव का कोपेश्वर मंदिर चालुक्य देवालय वास्तुकला की उत्कृष्ट कृति है। एक प्राचीन शिलाहर मूर्तिकला पत्थर का मंदिर है, कोपेश्वर मंदिर,  तंजावुर के चोला मंदिरों अथवा खजुराहो के चंदेल मंदिरों की भान्ति प्रसिद्ध नहीं हो पाया है। मराठी फिल्म " कट्यार काळजात घुसली " में 'शिव भोला भंडारी' गीत के फिल्मांकन के कारण, पर्यटक इस मंदिर की ओर आकर्षित होने लगे हैं, जिसे कभी अनदेखा किया गया था। कदाचित इस क्षेत्र में इस वास्तुकला का एक ही मंदिर होना इसका मुख्य कारण हो सकता है। अथवा इसके प्रसिद्धी प्राप्त करने का निर्धारित समय कदाचित अब आया हो।

कोपेश्वर मंदिर का इतिहास

इस मंदिर की निर्माण तिथि के विषय में विभिन्न मत हैं। कुछ स्त्रोतों के अनुसार इसकी स्थापना ७वी. सदी में कदाचित बदामी चालुक्य राजाओं ने की थी। कुछ अन्य स्त्रोतों के अनुसार, इसका निर्माण कल्याणी चालुक्य के राज में ९वी सदी में किया गया था। एक अन्य स्त्रोत इसे १२वी. सदी में शैलहार राजाओं द्वारा निर्मित दर्शाता है जो एक समय चालुक्य राजाओं के सूबेदार थे। इसके निर्माण में देवगिरि के यादवों का भी योगदान रहा है। यहाँ की वास्तुकला दक्षिणी बेलूर, हलेबिड के समान है।
कोपेश्वर मंदिर खिद्रापुर – एक अद्भुत वास्तुकला
कोपेश्वर मंदिर खिद्रापुर – एक अद्भुत वास्तुकला
कोपेश्वर मंदिर खिद्रापुर – एक अद्भुत वास्तुकला
कोपेश्वर मंदिर खिद्रापुर – एक अद्भुत वास्तुकला
कोपेश्वर मंदिर खिद्रापुर – एक अद्भुत वास्तुकला
कोपेश्वर मंदिर खिद्रापुर – एक अद्भुत वास्तुकला
कोपेश्वर मंदिर खिद्रापुर – एक अद्भुत वास्तुकला
कोपेश्वर मंदिर खिद्रापुर – एक अद्भुत वास्तुकला
कोपेश्वर मंदिर खिद्रापुर – एक अद्भुत वास्तुकला
कोपेश्वर मंदिर खिद्रापुर – एक अद्भुत वास्तुकला
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भोगा नन्देशेश्वर मंदिर
भोगा नन्देशेश्वर मंदिर (कन्नड़: ಭೋಗ ನಂದೀಶ್ವರ ದೇವಾಲಯ)  "भोग नंदीश्वर" या "भोग नंदीश्वर" भी कहा जाता है। नंदी गाँव में स्थित एक हिंदू मंदिर है, जो कर्नाटक राज्य के चिक्कबल्लापुर जिले में नंदी हिल्स (या नंदीदुर्ग) के आधार पर स्थित है। यह हिंदू भगवान शिव को समर्पित है। परिसर में मूल मंदिर, कर्नाटक के सबसे पुराने मंदिरों में से एक के रूप में पहचाना जाता है, जो 9 वीं शताब्दी की शुरुआत में है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अनुसार, शिव के लिए मंदिर के निर्माण का जिक्र करते हुए सबसे प्राचीन शिलालेख, नोलम्बा राजवंश के शासक नोलंबादिराज और राष्ट्रकूट सम्राट गोविंदा तृतीय ने 806 ई स, और बाण शासकों जयतेज और ताम्रपत्रों के ताम्रपत्रों के हैं। 810 ई स बाद में मंदिर लगातार दक्षिण भारतीय राजवंशों के संरक्षण में था: गंगा राजवंश, चोल वंश, होयसला साम्राज्य और विजयनगर साम्राज्य। मध्ययुगीन युग के बाद, चिकबल्लापुरा के स्थानीय प्रमुखों और मैसूर साम्राज्य (हैदर अली और टीपू सुल्तान) के शासकों ने इस क्षेत्र को नियंत्रित किया इससे पहले कि यह 1799 ई स में टीपू सुल्तान की मृत्यु के बाद ब्रिटिश शासन के अधीन आ गया। स्थापत्य शैली द्रविड़ियन है। मंदिर बैंगलोर से 60 किमी की दूरी पर स्थित है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा मंदिर को राष्ट्रीय महत्व के स्मारक के रूप में संरक्षित किया गया है।
 भोगा नन्देशेश्वर मंदिर
 भोगा नन्देशेश्वर मंदिर
 भोगा नन्देशेश्वर मंदिर
 भोगा नन्देशेश्वर मंदिर
 
भोगा नन्देशेश्वर मंदिर
 भोगा नन्देशेश्वर मंदिर
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बटेश्वर मंदिर, मुरैना ग्वालियर मध्य प्रदेश
बटेश्वर हिन्दू मंदिर,  मध्य प्रदेश  के मुरैना  जिले में गुर्जर  राजाओं के द्वारा निर्मित लगभग २०० बलुआ पत्थर से बने हिंदू मंदिर है, ये मंदिर समूह उत्तर भारतीय मंदिर वास्तुकला की शुरुआती गुर्जर-प्रतिहार  शैली के मंदिर समूह हैं। यह ग्वालियर के उत्तर में लगभग ३५ किलोमीटर (२२ मील) और मुरैना शहर से लगभग ३० किलोमीटर है। मंदिरों में ज्यादातर छोटे हैं और लगभग 25 एकड़ (10 हेक्टेयर) में फैले हुए हैं। वे शिव, विष्णु और शक्ति को समर्पित हैं - हिंदू धर्म के भीतर तीन प्रमुख परंपराओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह स्थल चंबल नदी घाटी के किले के भीतर है, इसकी प्रमुख मध्ययुगीन युग विष्णु मंदिर के लिए जाना जाता पदावली के निकट एक पहाड़ी के उत्तर-पश्चिमी ढलान पर है। बटेश्वर मंदिर ८ वीं और १० वीं शताब्दी के बीच बनाए गए थे। जिन मंदिरों के रूप में वे अब दिख रहे हैं, वे कई मामलों में २००५ में भारत के पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा शुरू की गई एक परियोजना में, खंडहर के पत्थरों से पुनर्निर्मित हुए हैं।

मध्य प्रदेश के पुरातत्व निदेशालय के मुताबिक,  गुर्जर-प्रतिहार  राजवंश के शासनकाल में २०० मंदिरों का यह समूह बनाया गया था। माइकल मीस्टर, एक कला इतिहासकार और भारतीय मंदिर वास्तुकला में विशेषज्ञता वाले एक प्रोफेसर के अनुसार, ग्वालियर के पास बत्सारर्व समूह के प्रारंभिक मंदिर ७५०-८०० ईसवी के होने की संभावना है। 
१३ वीं शताब्दी के बाद ये मंदिर नष्ट हो गए; यह स्पष्ट नहीं है कि यह भूकंप या मुस्लिम बलों द्वारा किया गया था। १८८२ में अलेक्जेंडर कनिंघम द्वारा साइट का दौरा किया गया और इसके खंडहरों का उल्लेख "परवली (पड़ावली ) के दक्षिण-पूर्व में बड़े और छोटे से १०० मंदिरों के संग्रह" के रूप में "एक बहुत ही पुराना मंदिर" के साथ उत्तरार्द्ध था। बट्टेश्वर को १९२० में एक संरक्षित स्थल के रूप में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा नामांकित किया गया था। औपनिवेशिक ब्रिटिश युग के दौरान सीमित वसूली, मानकीकृत मंदिर संख्या, फोटोग्राफी के साथ खंडहर अलगाव, और साइट संरक्षण प्रयास शुरू किया गया था। कई विद्वानों ने साइट का अध्ययन किया और उन्हें अपनी रिपोर्ट में शामिल किया। उदाहरण के लिए, फ्रेंच पुरातत्त्ववेत्ता ओडेट वियॉन ने १९६८ में एक पत्र प्रकाशित किया था जिसमें संख्याबद्ध बतेश्वर मंदिरों की चर्चा और चित्र सम्मिलित थे।

२००५ में, एएसआई ASI Archeological Survey Of India ने सभी खण्डों को इकट्ठा करने के लिए एक महत्वाकांक्षी परियोजना शुरू की, उन्हें पुन: इकट्ठा करने और संभव के रूप में कई मंदिरों को बहाल करना, एएसआई भोपाल क्षेत्र के अधीक्षक पुरातत्वविद् के के मोहम्मद के नेतृत्व में, कुछ ६० मंदिरों को बहाल किया गया था। मुहम्मद ने साइट की आगे की बहाली के लिए अभियान जारी रखा है और इसे "मेरी तीर्थस्थल की जगह कहते हैं। मैं यहां हर तीन महीनों में एक बार आ रहा हूं। मैं इस मंदिर परिसर के बारे में भावुक हूं।"

K K मुहम्मद के मुताबिक, बट्टेश्वर परिसर "संस्कृत हिंदू मंदिर वास्तुकला ग्रंथों, मानसारा शिल्पा शास्त्र, चौथी शताब्दी में बनाये गये वास्तुशिल्प सिद्धांतों और 7 वीं शताब्दी सीई में लिखित मायामत वास्तु शास्त्र " के आधार पर बनाया गया था। उन्होंने इन ग्रंथों का पालन किया क्योंकि 50 से अधिक श्रमिकों की उनकी टीम साइट से खंडहर के टुकड़े एकत्र कर ली और एक पहेली की तरह इसे एक साथ वापस करने की कोशिश की।

बटेश्वर, मुरैना ग्वालियर से ४० किमी दूर स्थित 200 प्राचीन शिव और विष्णु मंदिरों का परिसर है। खजुराहो से २०० साल पहले गुर्जर-प्रतिहार राजवंश के दौरान ९ वें और ११ वीं शताब्दी के बीच इन मंदिरों का निर्माण हुआ था। यह क्षेत्र निर्भय सिंह गुज्जर और गड़रिया डाकुओं के नियंत्रण में था। केके मुहम्मद डकैतों को समझाने में सफल रहे ताकि वे इन मंदिरों को पुनर्स्थापित कर सकें। वह क्षेत्र में अपने कार्यकाल के दौरान ६० मंदिरों को पुनर्स्थापित करने में सक्षम हुए । पुलिस द्वारा डकैतों का सफाया होने के बाद, इस क्षेत्र को खनन माफिया द्वारा घेर लिया गया।
 बटेश्वर मंदिर, मुरैना ग्वालियर मध्य प्रदेश
 बटेश्वर मंदिर, मुरैना ग्वालियर मध्य प्रदेश
 बटेश्वर मंदिर, मुरैना ग्वालियर मध्य प्रदेश
 बटेश्वर मंदिर, मुरैना अवशेष
 बटेश्वर मंदिर, मुरैना ग्वालियर मध्य प्रदेश
 बटेश्वर मंदिर, मुरैना ग्वालियर मध्य प्रदेश
 बटेश्वर मंदिर, मुरैना ग्वालियर मध्य प्रदेश
 बटेश्वर मंदिर, मुरैना ग्वालियर मध्य प्रदेश
 बटेश्वर मंदिर, मुरैना ग्वालियर मध्य प्रदेश
बटेश्वर मंदिर, मुरैना अवशेष

बटेश्वर मंदिर, मुरैना ग्वालियर मध्य प्रदेश
बटेश्वर मंदिर, मुरैना ग्वालियर मध्य प्रदेश
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K.K. Mohammad

Karingamannu Kuzhiyil Muhammed (born 1 July 1952) is an Indian archaeologist. He was the Regional Director (North) of the Archaeological Survey of India (ASI), and also served as the Project Archaeological Director in the Aga Khan Trust for Culture from 2013 to 2016.He was honored with India's civilian honor Padma Shri[1] in 2019 by President Ram Nath Kovind.

"के के मुहम्मद" एक प्रसिद्ध भारतीय पुरातत्वविद् है। वे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के क्षेत्रीय निदेशक (उत्तर) थे, और वर्तमान में आगा खान संस्कृति ट्रस्ट में पुरातात्विक परियोजना निदेशक के रूप में सेवा दे रहे हैं। श्री के के मोहम्मद, अयोध्या राममंदिर में 80 के दशक में पुरातत्व विभाग के सर्वेक्षण टीम में शामिल थे। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में राममंदिर के पक्ष में हिंदू मंदिर के ऊपर मस्जिद बनने की रिपोर्ट में अहम भूमिका निभाई है। ASI की रिपोर्टको अहम प्रमाण मानकर सुप्रीम कोर्ट ने यह राममंदिर के पक्ष में 9/11/2019 को अहम लैंडमार्क फैसला दिया है।
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जम्बुकेश्वरार मंदिर, तिरुवनाईकवल तिरुचिरापल्ली
भारत के तमिलनाडु राज्य में, तिरुचिरापल्ली जिले में एक प्रसिद्ध शिव मंदिर है। मंदिर का निर्माण 1,800 साल पहले के शुरुआती चोलों में से एक कोकेंगनान द्वारा किया गया था। यह श्रीरंगम द्वीप में स्थित है, जिसमें प्रसिद्ध रंगनाथस्वामी मंदिर है। यह पञ्च महाभूत स्थान गिना।जाता है।
 जम्बुकेश्वरार मंदिर, तिरुवनाईकवल तिरुचिरापल्ली
 जम्बुकेश्वरार मंदिर, तिरुवनाईकवल तिरुचिरापल्ली
 जम्बुकेश्वरार मंदिर, तिरुवनाईकवल तिरुचिरापल्ली
 जम्बुकेश्वरार मंदिर, तिरुवनाईकवल तिरुचिरापल्ली
 जम्बुकेश्वरार मंदिर, तिरुवनाईकवल तिरुचिरापल्ली
जम्बुकेश्वरार मंदिर, तिरुवनाईकवल तिरुचिरापल्ली
जम्बुकेश्वरार मंदिर, तिरुवनाईकवल तिरुचिरापल्ली

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महालक्ष्मी स्वर्ण मंदिर, श्रीपुरम, वेल्लूर, तमिलनाडु
महालक्ष्मी स्वर्ण मंदिर, श्रीपुरम, वेल्लूर, तमिलनाडु
 महालक्ष्मी स्वर्ण मंदिर, श्रीपुरम, वेल्लूर, तमिलनाडु
महालक्ष्मी स्वर्ण मंदिर, श्रीपुरम, वेल्लूर, तमिलनाडु
महालक्ष्मी स्वर्ण मंदिर, श्रीपुरम, वेल्लूर, तमिलनाडु
 महालक्ष्मी स्वर्ण मंदिर, श्रीपुरम, वेल्लूर, तमिलनाडु
 महालक्ष्मी स्वर्ण मंदिर, श्रीपुरम, वेल्लूर, तमिलनाडु
 महालक्ष्मी स्वर्ण मंदिर, श्रीपुरम, वेल्लूर, तमिलनाडु
 महालक्ष्मी स्वर्ण मंदिर, श्रीपुरम, वेल्लूर, तमिलनाडु
 महालक्ष्मी स्वर्ण मंदिर, श्रीपुरम, वेल्लूर, तमिलनाडु
  महालक्ष्मी स्वर्ण मंदिर, श्रीपुरम, वेल्लूर, तमिलनाडु
 महालक्ष्मी स्वर्ण मंदिर, श्रीपुरम, वेल्लूर, तमिलनाडु
 महालक्ष्मी स्वर्ण मंदिर, श्रीपुरम, वेल्लूर, तमिलनाडु
 महालक्ष्मी स्वर्ण मंदिर, श्रीपुरम, वेल्लूर, तमिलनाडु
 महालक्ष्मी स्वर्ण मंदिर, श्रीपुरम, वेल्लूर, तमिलनाडु
महालक्ष्मी स्वर्ण मंदिर, श्रीपुरम, वेल्लूर, तमिलनाडु


महालक्ष्मी स्वर्ण मंदिर, श्रीपुरम, वेल्लूर, तमिलनाडु
15 हजार किलो सोने से बना है यह महालक्ष्मी स्वर्ण मंदिर ... स्वर्ण मंदिर, श्रीपुरम।

तमिलनाडु के वेल्लोर नगर के मलाईकोड़ी पहाड़ों पर स्थित महालक्ष्मी मंदिर 15 हजार किलो सोने से बना है।  यह मंदिर 100 एकड़ से ज़्यादा क्षेत्र में फैला है और इस महालक्ष्मी मंदिर में हर एक कलाकृति हाथों से बनाई गई है।  

मन्दिर (अंग्रेज़ी: Golden Temple, Sripuram) तमिल नाडु राज्य के वेल्लोर नगर में स्थित है। यह मंदिर वेल्लोर शहर के दक्षिणी भाग में निर्मित है। इस महालक्ष्मी मंदिर के निर्माण में तकरीबन 15,000 किलोग्राम विशुद्ध सोने का इस्तेमाल हुआ है। स्वर्ण मंदिर श्रीपुरम के निर्माण में 300 करोड़ रुपए से ज्यादा राशि की लागत आई है।

निर्माण
मंदिर के आंतरिक और बाह्य सजावट में सोने का बड़ी मात्रा में इस्तेमाल हुआ है। विश्व में किसी भी मंदिर के निर्माण में इतना सोना नहीं लगा है। रात में जब इस मंदिर में प्रकाश किया जाता है, तब सोने की चमक देखने लायक होती है। यहां पूरे सालभर श्रृद्धालुओं का तांता लगा रहता है। कई दिन तो यहां एक दिन में एक लाख से ज्यादा श्रद्धालु आते हैं। 100 एकड़ से ज्यादा क्षेत्र में फैले इस मंदिर में सर्वत्र हरियाली नजर आती है। मंदिर की संरचना वृताकार है। मंदिर परिसर में देश की सभी प्रमुख नदियों से पानी लाकर सर्व तीर्थम सरोवर का निर्माण कराया गया है।

यह विश्व का एकलौता ऐसा मंदिर है जिसमें इतने सोने का प्रयोग हुआ है। अमृतसर के गोल्डन टेम्पल में भी सिर्फ 750 किलो की सोने की छतरी लगी हुई है। इस मंदिर को भक्तों के लिए 2007 में खोला गया था। रात के समय यहां भक्तों की संख्या ज़्यादा रहती है। रात मे सोने से बने पूरे मंदिर को रोशनी से जगमगाया जाता है, जो अद्भुत ही नज़ारा होता है।
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अक्षरधाम मंदिर, दिल्ली
एक अनोखा सांस्कृतिक तीर्थ
अक्षरधाम मंदिर, दिल्ली
अक्षरधाम मंदिर, दिल्ली
अक्षरधाम मंदिर, दिल्ली
अक्षरधाम मंदिर, दिल्ली
अक्षरधाम मंदिर, दिल्ली
अक्षरधाम मंदिर, दिल्ली
अक्षरधाम मंदिर, दिल्ली
अक्षरधाम मंदिर, दिल्ली
अक्षरधाम मंदिर, दिल्ली
अक्षरधाम मंदिर, दिल्ली
अक्षरधाम मंदिर, दिल्ली
अक्षरधाम मंदिर, दिल्ली
अक्षरधाम मंदिर, दिल्ली
अक्षरधाम मंदिर, दिल्ली
अक्षरधाम मंदिर, दिल्ली
नई दिल्ली में बना स्वामिनारायण अक्षरधाम मन्दिर एक अनोखा सांस्कृतिक तीर्थ है। इसे ज्योतिर्धर भगवान स्वामिनारायण की पुण्य स्मृति में बनवाया गया है। यह परिसर १०० एकड़ भूमि में फैला हुआ है। दुनिया का सबसे विशाल हिंदू मन्दिर परिसर होने के नाते २६ दिसम्बर २००७ को यह  गिनीज बुक ऑफ व‌र्ल्ड रिका‌र्ड्स में शामिल किया गया।

अक्षरधाम मन्दिर को दुनिया का सबसे विशाल हिंदू मन्दिर परिसर होने के नाते गिनीज बुक ऑफ व‌र्ल्ड रिका‌र्ड्स में बुधवार, २६ दिसंबर २००७ को शामिल कर लिया गया है। गिनीज बुक ऑफ व‌र्ल्ड रिका‌र्ड्स के एक वरिष्ठ अधिकारी एक सप्ताह पहले भारत की यात्रा पर आए और स्वामी नारायण संस्थान के प्रमुख स्वामी महाराज को विश्व रिकार्ड संबंधी दो प्रमाणपत्र भेंट किए। गिनीज व‌र्ल्ड रिकार्ड की मुख्य प्रबंध समिति के एक वरिष्ठ सदस्य माइकल विटी ने बोछासनवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामी नारायण संस्थान को दो श्रेणियों के तहत प्रमाणपत्र दिए हैं। इनमें एक प्रमाणपत्र एक व्यक्ति विशेष द्वारा सर्वाधिक हिंदू मंदिरों के निर्माण तथा दूसरा दुनिया का सर्वाधिक विशाल हिंदू मन्दिर परिसर की श्रेणी में दिया गया।

अक्षरधाम मन्दिर को गुलाबी, सफेद संगमरमर और बलुआ पत्थरों के मिश्रण से बनाया गया है। इस मंदिर को बनाने में स्टील, लोहे और कंक्रीट का इस्तेमाल नहीं किया गया। मंदिर को बनाने में लगभग पांच साल का समय लगा था। श्री अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था के प्रमुख स्वामी महाराज के नेतृत्व में इस मंदिर को बनाया गया था। करीब 100 एकड़ भूमि में फैले इस मंदिर को 11 हजार से ज्यादा कारीगरों की मदद से बनाया गया। पूरे मंदिर को पांच प्रमुख भागों में विभाजित किया गया है। मंदिर में उच्च संरचना में 234 नक्काशीदार खंभे, 9 अलंकृत गुंबदों, 20 शिखर होने के साथ 20,000 मूर्तियां भी शामिल हैं। मंदिर में ऋषियों और संतों की प्रतिमाओं को भी स्थापित किया गया है।
म्यूजिकल फाउंटेन्स (यग्नपुरूष कुंड)
म्यूजिकल फाउंटेन्स (यग्नपुरूष कुंड) : संध्याकालीन आयोजित होने वाला संगीतमय फव्वारा भगवान, मनुष्य और प्रकृति के बीच परस्पर निर्भरता प्रदर्शित करता है। यह एक निराला अनुभव है।








म्यूजिकल फाउंटेन्स (यग्नपुरूष कुंड)
मंदिर में रोजाना शाम को दर्शनीय फव्वारा शो का आयोजन किया जाता है। इस शो में जन्म, मृत्यु चक्र का उल्लेख किया जाता है। फव्वारे में कई कहानियों का बयां किया जाता है। यह मंदिर सोमवार को बंद रहता है। अक्षरधाम मंदिर में 2870 सीढियां बनी हुई हैं। मंदिर में एक कुंड भी है, जिसमें भारत के महान गणितज्ञों की महानता को दर्शाया गया है।

मन्दिर के कुछ प्रमुख आकर्षण निम्न हैं:
मंदिर: गुलाबी पत्थर और सफेद संगमरमर से बना, मुख्य मंदिर स्टील के उपयोग के बिना बनाया गया था। नक्काशीदार स्तंभों, गुंबदों और 20,000 मूर्तियों के साथ सजाया गया यह मन्दिर अत्यन्त दिव्य है।

मंदिर का केंद्रीय गुंबद






हॉल ऑफ वैल्यू (सहजानंद प्रदर्शन): ऑडियो- एनिमेट्रॉनिक्स शो के द्वारा ज्ञान और सजीव जीवन का सच्चा अर्थ जैसे अहिंसा, शाकाहार, नैतिकता और सामंजस्य आदि के अभ्यास का संदेश दिया जाता है। यहाँ पर स्थित प्रत्येक मूर्ति जीवंत दिखाई देती है। 

विशाल फिल्म स्क्रीन (नीलकंठ यात्रा) :यह फिल्म एक बच्चे योगी, नीलकंठ वर्णी पर आधारित है। इस स्क्रीन में छह से अधिक कहानियों पर बनी फिल्मों को दिखाया जाता है।

बोट राइड (संस्कृत विहार) :किसी को भी अक्षरधाम में नाव की सवारी नहीं छोड़नी चाहिए। बारह मिनट की यह सवारी भारतीय विरासत के 10,000 वर्षों में एक सवारी की तरह होगी। आप इसमें वैदिक जीवन से तक्षशिला तक और प्राचीन खोजों के युग आदि सभी का अनुभव प्राप्त करेंगे।

गार्डन ऑफ इंडिया (भारत उपवन) : पीतल की मूर्तियों के साथ सुसज्जित बगीचे और घास के मैदान इस पूरे परिसर को आकर्षक बनाते हैं। योगिहृदय कमल एक विशेष कमल है जो शुभ भावनाओं को दर्शाता है। 

अभिषेक मंडप :इसमें नीलकंठ वर्णी की मूर्ति का जलाभिषेक किया जाता है जिसमें भजन और प्रार्थनाएं होती हैं। आगंतुकों को मूर्ति का अभिषेक करने की अनुमति है।

 सहज आनंद वॉटर शो :यह आश्चर्यजनक शो 24 मिनट के लिये चलता है, इसमें केना उपनिषद से संबंधित कहानियों को दिखाने के लिए मीडिया के विभिन्न माध्यमों का उपयोग किया जाता है। कई रंग के लेजर, पानी के नीचे की लपटें, चलचित्र सामग्री और पानी की तेज धारें इस शो को बहुत आकर्षक बनाते हैं
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बादामी गुफा मंदिर 
भारत के कर्नाटक के उत्तरी भाग में बागलकोट जिले के एक शहर बादामी में स्थित हिंदू गुफा मंदिरों का एक परिसर है। गुफाओं को भारतीय रॉक-कट वास्तुकला का उदाहरण माना जाता है, विशेष रूप से बादामी चालुक्य वास्तुकला, जो 6 वीं शताब्दी से है। बादामी को पहले वातपपी बादामी के नाम से जाना जाता था, जो शुरुआती चालुक्य वंश की राजधानी थी, जिसने 6 ठी से 8 वीं शताब्दी तक कर्नाटक पर काफी शासन किया था। बादामी एक मानव निर्मित झील के पश्चिमी तट पर स्थित है, जो पत्थर की सीढ़ियों के साथ मिट्टी की दीवार से घिरा है; यह बाद के समय में निर्मित किलों द्वारा उत्तर और दक्षिण में घिरा हुआ है।

 बादामी गुफा मंदिर 
 बादामी गुफा मंदिर 
बादामी गुफा मंदिर 
बादामी गुफा मंदिर 
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वरदराज महाराजा पेरुमल मंदिर 



या हस्तिगिरि या अत्तियुरन एक हिंदू मंदिर है जो भारत के पवित्र शहर कांचीपुरम में स्थित भगवान विष्णु को समर्पित है। यह दिव्य देशमों में से एक है, माना जाता है कि विष्णु के 108 मंदिरों में 12 कवि संतों या अलवरों द्वारा दौरा किया गया था।

यह कांचीपुरम के एक उपनगर में स्थित है जिसे विष्णु कांची के रूप में जाना जाता है जो कई प्रसिद्ध विष्णु मंदिरों के लिए एक घर है। माना जाता है कि वैष्णव विष्टाद्वैत दर्शन के सबसे बड़े हिंदू विद्वानों में से एक रामानुज का इस मंदिर में निवास है।

कांचीपुरम में एकम्बरेस्वरार मंदिर और कामाक्षी अम्मन मंदिर के साथ मंदिर को मुमुर्तिवासम (तीनों का निवास स्थान) के रूप में जाना जाता है, जबकि श्रीरंगम को इसके नाम से जाना जाता है: 'कोइल (अर्थ: "मंदिर") और तिरुपति जैसे:' मलाई ' (अर्थ: "पहाड़ी")। दिव्य देशमों में, कांचीपुरम वरदराज पेरुमल मंदिर को पेरुमल कोइल के नाम से जाना जाता है। यह वैष्णवों के लिए सबसे पवित्र स्थानों में से एक है। इस श्रृंखला को पूरा करने वाले दिव्य देशम का चौथा मेलुकोटे है - जिसे थिरुन्नारायणपुरम के नाम से जाना जाता है। वैष्णवों का मानना ​​है कि बिना विराम के सभी चार स्थानों का दौरा करना परमपद में एक स्थान की गारंटी देगा।
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लेपाक्षी मंदिर की सुंदरता अनुपम है।
 लेपाक्षी मंदिर
 लेपाक्षी मंदिर
लेपाक्षी मंदिर
 लेपाक्षी मंदिर
 लेपाक्षी मंदिर
 लेपाक्षी मंदिर
 लेपाक्षी मंदिर
लेपाक्षी मंदिर का हैंगिंग पिलर
16 वीं शताब्दी का सुंदर वीरभद्र मंदिर, जिसे लेपाक्षी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, भारत के आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले में लेपाक्षी के छोटे से ऐतिहासिक गाँव में स्थित है, जो कि हिंदूपुर से लगभग 15 किलोमीटर पहले और बैंगलोर से लगभग 120 किलोमीटर दूर है। विजयनगर वास्तुकला की विशिष्ट शैली में निर्मित, मंदिर में भगवान, देवी-देवताओं, नर्तकियों और संगीतकारों की कई उत्कृष्ट मूर्तियां और महाभारत, रामायण, और महाकाव्यों की कहानियों से चित्रित दीवारों, स्तंभों और छत पर सैकड़ों चित्र हैं। इसमें वीरभद्र का 14 फीट का 24 फीट का भित्ति चित्र, छत पर शिव द्वारा निर्मित उग्र देवता शामिल है, जो भारत में किसी एक आंकड़े का सबसे बड़ा भित्ति चित्र है। मंदिर के सामने एक बड़ा नंदी (बैल) है, शिव का पर्वत, जो पत्थर के एक खंड से उकेरा गया है, और यह दुनिया में अपने प्रकार का सबसे बड़ा कहा जाता है।

"ले पाक्षी ने भगवान राम से जटायु, पक्षी, इसे उठने के लिए कहते हुए कहा, "रावण ने अपने पंख काट दिए थे और भगवान राम ने इस गाँव में पक्षी को यहीं गिरा पाया था। इसीलिए इसे लेपाक्षी कहा जाता है। लेपाक्षी सांस्कृतिक और पुरातात्विक रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह शिव, विष्णु और समर्पित मंदिरों का स्थान है।

वीरभद्र जो विजयनगर राजाओं के काल (1336-1646) के दौरान बनाए गए थे। मंदिर विजयनगर राजाओं और कन्नड़ शिलालेखों के भित्ति चित्रों का स्थान हैं। मंदिर परिसर के पास एक बड़ा ग्रेनाइट नंदी बैल है। "कछुए के आकार की पहाड़ी",  पापनाथेश्वर, रघुनाथ, श्रीराम और दुर्गा के अन्य मंदिर हैं। लेपाक्षी हिंदू पौराणिक कथाओं पर आधारित कठपुतली शो के लिए भी प्रसिद्ध है। 
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सहस्रबाहु मंदिर (सास बहू का मंदिर)

 सहस्रबाहु मंदिर (सास का मंदिर)
 सहस्रबाहु मंदिर
 सहस्रबाहु मंदिर

सहस्रबाहु मंदिर
 सहस्रबाहु मंदिर
सहस्रबाहु मंदिर (बहू का मंदिर)
 तेली का मंदिर
तेली का मंदिर
सास बहू का मंदिर सहस्रबाहु मंदिर
मध्य प्रदेश के इतिहास प्रसिद्ध शहर ग्वालियर में स्थित है। ग्यारवीं शताब्दी में निर्मित यह मंदिर शानदार मूर्तिकला का अद्भुत नमूना है।
  • इस मंदिर का निर्माण 1093 ई. में किया गया था।
  • स्‍थानीय लोगों की यह मान्यता है कि यह मंदिर 'सास और बहू' को समर्पित है।

  • यह मंदिर सहस्रबाहु अर्थात् हज़ार भुजाओं वाले विष्णु को समर्पित है।
  • सास बहू मंदिर की मूर्तिकला तथा नक़्क़ाशी शानदार है। ख़ूबसूरत मूर्तिकला का यह सुन्दर नमूना है।

  • इस मंदिर के मध्य में एक वर्गाकार प्रकोष्ट है, जिसके तीन ओर द्बार मंडप हैं और चोथी ओर एक गर्भगृह है, जो अब रिक्त है।
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अन्य प्रसिद्ध भारतीय मंदिर, प्रसाद वास्तुकला :
अजंता-एलोरा कैलाश मंदिर विश्वधरोहर
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सूर्यमंदिर, मोढेरा, गुजरात
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 गोल्डन टेम्पल, वेलोर, तमिलनाडु
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रघुनाथस्वामी मंदिर, श्रीरंगम, तिरुचिरापल्ली, तमिलनाडु
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 रघुनाथस्वामी मंदिर, श्रीरंगम, तिरुचिरापल्ली, तमिलनाडु
 रघुनाथस्वामी मंदिर, श्रीरंगम, तिरुचिरापल्ली, तमिलनाडु
 रघुनाथस्वामी मंदिर, श्रीरंगम, तिरुचिरापल्ली, तमिलनाडु
रघुनाथस्वामी मंदिर, श्रीरंगम, तिरुचिरापल्ली, तमिलनाडु
रघुनाथस्वामी मंदिर, श्रीरंगम, तिरुचिरापल्ली, तमिलनाडु
शिवमंदिर, मुरुडेश्वर, मेंगलुरु
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मीनाक्षी मंदिर, मदुरई, तमिलनाडु
मीनाक्षी मंदिर, मदुरई, तमिलनाडु

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मीनाक्षी मंदिर, मदुरई, तमिलनाडु
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रामेश्वरम, मंडपम, तमिलनाडु
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रामेश्वरम, मंडपम, तमिलनाडु
सुचिन्द्रम, कन्याकुमारी, तमिलनाडु
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बृहदेश्वर, मंदिर, तंजौर, तमिलनाडु

पद्भनाभ मंदिर, तिरुवनंतपुरम, केरला
सूर्यमंदिर, जगन्नाथपुरी, उड़ीसा
हम्पी रथ कर्णाटक
हम्पी, कर्णाटक
शिवमंदिर, जाटौली, सलोन, हिमाचल प्रदेश
स्वामीनारायण अक्षरधाम, गांधीनगर, गुजरात
स्वामीनारायण अक्षरधाम, नईदिल्ली
स्वामीनारायण अक्षरधाम 
विघ्नहर्ता गणेश





भगवान विष्णु वाहन गरुड़
सबसे ऊँची हिंदू देवता की प्रतिमा इस्लामिक राष्ट्र इंडोनेशिया के बाली में है। गरूड़ व विष्णु के 122 फुट ऊँची, 64 फुट चौड़े पंख, तांबे व पीतल से बनी है। और भारत मे सेक्यूलर भगवान  #श्री_राम को काल्पनिक बताते है।
इंडोनेशिया के मुस्लिम अभी भी अपनी मूल जड़ों से जुड़े हुए हैं, अर्थात् हिंदुत्व से। हमे अपनी सँस्कृति व हिन्दू सभ्यताओ पे गर्व है।
🚩🚩 जय श्री राम 



कोपेश्वर मंदिर खिद्रापुर – एक अद्भुत वास्तुकला
द्वारकाधीश मंदिर, द्वारका, गुजरात
सांची स्तूप, मध्यप्रदेश

जैन मंदिर, राणकपुर, राजस्थान
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जैनमंदिर, देलवाड़ा, माउंट आबू, राजस्थान
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हरमंदिर साहिब, स्वर्णमंदिर, अमृतसर, पंजाब
 विश्व विपश्यना केंद्र, मुंबई

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विश्व विपश्यना केंद्र, मुंबई
राणी की वाव, पाटण, गुजरात
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मैसूर महल, मैसूर, कर्णाटक

मैसूर महल, मैसूर, कर्णाटक
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मैसूर महल, मैसूर, कर्णाटक
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रॉयल पैलेस, बेंगलुरू, कर्णाटक
लक्ष्मीविलास महल, वडोदरा, गुजरात
लक्ष्मीविलास महल, वडोदरा, गुजरात
 ओना कोना मंदिर, धमतरी, छत्तीसगढ़
  ओना कोना मंदिर, धमतरी, छत्तीसगढ़
 ओना कोना मंदिर, धमतरी, छत्तीसगढ़
 खजुराहो मंदिर, मध्यप्रदेश
  खजुराहो मंदिर, मध्यप्रदेश
 खजुराहो मंदिर, मध्यप्रदेश
खजुराहो मंदिर, मध्यप्रदेश
  खजुराहो मंदिर, मध्यप्रदेश
  खजुराहो मंदिर, मध्यप्रदेश
 खजुराहो मंदिर, मध्यप्रदेश
 बटेश्वर मंदिर मुरैना, मध्यप्रदेश
 बटेश्वर मंदिर मुरैना, मध्यप्रदेश
सोमनाथ ज्योतिर्लिंग, वेरावल, गुजरात
 सोमनाथ ज्योतिर्लिंग, वेरावल, गुजरात
 सोमनाथ ज्योतिर्लिंग, वेरावल, गुजरात
 सोमनाथ ज्योतिर्लिंग, वेरावल, गुजरात
 द्वारकाधीश मंदिर, द्वारका, गुजरात
  द्वारकाधीश मंदिर, द्वारका, गुजरात
  द्वारकाधीश मंदिर, द्वारका, गुजरात
 जगन्नाथ मंदिर पूरी, ओडिशा
 जगन्नाथ मंदिर पूरी, ओडिशा
जगन्नाथ मंदिर पूरी, ओडिशा
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