'ज्यूरी' लोकतांत्रिक न्यायपालिका
मित्रों,
इस चर्चा में हम ज्यूरी सिस्टम याने प्रजा आधारित न्यायतंत्र या आम नागरिको द्वारा भर्स्ट को सजा देने के अधिकारके बारे में बात करेंगें।
इस चर्चा में हम ज्यूरी सिस्टम याने प्रजा आधारित न्यायतंत्र या आम नागरिको द्वारा भर्स्ट को सजा देने के अधिकारके बारे में बात करेंगें।
प्राचीन भारतमे ग्रामसभा या जनपदों के पास यह अधिकार रहता था की वह:
क्या है Jury System इस लेख को पूरा पढ़ें।
जूरी सिस्टम = प्रजा एवम नागरिक आधीन न्यायतंत्र।
* किसी राजा को अयोग्य होने पर निकाल सकते थे।
* या राजा के प्रजा या देशहित के विरुद्ध दिए हुए गलत न्याय या फैसले को रद्द कर सकते थे।
* या राजा के प्रजा या देशहित के विरुद्ध दिए हुए गलत न्याय या फैसले को रद्द कर सकते थे।
* अगर राजा ऐसी ग्रामसभा या जनपदों के फैसलों को मानने से इनकार करदे तो राजा को बहुमत से सजा या फांसी दे सकते थे।
भारतके स्कूल कॉलेजों में यह पुरातन न्यायप्रणाली नही पढ़ाई जाती, क्योंकि आज के भर्स्ट नेता जानते है कि ऐसी न्यायप्रणाली से उनके गोरखधंधे नही चल पायेंगे।
1956 में भ्रस्ट जवाहर लाल नेहरु ने #Jury_System को बर्खास्त करके Corrupt Judge System को Implement किया। आप लोगो ने नानावटी आहूजा केस सुना होगा। दोस्तों आज मै आपको एक राज बताने जा रही हूँ, देश आजाद होने के 9 साल तक हमारे संविधान में न्याय मिलने का एक मात्र साधन था Jury System. 1956 में जवाहर लाल नेहरु ने jury System को बर्खास्त करके corrupt judge system को impose किया। इसके पीछे उसका एक ही कारण था की कांग्रेस और भ्रस्ट जज मिलकर घोटाले पर घोटाले करें और आम जनता उन्हें सजा न दे पाए।
क्या है #Jury_System इस लेख को पूरा पढ़ें।
जूरी सिस्टम = प्रजा एवम नागरिक आधीन न्यायतंत्र।
पश्चिम के देशो में भारत के मुकाबले मे भ्रष्टाचार क्यों कम हे ? उसका कारण है की वहां के नागरिको के पास उनके राजनेता, मंत्रीगण, सरकारी कर्मचारियों एवं न्यायाधीशों को वहां की जनता के द्वारा नौकरी से निकल देने की और उनको सजा देने की प्रक्रिया हे, और उनको यह करने के लिए न्यायाधीशोंके सामने गिड़गिड़ाना या अनुरोध नहीं करना पड़ता।
इस नौकरी से निकालने की प्रक्रिया को #राईट_टू_रिकॉल #Right_to_Recall कहते हैं और इस सजा देने की प्रक्रिया को 'ज्यूरी सिस्टम' कहते हैं।
मतलब की वहां के राजनेता, मंत्रियों, सरकारी कर्मचारी एवं न्यायाधीशों के सिर के ऊपर दो तलवार हमेशा लटकती रहती है की अगर मैं ठीक से काम नही करूँगा तो मुझे नौकरी में से निकाल देंगे, और अगर मैं भ्रष्टाचार करूँगा तो नौकरी में से निकाल देंगे और नौकरी मे से निकलने के बाद मुझे सजा भी १५-२० दिन में दे देंगे।
अभी हम भारत को देखे तो हमें न्यायाधीशों, सी.बी.आई और पुलिस के ऊपर निर्भर रहना पड़ता है। हम अपने आप राजनेता, मंत्रियों, सरकारी कर्मचारी, न्यायाधीशों को काम से या नौकरी से निकाल नहीं सकते और उनको सजा १५-२० दिन में नहीं दे सकते।
अभी मैं आप को बताउंगा की पश्चिम के देशो में राजनेता, मंत्रियों, सरकारी कर्मचारी, न्यायाधीशों को सजा देने की प्रक्रिया कैसे काम करती है, जिसे ज्यूरी सिस्टम के नाम से जाना जाता है।
(१) वहां भ्रष्टाचार का कोई भी केस जब कभी भी कोर्ट मे आता है तो उसका निर्णय लेने का अधिकार न्यायाधीशों के पास नहीं होता लेकिन जनता के पास होता है। मतलब नागरिक कोर्ट में स्वयं निर्णय करते हैं न की न्यायाधीश।
(२) वहां जब भी कोर्ट मे भ्रष्टाचार का कोई केस आता है तो वहां के जिले की कुल आबादी या जन-संख्या में से अनियमित रूप से या रेनडम तरीके या यादृच्छिक तरीके से १५ से २० नागरिको का चयन किया जाता है जिसको जूरी कहते हैं। फिर उनको कोर्ट में बुलाया जाता है और दोनों पक्ष अपना प्रस्ताव कोर्ट में उन १५ से २० नागरिको के सामने या जूरी के सामने रखते हैं। फिर वो अपना निर्णय सुनाते हैं जो न्यायाधीशों को मानना ही पड़ता है।
(३) फिर न्यायाधीश को वो नागरिको के कहने पर उसी वक्त अपना निर्णय सुनना पड़ता हे. मतलब की नागरिक या जूरी उसी वक्त १५-२० दिन मे निर्णय ले लेते हे की राजनेता, मिनिस्टर्स, मंत्रियों, सरकारी कर्मचारी, न्यायाधीश कसूरवार है या बेकसूर। अगर एक बार जूरी या नागरिक कसूरवार ठहरा देते हैं तो न्यायाधीश को उसी वक्त जूरी के फेसला करने के तुरंत बाद कायदे के दायरे में वो अपराध का जितनी सजा देने का प्रावधान हे वो सजा देनी पड़ती हे।
(४) मतलब नागरिक या जूरी ने अपना निर्णय एक बार ले लिया तो न्यायाधीश केवल कानून की किताब में से पढकर वो अपराध की सजा का प्रावधान ढूंढ कर सजा सुनाने के की केवल औपचारिकता के लिये ही होता हे।
(५) नागरिक या जूरी एक बार सजा सुना दे तो न्यायाधीश सजा सुनाने का काम १ घंटे के बाद भी नहीं कर सकता उसको उसी वक्त सजा देनी पड़ती हे चाहे जो हो भ्रष्ट राजनेता, मिनिस्टर्स, मंत्रियों, सरकारी कर्मचारी, न्यायाधीशों क्यों न हो।
(6) हर केस में जूरी बदलती रहती है... हर नागरिक केवल १ बार १० साल में जूरी मे आता है या आ सकता है। और अगर कोई राजनेता, मंत्रियों, सरकारी कर्मचारी, न्यायाधीशों पर कोई भ्रष्टाचार के १०० केस हे तो १०० अलग-अलग जूरी आती है, मतलब की जिले की कुल आबादी या जन-संख्या में से अनियमित रूप से या रेनडम तरीके से १५००-२००० नागरिको का चयन करके १०० अलग-अलग जूरी बनायी जाती है। और १०० अलग-अलग जूरी स्वतन्त्र निर्णय करके अलग अलग १०० सजाएं देती हे।
(7) ज्यूरी पैसे से खरीदी नही जा सकती, मान लो की एक क्रिमिनल के जीवनकाल में उसके ऊपर ३० साल में ३००० केस होंगे।
जज सिस्टम या न्यायाधीश आधीन न्यायतंत्र में यही ३००० केस सिर्फ ३० से न्यायाधीश के पास जायेंगे। तो वो न्यायाधीश को घूस देना या उनके रिश्तेदार वकीलों को रोककर वो केस का निपटारा करना काफी आसान हे।
जज सिस्टम या न्यायाधीश आधीन न्यायतंत्र में यही ३००० केस सिर्फ ३० से न्यायाधीश के पास जायेंगे। तो वो न्यायाधीश को घूस देना या उनके रिश्तेदार वकीलों को रोककर वो केस का निपटारा करना काफी आसान हे।
ज्यूरी सिस्टम या प्रजा एवम नागरिक आधीन न्यायतंत्र में यही ३००० केस ३०००० से ४५००० आम नागरिको के पास जायेंगे।
(8) ज्यूरी को घूस देना वास्तव में सम्भव नहीं हे। अगर कोई गेंग में यदी १००० गुंडे हे और उनपर यदी हर साल १०० केस होते हे तो टोटल १००,००० केस होंगे एक गेंग पर। वो १००,००० केस १५,००,००० नागरिको के पास जायेंगे। प्रेक्टिकल वो गेंग १५,००,००० नागरिको को घूस नहीं दे सकते।
(९) ज्यूरी सिस्टम या प्रजा एवम नागरिक आधीन न्यायतंत्र में नागरिक न्यायाधीश से अच्छा निर्णय दे सकते हैं. क्यूंकि १२ से १५ मेम्बर को १ केस सुनने के लिये १५ से ३० दिन पूरे मिलते हे। तो वो आराम से सभी पक्षों को सुनकर अपना निर्णय दे सकते हैं।
(१०) ज्यूरी सिस्टम या प्रजा एवम नागरिक आधीन न्यायतंत्र मे निरक्षर लोग या नागरिक भी ज्यूरी बनकर अपना निर्णय ले सकते है।
कानून - न्यायप्रक्रिया केवल एक सामान्य ज्ञान (Education Base) है। अपनेआपको Socalled बुद्धिजीवी कहलाने वाले यह गलत प्रचार करते हैं की कानून एक मुश्किल विषय हे यह पढेलिखे ही कर सकते है। आज भी हमारे यहां मुख्यतः न्याय प्रक्रिया व्यवारिक सूझबूझ से कौटुम्बिक - सामाजिक - या ग्रामसभा के माध्यम से विश्वसनीय रूपसे चलती आ रही है। हां कुछ दोष या त्रुटियां रहना स्वभाविक है। जो साशनाधित न्यायप्रणाली से कहीं गुणा बहेतर और विश्वसनीय है।
निचली अदालतों, उच्च न्यायालयों में न्यायप्रणाली की विश्वसनीयता एवं न्याय देने में विलंब आज सामान्य बात बन गई है कोर्ट केशमे पिढ्ढीयां बदल जाती है। वर्तमान में Suprim Court के 4 न्यायाधीश द्वारा ग़ैरबंधारणीय प्रेसकोंफ्रेंस कर रखे तथ्यों और शिकायत से तो अब पूरे देश को वर्तमान न्यायप्रणाली पर धीरे धीरे विश्वास उठ रहा है।
अगर हम अदालतों की संख्या को बढ़ा दें तो केस के निपटारे में गति अवश्य ही आयेगी लेकिन हमें निम्नलिखित समस्याओं को हल करने के लिये संरचनात्मक परिवर्तन की जरुरत है। भाई-भतीजा वाद-सगावाद - वकील जो न्यायाधीश के सगे हैं वो हर केस एक के बाद एक जीत ते जाते हैं। न्यायाधीश और वकील का ये गठजोड़, न्यायाधीश और आरोपी या क्रिमिनल का गठजोड़, न्यायाधीशो में भ्रष्टाचार, न्यायाधीश की नियुक्ति में सगावाद, ज्यूरी सिस्टम या प्रजा एवम नागरिक आधीन न्यायतंत्र के बारे मे हम ऊपर लिखित प्रथम चार (४) समस्या को हल करने के लिये ज्यूरी सिस्टम या ज्यूरी सिस्टम या प्रजा एवम नागरिक आधीन न्यायतंत्र का सुझाव करते हैं एवं पांचवी (५) समस्या को हल करने के लिये यह सुझाव देते हैं।
न्यायाधीश का चुनाव केवल लिखित परीक्षा से ही हो। यह हमारा दुर्भाग्य है की हम विश्व में प्रचलित प्रणाली जिसको ज्यूरी सिस्टम/ प्रजा एवम नागरिक आधीन न्यायतंत्र कहते है उसके बारे मे नहीं जानते। यह इस लिये की भारत के कु-बुद्धिजीवी ने भारत के छात्रो को कभी बताया नहीं एवम पढाई की किताबो में उसके बारे मे जानकारी नहीं दी।
इसलिये हमने इस ब्लॉग के माध्यम से ज्यूरी सिस्टम या ज्यूरी सिस्टम या प्रजा एवम नागरिक आधीन न्यायतंत्र के बारे मे जानकारी दी हे।
“जज सिस्टम या न्यायाधीश आधीन न्यायतंत्र” एवम “ज्यूरी सिस्टम या प्रजा आधीन न्यायतंत्र” क्या है? भारत में १२५ करोड नागरिक हे। भारत में हर साल २० लाख से ५० लाख विवाद या आपराधिक मामले कोर्ट या न्यायलय में आते है। अगर विवाद का निपटारा समय से नहीं होता है एवम अपराधियों को जल्दी सजा नहीं मिलती है तो वो अपराधी ज्यादा अपराध करेंगे तथा आम इंसान को परेशान करेंगे और उसके बाद समाज में अराजकता फेलेगी। अन्याय नागरिको में अविश्वास की भावना को जन्म देगा एवम नागरिको में अपने देश और अन्य नागरिकों के प्रति भावनात्मक लगाव कमजोर होगा।
अगर ऐसे फिर से अराजकता आ गयी तो भारत राष्ट्र फिर से कमजोर होंगा तथा फिर से गुलाम बन जायेगा। इस लिये भारत में स्थिरता बनाये रखने के लिये यह आवश्यक है की नागरिक को समय पर न्याय मिले, न्यायतंत्र में विवादों और आपराधिक मामले का निर्णय जल्दी आये एवम निर्णय लागू करने के लिए बल प्रयोग न करे।
भारत के कोई भी नागरिक के लिये यह सम्भव नहीं है की वो व्यक्तिगत रूप से यह २० लाख केस में अपनी दिलचस्पी ले। कोई भी एक नागरिक हर साल केवल २-५ विवाद में सबसे अच्छे रूप में अपना योगदान दे सकता है | इसलिए, नागरिकों के पास विकल्प ज्यादा नहीं है, हर विवाद के लिए कुछ व्यक्तियों को नियुक्त करे तथा हर केस में उनको अंतिम निर्णय लेने दे, और अपील के माध्यम से कुछ मामलों को जाँच करें। तो कोई एक प्रक्रिया हे जो राष्ट्र को लागू करनी होगी, स्पष्ट या परोक्ष रूप से, कुछ नागरिको का चयन करके उनको कोई विवाद पर निर्णय लेने दिया जाना चाहिए।
ज्यूरी सिस्टम- प्रजा एवम नागरिक आधीन न्यायतंत्र में हर केस में भारत के मतदाता में से यदि १२-१५ वयस्क नागरिक को जिला, राज्य या देश में से अनियमित रूप से या रेनडम तरीके से चुना जाता है और फिर वो कोर्ट या न्यायलय में जाकर फैसला करते हैं जिसे ज्यूरर या फिर जूरी सदस्य भी कहते हैं। यही लोग शिकायत सुनते हैं, सबूत जांचते हैं, एवम निर्णय देते हैं। भारत में १९५६ से पहले इसी तरह १२ लोग अनियमित रूप से या रेनडम तरीके से चुनकर निर्णय दिया करते थे।
उसके अलावा काफी सारे और कारण हैं जैसे की ज्यूरी की संख्या, योग्यता, जाँच के नियम, जो ज्यूरी सिस्टम को अलग करती है। लेकिन “ज्यूरी सिस्टम प्रजा एवम नागरिक आधीन न्यायतंत्र” तथा “जज सिस्टम या न्यायाधीश आधीन न्यायतंत्र” का अंतर नीचे लिखा हुआ है।
जज सिस्टम या न्यायाधीश आधीन न्यायतंत्र में भारत के २०,००० से १००,००० व्यक्ति भारत के २० से २५ लाख केस का निर्णय हर साल करते हैं, ज्यूरी सिस्टम या प्रजा एवम नागरिक आधीन न्यायतंत्र में हर केस में भारत के मतदाता में से १२-१५ नगरकों को अनियमित रूप से या रेनडम तरीके चुना जाता हे और फिर वो कोर्ट या न्यायलय में जाकर फेसला करते हैं. इस तरह हर साल २० से २५ लाख केस का निर्णय ३ करोड़ नागरिक करते हैं।
कई सारे केस एक ही न्यायाधीश को जाते हैं. एक न्यायाधीश अपने कैरियर में ५०० से २,००,००० केस सुनता है एवम ५,००० से २,००,००० केस मे अपना निर्णय देता है। हर केस में जूरी-सदस्य बदलते रहते हैं। हर नागरिक संविधान के अनुसार अगले ५ - १० साल तक फिर से जूरी में शामिल नहीं हो सकता।
मान लो के हर जनपद या जिले में हर साल ५००० केस आते हैं तो अगले ५ साल में २५००० केस आएंगे। जज सिस्टम या न्यायाधीश आधीन न्यायतंत्र में ये सारे केस २५-५० न्यायाधीश द्वारा सुलझाये जायेंगे। जूरी सिस्टम या प्रजा एवम नागरिक आधीन न्यायतंत्र में यही केस ३,००,००० से ४,००,००० नागरिको के द्वारा सुलझाये जायेंगे।
कई बार केश दरम्यान वार्तालाप एकदम महत्वहीन लगता है की क्या फर्क पड़ता है की केस का फेसला चाहे न्यायाधीश करे या अनियमित रूप से चुने गए नागरिक करे | लेकिन यही तुच्छ वार्तालाप एक राष्ट्र को मजबूत या कमजोर बनाने में एक बड़ा योगदान देता हे |
उदाहरण के लिये अमेरिका में फ्लोरिडा नामका एक राज्य है जहा पे साल २००६-२००७ में ६००० आपराधिक जूरी सुनवाई /ट्रायल्स हुए थे तथा उसका नतीजा कुछ (६००० * १२ = ७२०००) ७२००० नागरिको ने दिया था | जज सिस्टम या न्यायाधीश आधीन न्यायतंत्र में यही कुछ केस पर न्यायाधीश निर्णय देते | अगर हम २५ साल का समय काल देखे तो ज्यूरी सिस्टम प्रजा एवम नागरिक आधीन न्यायतंत्र में यह ६००० * २५ = १,५०,००० ज्यूरी सुनवाई/ट्रायल्स होगे जिसका फैसला १,५०,००० केस* १२ ज्यूरी मेम्बेर्स = १८,००,००० नागरिको के द्वारा होगा तथा जज सिस्टम या न्यायाधीश आधीन न्यायतंत्र में यही केस १०००-१५०० न्यायाधीश फैसला देंगे | अगर हम फैसला देने वाले व्यकियो की शंख्या १८००-२००० गुनी बढ़ा देते हैं तथा ज्यूरी सिस्टम का चयन करते हैं तो भाई भतीजावाद और भ्रष्टाचार कम या नहीं के बराबर होगा। ज्यूरी का वकील के साथ गठजोड़ होने की संभावना न्यायाधीश की वकील के साथ गठजोड़ होने की संभावना से काफी कम या नहीं के बराबर होंगी।
न्यायपालिका या न्यायप्रणाली बदलना यह सीधे हम नागरिक के बस में नही है। इसे बदलना या सुचारू रूप से लागू करवाना होगा तो वह राजनीतिक इच्छाशक्ति से संसद में पारित कर राष्ट्रपति की।अनुमति से ही शक्य है।
लेकिन यह विचार और व्यवस्था हम समज कर जन जन तक पहुचायेंगे तब यह वैचारिक क्रांति से ही हमारी आवाज संसद तक पहुचेगी। यह लंबी प्रक्रिया है केवल मेरा क्या ? और मुझे क्या ? से ऊपर उठकर #हम_करेंगे_हम_करेंगे #We_Can से ही शक्य होंगा।
जय हिंद
#जागो_भारत_जागो
Comments