फिर से पूरी दुनिया मे हमारे गांड़ीव की टंकार के साथ पांचजन्य का शंखनाद गूंज रहा है ...

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सयुंक्त राष्ट्र संघ के मंच से

आज फिर से पूरी दुनिया मे हमारे गांड़ीव की टंकार के साथ पांचजन्य का शंखनाद गूंज रहा है ... जिसकी आवाज से हमारा मन, मस्तिष्क ही नही हमारा रोम रोम तक पुलकित हो रहा है ... सदियों से मानसिक, वैचारिक आक्रमण और संस्कृति पर निरंतर आघात सहते हमारे तप्त ह्रदय पर पिछले पांच वर्षों से जो गर्व और अभिमान की फुहारे पड़ रही है ना ... उसका कारण केवल जनमानस का जागरण है ... मेरा मानना है कि जन जागरण के लिये परमात्मा ने मोदीजी को मानो निमित्त बनाकर भेजा है।

भगवद्गीता में भगवान के अधर्म को नाश करने के लिये समयसमय पर अपने अवतरण का उद्देश्य और काल परिस्थितियों का वर्णन किया है ...

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्‌।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥
भावार्थ:  जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने रूप को रचता हूँ अर्थात साकार रूप से लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूँ। साधु पुरुषों का उद्धार करने के लिए, पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिए और धर्म की अच्छी तरह स्थापना करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट हुआ करता हूँ।

भगवद्गीता का शास्वत सिद्धांत सर्वकालिक है - आज के संदर्भ में इस सिद्धांत की प्रसांगिकता समजने की आवश्यकता है। 

भारतीय संस्कृति सदैव ' वसुधैव कुटुम्बकम ' के सिद्धांत पर विश्व कल्याण को मार्गदर्शन करते हुए विश्वगुरु रही है। पाषाण युग से लेकर विश्व मे अन्य कितनी ही संस्कृति अपने समय मे प्रभावित रही है, जिसमे मुख्यतः मिश्र, मेसोपोटामिया, फारस, आर्मेनियन, बेबीलोन, चीन, यूनान सहित हमारी वैदिक संस्कृति जिसे सिंधुघाटी की सभ्यता के नाम से जानी जाती है।

इन प्रमुख सभ्यताओं ने अपने समय मे विश्व को प्रभावी मार्गदर्शन और मार्गदर्शक भी दिये है लेकिन कालचक्र में समय जाते यह सभ्यताए नामशेष हो गई है। हमारी भव्यदिव्य वैदिक सँस्कृति पर भी कंई प्रहार हुए इसे तहसनहस करने के लिये समयसमय पर अनेक प्रहार हुए, जिसके चलते इसमें कूड़ा करकट आना स्वाभाविक है लेकिन हमारी संस्कृति के जीवन सिद्धांत, कार्यप्रणाली, जीवनशैली की नींव इतनी गहरी है कि वह जीर्णशीर्ण होते हुए भी पुनः प्रस्थापित होते होते आज भी जीवित है, अवतारों, ऋषि मुनियों मनीषियों के द्वारा भगवद्गीता के उपरोक्त सिद्धांत के अनुसार इसका समयसमय पर जीर्णोद्धार होते रहा है।

केवल वर्तमान भारत की सीमाओं तक नही पर एशिया के बड़े भूभाग पर फैली हमारी अखंड भारतीय वैदिक संस्कृति जिसे विदेशी सोने की चिड़िया मानते थे। हमारी संस्कृति पर पिछले समय मे विदेशी आक्रांताओं ने अनेक बार आक्रमण कर इसे नष्ट करने के प्रयत्न किये जिसका प्रभाव हमारी जीवनशैली, शिक्षण, रहनसहन कुछेक विचारों पर भी जरूत हुआ है, हमारे मूलभूत जीवन जीवनमूल्य एवं सिद्धांत भी इस प्रभाव से अछूते नही रह पाये। लेकिन हमारी संस्कृति झड़े इतनी गहरी है कि हमारे DNA में आज भी उस भव्यदिव्य संस्कृति के कुछेक अंश विद्यमान है।

पिछली शदियों में हमारी संस्कृति तहसनहस होने के कईं कारण रहे है, मुख्यतः छोटेबड़े रजवाड़ों बटे हमारे भारत के भूभाग को विदेशी आक्रांताओं ने आपस मे फुट डालकर अपना प्रभाव जमाकर लगभग वर्तमान पूरे भूभाग को अपना गुलाम बना दिया था।

आजादी की लड़ाई
समय समय पर हमारी संस्कृति पर हुए आक्रमण, संकटों, धार्मिक, सामाजिक बुराइयों को दूर करने के लिये अनेक वीर योद्धाओं, संत महात्मा, समाज सुधारकों, क्रांतिकारियोंऔर महापुरुषों ने अपने अपने तौरतरीकों से प्रतिकार कर इसे पुनः प्रस्थापित करने के अनेक प्रयत्न किये है।

आज़ादी का श्रेय कोंग्रेस अपने नाम लिखा है और हमें यह पढ़ाया भी गया है। लेकिन इतिहास कुछ और ही है। गुलामी से आज़ादी की लड़ाई भलेही 1857 से मानी जाती है लेकिन इसके पहले छत्रपति शिवाजी महाराज, महाराणा प्रताप, रानी लक्ष्मीबाई जैसे वीरों ने अपनेअपने क्षेत्रों में अनेक प्रयास किये थे जिसका इतिहास गवाह है। इन व्यक्तिगत प्रयासों का परिणाम जरूर हुआ है। लेकिन सँगठित व्यापक प्रयास बहोत कम हुए है। क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों के खिलाफ अलग अलग जगह विद्रोह कर उन्हें जरूर उलजाया था लेकिन सत्ता परिवर्तन में विशेष योगदान नही दिखाई देता था। वह प्रयास नेताजी सुभाषचंद्र बोस की आजाद हिंद फौज के माध्यम से हुआ।



हमें पढ़ाया गया है कि आजादी हमे गांधी के अहिंसा और सत्याग्रह के मार्ग से मिली है। तो हजारों वीर बलिदानियों का खून व्यर्थ बहा ? यदि चरखे से आजादी मिली होती तो सीमाओं पर सैन्या की जरूरत क्या है ? आजादी के बाद सरकारी इतिहासकारो से मनगढ़ंत इतिहास रचकर हमसे वास्तविकता छुपाई गई है। गांधी के अहिंसा सत्याग्रह मे दम जरूर था लेकिन केवल हिन्दूओ को कायर और दुर्बल बनाकर अपने रास्ते पर चलने पर मजबूर करते रहे। गांधी को अंग्रेजो द्वारा ' राष्ट्रपिता' ' बनाकर हम पर जबर्दस्ती थोपा गया है !!!दे दी हमे आजादी बिना खड्ग बिना ढाल ' जैसे गाने गवा कर रक्तरंजित बलिदााानियों की शहादतो की मजाक बनाकर रखी दी है ... भारत मे आजादी नही लेकिन सत्ता हस्तांतरण की वास्तविकता यह थी की नेताजी के नेतृत्व में गठित आजद हिंद फौज Indian National Army के नाम से आजाद हिंद सरकार की मुख्य भूमिका रही है।


आजाद हिंद फौज

आजाद हिंद फौज

आजाद हिन्द सरकार की स्थापना
सन 1939 में सुभाष चंद्र बोस ने कांग्रेस के अध्यक्ष पद के चुनाव में गाँधीजी द्वारा समर्थित पट्टाभि सीता रमैया को हरा दिया था। रमैया महात्मा गांधी के उम्मीदवार थे। बोस की जीत पर गांधी ने कहा कि 'सीता रमैया की हार मेरी हार है.' नतीजतन पूरी कांग्रेस कार्य समिति ने इस्तीफा दे दिया। समिति के सदस्य बोस के साथ काम करने को तैयार नहीं थे। मजबूर होकर सुभाष चंद्र बोस ने भी कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। बाद में सुभाष चंद्र बोस ने फॉरवर्ड ब्लॉक नामक राजनीतिक दल बना लिया।

गांधी की दूसरी मनमानी : 29 अप्रैल 1946 कोंग्रेस अध्यक्ष पद के लिए नेहरू को गांधी के समर्थन के बाद भी राज्य की कांग्रेस समिति द्बारा समर्थन नहीं मिला। सिर्फ इतना ही नहीं, 15 राज्यों में से करीबन 12 राज्यों ने सरदार पटेल को कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में प्रस्तावित किया और बाकी 3 राज्यों ने किसी का भी समर्थन नहीं किया। 12 राज्यों द्बारा मिला समर्थन सरदार पटेल को अध्यक्ष बनाने के लिए काफी था। गांधी चाहते थे कि नेहरू कांग्रेस के अध्यक्ष पद को संभाले इसलिए उन्होंने जे बी कृपलानी पर दबाव डाला कि वे कांग्रेस कार्य समिति के कुछ सदस्यों को नेहरू को समर्थन देने के लिए राज़ी करें। गांधी के दबाव में कृपलानी जी ने कुछ सदस्यों को इस बात के लिए मना भी लिया। नेहरू को समर्थन दिलवाने के लिए जो भी गांधी कर रहे थे वो कांग्रेस के संविधान के खिलाफ था। सिर्फ इतना ही नहीं, इसके बाद गांधी ने सरदार पटेल से मुलाकात कर कांग्रेस अध्यक्ष पद के उम्मीदवार की दौड़ से हट जाने का निवेदन किया। सरदार पटेल सारी कूटनीति को समझते हुए भी कांग्रेस की एकता बनाए रखने के लिए गांधी का ये निवेदन स्वीकार कर लिया जिसके कारण नेहरू प्रधानमंत्री के पद के उम्मीदवार बन गए।

नेहरू प्रधानमंत्री तो बन गए लेकिन जब सरदार पटेल के उम्मीदवार के पद से हटने की खबर सुनकर राजेंद्र प्रसाद के मुंह से एक ही बात निकली कि एक बार फिर गांधी ने अपने चहेते चमकदार चेहरे के लिए अपने विश्वासपात्र सैनिक की कुर्बानी दे दी। यह भारत का पहला EVM हैकिंग माना जायेगा।

उन दिनों की बात ही कुछ और थी ... तब कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए वैसे नेता भी चुन लिए जा सकते थे जिन्हें पार्टी के सर्वोच्च नेता का अशीर्वाद प्राप्त नहीं होता था ... गांधी जी तब पार्टी के सर्वोच्च नेता थे।यह और बात है कि चुने जाने के बाद वे उस पद पर रह नहीं पाते थे।

भारत की स्वाधीनता में सुभाष चंद्र बोस की ‘आजाद हिन्द फौज’ की बड़ी निर्णायक भूमिका है; पर इसकी स्थापना से पहले भारत के ही एक अंग रहे अफगानिस्तान में भी ‘आजाद हिन्द सरकार’ की स्थापना हुई थी। आज़ाद हिन्द फ़ौज सबसे पहले राजा महेन्द्र प्रताप सिंह  ने 29 अक्टूबर 1915 को अफगानिस्तान  में बनायी थी। मूलत: यह 'आजाद हिन्द सरकार' की सेना थी जो अंग्रेजों से लड़कर भारत को मुक्त कराने के लक्ष्य से ही बनायी गयी थी।

द्वितीय विश्व युद्ध  के दौरान सन 1942 में भारत  को अंग्रेजों के कब्जे से स्वतन्त्र कराने के लिये आजाद हिन्द फौज या इन्डियन नेशनल आर्मी (INA) नामक सशस्त्र सेना का संगठन किया गया। इसकी संरचना रासबिहारी बोस  ने जापान की सहायता से टोकियो  में की थी।
आरम्भ में इस फौज़ में उन भारतीय सैनिकों को लिया गया था जो जापान द्वारा युद्धबन्दी बना लिये गये थे। बाद में इसमें  बर्मा  और मलाया  में स्थित भारतीय स्वयंसेवक भी भर्ती किये गये। 

एक वर्ष बाद सुभाष चन्द्र बोस  ने जापान पहुँचते ही जून 1943 में टोकियो रेडियो से घोषणा की कि अंग्रेजों से यह आशा करना बिल्कुल व्यर्थ है कि वे स्वयं अपना साम्राज्य छोड़ देंगे। हमें भारत के भीतर व बाहर से स्वतंत्रता के लिये स्वयं संघर्ष करना होगा। इससे गद्गद होकर रासबिहारी बोस ने 4 जुलाई 1943 को 46 वर्षीय सुभाष को इसका नेतृत्व सौंप दिया। 5 जुलाई 1943 को सिंगापुर  के टाउन हाल के सामने 'सुप्रीम कमाण्डर' के रूप में सेना को सम्बोधित करते हुए "दिल्ली चलो" का नारा दिया और जापानी सेना के साथ मिलकर ब्रिटिश व कामनवेल्थ सेना से बर्मा  सहित इम्फाल  और कोहिमा  में एक साथ जमकर मोर्चा लिया।

21 अक्टूबर 1943 के सुभाष बोस ने आजाद हिन्द फौज के सर्वोच्च सेनापति की हैसियत से स्वतन्त्र भारत की अस्थायी सरकार बनायी जिसे जर्मनी,  जापान,  फिलीपीन्स,  कोरिया,  चीन,  इटली, मान्चुको और आयरलैंड सहित 11 देसो ने मान्यता दे दी। जापान ने अंडमान व निकोबार द्वीप  इस अस्थायी सरकार को दे दिये। सुभाष उन द्वीपों में गये और उनका नया नामकरण किया। अंडमान का नया नाम शहीद द्वीप तथा निकोबार का स्वराज्य द्वीप रखा गया। 30 दिसम्बर 1943 को इन द्वीपों पर स्वतन्त्र भारत का ध्वज भी फहरा दिया गया। 4 फ़रवरी 1944 को आजाद हिन्द फौज ने अंग्रेजों पर दोबारा भयंकर आक्रमण किया और कोहिमा, पलेल आदि कुछ भारतीय प्रदेशों को अंग्रेजों से मुक्त करा लिया।
'बृहद पूर्वी एशिया' सम्मेलन के समय नेताजी (नवम्बर, १९४३)

6 जुलाई 1944 को उन्होंने रंगून  रेडियो स्टेशन से गाँधी जी  के नाम जारी एक प्रसारण में अपनी स्थिति स्पष्ठ की और आज़ाद हिन्द फौज़ द्वारा लड़ी जा रही इस निर्णायक लड़ाई की जीत के लिये उनकी शुभकामनाएँ माँगीं। 21 मार्च 1944 को 'चलो दिल्ली' के नारे के साथ आज़ाद हिंद फौज का हिन्दुस्थान की धरती पर आगमन हुआ।

22 सितम्बर 1944 को शहीदी दिवस मनाते हुये सुभाष बोस ने अपने सैनिकों से मार्मिक शब्दों में कहा -
हमारी मातृभूमि स्वतन्त्रता की खोज में है। तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा। यह स्वतन्त्रता की देवी की माँग है।
ऐसे अनेक बलिदानों के बाद भी विदेशी धरती से देश की स्वतंत्रता के कष्टसाध्य प्रयास लगातार चलते रहे।

आजाद हिंद सेना का प्रभाव भारतीय सेना और अन्य संगठनों में भी हो गया था। जिसके चलते वह अंग्रेजों के खिलाफ कभी भी बगावत कर सकते थे। इसकी भनक चालक गोरे अंग्रेजो को लग गई थी। इसलिये उन्होंने यहाँ से खिसकने में ही अपनी भलाई समझी थी। लेकिन जाते जाते उन्होंने सत्तालोलुप नहेरु के माध्यम से अपना वर्चस्व भारत के ऊपर कायम रखकर देश को आजाद नही किन्तु सठता परिवर्तन के माध्यम से किया है ... जिसे हम आजादी समज रहे है वह वास्तव में Transfer of Power सत्ता हस्तांतरण है।

क्या हमे 14 अगस्त 1947 कि रात को आजादी मिली थी या सत्ता हस्तांतरण की संधि "Transfer of Power Agreement" का एग्रीमेंट हुआ था !!!

14 अगस्त 1947 कि रात 12 बजे यानि 15अगस्त 1947 को आजादी नहीं मिली थी बल्कि सत्ता हस्तांतरण की संधि  "Transfer of Power Agreement"  हुआ था। 

यह एग्रीमेंट  नेहरु और लोर्ड माउन्ट बेटन  के बीच में हुआ था।भारत की आज़ादी का कानून-1947 "  ब्रिटेन की संसद द्वारा पास किया गया था, यह अधिनियम 18 जुलाई 1947 को स्वीकृत हुआ।  युनाइटेड किंगडम की पार्लियामेंट द्वारा पारित वह विधान है  जिसके अनुसार ब्रिटेन शासित भारत का दो भागों (भारत तथा पाकिस्तान) में विभाजन किया गया। जिससे यह देश कभी तरक्की न कर सके। 

सत्ता के लालची लोगों ने बिना सोचे समझे या आप कह सकते हैं क़ि पुरे होशो हवास में इस संधि को मान लिया।  गांधी व अन्य समझदार लोगों ने इसका विरोध भी किया था यहा तक की गांधी ने नोआखाली (बंगाल) से प्रेस विज्ञप्ति भी जारी की थी  उस प्रेस स्टेटमेंट के पहले ही वाक्य में गाँधी ने ये कहा -
कि मै हिन्दुस्तान के उन करोडो लोगों को ये सन्देश देना चाहता हुं कि ये जो तथाकथित आजादी (So Called Freedom) आ रही है ये मै नहीं लाया। ये सत्ता के लालची लोग सत्ता के हस्तांतरण के चक्कर में फंस कर लाये है,  मै मानता नहीं कि इस देश में कोई आजादी आई है।
सबसे बडी बात की 14 अगस्त 1947 की रात को गाँधी दिल्ली में नहीं नोआखाली में थे। क्यों ? जिसका बहाना कांग्रेस ने बनाया कि वहा दंगे हो रहे थे, दंगे का आज तक कोई भी सबूत नहीं मिला है।

यह वही कानून जिसकी वजह से भारत का बटवारा हुआ और इसके बारे में हमें कभी भी नहीं बताया गया। इसमे साफ-साफ़ लिखा है कि इंडिया और पाकिस्तान ब्रिटेन की सत्ता के अधीन होंगे और इसी में लिखा है कि इन अधीन राज्यों का गठन 15 अगस्त-1947 को किया जायेगा। इसी के आधार पर "ट्रांसफर ऑफ़ पॉवर अग्रीमेंट" हुआ था जिस पर नेहरू और माउन्ट बेटन ने 14 अगस्त 1947 की रात को हस्ताक्षर किया था।

तारीख 15 अगस्त ही क्यों चुनी गयी -    
लार्ड माउंटबैटन 15 अगस्त की तारीख़ को शुभ मानते थे,  क्योंकि द्वितीय विश्व युद्ध के समय 15 अगस्त, 1945 को जापानी आर्मी ने आत्मसमर्पण किया था और उस समय लार्ड माउंटबैटन अलाइड फ़ोर्सेज़ के कमांडर थे।

स्वतंत्रता  और सत्ता का हस्तांतरण ये दो अलग चीजे है। Transfer of Power  और  Independence ये दो अलग चीजे है।


सत्ता का हस्तांतरण कैसे होता है ?
आप देखते होंगे क़ि एक पार्टी की सरकार है, वो चुनाव में हार जाये, दूसरी पार्टी की सरकार आती है तो दूसरी पार्टी का प्रधानमन्त्री जब शपथ ग्रहण करता है, तो वो शपथ ग्रहण करने के तुरंत बाद एक रजिस्टर पर हस्ताक्षर करता है।  उसी रजिस्टर को ट्रान्सफर ऑफ़ पॉवर की बुक कहते है  और उस पर हस्ताक्षर के बाद पुराना प्रधानमन्त्री नए प्रधानमन्त्री को सत्ता सौंप देता है।

यही नाटक हुआ था 14 अगस्त 1947 की रात को 12 बजे यानि 15अगस्त 1947 के दिन ।  लार्ड माउन्ट बेटन ने अपनी सत्ता नेहरु के हाथ में सौंपी थी, और हमने कह दिया कि स्वराज्य आ गया।
  • कैसा स्वराज्य और काहे का स्वराज्य ?
  • अंग्रेजो के लिए स्वराज्य का मतलब क्या था ?
  • हमारे लिए स्वराज्य का मतलब क्या था ?
अंग्रेज कहते थे क़ि हमने स्वराज्य दिया,  माने अंग्रेजों ने अपना राज हमको सौंपा है ताकि तुम लोग कुछ दिन इसे चला लो जब जरुरत पड़ेगी तो हम दुबारा आ जायेंगे। ये अंग्रेजो का Interpretation (व्याख्या) थी। 

इस संधि के अनुसार ही भारत के दो टुकड़े किये गए और भारत और पाकिस्तान नामक दो Dominion States बनाये गए हैं।Dominion State का  हिंदी में अर्थ होता है एक बड़े राज्य के अधीन एक छोटा राज्य।

Dominion State और Independent Nation में जमीन आसमान का अंतर होता है। मतलब सीधा है क़ि भारत और पाकिस्तान आज भी अंग्रेजों के अधीन/मातहत  हैं।

अंधकार में रखकर हमें पढ़ाये गये इतिहास की पोल अब खुल रही है ... काल के गर्त में दबाये गये इतिहास की पर्त दर पर्त खुल रही है ... अभी तो बहोत कुछ अकल्पनीय बातें बहार आना बाकी है ... तब प्रतित होता है की अब वक्त बदल रहा है ... सही मायनों में भारत की आझादी की शरुआत अब हो रही है ... इतिहास पर छाए बादल छंट रहे है ... नया सवेरा हो रहा है ... बहुत कुछ हो रहा है ... बहुत कुछ होना बाकी है ... हमें तो इस नये भारत के शिल्पी की रचना के यज्ञनिय कार्यो में हमारी सकारात्मक आहुति प्रदान करके इतिहास के केवल साक्षी नही सहयोगी की भूमिका निभाना है।

नये भारतकी रचना में केवल मोदीजी ही नही किंतु परमात्मा द्वारा सद्बुद्धि प्रदत्त देश की वो जनता भी शामिल है जिसने विपक्ष के लालच, चक्रव्युह और साजिशों से ऊपर उठ कर सिर्फ राष्ट्र सर्वोपरि मंत्र को साधा है। ज्ञात इतिहास में आजादी संग्राम के बाद देश मे एकजुट राष्ट्रवाद उभरता पाया है।

वर्तमान में मोदीजी अमेरिका और सयुंक्त राष्ट्र के दौरे पर है। इस समय पूरे देश का उत्साह जहां चरम पर है, वहीं विशेष परिवार मय चाटुकारों, सेकुलरों, कम्युनिस्टों, गजवाई गिद्धों या लुटियन जोन के बिलौटों का न केवल मुंह फूल कर कुप्पा हुआ है। बल्कि उनकी हरामखोरी की चर्बी से भरी तशरीफ तक मे ऐसी सूजन हुई है कि बेचारे न बोल पा रहें है और न ढ़ंग से बैठ ही पा रहे है ... बस पानी पी पी कर मोदी को कोस रहे हैं ... पांच साल से बेबस, लाचार और हताश हो चुके बेचारे लकड़बग्घे ...!!!
लकड़बग्घों, गिद्धो और मगरमच्छों की ये नस्ल न केवल बेहया ही है बल्कि निर्लज्ज और थेथर भी है तभी तो ... #HOWDY_MODY से पीड़ित ये मानसिक दरिद्र ... भारत की सम्पन्नता, समृद्धता और विश्वगुरू बनने की दिशा मे बढ़ते कदमों पर बजाय गर्व करने के ... कल से ही लोटा भर आँसू चुआ कर बिलख रहे हैं ... एकदम कायदे आजम के कंगाल मुलुक की तरह ...!!!

खैर ... मोदी युग मे बार बार बौखला कर, बाल नोच कर, पगला चुके देशी विदेशी बिलौटों ... कब समझोगे कि ... ' हाऊड़ी मोदी ' कार्यक्रम केवल एक इवेंट भर नही ही था ... वहां से पूरी दुनिया को हिलाने वाली आवाज केवल मोदी के समर्थन मे नही गूंज रही थी ... ये सनातन राष्ट्रवाद की वैचारिक अवधारणा का वो निनाद है, जिसे तुम सबने मिल कर दशकों ही नही सदियों से जातिवाद, क्षेत्रवाद और मजहबी तुष्टीकरण के पत्थर से दबाने और कुचलने का कुचक्र रचा था ... मोदी ने केवल उस पत्थर को हटा भर दिया है ... जिसका परिणाम पिछले पांच साल से तुम सब न केवल देख रहे हो बल्कि फजीहत की हद तक भुगत भी रहे हो ... सुनो ... कल सात समुंदर पार से हजारो भारतीयों के समवेत स्वर की जो गूंज तुम सबको सुनाई दे रही है, जिससे तुम सब बेचैन हो रहे हो ... वो केवल एक झलक है उस फिल्म की ... जिसे देख कर तुम सबके जाने कितने सपने टूट कर तुम्हे विक्षिप्त कर देने वाले हैं ... देख लेना ... वादा रहा ... हजार साल से तुम्हारे आघात सहने वाले पृथ्वीराज, महाराणा प्रताप से लेकर भगत सिंह, आजाद, सुभाष बोस और वीर सावरकर जैसी लाखों हुतात्माओं के रक्तवंशी जाग चुके हैं, जिनके लहू का ताप बर्दाश्त करने की कूवत तुममे ही नही ... दुनिया की किसी ताकत मे नही है ... ये हमारा विश्वास है ...!!!

फिलहाल कल ह्युस्टन से इस्लामी आतंकवाद को पहचान देकर उसके विरूद्ध जो जबरदस्त हुंकार उठी है उससे नि:संदेह कहीं न कहीं इस्लाम के नाम पर खूनी खेल खेलने के साथ दुनिया को हरे झंड़े के नीचे लाने का ख्वाब देखने वाली प्रजनन प्रजाति के मठाधीशों के कलेजे मे भी मोहर्रम जैसा मातम जरूर हुआ होगा ...

बाकी मै तो आपका ध्यान हीरा बेन के यशस्वी पुत्र के संयुक्त राष्ट्र में दिये 16 मिनिट के भाषण की ओर दिलाना चाहता हूं ... जरा गौर से पूरा सम्बोधन सुनेगें तो समझ जायेंगे कि मोदीजी की युद्ध नही बुद्ध और आंतकवाद के खिलाफ विश्वको एकजुट होंने की अपील और आक्रोश ... और हयूस्टन में फिजिक्स और केमेस्ट्री की बात करने का मतलब क्या है ...  9/11 ... 26/11 याद क्यों दिला रहे थे ... और क्यों वहां हजारों की संख्या मे मौजूद जनता को अपना परिवार बता कर ट्रम्प से परिचय करा रहे थे ... 

कैसे आतंकवाद की अम्मी को इस कार्यक्रम को देख रहे पूरी दुनिया के 40% नागरिकों के सामने नंगा कर रहे थे ... यह सब केवल जलवायु परिवर्तन से दुनिया को होने वाली आसन्न क्षति से सावधान करने के लिये नही था ... मेरा मानना है कि मोदी का यह पूरा सम्बोधन बेहद सोची समझी रणनीति का एक अहम और सधा हुआ हिस्सा था, जिसे वो आतंकवाद विरोधी अपने उस लक्ष्य को पाने से पहले पूरी दुनिया से घोषित, अघोषित रूप से पुष्ट और प्रमाणित कर लेना चाहते है ... जिस लक्ष्य की पूर्ति से शीघ्र ही दक्षिण एशिया मे आतंकवाद का प्रसव केन्द्र बन चुके मुलुक का भौगोलिक परिवर्तन ही नही वरन् एशियाई परिक्षेत्र मे इस्लामी आतंकवाद के पालन पोषण के उन केन्द्रों पर भी निर्णायक और जबरदस्त प्रहार हो सकता है ... जिनको आदर्श मान कर भारत मे बिल बना कर, उसमे घात लगाये बैठे सांप संपोलों की उस जेहादी मानसिकता की रीढ़ तोड़ देगा, जिसके ख्वाबों मे गजवा ए हिंद बसता है ... इन जैसों पर प्रचंड प्रहार करने वाला मोदी के नेतृत्व मे ये वो नया भारत है। जो अपने पराक्रम और शौर्य का नया इतिहास रोज लिखने वाला ही नही है ... बल्कि दिन प्रतिदिन लिख भी रहा है ... अब जिसे न समझ मे आये तो सौ करोड़ राष्ट्रवादी रामभक्त क्या करें ...!!!

यह ब्लॉग लिखते समय अमेरिका यात्रा से वापस लौटे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नई दिल्ली हवाईमथक पर अपने विश्वविजेता नेता के स्वागत में उमड़ी जनता को देख मन गद्गदित हो गया। मोदीजी आज केवल भारत के ही नही विश्वनायक के रूप में प्रस्थापित हुए है। यह उनकी नही 135 करोड़ भारतियों की जीत है।

यह बात अलग है कि हमारे युगप्रवर्तक अवतारी शकितयाँ श्रीराम औऱ श्रीकृष्ण को तत्कालीन समाज कहाँ समज पाया था ? जो आज हम समज पाये ! यहाँ मोदीजीको ईश्वरीय शक्ति मानने का आशय नही है लेकिन  मेरा मानना है की यह नये भारत की प्रस्थापना और पुनः विश्वगुरु के स्थान पर भारत को प्रस्थापित करवाने के पीछे भगवद्गीता कथित परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्‌। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥ इस शास्वत सिद्धांत के अनुसार ईश्वरीय शक्ति का ही संकेत है ... हम आजके समय मे यह माने या न माने यह स्वतंत्र विचार है ... 

जिसको न निज गौरव न निज देश का अभिमान है।
वो नर नही नर पशु निरा और मृतक समान है॥

वन्देमातरम्॥

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