इतिहास का कड़वा सच्च
कश्मीर के राजा हरिसिंह ने भरे दरबार में जवाहरलाल नेहरु को थप्पड़ भी मारा था और कश्मीर की सरहद से बाहर फिकवा दिया था।
हम लोगों में से बहुत ही कम जानते होंगे कि नेहरू पेशे से वकील था लेकिन किसी भी क्रांतिकारी का उसने केस नहीं लड़ा।
जानकारों के भी हैं अपने-अपने तर्क यह माना जाता है कि भारत की संसद, राज्यसभा और राष्ट्रपति मिलकर धारा 370 और आर्टिकल 35A को हटाने की शक्ति रखते हैं। संविधान के जानकारों के मुताबिक संविधान में 35 (a) का जिक्र है, जो जम्मू-कश्मीर से जुड़ा हुआ नहीं है। राष्ट्रपति ने जम्मू-कश्मीर से जुड़ा जो आदेश दिया है, वो आर्टिकल 35 (A) है। वहीं संविधान में जब-जब संशोधन किया जाता है, उसका जिक्र संविधान की किताब में किया जाता है। अब तक के हुए संशोधनों में आर्टिकल 35 (A) का जिक्र नहीं है हालांकि इस धारा को संविधान के परिशिष्ट (अपेंडिक्स) में शामिल किया गया है।
भारतमाता के इतिहास पर लगी इस कालिख को पोंछकर और एक भारत श्रेष्ठ भारत के प्रणेता लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल एवं महान शिक्षाविद, प्रखर राष्ट्रवादी चिंतक डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के कर्मयोग को पूर्ण कर टीम मोदीजी ने आज कश्मीर को संवैधानिक जिंजीरो से आजाद करवाया है।
इतिहास के पन्नो से ...
कश्मीर के महाराजा हरिसिंह
शेख अब्दुल्ला - जवाहरलाल नेहरू
कश्मीर के महाराजा हरिसिंह
बात उस समय की है जिस समय महाराजा हरिसिंह 1937 के दरमियान ही जम्मू कश्मीर में लोकतंत्र स्थापित करना चाहते थे लेकिन शेख अब्दुल्ला इसके विरोध में थे क्योंकि शेख अब्दुल्ला महाराजा हरिसिंह के प्रधानमंत्री थे और कश्मीर राज्य का नियम यह था कि जो प्रधानमंत्री होगा वही अगला राजा बनेगा लेकिन महाराजा हरि सिंह प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला के कुकृत्य से भलीभांति परिचित थे इसलिए कश्मीर के लोगों की भलाई के लिए वह 1937 में ही वहां लोकतंत्र स्थापित करना चाहते थे लेकिन शेख अब्दुल्ला ने बगावत कर दी और सिपाहियों को भड़काना शुरू कर दिया लेकिन राजा हरि सिंह ने समय रहते हुए उस विद्रोह को कुचल डाला और शेख अब्दुल्ला को देशद्रोह के केस में जेल के अंदर डाल दिया।
शेख अब्दुल्ला और जवाहरलाल नेहरू की दोस्ती प्रसिद्ध थी। जवाहरलाल नेहरू शेख अब्दुल्ला का केस लड़ने के लिए कश्मीर पहुंच जाते हैं, वह भी बिना इजाजत के राजा हरिसिंह द्वारा चलाई जा रही कैबिनेट में प्रवेश कर जाते हैं , महाराजा हरि सिंह के पूछे जाने पर की आप किसकी मंजूरी से यहाँ आये हो नेहरु ने बताया कि मैं भारत का भावी प्रधानमंत्री हूं।
राजा हरिसिंह ने कहा चाहे आप कोई भी है, बगैर इजाजत के यहां नहीं आ सकते अच्छा रहेगा आप यहां से निकल जाएं।
नेहरु ने जब राजा हरि सिंह के बातों को नहीं माना तो राजा हरिसिंह ने गुस्से में आकर नेहरु को भरे दरबार में जोरदार थप्पड़ जड़ दिया और कहा यह तुम्हारी कांग्रेस नहीं है या तुम्हारा ब्रिटिश राज नहीं है जो तुम चाहोगे वही होगा। तुम होने वाले प्रधानमंत्री हो सकते हो लेकिन मैं वर्तमान राजा हूं और उसी समय अपने सैनिकों को कहकर कश्मीर की सीमा से बाहर फेंकवा दिया।
कहते हैं फिर नेहरू ने दिल्ली में आकर शपथ ली कि वह 1 दिन शेख अब्दुल्ला को कश्मीर के सर्वोच्च पद पर बैठा कर ही रहेगा। इसीलिए बताते हैं कि भारत मे विलीनीकरण के समय कश्मीर को छोड़कर अन्य सभी रियासतों का जिम्मा सरदार पटेल को दिया गया और एकमात्र कश्मीर का जिम्मा भारत में मिलाने के लिए जवाहरलाल नेहरु ने लिया था।
सरदार पटेल ने सभी रियासतों को मिलाया लेकिन नेहरू ने एक थप्पड़ के अपमान के लिए भारत के साथ गद्दारी की ओर शेख अब्दुल्ला को मुख्यमंत्री बनाया और 1955 में जब वहां की विधानसभा ने अपना प्रस्ताव पारित करके जवाहरलाल नेहरू को पत्र सौंपा कि हम भारत में सभी शर्तों के साथ कश्मीर का विलय करना चाहते हैं तो जवाहरलाल नेहरू ने कहा ---- नहीं अभी वह परिस्थितियां नहीं आई है कि कश्मीर का पूर्ण रूप से भारत में विलय हो सके।
इस प्रकार उस पत्र को प्रधानमंत्री नेहरू ने इरादतन ठुकरा दिया था, और अपने अपमान का बदला लिया जीसका खामियाजा भारत आज तक भुगत रहा था।
आइये जाने क्या है धारा 370 :
स्वतंत्रता के बाद छोटी-छोटी रियासतों को भारतीय संघ शामिल किया गया। जम्मू-कश्मीर को भारत के संघ में शामिल करने की प्रक्रिया शुरू करने के पहले ही पाकिस्तान समर्थित कबिलाइयों ने उस पर आक्रमण कर दिया। उस समय कश्मीर के राजा हरि सिंह कश्मीर के राजा थे।
सरदार वल्लभ भाई पटेल के अथाह प्रयत्नों और दृढ़ संकल्पो से 564 रियासतों का बिना शर्त भारत में विलीनीकरण हो गया था लेकिन एकमात्र जम्मू-कश्मीर जिसके विलय की जिम्मेदारी स्वयं नेहरू ने ली थी वह भारत के साथ सशर्त मिला था। इसके पीछे नहेरु की वोटबैंक वाली कुटिल चाल थी। जिसका खामियाजा आज तक भुगतना पड़ा।
1947 में जब भारत और पाकिस्तान अलग हुए थे, उस वक्त जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरिसिंह ने कुटिल नेहरू की महत्वाकांक्षा देखते हुए दोनों में से किसी भी देश में शामिल ना होकर स्विजरलैंड जिसे अलग देश के रूप में रहने का फैसला किया था। लेकिन इसी बीच पाकिस्तानी सेना ने पश्तून कबाइलियों के नेतृत्व में जम्मू-कश्मीर पर हमला कर दिया, जिसके बाद हरि सिंह ने भारत सरकार से मदद मांगी। इसके बाद दोनों के बीच एक समझौता हुआ, जिसके तहत जम्मू-कश्मीर के रक्षा, संचार और विदेश मामलों से जुड़े फैसले लेने का अधिकार भारत के पास आ गया। 26 अक्टूबर 1947 को जम्मू-कश्मीर का विलय भारत के साथ हुआ था। 1950 में भारतीय संविधान में जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जे के साथ शामिल कर लिया गया।
सरदार वल्लभ भाई पटेल के अथाह प्रयत्नों और दृढ़ संकल्पो से 564 रियासतों का बिना शर्त भारत में विलीनीकरण हो गया था लेकिन एकमात्र जम्मू-कश्मीर जिसके विलय की जिम्मेदारी स्वयं नेहरू ने ली थी वह भारत के साथ सशर्त मिला था। इसके पीछे नहेरु की वोटबैंक वाली कुटिल चाल थी। जिसका खामियाजा आज तक भुगतना पड़ा।
1947 में जब भारत और पाकिस्तान अलग हुए थे, उस वक्त जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरिसिंह ने कुटिल नेहरू की महत्वाकांक्षा देखते हुए दोनों में से किसी भी देश में शामिल ना होकर स्विजरलैंड जिसे अलग देश के रूप में रहने का फैसला किया था। लेकिन इसी बीच पाकिस्तानी सेना ने पश्तून कबाइलियों के नेतृत्व में जम्मू-कश्मीर पर हमला कर दिया, जिसके बाद हरि सिंह ने भारत सरकार से मदद मांगी। इसके बाद दोनों के बीच एक समझौता हुआ, जिसके तहत जम्मू-कश्मीर के रक्षा, संचार और विदेश मामलों से जुड़े फैसले लेने का अधिकार भारत के पास आ गया। 26 अक्टूबर 1947 को जम्मू-कश्मीर का विलय भारत के साथ हुआ था। 1950 में भारतीय संविधान में जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जे के साथ शामिल कर लिया गया।
जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा क्यों मिला है ? वह भारत के अन्य राज्यों से किस तरह से अलग है ? वहां की राजनीति में क्या खास बात है ?
इन सारे सवालों का एक मात्र जवाब है, वहां लागू धारा 370 और 35A. धारा 370 और 35A इन दिनों चर्चा में है। जम्मू से लेकर दिल्ली तक की सियासत में इसे लेकर हो हल्ला मचा हुआ है।
ऐसे में यह जानना बेहद जरूरी है कि आखिर धारा 370 है क्या?
क्या इसे हटाया जा सकता है, जिसे लेकर यह चर्चा में है।
धारा 370 और आर्टिकल 35A के इतिहास को समझेंगे तभी यह समझ पाएंगे कि इसे हटाना कितना मुश्किल या सरल है। धारा 370 के बारे में विस्तार से तो संविधान की किताब में पढ़ा जा सकता है, लेकिन यहां इतना जानना काफी होगा कि इसके तहत कश्मीर राज्य तीन विषयों में भारतीय संघ से जुड़ा है और बाकी मामलों में उसे स्वायत्तता हासिल है।
धारा 370 की पूरी कहानी देश 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ. इससे पहले जब अंग्रेज यहां से जा रहे थे तो वे भारत छोड़कर जा रहे थे, किसी रियासत को नहीं। स्वाभाविक ही ये सभी रियासतें मिलाकर भारत ही थीं। जब रियासतें भारत में ही थीं तो विलय का कोई मतलब ही नहीं बनता। जब भारत से रियासतें बाहर हैं ही नहीं तो कैसा विलय ? लेकिन फिर भी विलय का प्रारूप बनाया गया। क्योंकि भारत के दो हिस्से किए जा रहे थे, एक का नाम पाकिस्तान और दूसरे का नाम हिंदुस्तान हुआ ऐसे में विलय पत्र जरूरी था।
प्रारूप बनाकर 25 जुलाई 1947 को गवर्नर जनरल माउंटबेटन की अध्यक्षता में सभी रियासतों को बुलाया गया इन सभी रियासतों को बताया गया कि आपको अपना विलय करना है, वह हिंदुस्तान में करें या पाकिस्तान में यह आपका निर्णय है। उस विलय पत्र को सभा में बांट दिया गया, यह विलय पत्र सभी रियासतों के लिए एक ही फॉर्मेट में बनाया गया था जिसमें कुछ भी लिखना या काटना संभव नहीं था। बस उस पर रियासतों के प्रमुख राजा या नवाब को अपने नाम पता, रियासत का नाम और सील लगाकर उस पर दस्तखत करके इसे गवर्नर को देना था और गवर्नर को यह निर्णय लेना था कि कौन सा राजा किस देश के साथ रह सकता है।
26 अक्टूबर 1947 को जम्मू और कश्मीर के तत्कालीन शासक महाराजा हरिसिंह ने अपनी रियासत के भारत में विलय के लिए विलय-पत्र पर दस्तखत किए थे। माउंटबेटन ने 27 अक्टूबर को इसे मंजूरी दी। न इसमें कोई शर्त शुमार थी और न ही रियासत के लिए विशेष दर्जे जैसी कोई मांग। इस वैधानिक दस्तावेज पर दस्तखत होते ही समूचा जम्मू और कश्मीर, जिसमें पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाला इलाका भी शामिल है, भारत का अभिन्न अंग बन गया। बाद के वर्षों में सरदार पटेल की पहल पर रियासत और राज्य दोनों के ही कानून एक हो गये जो केंद्र के संविधान के अधीन थे।
इस तरह से आय़ा धारा 370 का अस्तित्व
17 अक्टूबर 1949 को एक एक ऐसी घटना घटी जिसके कारण आजतक जम्मू और कश्मीर विवाद का विषय है। नहेरु की कुटिल चाल से संसद में गोपाल स्वामी अयंगार ने कहा कि हम जम्मू और कश्मीर को नया आर्टिकल देना चाहते हैं, तत्कालीन महाराजा हरिसिंह के दीवान रहे गोपाल स्वामी अयंगार भारत की पहली कैबिनेट में मंत्री थे। संसद में उनसे जब यह पूछा गया कि क्यों ? तो उन्होंने कहा कि आधे कश्मीर पर पाकिस्तान ने कब्जा कर लिया है और इस राज्य के साथ समस्याएं हैं, आधे लोग उधर फंसे हुए हैं और आधे इधर तो अभी वहां की स्थिति अन्य राज्यों की अपेक्षा अलग है तो ऐसे में वहां के लिए फिलहाल नए आर्टिकल की जरूरत होगी, क्योंकि अभी जम्मू और कश्मीर में पूरा संविधान लागू करना संभव नहीं होगा। अस्थायी तौर पर उसके लिए 370 लागू करना होंगा जब वहां हालात सामान्य हो जाएंगे तब इस धारा को भी हटा दिया जाएगा फिलहाल वहां धारा 370 से काम चलाया जा सकता है।
उल्लेखनीय है कि सबसे कम समय में चर्चा के बाद यह आर्टिकल संसद में पास हो गया, यह संविधान में सबसे आखिरी में जोड़ी गई धारा थी। भारतीय संविधान के 21वें भाग का 370 एक अनुच्छेद है। इस धारा के 3 खंड हैं इसके तीसरे खंड में लिखा है कि भारत का राष्ट्रपति जम्मू और कश्मीर की संविधान सभा के परामर्श से धारा 370 कभी भी खत्म कर सकते है। हालांकि अब तो संविधान सभा रही नहीं ऐसे में राष्ट्रपति को किसी से परामर्श लेने की जरूरत नहीं।
यहां यह समझने वाली बात यह है कि धारा 370 भारत की संसद लेकर आई है और वहीं इसे हटा सकती है इस धारा को कोई जम्मू और कश्मीर की विधानसभा या वहां का राजा नहीं लेकर आया जो हटा नहीं सकते हैं। यह धारा इसलिए लाई गई थी, क्योंकि तब वहां युद्ध जैसे हालात थे और उधर (POK) की जनता इधर पलायन करके आ रही थी ऐसे में वहां भारत के संपूर्ण संविधान को लागू करना तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने अपने अपमान के कारण उचित नहीं समझा था।
जम्मू कश्मीर के पास क्या विशेष अधिकार हैं - धारा 370 के प्रावधानों के मुताबिक संसद को जम्मू-कश्मीर के बारे में रक्षा, विदेश मामले और संचार के विषय में कानून बनाने का अधिकार है - किसी अन्य विषय से संबंधित कानून को लागू करवाने के लिए केंद्र को राज्य सरकार की सहमति लेनी पड़ती है - इसी विशेष दर्जे के कारण जम्मू-कश्मीर राज्य पर संविधान की धारा 356 लागू नहीं होती। राष्ट्रपति के पास राज्य के संविधान को बर्खास्त करने का अधिकार नहीं है - 1976 का शहरी भूमि कानून भी जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होता - भारत के अन्य राज्यों के लोग जम्मू-कश्मीर में जमीन नहीं खरीद सकते - भारतीय संविधान की धारा 360 यानी देश में वित्तीय आपातकाल लगाने वाला प्रावधान जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं हो सकता।
दिल्ली समझौता और धारा 35 A जम्मू-कश्मीर के भारत में शामिल होने के बाद शेख अब्दुल्ला वहां के अंतरिम प्रधानमंत्री बने 1952 में जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला और भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के बीच एक समझौता हुआ, जिसे दिल्ली समझौता कहा जाता है। इस दिल्ली समझौते के तहत संविधान की धारा 370 (1) (D) के तहत भारत के राष्ट्रपति को जम्मू और कश्मीर के‘राज्य विषयों’ के लाभ के लिए संविधान में “अपवाद और संशोधन” करने की ताकत देती है।
शेख अब्दुल्ला कश्मीर के प्रधानमंत्री ने अपने मित्र नहेरु से राज्य में नागरिकता का।अधिकार, अपना झण्डा और अपना संविधान मांगने की मांग की तो नहेरु ने बिना संसद की मंजूरी और चर्चा करवाये राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद पर दबाव बनाकर जो विषेसाधिकार दिलवाये वह है आर्टिकल 35a जो संविधान को बिना शंसोधित किये लागू करवाया था।
35a का इस्तेमाल करते हुए राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने प्रधानमंत्री नहेरु के दबाव से 14 मई 1954 को एक अध्यादेश के जरिए धारा 35 A को लागू किया। (राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद कानून के निष्णात थे उन्होंने इस अध्यादेश पर सही करने का।विरोध किया था लेकिन नेहरू ने बताया कि आप सही नही करेंगे तो मैं इसे कोंग्रेस अधिवेशन से पारित करवाऊंगा तब इस दबाव के चलते डॉ राजेन्द्र प्रसाद ने इस पर सही की थी) इसे सरल और स्पष्टता से समझने के लिए इस LINK पर दिये VDO Clip पर क्लिक कर सुने https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1432520370219239&id=100003838689323
ये धारा जम्मू-कश्मीर की सरकार और वहां की विधानसभा को जम्मू-कश्मीर का स्थायी नागरिक तय करने का अधिकार देती है इसी धारा के आधार पर 1956 में जम्मू कश्मीर ने राज्य में स्थायी नागरिकता की परिभाषा तय कर दी गई जो अब तक कि सबसे बड़ी विवाद की जड़ थी। तत्कालीन डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इसका विरोध किया था। पंडित जवाहर लाल नेहरू कैबिनेट में उद्योग और आपूर्ति मंत्री रहे डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने धारा 370 का कड़ा विरोध किया था। डॉ॰ श्यामा प्रसाद मुखर्जी जम्मू कश्मीर को एक अलग दर्जा दिए जाने के विरोधी थे इस के लिए उन्होंने ‘एक देश में दो विधान, दो निशान और दो प्रधान नहीं चलेगा’ का नारा दिया. मतभेदों के कारण उन्होंने मंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया था। इसके बाद उन्होंने नई राजनैतिक पार्टी‘भारतीय जनसंघ’ की स्थापना की थी।
वर्ष 1953 में श्यामा प्रसाद बिना परमिट के जम्मू कश्मीर की यात्रा पर निकले थे ऐसा करने के लिए उन्हें 11 मई 1953 को गिरफ्तार कर लिया गया गया था। गिरफ्तारी के कुछ दिन बाद ही 23 जून 1953 को उनकी रहस्यमय परिस्थितियों में मौत हो गई। गौर करने वाली बात यह थी कि तत्कालीन समय में 370 के मुताबिक कश्मीर में बिना परमिट यात्रा करना अवैध था, जिसे बाद में हटा दिया गया।
आर्टिकल 35A के अनुसार मुख्य बिंदु ...
1. जम्मू-कश्मीर का स्थायी नागरिक वह व्यक्ति है, जो 14 मई 1954 को राज्य का नागरिक रहा हो या फिर उससे पहले के 10 वर्षों से राज्य में रह रहा हो, साथ ही उसने वहां संपत्ति हासिल की हो।
2. भारत के किसी अन्य राज्य का निवासी जम्मू और कश्मीर का स्थायी निवासी नहीं बन सकता है और इसी कारण वो वहां वोट नहीं डाल सकता है।
3. राज्य किसी गैरकश्मीरी व्यक्ति को कश्मीर में जमीन खरीदने से रोकता है।
4. अगर जम्मू और कश्मीर की कोई लड़की किसी बाहर के लड़के से शादी कर लेती है तो उसके सारे अधिकार खत्म हो जाते हैं, साथ ही उसके बच्चों के अधिकार भी खत्म हो जाते हैं।
5. लेकिन राज्य का कोई पुरुष अगर बाहर की किसी महिला से शादी करता है, तो उसके अधिकार खत्म नहीं होते। उस पुरूष के साथ ही उसके होने वाले बच्चों के भी अधिकार कायम रहते हैं।
6. राज्य सरकार किसी कानून को अपने हिसाब से बदलती है तो उसे किसी भी कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती है।
7. कोई भी बाहरी व्यक्ति राज्य में व्यापारिक संस्थान नहीं खोल सकता है।
8. जम्मू-कश्मीर का अलग झंडा है।
9. भारत की संसद जम्मू-कश्मीर में रक्षा, विदेश मामले और संचार के अलावा कोई अन्य कानून नहीं बना सकती।
10. धारा 356 लागू नहीं, राष्ट्रपति के पास राज्य के संविधान को बर्खास्त करने का अधिकार नहीं।
11. संविधान में ये भी बताया गया कि सिर्फ जम्मू-कश्मीर विधानसभा ही राज्य के मूल निवासियों की परिभाषा को दो तिहाई बहुमत से कानून बनाते हुए बदल सकती है।
12. बाहर का कोई व्यक्ति जम्मू-कश्मीर राज्य द्वारा संचालित किसी प्रोफेशनल कॉलेज में एडमिशन भी नहीं ले सकता और ना ही राज्य सरकार द्वारा दी जाने वाली कोई मदद ले सकता है।
2. भारत के किसी अन्य राज्य का निवासी जम्मू और कश्मीर का स्थायी निवासी नहीं बन सकता है और इसी कारण वो वहां वोट नहीं डाल सकता है।
3. राज्य किसी गैरकश्मीरी व्यक्ति को कश्मीर में जमीन खरीदने से रोकता है।
4. अगर जम्मू और कश्मीर की कोई लड़की किसी बाहर के लड़के से शादी कर लेती है तो उसके सारे अधिकार खत्म हो जाते हैं, साथ ही उसके बच्चों के अधिकार भी खत्म हो जाते हैं।
5. लेकिन राज्य का कोई पुरुष अगर बाहर की किसी महिला से शादी करता है, तो उसके अधिकार खत्म नहीं होते। उस पुरूष के साथ ही उसके होने वाले बच्चों के भी अधिकार कायम रहते हैं।
6. राज्य सरकार किसी कानून को अपने हिसाब से बदलती है तो उसे किसी भी कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती है।
7. कोई भी बाहरी व्यक्ति राज्य में व्यापारिक संस्थान नहीं खोल सकता है।
8. जम्मू-कश्मीर का अलग झंडा है।
9. भारत की संसद जम्मू-कश्मीर में रक्षा, विदेश मामले और संचार के अलावा कोई अन्य कानून नहीं बना सकती।
10. धारा 356 लागू नहीं, राष्ट्रपति के पास राज्य के संविधान को बर्खास्त करने का अधिकार नहीं।
11. संविधान में ये भी बताया गया कि सिर्फ जम्मू-कश्मीर विधानसभा ही राज्य के मूल निवासियों की परिभाषा को दो तिहाई बहुमत से कानून बनाते हुए बदल सकती है।
12. बाहर का कोई व्यक्ति जम्मू-कश्मीर राज्य द्वारा संचालित किसी प्रोफेशनल कॉलेज में एडमिशन भी नहीं ले सकता और ना ही राज्य सरकार द्वारा दी जाने वाली कोई मदद ले सकता है।
भारतमाता के इतिहास पर लगी इस कालिख को पोंछकर और एक भारत श्रेष्ठ भारत के प्रणेता लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल एवं महान शिक्षाविद, प्रखर राष्ट्रवादी चिंतक डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के कर्मयोग को पूर्ण कर टीम मोदीजी ने आज कश्मीर को संवैधानिक जिंजीरो से आजाद करवाया है।
इतिहास के पन्नो से ...





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