इतिहास का विकृतिकरण
इतिहास का विकृतिकरण
भारतका गौरवशाली इतिहास, शिक्षण और समाज व्यवस्था :
'दुर्लभं भारते जन्म' भारतमे जन्म मिले इसमें अपना गौरव मानने वालों की यह पावनभूमि है। विश्वकी पुरातन सभ्यता-संस्कृतियों में सबसे पुरातन हमारी भारतिय सभ्यता जो भौतिक रूपसे सिंधु घाटी की सभ्यता के रूपमे जानी जाती है। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो और भारतके अन्य प्रांतों में खुदाई से मिले अवशेष इस बात का प्रमाण है। वैदिक काल से लेकर आजतक का गौरवशाली इतिहास प्रेरणादायक अवतारों, ऋषिमुनियों, मनीषीयों, आचार्यो, विद्वान तत्वचिंतक महापुरुषोंके न केवल विचारों से परंतु उनके कर्मयोग से देदीप्यमान है। जीवनके सर्वागीण विकासार्थ आचार विचार व्यवहार में मार्गदर्शन करने वाले हमारे वेद, उपनिषद, गीता जो विश्व को मार्गदर्शन कर भारतको विश्वगुरु बनानेमें समर्थ है एवं सतत विश्व को मार्गदर्शन करते आये है। विदेशी आक्रमण के पश्चात पिछली 6-7 सदियों से वैदिक तत्वज्ञान और वाङ्मय का प्रभाव जरूर कम हुआ है। यह समजने के लिए हमे पीछे मुड़कर देखना होंगा की ऐसा क्यों हुआ? लेकिन यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नही होंगी की 'Max Müller मैक्स मुलर' जैसे पाश्चात्य तत्वचिंतको के कारण ही आज विश्वमे हमारे वैदिक वाङ्मय की संभावना हुई है।
ऐसा कहा जाता है कि जिनके शासनकाल में कभी सूर्यास्त होता ही नही था ऐसे अंग्रेज जहाँ गये वहाँ उन्होंने येनकेन प्रकरेण स्थानीय प्रजाको अपना क्रिश्चन धर्म लागू करने के लिए मजबूर कर दिया था। क्योंकि क्रिश्चन धर्मको राज्याश्रय था। ठीक इसी तरह इस्लामिक शासकोने तलवारके बलबूते पर विश्वको इस्लामिक बनाने की कोशिष की है जो अत्याचार आज तक चालु है। इतनाही नही हमारी भारतभूमि से पूर्वविश्व में पहुंचे बौद्धधर्म को भी तत्कालीन सम्राट अशोक द्वारा राज्याश्रय मिला था। हम हिंदु जिन्हें अवतार के रूपमे मानते-पूजते ऐसे भगवान बुद्धकी निवृत्तिवादी विचारधारा जिसे तत्कालीन शासको द्वारा राज्याश्रय था, 4 सदियों से अधिक क्रूर इस्लामिक शासकोंका अत्याचारी शासन, तत्पश्चात अंग्रेजों का 3 सदियों का शासनकाल फिर भी हमारी अपौरूषेय 'सनातन वैदिक संस्कृति' के पुरातन वटवृक्षकी गहरी जड़ों को हिला नही पाई है। हां इस भयंकर झंझावात और आंतरिक कमजोरीसे कुछ कमजोर डाली पत्ते जरूर हिले है।
अंग्रेजों द्वारा इतिहास और शिक्षण व्यवस्था पर प्रहार एवं विकृतिकरण :
अंग्रेजों द्वारा इतिहास और शिक्षण व्यवस्था पर प्रहार एवं विकृतिकरण :
अंग्रेजोंके साशनकाल दरम्यान 'लॉर्ड थौमस् बैबिंग्टन् मैकाॅलेऽ' ने 1835 में भारत दौरे के दरम्यान इस बात का गहरा अध्ययन किया था उन्होंने वैदिक वाङ्मय का अंग्रेजी अनुवाद कर वैदिक संस्कृति को तत्वतः समजा, गुरुकुल शिक्षण पद्धति का बारीकी से अध्ययन किया। औऱ देखा की सनातन वैदिक धर्म मे केवल आध्यात्मिक नही जिवन की समग्रता से सर्वागीण विकास की बात है।
" यतो अभ्युदय निःश्रेयस सिद्धि सह धर्मः। "
अर्थात, जिससे हमारे जीवन का समग्रता से भौतिक उत्कर्ष हो, उसे धर्म कहते है !
उन्हें भारतिय वैदिक संस्कृति की यह समग्रता, तेजस्विता और अस्मिता समज में आ गई। मानव जीवनकी नींव बालक काल में ही शिक्षण पद्धति द्वारा वैदिक वाङ्मय द्वारा तेजस्विता और अस्मिता युक्त वैदिक विचारों से बीजारोपण और सिंचन किया जाता था। जिससे जीवनका सर्वांगीण विकास होता था।
1835 में लार्ड मैकाले ने भारत का दौरा किया और इंग्लैंड जाकर ब्रिटिश संसद में अपना रिपोर्ट देते हुए क्या कहा - मैं पूरा भारत घूमा, वहां पर ना ही मुझे कोई भिखारी और ना ही मुझे कोई चोर मिला, मुझे किसी भी तरह से ना ही कोई धन की कमी दिखाई दी। वहां पर लोगों की Morale Values नैतिक मूल्यों बहुत ऊँची है, लोग बहुत Intelligent बुद्धिमान है व उनकी क्षमता Caliber इतनी अधिक है की हम उन्हें नहीं जीत सकते - जब तक की हम उनकी रीढ़ की हड्डी, उनके एजुकेशन सिस्टम को न तोड़ दें यानी उनकी आध्यात्मिक व सांस्कृतिक विराशत को खत्म न कर दें भारत को जीतना मुश्किल ही नहीं असंभव है।
इसलिए मेरा (लार्ड मेकाले) प्रस्ताव है की उनके पुराने एजुकेशन सिस्टम व उनकी सांस्कृतिक विरासत को पहले खत्म किया जाए और उन्हें भरोसा दिलाया जाए की ये सिस्टम सही नहीं है। उन्हें भरोसा दिलाया जाए की इंग्लिश इससे ज्याद अच्छी है और उनके पुराने एजुकेशन सिस्टम से अच्छी है ताकि उनका स्वाभिमान (आत्मसम्मान) खत्म हो जाये और अपनी मूल संस्कृति से भटक जाएँ। तभी जो हम चाहते है वो हो सकता है, यानी तभी हम उन पर हावी हो सकते है अन्यथा नहीं।
इस सब से आप क्या समझते है, यही के हमारा पुराना एजुकेशन सिस्टम आज के पाश्चात्य एजुकेशन सिस्टम से बहुत बहुत ज्यादा अच्छा था।यानी ट्रेडिशनल एजुकेशन वर्सेस मॉडर्न एजुकेशन सिस्टम को देखें तो किताबों में जो सिलेबस है वो भी हिन्दू विरोधी, बच्चों को भटकाने वाला, शहिदों का अपमान करने वाला, इतिहास तो तोड़ मोड़ कर पेस करने वाला, सांस्कृतिक धरोहर व विराशत का अपमान करने वाला व कुल मिलाकर देशभक्ति की भावना पैदा करने वाला नहीं है। जब तक एक एक विद्यार्थी को हम गुरुकुल का माहौल नहीं देंगे तो ये सब संभव नहीं है और विद्यार्थी के लिए यह बातें बहुत जरुरी है।
इसलिए मेरा (लार्ड मेकाले) प्रस्ताव है की उनके पुराने एजुकेशन सिस्टम व उनकी सांस्कृतिक विरासत को पहले खत्म किया जाए और उन्हें भरोसा दिलाया जाए की ये सिस्टम सही नहीं है। उन्हें भरोसा दिलाया जाए की इंग्लिश इससे ज्याद अच्छी है और उनके पुराने एजुकेशन सिस्टम से अच्छी है ताकि उनका स्वाभिमान (आत्मसम्मान) खत्म हो जाये और अपनी मूल संस्कृति से भटक जाएँ। तभी जो हम चाहते है वो हो सकता है, यानी तभी हम उन पर हावी हो सकते है अन्यथा नहीं।
इस सब से आप क्या समझते है, यही के हमारा पुराना एजुकेशन सिस्टम आज के पाश्चात्य एजुकेशन सिस्टम से बहुत बहुत ज्यादा अच्छा था।यानी ट्रेडिशनल एजुकेशन वर्सेस मॉडर्न एजुकेशन सिस्टम को देखें तो किताबों में जो सिलेबस है वो भी हिन्दू विरोधी, बच्चों को भटकाने वाला, शहिदों का अपमान करने वाला, इतिहास तो तोड़ मोड़ कर पेस करने वाला, सांस्कृतिक धरोहर व विराशत का अपमान करने वाला व कुल मिलाकर देशभक्ति की भावना पैदा करने वाला नहीं है। जब तक एक एक विद्यार्थी को हम गुरुकुल का माहौल नहीं देंगे तो ये सब संभव नहीं है और विद्यार्थी के लिए यह बातें बहुत जरुरी है।
जो काम मुस्लिम शासक तलवारके बलबूत्ते नही कर सके वह बुद्धिशाली अंग्रेजों ने बुद्धिबल से कर दिखाया। उन्हें इंग्लैंड बैठेबैठे अपने नियंत्रण में काम करने वाले 'बाबूओं' की जरूरत थी जो उन्होंने 'भारतीय सेवा आयोग' Indian Service Commission' के माध्यम से विविध क्षेत्रों में शिक्षण देकर 'बाबू' बनाने के कारखाने (शिक्षण संस्थान) शरू किये। आज भी हमारे यहाँ केवल नाम बदलकर यही शिक्षण पद्धति भारतीय प्रशासनिक सेवा 'Indian Administrative Service' के नाम से चल रही है। जो हमारी सर्वोच्च शिक्षण उपलब्धि मानी जाती है। जिसमे जीवन की सर्वांगीण नही एकांगी विकास की बात है जिसमें केवल जीवनयापन का ज्ञान How To earn a bread को ही महत्व दिया जाता है। जब की गुरुकुल पद्धति में जीवन विष्यक ज्ञानमे रोटी के साथसाथ सर्वागीण विकासकी 14 विद्या और पेट भरने की वर्णाश्रम अनुसार 64 कलाओ का ज्ञान एक छत के नीचे बिना भेदभाव सहजता और सरलता से दिया जाता था। गुरुकुल पद्धति में शिक्षण राजमान्य नही ऋषिमान्य था। राजा को गुरुकुल में प्रवेश करना होता था तो वह अपना मुकुट गुरुकुल के बहार उतारकर सामान्य नागरिकों की तरह विनय से प्रवेश करते थे।
आज शिक्षण राजमान्य हो गया है। 5 साल में सरकार बदल जाये तो अपनी पार्टी के विचार अनुरूप पाठ्यक्रम वस्तु विचार बदल जाते है। आझादी के बाद मुस्लिम पक्षधर नहेरु सरकार ने पाठ्यपुस्तक को लिए इतिहास 'तैयार' करवाया था वह कैसा होंगा ??? यह हम भलीभाँति समज सकते है। इस इतिहास में मुख्यतः 6 सदियों पूर्व भारतमे मुस्लिम और अंग्रेज शासन और शासक का ही महिमा मंडन किया गया है। रामायण महाभारत कालको कोई महत्व नही दिया है। और वैदिक काल का तो उल्लेख ही नही है। कोंग्रेस सरकारने इस इतिहास के आधार पर "भारत एक खोज" नामक TV सीरियल दूरदर्शन पर प्रसारित की थी। वर्तमान पीढिको आज यह बात शायद काल्पनिक या असंभव लगती होंगी। परंतु यह थी हमारी ऋषिमान्य गुरुकुल शिक्षण पद्धति और वर्तमान शिक्षण पद्धति और बदलाव। जिसका संक्षिप्त परिचय यहाँ करवाया है।
पाश्चात्य विद्वानों के पुस्तको में भारतीय इतिहास का विकृतिकरण:
'Mother India' - Miss Meyo
'Ancient Sanskrit Literature' - Max Müller
'History of Philosophy' - Frank Thilly
'History of Education' - Grevs
'Is India Civilized' - Sir John Woodroffe
'India from Primitive Communism' - Karl Marx
जैसे अनेक पाश्चात्य लेखकों ने द्वेष और पूर्वाग्रहसे पीड़ित होकर हमारे इतिहास का विकृतिकरण करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। पाश्चात्य लेखकों के पुस्तकों में भारत को जंगली अवस्था वाला अप्रगत, अनपढ़ गवारों का देश के रूपमे चित्रित किया है।
'Mother India' - Miss Meyo
'Ancient Sanskrit Literature' - Max Müller
'History of Philosophy' - Frank Thilly
'History of Education' - Grevs
'Is India Civilized' - Sir John Woodroffe
'India from Primitive Communism' - Karl Marx
जैसे अनेक पाश्चात्य लेखकों ने द्वेष और पूर्वाग्रहसे पीड़ित होकर हमारे इतिहास का विकृतिकरण करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। पाश्चात्य लेखकों के पुस्तकों में भारत को जंगली अवस्था वाला अप्रगत, अनपढ़ गवारों का देश के रूपमे चित्रित किया है।
अंग्रेज संशोधक प्रजा है उन्होंने जब संशोधन किया तब लगा कि भारतीय संस्कृति इतनी बेकार और त्याज्य नही थी। उनके पास भी उत्तम वाङ्मय और अच्छे विचार थे तो उन्होंने अलग ही निष्कर्ष निकाला की भारतीयों ने 'नाट्यशास्त्र' ग्रीको से लिया है, 'रसायनशास्त्र' अरबों से लिया है, उनके अनुसार 'गीता' 'बाइबल' से लिखी गई है और महाकाव्य रामायण 'होमर' के 'इलियड' में वर्णित 'टोर्जन युद्ध' के आधार पर लिखा गया है। 'इलियड' में रानी हेलन के भाग जानेका वर्णन आता है, इसमें से रामायण की सीताके अपहरण की कल्पना ली गई है। भारीतय इतिहास को निकृष्ट और विकृत करने के लिए उन्होंने ऐसे ऐसे मनगढ़त संशोधन जगत के सामने रखे। उनके संशोधन के अनुसार राम, कृष्ण, रावण, लंका रामसेतु राम-रावण युद्ध, कौरव-पांडव महाभारत युद्ध चाणक्य वगेरे कोई वास्तविक घटना या जीवन चरित्र नही है यह सारे काल्पनिक पात्र है। यह बात हमारे तथाकथित पंडित ! भी स्वीकार कर रहे है।
संशोधन आगे बढ़ते यह सिद्ध होने लगा कि यह सारे काल्पनिक पात्र घटना नही वास्तविकता है, तो वह कहने लगे की यह पात्र भारतिय नही विदेशी है राम ईरान से है और रामायण की घटना मध्यपूर्व एशिया में हुई थी। क्योंकि उस समय अयोध्या में खच्चर से जोते जाने वाली गाड़ियां ईरान और मध्यपूर्व के देशों में पाई जाती थी।
इतिहास की ऐसी विकृति के सामने तत्कालीन भारतिय त्तत्वचिंतक स्वामी विवेकानंद, डॉ भांडारकर, केळकर, लोकमान्य तिळक, तेलंग जैसे महापुरुषों ने उनके उपरोक्त संशोधन और तथाकथित इतिहास का खण्डन भी किया है। परंतु तत्कालीन परस्थितियों वस सच्चे इतिहास का प्रभावी रूपसे मंंडन नही कर सकेथे। अंग्रेज शासक येनकेन प्रकरेण हमारे भव्यदिव्य इतिहास को तोड़मरोड़कर हमे ईर्षा, द्वेष और अपने स्वार्थ सिद्धि हेतु निचा दिखाने के लिए प्रयासरत थे जिसमें उन्हें वांछित सफलता भी मिली है, परंतु हमारी विडंबना है की हमारे SoCalled विद्वान आजभी उनके संशोधन का समर्थित कर इतिहास को काल्पनिक मानकर सदैव खंडन करते आये है।
आजादी पश्चात हमारे ही शासकों द्वारा इतिहास, शिक्षण और समाज व्यवस्था पर प्रहार और विकृतिकरण :
आजादी पश्चात हमारे ही शासकों द्वारा इतिहास, शिक्षण और समाज व्यवस्था पर प्रहार और विकृतिकरण :
हमारे गौरवशाली इतिहास को खत्म करने का हमारे ही लोगोने किया है। आजादी के बाद प्रधानमंत्री नहेरुजी ने भारतिय स्कूलों में पढ़ाने के लिए अल्लाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ.ताराचंद के अध्यक्षता वाली ईतिहास कमेटी की नियुक्ति कर लिखा गया है। इस कमेटी द्वारा लिखे गये विवादास्पद इतिहास बाबत तत्कालीन अन्य इतिहासकार एवं प्रबुद्ध वर्ग ने विरोध जाहेर में अपना विरोध प्रकट किया था।
इस Fabricated History इतिहास के बाबत तत्कालीन ढाका विश्वविद्यालय के कुलपति प्रसिद्ध इतिहासकार श्री R C Majumdar श्री रमेशचंद्र मजमुदार ने अपना अभिप्राय दिया था की 'एक अप्रामाणिक इतिहासकार द्वारा लिखा गया अप्रामाणिक इतिहास...., यह इतिहास, इतिहास न रहकर कोंग्रेसका प्रचार ग्रंथ है। इस विकृत इतिहास को प्रमाण भूत मान्यता देने हेतु श्री R C Majumdar पर दबाव बनाया गया था, उन्हें प्रलोभन भी दिए गए थे परंतु वह निर्लेप रहकर इतिहास के लिये किये गए संशोधन एवं विचारों से वफादार रहे थे।
फरवरी 1969 में TIMES OF INDIA में डॉ ताराचंद कमेटी लिखत इतिहास की कड़ी समालोचना करते हुए न्यायमूर्ति माननीय श्री खोसलाने तीन मननीयलेख में लिखेथे "यदि ऐसा ही इतिहास लिखना हो तो छोड़ दो इस इतिहास को....! और बहेतर यह होंगा की इतिहास का विषय ही पाठ्यक्रम से निकाल दो "।
इतना ही नही स्वयं डॉ ताराचंद ने इस ग्रँथ की प्रस्तावना में स्वीकार किया है की 'मैने इतिहास की सारी घटनाएं इसमें समाविष्ट नही की है, कुछ चुनिंदा घटना ही इसमें समाविष्ट की है'। सोमनाथ मंदिर तोड़ने का कार्य गज़नी के मोहम्मद ने किया था यह बात डॉ ताराचंद स्वीकार करते है, लेकिन उसे इतिहास में समाविष्ट नही किया है। क्योकि उन्हें ऐसा करने के लिए बाध्य किया गया था। मराठाओ के इतिहास पर कैची चलाई है लेकिन अपनेआपको पंडित कहलाने वाले नहेरुने! महान अकबर, शाहजहां, टीपू सुलतान, बहादुरशाह जफर का महिमा मंडन करवाया है, लेकिन महाराणा प्रताप, पेशवा बाजीराव जैसे राजपूतों को जानबूझकर भुलाया गया है। यहाँ प्रश्न होता है की यह 'इतिहास' है या 'पुराण' ???
डॉ ताराचंद के इतिहास को सनातन वैदिक काल मान्य ही नही है।
इस Fabricated History इतिहास के बाबत तत्कालीन ढाका विश्वविद्यालय के कुलपति प्रसिद्ध इतिहासकार श्री R C Majumdar श्री रमेशचंद्र मजमुदार ने अपना अभिप्राय दिया था की 'एक अप्रामाणिक इतिहासकार द्वारा लिखा गया अप्रामाणिक इतिहास...., यह इतिहास, इतिहास न रहकर कोंग्रेसका प्रचार ग्रंथ है। इस विकृत इतिहास को प्रमाण भूत मान्यता देने हेतु श्री R C Majumdar पर दबाव बनाया गया था, उन्हें प्रलोभन भी दिए गए थे परंतु वह निर्लेप रहकर इतिहास के लिये किये गए संशोधन एवं विचारों से वफादार रहे थे।
फरवरी 1969 में TIMES OF INDIA में डॉ ताराचंद कमेटी लिखत इतिहास की कड़ी समालोचना करते हुए न्यायमूर्ति माननीय श्री खोसलाने तीन मननीयलेख में लिखेथे "यदि ऐसा ही इतिहास लिखना हो तो छोड़ दो इस इतिहास को....! और बहेतर यह होंगा की इतिहास का विषय ही पाठ्यक्रम से निकाल दो "।
इतना ही नही स्वयं डॉ ताराचंद ने इस ग्रँथ की प्रस्तावना में स्वीकार किया है की 'मैने इतिहास की सारी घटनाएं इसमें समाविष्ट नही की है, कुछ चुनिंदा घटना ही इसमें समाविष्ट की है'। सोमनाथ मंदिर तोड़ने का कार्य गज़नी के मोहम्मद ने किया था यह बात डॉ ताराचंद स्वीकार करते है, लेकिन उसे इतिहास में समाविष्ट नही किया है। क्योकि उन्हें ऐसा करने के लिए बाध्य किया गया था। मराठाओ के इतिहास पर कैची चलाई है लेकिन अपनेआपको पंडित कहलाने वाले नहेरुने! महान अकबर, शाहजहां, टीपू सुलतान, बहादुरशाह जफर का महिमा मंडन करवाया है, लेकिन महाराणा प्रताप, पेशवा बाजीराव जैसे राजपूतों को जानबूझकर भुलाया गया है। यहाँ प्रश्न होता है की यह 'इतिहास' है या 'पुराण' ???
तो उस भव्यदिव्य वैदिक कालका वर्तमान पीढ़ियों को भारतिय जीवन दर्शन कैसे हो सकेंगा ??? हमारी भव्यदिव्य सनातन वैदिक संस्कृति के खोखले नारों से सनातन धर्म का जय नही होंगा ! जय करवाना होंगा तो उसे पढ़ना-पढ़ाना पड़ेंगा। आज विश्वमे जर्मनी नेधरलेण्ड जैसे पाश्चात्य देशोमे गीता वेद उपनिषद द्वारा भारतिय जिवन दर्शन पढ़ाया जाता है। लेकिन हमारे देश की हिंदू बहुल प्रजा पर शासन करने वाले हिंदु शासको वाली बिनसंप्रदायिक सरकारो को मदरसों में कुरान या क्रिश्चन स्कूलों में बाइबल पढ़ाने पर एतराज नहीं है लेकिन गीता महाभारत रामायण पढ़ाने पर साम्प्रदायिकता दिखती है !!! यह आज की सबसे बड़ी विडंबना है।
आजादी के बाद भारत में कोंग्रेस शासनमें वामपंथी विचारधारा ने कैसे किया शिक्षण, साहित्यके द्वारा इतिहास और समाज का नुकसान ?
जिनकी उम्र पचास का आकड़ा पार कर चुकी है उन्हें याद होगा को साठ के दशक में रूस से बेहद सस्ती 'सोवियत संघ' 'सोवियत देश' 'सोवियत नारी' जैसी मासिक, पाक्षिक मैगजीन आती थीं। रूस ने हमारे यहाँ कोई धर्मशाला तो खोली नहीं थी। वो इन सस्ती किताबो की अच्छी कीमत देश समाज से अलग ढंग से वसूल रहा था। और ऐसा करने के लिए रास्ता दिया था कामरेड नेहरू ने। जवाहरलाल नेहरू की जीवनशैली पूंजीवादी थी मगर विचारधारा एक कट्टर वामपंथी की थी। इस तरह Duel Personality दोहरे मापदंड वाले व्यक्ति थे। उन्हें दोनों गुट का मजा लेना था, इसलिए उन्होंने विश्व की दोनो महाशक्तियाँ के बीच में अपना एक गुटनिरपेक्ष समूह खड़ा कर दिया। गुटनिरपेक्ष के प्रारंभिक दौर को ध्यान से देखें तो यहां इस आंदोलन को स्थापित करने वाले राजनेताओं का उद्देश्य अपने अपने राष्ट्र को लाभ पहुंचाने से अधिक स्वयं को अपने देश में राजनैतिक रूप से स्थापित करना था। अर्थात इन सब का व्यक्तिगत हित साधना ही प्रमुख उद्देश्य नजर आएगा। और नेहरू ने अपने दूरगामी राजनैतिक फायदे को देखते हुए वामपंथियों के लिए भारत के दरवाजे खोल दिए !
उन दिनों, 600 साल की गुलामी के कारण भारत में गरीबी थी। गुलाम देश को गरीब बनाना बेहद आसान है। वरना भारत की प्राचीन सामाजिक व्यवस्था इतनी आत्मनिर्भर थी की कोई भूखा नहीं होता था 'गरीब' और 'गरीबी' का अस्तित्व ही नहीं था। क्या होता है 'गरीब' और 'गरीबी' ? जिसके पास आधुनिक साधन सुविधा ना हो। लेकिन सनातन वैदिक काल में तो ऋषि मुनि साधन विहीन होते थे या यूं कहें कि साधन सम्पन्न ना होना ही साधू होने की पहली शर्त होती थी। मगर इन गरीब ब्राह्मण का स्थान समाज में शीर्ष पर था और शक्तिशाली राजा को भी समय समय पर इनकी कुटिया में नतमस्तक होना पड़ता। हमारे पूर्वजों ने ऐसी अद्भुत सामाजिक व्यवस्था बनाई थी। अर्थात हमारे जीवन दर्शन में गरीबी को लेकर दृष्टिकोण ही भिन्न था। मगर भूख और भिखारी का कोई अस्तित्व नहीं था।
एक अति समृद्ध देश में, पहले मुगलों और फिर अंग्रेजों ने, यहां की आर्थिक व्यवस्था पर चोट मार कर कई वर्गों का काम छीन कर उन्हें भुखमरी के स्तर तक पहुंचा दिया ! चातुर्वर्ण्य व्यवस्था में एक दुसरे पर निर्भर समाज की आतंरिक व्यवस्था को छिन्नभिन्न कर दिया गया !
इसे समझने के लिए यह उदाहरण उचित होगा की हिन्दुस्तान के गांव वर्षों तक इस गरीबी और भूखमरी के शिकार नहीं थे। और समाज का सबसे बड़ा विभाजन कलकत्ता में देखा जा सकता था जो अंग्रेजों की राजधानी लम्बे समय तक रही थी। वहाँ अगर पूंजीपति फलफूल रहे थे तो मजदूरों की संख्या भी कीड़े मकोड़ों की तरह तेजी से चारो और फ़ैल रही थी। यह वामपंथ के लिए सबसे उर्वरक राजनैतिक जमीन थी। और इसलिए सबसे लम्बे समय तक यहीं पर इन वामपंथियों ने राज किया।चूंकि इन वामपंथियों की राजनीति गरीबी पर निर्भर है, इसलिए इनके शासन काल में कलकत्ता में गरीबों की कई पीढ़ी खड़ी कर दी गई।
बहरहाल, हम पोस्ट के मुख्य मुद्दे पर आते हैं। कामरेड नेहरू ने देश का बौद्धिक क्षेत्र वामपंथियों को ठेके पर दे दिया। अब ठेके को देने लेने में कितना और क्या चलता है यह हम सब जानते हैं। ठेका मिलने के बाद वामपंथियों ने कॉलेज और विश्वविद्यालयों में अपनी विचारधारा के लोगों को स्थापित करना शुरू किया। और धीरे धीरे इन लोगों ने देश के सभी विशिष्ट शैक्षणिक संस्थाओं पर कब्जा कर लिया ! किताबो और स्कूल कॉलेज के कोर्स भी इन विचारधाराओं के द्वारा बनाये जाने लगे। धीरे धीरे पढ़ाने वाले प्रोफ़ेसर ही लेखक भी बन गए। और उन्होंने अपना पाठक बनाया अपने निरीह छात्रों को। आप पाएंगे पिछली कई सदी में अधिकांश हिंदी के लेखक शिक्षण संस्था से ही जुड़े मिलेंगे। इस तरह शिक्षक और छात्र, लेखक और पाठक भी बन गए। इस तरह से लेखन और शिक्षण हर तरफ इनका कब्जा हो गया। अब अगर कोई शिक्षक, चाहे जो लिखे, कोई छात्र इस पर कुछ कह तो सकता नहीं। ऐसे में प्रोफ़ेसर और लेखक ने घेर कर छात्रों के बौद्धिक क्षेत्र में बुरी तरह घुसपैठ की। जो भी कचरा इनके द्वारा लिखा गया वही कचरा पढ़ाया गया और इस तरह से एक तरफ जहां छात्रों का दिमाग कचरे का घर बना दिया गया वहीं हिंदी साहित्य कचरे का ढेर बनता गया और आम जन से दूर होता चला गया।
यही छात्र जब पढ़ लिख कर बाहर निकला तो वो कैसा नागरिक बनेगा उसकी सहज कल्पना की जा सकती है। क्योंकि हर क्लास में सामान्य छात्रों का ही प्रतिशत अधिक होता है, जिन्हे किताब में जो लिखा है या मास्टर ने जो पढ़ाया है वही उनके लिए पत्थर की लकीर बन जाता है ।ऐसे में धीरे धीरे देश में ऐसे नागरिकों की फौज खड़ी हो गई, जिन्हे राष्ट्रवाद और राष्ट्रगान पर बहस करना और बहस को सुनना अटपटा नहीं लगता। यही छात्र समाज के हर क्षेत्र में जाकर वही सब परोसते हैं जो उनके मन-मष्तिष्क में स्कूल के दिनों से भर दिया गया था। आखिर आज का छात्र ही कल का नागरिक है। और वामपंथ ने आज के छात्र को पिछले सत्तर साल में जो कचरा पढ़ाया वही कचरा देश में चारों ओर बिखरा हुआ देखा जा सकता है। कोई एक उदाहरण देखना हो तो यह देख सकते हैं की, जब जब देश के गौरवशाली इतिहास पर प्रहार हुआ देश का बड़ा वर्ग निष्क्रिय बैठा रहा। इस तरह से वामपंथ ने समाज को इस कदर बीमार कर दिया की जब भी कभी देश के समृद्ध अतीत को खंडित किया जाता है, सांस्कृतिक परम्परा की खिल्ली उड़ाई जाती है या फिर हमारे गुरूर को फिल्मो और साहित्यों के माध्यम से तोड़ामरोडा जाता है, हमारे अपने समाज का एक बड़ा वर्ग दर्शक बन कर ताली बजा रहा होता है।
कल जब मोदी जी से एकमात्र महत्वपूर्ण सवाल राष्ट्रगान पर उठ रहे वादविवाद और भारत तेरे टुकड़े होंगे जैसे नारों आदि पर पूछा गया तो सवाल के जवाब में उनका कहना उचित ही था की हमे देखना होगा की हमारी शिक्षा में कहाँ चूक रह गई।
कोंग्रेस शासन में राजनीतिक गठजोड के चलते भारत के महत्वपूर्ण न्यायपालिका, शिक्षण संस्थानों, सूचना प्रसारण, फ़िल्म निर्माण, आदि बड़े बड़े संस्थानोंमें जवाबदारी के महत्वपूर्ण स्थानो पर वामपंथी विचारधारा के लोगों को बिठाकर हमारे इतिहास और संस्कृति को नेस्तनाबूद करनेका षडयंत्र ही चलाया था। इतनाही नही भारतमें विदेशी मददसे चलने वाले NGO और आंदोलनकर्ताओ को पुरष्कृत कर उन्हें देशकी तरक्की में रुकावटे खड़ी करने के लिए प्रोत्साहित किया गया है। यह सब देशद्रोही कार्य आजादी से आजतक शासन की मदद से बिना रोकटोक चलता रहा है।आजादी के बाद भारत में कोंग्रेस शासनमें वामपंथी विचारधारा ने कैसे किया शिक्षण, साहित्यके द्वारा इतिहास और समाज का नुकसान ?
जिनकी उम्र पचास का आकड़ा पार कर चुकी है उन्हें याद होगा को साठ के दशक में रूस से बेहद सस्ती 'सोवियत संघ' 'सोवियत देश' 'सोवियत नारी' जैसी मासिक, पाक्षिक मैगजीन आती थीं। रूस ने हमारे यहाँ कोई धर्मशाला तो खोली नहीं थी। वो इन सस्ती किताबो की अच्छी कीमत देश समाज से अलग ढंग से वसूल रहा था। और ऐसा करने के लिए रास्ता दिया था कामरेड नेहरू ने। जवाहरलाल नेहरू की जीवनशैली पूंजीवादी थी मगर विचारधारा एक कट्टर वामपंथी की थी। इस तरह Duel Personality दोहरे मापदंड वाले व्यक्ति थे। उन्हें दोनों गुट का मजा लेना था, इसलिए उन्होंने विश्व की दोनो महाशक्तियाँ के बीच में अपना एक गुटनिरपेक्ष समूह खड़ा कर दिया। गुटनिरपेक्ष के प्रारंभिक दौर को ध्यान से देखें तो यहां इस आंदोलन को स्थापित करने वाले राजनेताओं का उद्देश्य अपने अपने राष्ट्र को लाभ पहुंचाने से अधिक स्वयं को अपने देश में राजनैतिक रूप से स्थापित करना था। अर्थात इन सब का व्यक्तिगत हित साधना ही प्रमुख उद्देश्य नजर आएगा। और नेहरू ने अपने दूरगामी राजनैतिक फायदे को देखते हुए वामपंथियों के लिए भारत के दरवाजे खोल दिए !
उन दिनों, 600 साल की गुलामी के कारण भारत में गरीबी थी। गुलाम देश को गरीब बनाना बेहद आसान है। वरना भारत की प्राचीन सामाजिक व्यवस्था इतनी आत्मनिर्भर थी की कोई भूखा नहीं होता था 'गरीब' और 'गरीबी' का अस्तित्व ही नहीं था। क्या होता है 'गरीब' और 'गरीबी' ? जिसके पास आधुनिक साधन सुविधा ना हो। लेकिन सनातन वैदिक काल में तो ऋषि मुनि साधन विहीन होते थे या यूं कहें कि साधन सम्पन्न ना होना ही साधू होने की पहली शर्त होती थी। मगर इन गरीब ब्राह्मण का स्थान समाज में शीर्ष पर था और शक्तिशाली राजा को भी समय समय पर इनकी कुटिया में नतमस्तक होना पड़ता। हमारे पूर्वजों ने ऐसी अद्भुत सामाजिक व्यवस्था बनाई थी। अर्थात हमारे जीवन दर्शन में गरीबी को लेकर दृष्टिकोण ही भिन्न था। मगर भूख और भिखारी का कोई अस्तित्व नहीं था।
एक अति समृद्ध देश में, पहले मुगलों और फिर अंग्रेजों ने, यहां की आर्थिक व्यवस्था पर चोट मार कर कई वर्गों का काम छीन कर उन्हें भुखमरी के स्तर तक पहुंचा दिया ! चातुर्वर्ण्य व्यवस्था में एक दुसरे पर निर्भर समाज की आतंरिक व्यवस्था को छिन्नभिन्न कर दिया गया !
इसे समझने के लिए यह उदाहरण उचित होगा की हिन्दुस्तान के गांव वर्षों तक इस गरीबी और भूखमरी के शिकार नहीं थे। और समाज का सबसे बड़ा विभाजन कलकत्ता में देखा जा सकता था जो अंग्रेजों की राजधानी लम्बे समय तक रही थी। वहाँ अगर पूंजीपति फलफूल रहे थे तो मजदूरों की संख्या भी कीड़े मकोड़ों की तरह तेजी से चारो और फ़ैल रही थी। यह वामपंथ के लिए सबसे उर्वरक राजनैतिक जमीन थी। और इसलिए सबसे लम्बे समय तक यहीं पर इन वामपंथियों ने राज किया।चूंकि इन वामपंथियों की राजनीति गरीबी पर निर्भर है, इसलिए इनके शासन काल में कलकत्ता में गरीबों की कई पीढ़ी खड़ी कर दी गई।
बहरहाल, हम पोस्ट के मुख्य मुद्दे पर आते हैं। कामरेड नेहरू ने देश का बौद्धिक क्षेत्र वामपंथियों को ठेके पर दे दिया। अब ठेके को देने लेने में कितना और क्या चलता है यह हम सब जानते हैं। ठेका मिलने के बाद वामपंथियों ने कॉलेज और विश्वविद्यालयों में अपनी विचारधारा के लोगों को स्थापित करना शुरू किया। और धीरे धीरे इन लोगों ने देश के सभी विशिष्ट शैक्षणिक संस्थाओं पर कब्जा कर लिया ! किताबो और स्कूल कॉलेज के कोर्स भी इन विचारधाराओं के द्वारा बनाये जाने लगे। धीरे धीरे पढ़ाने वाले प्रोफ़ेसर ही लेखक भी बन गए। और उन्होंने अपना पाठक बनाया अपने निरीह छात्रों को। आप पाएंगे पिछली कई सदी में अधिकांश हिंदी के लेखक शिक्षण संस्था से ही जुड़े मिलेंगे। इस तरह शिक्षक और छात्र, लेखक और पाठक भी बन गए। इस तरह से लेखन और शिक्षण हर तरफ इनका कब्जा हो गया। अब अगर कोई शिक्षक, चाहे जो लिखे, कोई छात्र इस पर कुछ कह तो सकता नहीं। ऐसे में प्रोफ़ेसर और लेखक ने घेर कर छात्रों के बौद्धिक क्षेत्र में बुरी तरह घुसपैठ की। जो भी कचरा इनके द्वारा लिखा गया वही कचरा पढ़ाया गया और इस तरह से एक तरफ जहां छात्रों का दिमाग कचरे का घर बना दिया गया वहीं हिंदी साहित्य कचरे का ढेर बनता गया और आम जन से दूर होता चला गया।
यही छात्र जब पढ़ लिख कर बाहर निकला तो वो कैसा नागरिक बनेगा उसकी सहज कल्पना की जा सकती है। क्योंकि हर क्लास में सामान्य छात्रों का ही प्रतिशत अधिक होता है, जिन्हे किताब में जो लिखा है या मास्टर ने जो पढ़ाया है वही उनके लिए पत्थर की लकीर बन जाता है ।ऐसे में धीरे धीरे देश में ऐसे नागरिकों की फौज खड़ी हो गई, जिन्हे राष्ट्रवाद और राष्ट्रगान पर बहस करना और बहस को सुनना अटपटा नहीं लगता। यही छात्र समाज के हर क्षेत्र में जाकर वही सब परोसते हैं जो उनके मन-मष्तिष्क में स्कूल के दिनों से भर दिया गया था। आखिर आज का छात्र ही कल का नागरिक है। और वामपंथ ने आज के छात्र को पिछले सत्तर साल में जो कचरा पढ़ाया वही कचरा देश में चारों ओर बिखरा हुआ देखा जा सकता है। कोई एक उदाहरण देखना हो तो यह देख सकते हैं की, जब जब देश के गौरवशाली इतिहास पर प्रहार हुआ देश का बड़ा वर्ग निष्क्रिय बैठा रहा। इस तरह से वामपंथ ने समाज को इस कदर बीमार कर दिया की जब भी कभी देश के समृद्ध अतीत को खंडित किया जाता है, सांस्कृतिक परम्परा की खिल्ली उड़ाई जाती है या फिर हमारे गुरूर को फिल्मो और साहित्यों के माध्यम से तोड़ामरोडा जाता है, हमारे अपने समाज का एक बड़ा वर्ग दर्शक बन कर ताली बजा रहा होता है।
कल जब मोदी जी से एकमात्र महत्वपूर्ण सवाल राष्ट्रगान पर उठ रहे वादविवाद और भारत तेरे टुकड़े होंगे जैसे नारों आदि पर पूछा गया तो सवाल के जवाब में उनका कहना उचित ही था की हमे देखना होगा की हमारी शिक्षा में कहाँ चूक रह गई।
परंतु 2014 में हुऐ सत्तापरिवर्तन से देशवासियों को उम्मीद की किरणें दिखाई देने लगी है। धीरे धीरे अंधकार दूर हो रहा है प्रकाश की किरणें दिखाई दे रही है। श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार सकारात्मक निर्णय एवं कार्य करने लगी है। परंतु नौकरशाही Bureaucracy में आज भी वामपंथी विचारधारा की पकड़ है। जो हालमें सुपिमकोर्टके जजों की प्रेसकोंफ्रेंस, JNU में वामपंथी विचारधारा प्रेरित छात्रसंघ द्वारा भारत के टुकड़े करने वाली घटना।से शाबित होता है। असहिष्णुता के नाम एवार्ड वापसी गैंग वर्तमान सरकार को येनकेन प्रकरेण बदनाम करने में लिप्त है। लेकिन वर्तमान सरकार की नीतियों औऱ निर्णयों से सामान्य प्रजा खुश है।
अब यह विघटनकारी गैंग फिल्मों द्वारा भारतिय इतिहास को विकृत करने का षड्यंत्र रचा है। इस कार्य मे मीडिया और भृष्ट न्यायतंत्र साथ दे रहा है।
फ़िल्म #पद्मावती से #पद्मावत तक फिल्म के प्रदर्शन के विरोध पर SC की प्रक्रिया, प्रतिक्रिया और भारतमे हिंदु विरोधी दोगली विचारधारा की पोल खोलती एक पोस्ट इतिहास के पन्नों से !...
एक समुदाय की भावनाओं को ठेस !!!
आतंकवादीयो को आतंकवादी कहना भावनाओं को ठेस पहुंचाता है, क्यों ???
कारण एक ही है, कुछ लोग मानते थे यह काम 'शबाब' ने कर दिखाया था खैर...
अमेरिकन एक्टर Tom Hanks टॉम हैंक्स के पूरे फिल्मी करियर में दो फिल्में सबसे यादगार हैं, उनके बेमिशाल अभिनय की प्रतिमा।
'Saving Private Ryan' सेविंग प्राइवेट रेयान और 'Da Vinci Code' द विंची कोड, 2006 में आयी दूसरी फिल्म 'Da Vinci Code' 'द विंची कोड' पर भारत के चार राज्यों नागालैंड, पंजाब, तमिलनाडु और गोवा में बैंड लगा दिया गया।
कारण यह पिक्चर ईसाई (कैथोलिक समाज) की भावनाओं को ठेस पंहुचाती है।
ये तो आधिकारिक बैन था, सरकार ने पायरेटेड सीडी भी ब्लाक कर दी थी।फिल्म की एक पायरेटेड सीडी ढूंढने में पूरा साल लग गया था।
एक फिल्म बनी थी 2005 में Sins, बैन कर दी गयी।
कारण कहानी एक इसाई (Preast) द्वारा महिलाओं का शोषण दिखाया गया था।
इस से भी भावनाओं को काफी ठेस पहुंची।
आप कभी गूगल पर सर्च करना, Best Song of Kishore Kumar और हर एक juke box में एक गाना जरूर आपको मिलेगा,
"तेरे बिना जिंदगी से कोई, शिकवा, तो नंही....."
संजीव कुमार और किशोर दा के कैरियर की माईलस्टोन फ़िल्म को तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा बैन कर दिया था। यह गाना निर्धारित तिथी से 26 हफ्ते यानी 182 दिन बाद सुना लोगों ने, पूरे 182 दिन बाद। कारण इस पिक्चर को कांग्रेस को ठेस पहुचाने वाली बताया गया था।
याद है 2013 में आयी पिक्चर कमल हसन की "विश्वरूपम"
ये मामला थोडा सा अलग है, कोर्ट और सेंसर बोर्ड ने रिलीज की अनुमति दे दी थी।
पर जललिता सरकार ने इसे मुस्लिम विरोधी मानते हुए तमिलनाडु में बैन कर दिया था।
कहानी का खैर भारत से कुछ लेना देना नहीं था, अफगानिस्तान में तालिबान द्वारा पीडित लोगो की कहानी ने तमिलनाडु के लोगो को बहुत ठेस पंहुचायी।
कहते हैं इस फिल्म को बनाने में मशहूर अभिनेता कमल हसन ने अपना घर तक गिरवी रखा था।
मूल फिल्म चूंकि तमिल में थी, तो भावनाओं को दुखाने की महंगी कीमत चुकानी पड़ी। तब वह सार्वजनिक रुप से भारत छोडने तक की घोषणा कर चुके थे।
मूल बंगलादेशी तस्लीमा नसरीन पर आज भी बंगाल में बैन है।
कारण उन्होंने बांग्लादेश में मुसलमानों द्वारा हिंदुओं के शोषण होने पर एक किताब लिखी थी "लज्जा"....
ठीक इसी तरह
The Satanic Verses Novel by Salman Rushdie (शैतानी आयतें....)
भारतीय मूल के बिट्रिस लेखक सलमान रुश्दी की ईस किताब ने दुनिया भर में हंगामा मचाया।
ईस किताब को ईस्लाम विरोधी मानते हुए तत्कालीन राजीव गांधी की कांग्रेस सरकार ने इस किताब को सम्पूर्ण भारतमें प्रतिबंधित कर दिया।
यहां तक कि ईस किताब का जापानी में अनुवाद करने वाले लेखक 'होतरसी ईरागसी' की हत्या कर दी गयी।
ईस किताब के इटालियन ट्रांसलेटर और नार्वे के प्रकाशक पर भी जानलेवा हमले हुए।
तो अगर आपको फ़िल्म पद्मावत पिक्चर बैन न करने पर बुरा सा कुछ लग रहा है तो यकीन मानिए,
बुरा तो आपको बहुत मानना चाहिए था, तब ही ईस बात की सार्थकता थी।
अब आता हु फिल्म के असल मुद्दे पर बहुत ही गहरी साजिस हिन्दुत्व को तोडने की हुई है, ब्राहम्ण भाइयो सावधान एक अनदेखा सच:
भंसाली की विवादित फिल्म पद्मावती पर हुआ सबसे बड़ा खुलासा !!!
20 जनवरी2018 – संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावती का हर जगह विरोध हो रहा था। यह विरोध और भी अधिक बढ़ने वाला है, क्योंकि इस फिल्म को लेकर चौंकाने वाला खुलासा हुऐ है। बता दें कि भंसाली ने अपने कुछ करीबी लोगों को अपनी फिल्म दिखाई है। सुदर्शन न्यूज़ के प्रमुख सुरेश चव्हाणके ने बताया कि इस फिल्म को लेकर एक ऐसे ही शख्स से उनकी बातें हुई हैं। साथ ही भंसाली और इस्लामिक जिहादियों की गहरी साजिश का भी पर्दाफाश हुआ है। यही कारण है कि भाजपा के पांच बड़े राज्यों में इस फिल्म पर रोक लगा दी गयी है।
यह फिल्म हिंदू विरोधी थी ये तो पता था लेकिन इस फिल्म में अलाउद्दीन खिलजी की जगह ब्राह्मणो को विलेन के रूप में दिखा दिया जायेगा, ये पता नहीं था। जी हां, इस फिल्म में भंसाली ने अलाउद्दीन खिलजी को तो अच्छे शाशक के रूप में पेश किया है, और दिखाया गया है कि खिलजी तो हमला ही नहीं करना चाहता था, राजपूतों की औरतों को लुटवाने के लिए ब्राह्मणो ने ही अलाउद्दीन को उकसाया था। तब जाकर खिलजी ने ऐसा कदम उठाया।
इससे भंसाली की सोच का पता चलता है। भंसाली ने दिखाया है कि, कैसे ब्राह्मण मिलकर राजपूतों की औरतों को इस्लामिक दरिंदों से लुटवाते थे। हिन्दुओ को ही विलन के रूप में भी दिखाया है। जिसका सीधा-सीधा मकसद है हिन्दुओं को जातियों में बांटकर उनकी एकता को तोड़ देना। यही कारण है कि इस्लामिक माफियाओं ने इस फिल्म में पानी की तरह पैसे को बहाया ताकि हिंदू समाज में फूट डाली जा सके।
मतलब साफ़ है कि भंसाली इस फिल्म की आड़ में हिन्दू ब्राह्मणो को विलन बना रहा है, ताकि हिंदू समाज बंट सके और राजपूतों और ब्राह्मणो में फूट डालने के लिए एक सोची समझी साजिश के तहत इस फिल्म का निर्माण किया गया है। इतना ही नहीं इस फिल्म में ब्राह्मणो की जमकर बुराई की गयी है और ब्राह्मणों की छवि को बिगाड़ने का प्रयास किया गया है।
इतिहास के इस्लामिक बलात्कारियों को महान और निर्दोष बताया गया है। साथ ही बताया गया है की ब्राह्मणों के द्वारा सीधे-साधे व शरीफ इस्लामिक शासको को उल्टी-सीधी बातें करके भड़काया जाता था। अब पूरा यकीन हो चुका है कि ये फिल्म हिंदू विरोधी है और इस फिल्म का मुख्य मकसद हिन्दुओं की एकता को तोड़ने का ही है।
साभार - 'विजिगीषु जीवनवाद'
सौंदर्यवति_बुद्धिमान_महारानी_पद्मावती_इतिहास_के_पन्नों_में..
जिज्ञासु मित्रों को इतिहास पढ़ने का अनुरोध, गुजराती भाषा में है परंतु कोशिश जरूर करें। और अपने अभिप्राय दर्शाये।
The Central Advisory Board of Education at their Fourteenth meet held in January, 1948, considered the question of Secondary Education in country. In view of its importance for the educational system as a whole the Board resolved that a Commission may be appointed by the Government of India to (a) review the present Position of Secondary Education in India make recommendations in regard to the various problems related thereto. the resolution of the Central Advisory Board of Education was endorsed by the All Indian Education Conference convened by the Hon'ble Minister education in January, 1948. In pursuance of these recommendations, the government of India appointed a Committee consisting of the following members:
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The Central Advisory Board of Education at their Fourteenth meet held in January, 1948, considered the question of Secondary Education in country. In view of its importance for the educational system as a whole the Board resolved that a Commission may be appointed by the Government of India to (a) review the present Position of Secondary Education in India make recommendations in regard to the various problems related thereto. the resolution of the Central Advisory Board of Education was endorsed by the All Indian Education Conference convened by the Hon'ble Minister education in January, 1948. In pursuance of these recommendations, the government of India appointed a Committee consisting of the following members:
1. Dr. Tara Chand. M.A., D.Phil. (Oxon), Educational Adviser to the Govt. of India (Chairman).
(In the absence of the Educational Adviser, Prof. Humayun Kabir, M.A.(Oxon), Joint Educational Adviser was to act as Chairman).
2. P. C. Sanyal, Esq., M.A., M.B.E., Director of Public Instruction, Assam.
3. Dr. Snehamoy Dutta, M.Sc. (Cal.), D.Sc. (Lond.), D.I.C., F.N. Director of Public Instruction, West Bengal.
4. Kamta Prasad, Esq., B.A. (Cantab), O.B.E., Director of Public Instruction, Bihar.
5. D. C. Pavate, Esq., M.A. (Cantab), Director of Public Instruction, Bombay.
6. Dr. V. S. Jha, Ph.D., Director of Public Instruction, C.P., & Berar
7. D. S. Reddi, Esq., M.A. (Oxon), Director of Public Instruction, Madras.
8. S. C. Tripathi, Esq., O.B.E., M.A., I.E.S., Director of Public Instruction, Orissa.
9. G. C. Chatterji, Esq., M.A., I.E.S., Director of Public Instruction, East Punjab.
10. Rai Bahadur Chuni Lall Sahney M.Sc., Director of Public Instruction U.P.
11. Dr. J. M. Mehta, Commissioner of Education, Baroda.
12. A Representative from Kashmir State.
13. Director of Public Instruction, Mysore, State.
14. A. Narayanantampi, Esq., B.A. (Oxon), Bar-at-Law, Director Public Instruction, Travancore State.
15. P. V R. Rao, Esq., I.C.S., Joint Secretary to the Government of India, Ministry of Defence.
16. K. G. Saiyidain, Esq., M.Ed. (Leeds), Educational Adviser to the Government of Bombay.
17. Mrs. Hannah Sen, C/O Lady Irwin College for Domestic Science Sikandra Road, New Delhi.
18. K. Zacharia, Esq., I.E.S. (Retd), Member, Federal Public Service Commission.
19. Principal, St. Mary's Training College for Women, Poona.
20. L. R. Sethi, Esq. M.A. (Toronto), Superintendent of Education Delhi and Ajmer-Merwara.
Report of committee
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Comments
ये पुस्तक pdf में चाहिए।
हर्षद आशोदिया
+973-66331781
बदलेमें और पीडीएफ भेजूंगा