कांग्रेस करे तो जय और बीजेपी करे तो भय !!!
धारा 370 हटाए जाने पर छाती पीटने वाले कांग्रेसियों से पूछो कि धारा 370 का हत्यारा कौन है ? क्या यह सच्चाई नहीं है कि कांग्रेस ने 1965 में ही धारा 370 का गला घोट दिया था !
कांग्रेस करे तो जय और बीजेपी करे तो भय। भारतीय जनता पार्टी में जब से मोदी युग की शुरुआत हुई है, कांग्रेस लगातार लोगों में भय पैदा करने की कोशिश कर रही है कि "बस अब लोकतंत्र खत्म होने वाला है।" मगर कांग्रेस को यह सोचना चाहिए कि हर बात पर लोकतंत्र खत्म हो जाने की दुहाई देने वाली उनकी दलील जनता के दिल में क्यों नहीं उतर रही है। क्या इस देश की जनता नासमझ है, निमूढ है, जो पढ़े-लिखे विद्वान कांग्रेसियों की बात समझ नहीं पा रही है ? या भारतीय जनता पार्टी ने सचमुच का ऐसा डर का माहौल पैदा कर दिया है कि कोई विरोध के लिए सामने आने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है ?
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास को देखें तो इनमें से दोनों ही बातें सच नहीं है। सच तो यह है कि भारत की जनता का कांग्रेस से भरोसा उठ गया है। 2014 के बाद देशमें अब ' राष्ट्रवाद ' खड़ा हुआ है। जनता के मन में यह बात घर कर गई है कि हर काम बीजेपी कर रही है जो नया है और कांग्रेस ने कभी न किया हो। अगर देशहित में बीजेपी जनता को बेहतर पैकेज दे रही है तो फिर जनता वही खरीदेगी। कांग्रेस को अपने अतीत में झांकना चाहिए। धारा 370 हटाए जाने पर छाती पीटने वाले कांग्रेसियों से पूछो कि धारा 370 का हत्यारा कौन है ? क्या यह सच्चाई नहीं है कि कांग्रेस ने 1965 में ही धारा 370 का गला घोट दिया था।
कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी बार-बार मोदी सरकार पर यह आरोप लगा रहे हैं कि जम्मू कश्मीर के जम्हूरियत के नेताओं को जबरन जेल के अंदर डाल दिया गया है, लोकतंत्र औऱ संविधान की हत्या हो रही है !!! लेकिन सच तो यह है कि दुनिया में सबसे ज्यादा लोकतांत्रिक और समाजवादी छवि के नेता पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भी उस वक्त कश्मीर के सबसे लोकप्रिय नेता शेख अब्दुल्ला को जेल में डाल दिया था।
कांग्रेस आरोप लगाती है कि क्षेत्रीय पार्टियों को तोड़कर बीजेपी राज्यों में अपनी सरकार बना रही है। कांग्रेस ने जम्मू-कश्मीर में यही तो किया था। जवाहरलाल नेहरू ने फरवरी 1964 में शेख अब्दुल्लाह की गुलाम मोहम्मद बख्शी की अगुवाई वाली नेशनल कॉन्फ्रेंस को तोड़कर डेमोक्रेटिक नेशनल कॉन्फ्रेंस बनाई और गुलाम मोहम्मद सादिक को जम्मू कश्मीर का 'वजीर-ए-आजम' यानी प्रधानमंत्री बना दिया। जिस तरह के हालात अभी देश में हैं ठीक उसी तरह से कांग्रेस ने नेशनल कॉन्फ्रेंस से अलग हुए गुलाम मोहम्मद सादिक की पार्टी का कांग्रेस में विलय कर लिया और फिर मार्च 1965 में धारा 370 की आत्मा को मार दिया गया। यह वक्त पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का था।
उस वक्त के तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के समय 1965 में कांग्रेस के अंदर इंदिरा गांधी के समर्थकों और विरोधियों के बीच सत्ता संघर्ष शुरू हो गया था। 1965 की लड़ाई का फायदा उठाते हुए पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तमाम चेतावनियों के बावजूद श्रीनगर में भारत-पाकिस्तान लड़ाई के वक्त सीमा के करीब सेना के साथ मौजूद रही। भारत-पाकिस्तान युद्ध के हालातों के बीच कांग्रेस ने अपनी पार्टी के वजीर-ए-आजम गुलाम मोहम्मद सादिक के जरिए धारा 370 में कई बदलाव करते हुए धारा 356 को जम्मू कश्मीर में के ऊपर लागू करवा दिया। धारा 356 केंद्र सरकार के हाथ में मौजूद वह खिलौना है जिसके जरिए जब चाहे केंद्र सरकार अपनी मर्जी की सरकार राज्यों पर थोप सकती है यानी राज्य सरकार को बर्खास्त कर राज्यपाल की नियुक्ति कर सकती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जम्मू कश्मीर में यह करने का हथियार कांग्रेस ही तो देकर गई है।
धारा 370 का गला कांग्रेस ने केवल इतना ही नहीं घोटा था। जम्मू कश्मीर रियासत को प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति यानी 'वजीरे-आजम' और 'सदर-ए-रियासत' का भी पद मिला हुआ था। तब सदर-ए-रियासत राजा हरीसिंह के उत्तराधिकारी कर्ण सिंह हुआ करते थे। कांग्रेस पार्टी ने अपनी पार्टी के डमी मुख्यमंत्री गुलाम मोहम्मद सादिक के साथ मिलकर जम्मू-कश्मीर के विशेष संविधान में कई तरह के बदलाव किए। सदर-ए-रियासत की जगह गवर्नर को नियुक्त कर दिया। गुलाम मोहम्मद सादिक के इस एहसान के बदले में 1967 के चुनाव में कांग्रेस ने ऐसी धांधली मचाई कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी के गुलाम मोहम्मद सादिक भारी बहुमत के साथ दोबारा मुख्यमंत्री बन गए और जम्मू कश्मीर के सबसे लोकप्रिय चेहरा शेख अब्दुल्ला जेल में कैद में पड़े रह गए। गुलाम मोहम्मद बख्शी की अगुआई वाली उनकी पार्टी नेशनल कॉन्फ्रेंस को महज 8 सीटें मिलीं।
उसी दौरान यह प्रावधान कर दिया गया कि जम्मू कश्मीर के झंडे के साथ भारत का झंडा भी लगेगा। जब कांग्रेस ने इतना कर ही दिया था तो बचा क्या रह गया था ? धारा 370 पहले से ही कोमा में थी, मोदी सरकार ने तो बस रहम करके युथनेशिया दिया है, यानी वेंटिलेटर पर पड़े हुए 370 का ऑक्सीजन हटाकर मुक्ति दी है। कांग्रेस ने राज्यपाल शासन लागू करने का प्रावधान करके धारा 370 के लिए कोई जगह नहीं छोड़ी थी। राज्यपाल के जरिए जब चाहे जितनी जमीन वहां भारत सरकार ले सकती थी या किसी को भी ले कर दे सकती थी।
ठीक इसी नक्शेकदम पर चलकर मोदी सरकारने 2014 से ही धारा 370 हटाने की पूर्व तैयारियां सत्तामें आते ही शरू कर दी थी। कश्मीर में जनवरी 2015 को पीडीपी के साथ सत्तामें भागीदारी करना यह उस ब्ल्यूप्रिंट के अनुरूप शरुआत थी। बीजेपी के समर्थकों को भी यह सांप-नवेला वाली साझीदारी रास नहीं आ रही थी। विपक्ष तो केवल राजनीतिक मतभेदों से चलकर विरोध कर रही थी। लेकिन ' कूटनीतिक चाणक्य ' की यह चाल कोई नही समज पाया न भविष्य में समज पायेंगे। 3 शाल सत्ता में रहकर बीजेपी ने महबूबा मुफ्ती सरकार से यथायोग्य समय देखकर समर्थन वापस लेकर वहाँ पर राष्ट्रपति शासन लगा दिया। सत्ता में रहकर कश्मीर राजनीत और शासन व्यवस्था में अनुकूल वातावरण बनाकर राष्ट्रपति शासन लगाना यही बीजेपी की सबसे पहली जीत हुई। औऱ MODI-2 की शरुआत में ही अपने घोषणापत्र के अनुसार बहुचर्चित और इसे हटाने में पैचेदी लगने वाली इस अस्थाई धारा 370 को केवल 2 दिनों में सामान्य प्रक्रिया से बिना रक्तपात के हटाकर, जम्मू कश्मीर 2 केंद्रशासित प्रदेश में विभाजित कर दशकों की इस त्रासदी का सुखद अंत ला दिया। जिसे आजादी के बाद की दूसरी बड़ी ' कश्मीरक्रान्ति ' के रूप में इतिहास याद रखेंगा। इस चाणक्यनीति को कोई राजनीतिक या कानूनी पंडित नही समज पाये।
अस्थाई धारा 370 के प्रावधान अनुसार इसके बदलाव या रद्द करने में राज्य की विधायिका या राज्यपाल के अनुमोदन से भारत की संसद इस पर निर्णय कर सकती है। यह काम जवाहरलाल नेहरू ने पूर्वमे किया हुआ था वही काम मोदी सरकार ने राज्य के राज्यपाल के अनुमोदन से किया है इसमें नया क्या है ?
मोदी सरकार के बिछाये इस जाल में फसकर कोंग्रेसियो समेत पूरे विपक्ष को चारों खाने चित्त हो गया ... और साँप निकलने के बाद संसदमें केवल लट्ठ भांजते रह गये... इस बात की भड़ास निकालते हुए हाल में नजरकैद दौरान ओमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती की नोकजोक कुत्ते-बिल्ली की तरह छीनाझपटी तक पहुंच गई, ओमर अब्दुल्ला का महबूबा पर आरोप था कि ' कश्मीर राजनीति में बीजेपी को लाने वाली तो तूं ही थी '।
कोंग्रेसियों को समझने की जरूरत है कि मोदी सरकार के इस जाल का तानाबाना तुम्हारे पूर्वजों ने ही बुना है। मोदी तो मौका ही खौज रहे थे जो विपक्ष की फूट ने उनको बैठेबिठाये दे दिया है। जो देश के लिये हितकारी भी है। इतना सब करने के बाद भी कॉन्ग्रेस जब कहती है कि मोदी सरकार जम्मू कश्मीर में जम्हूरियत का गला घोट रही है तो देश में तो छोड़िए जम्मू कश्मीर में भी किसी के गले नहीं उतरती है। कश्मीर की सामान्य जनता को धारा 370 से कोई सरोकार नहीं है। अलगाववादी नेताओं के बहकावे में फसे कुछेक को छोड़कर बाकी को तो विकास के धाराप्रवाह से जुड़ने में ही अपनी भलाई दिखती है। जम्मू और लदाखियों को तो अपना मुँहमाँगा मिल गया है। हाँ वहाँ के सियासतदानों और अलगाववादी ताकतों की नैया जरूर डूब गई है। शदियों से कश्मीर को अपनी जागीर मानने वाले घरानों और पाक परस्त अलगाववादीयों की दुकानें अब हमेशा के लिये बंद हो गई है। ऐसे में उनका रोना समज सकते है।
कोंग्रेसियों को समझने की जरूरत है कि मोदी सरकार के इस जाल का तानाबाना तुम्हारे पूर्वजों ने ही बुना है। मोदी तो मौका ही खौज रहे थे जो विपक्ष की फूट ने उनको बैठेबिठाये दे दिया है। जो देश के लिये हितकारी भी है। इतना सब करने के बाद भी कॉन्ग्रेस जब कहती है कि मोदी सरकार जम्मू कश्मीर में जम्हूरियत का गला घोट रही है तो देश में तो छोड़िए जम्मू कश्मीर में भी किसी के गले नहीं उतरती है। कश्मीर की सामान्य जनता को धारा 370 से कोई सरोकार नहीं है। अलगाववादी नेताओं के बहकावे में फसे कुछेक को छोड़कर बाकी को तो विकास के धाराप्रवाह से जुड़ने में ही अपनी भलाई दिखती है। जम्मू और लदाखियों को तो अपना मुँहमाँगा मिल गया है। हाँ वहाँ के सियासतदानों और अलगाववादी ताकतों की नैया जरूर डूब गई है। शदियों से कश्मीर को अपनी जागीर मानने वाले घरानों और पाक परस्त अलगाववादीयों की दुकानें अब हमेशा के लिये बंद हो गई है। ऐसे में उनका रोना समज सकते है।
लेकिन देश की सबसे पुरानी और सर्वाधिक सत्ता में रहने वाली कोंग्रेसपार्टी जनता की नब्ज परखे बिना इसका विरोध कर दुश्मनों की आवाज बन गई है उनके ब्यानों को पाकिस्तान हवा देकर भारत विरुद्ध दुनियां में वातावरण बनाने की नाकामियाब कोशिशे कर UNSC तक पहुंच गया। हालांकि वहाँ उसे चीन के साथ के बाद भी मुंह की खानी पड़ी और विश्वभरमे अपनी किरकिरी करवाई। कश्मीर मांगने वाले अब कटोरा लेकर POK बचाने की विश्वसमुदाय के समक्ष भीख मांग रहे है। इतना ही नहीं इधर कश्मीरक्रान्ति के बाद घाटी की शांति कोंग्रेस को अप्रत्याशित लग रही है, उन्हें यह शांति हजम नही हो रही है। उल्टे गलत बयानबाज़ी कर घाटी में आग लगाने की कोशिशे तक की। लेकिन मोदी - शाह - डावोल की तिक्कड़ी की पूर्व तैयारी और समज़बूज ने विरोधियों के नापाक इरादों को कामयाब नही होने दिया न होने देंगे।
कांग्रेस को अभी समझना होगा कि ' सौ चूहे खा कर बिल्ली हज पर नहीं जा सकती है ' मोदी सरकार को बार-बार कोसने वाली कांग्रेस अगर अपनी गिरेबान में झांक कर देखेगी तो उसे समझ में आ जाएगा कि जो लकीरें इंदिरा गांधी खींचकर गई हैं उसे ही मोदी लंबी करने में लगे हुए हैं।
चाहे तीन तलाक का मामला हो या फिर जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटाने का हो, आम कांग्रेस जन में या फिर कांग्रेस के जमीनी कार्यकर्ताओं में बीजेपी के कदम को लेकर निराशा नहीं, बल्कि उत्साह नजर आ रहा है। पार्टीलाइन से हटकर कोंग्रेस के कई बड़े नेताओं ने इस कदम का स्वागत भी किया है। तब सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस अपने ही कार्यकर्ताओं की भावनाओं को नहीं समझ पाती है या फिर कॉन्ग्रेस पुरातन रुदाली परंपरा के अनुसार अभी भी राज चला रही है।
रुदाली परंपरा :
जहां पर राजा के मरने के बाद राजमहल में कोई नहीं रोता था मगर रोने के लिए गरीब औरतें बुलाई जाती थीं। क्योंकि रोने का रिवाज था, इसलिए रिवाज निभाना जरूरी था। राजा की मौत के बाद नए राजा की राज गद्दी की शुरुआत होती थी ऐसे माहौल में भला राजमहल में कोई कैसे रोए, लिहाजा रुदालियां यह परंपरा निभा लेती थीं।
रुदाली परंपरा :
जहां पर राजा के मरने के बाद राजमहल में कोई नहीं रोता था मगर रोने के लिए गरीब औरतें बुलाई जाती थीं। क्योंकि रोने का रिवाज था, इसलिए रिवाज निभाना जरूरी था। राजा की मौत के बाद नए राजा की राज गद्दी की शुरुआत होती थी ऐसे माहौल में भला राजमहल में कोई कैसे रोए, लिहाजा रुदालियां यह परंपरा निभा लेती थीं।
कांग्रेस की तरफ से 370 और तीन तलाक़ इन दोनों पर जिस तरीके से विरोध किया गया, उससे साफ लग रहा था कि कांग्रेस बस रुदाली परंपरा निभा रही है। अगर कांग्रेस धारा 370 हटाए जाने या फिर हटाए जाने के तरीकों के खिलाफ थी तो क्या आपको कहीं भी कांग्रेस सड़कों पर उतरकर संघर्ष करती दिखी ? या धारा 370 कश्मीरियों के लिये हितकारी थी तो अपने समय मे उसे स्थाई कर देते। अगर देश को इतना ही खतरा था तो क्या आपने कहीं भी किसी बड़े कांग्रेस नेता को कहीं भी जनता को किसी सभा में यह समझाते हुए देखा कि जम्मू कश्मीर के लिए धारा 370 क्यों जरूरी है। मोदीजी तो संसद में और जाहीर में कह रहे है की "धारा 370 से कश्मीरियों को क्या फायदा हो रहा है यह इसके विरोध करने वाले बताये!" इसके विपरीत कोंग्रेस के नेता प्रतिपक्ष अधीर रंजन चौधरी ने तो बिना सोचे समज 'कश्मीर को द्विपक्षीय मामला नही अंतरराष्ट्रीय मामला' बताकर कोंग्रेसकी राष्ट्रनिष्ठा पर ही बैठेबिठाये सत्तापक्ष और जनता को मुद्दा दे दिया। कोंग्रेस ने बस राजमहल का उत्सव खतरे में ना पड़े इसलिए रुदाली बुलाकर रो लिए की ' धारा 370 हटाने में सरकार द्वारा संसद में सही प्रक्रिया नहीं अपनाई गई '।
कांग्रेस को अभी तक यह बात समझ में नहीं आई है कि जिन जिन मुद्दों पर वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विरोध कर रही है वह सभी के सभी तौर तरीके इंदिरा गांधी के जमाने में हिट फॉर्मूला रहे है। और ऐसा लगता है कि नरेंद्र मोदी इंदिरा गांधी के 1966 से 1975 के सफल 10 साल के कार्यकाल की सफलता के गेस पेपर लेकर बैठ गए हैं।
कांग्रेस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नोटबंदी के दौरान के लिए अचानक टीवी पर आकर घोषणा करने के मामले को जनता के बीच मजाक उड़ाती है कि ना जाने अब आकर क्या बोल जाएं। लेकिन कांग्रेस भूल जाती है कि इंदिरा गांधी ने इसी तरह से जुलाई 1969 में बैंकों के राष्ट्रीकरण की घोषणा अचानक से की थी तब किसी को पता नहीं था और देशभर में अफरा-तफरी का माहौल बन गया था। यह तरीका भी नरेंद्र मोदी ने इंदिरा गांधी से ही सीखा है।
बालाकोट एयर स्ट्राइक के मसले पर जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुनाव जीत कर आते हैं तो कॉन्ग्रेस आरोप लगाती है कि सेना के नाम पर राजनीति करके सत्ता में मोदी लौटे हैं मगर क्या यह सच नहीं है कि इंदिरा गांधी को इस काम में महारत हासिल थी। जब पाकिस्तान के साथ 1965 का युद्ध हुआ तो देश में अपना कद बढ़ाने में लगी में इंदिरा गांधी मना करने के बावजूद जम्मू तक नहीं रुकी, बल्कि श्रीनगर में सीमा के पास डटी रहीं।
1971 के युद्ध में पाकिस्तान पर महाविजय के बाद कांग्रेस ने इंदिरा गांधी को आयरन लेडी से लेकर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का हवाला देते हुए साक्षात दुर्गा तक प्रचारित करना शुरू कर दिया था। देश में एक ही व्यक्ति के शासन करने के सवाल पर मोदी पर हमला बोलने वाले कांग्रेसियों ने तो INDIRA IS INDIA और INDIA IS INDIRA तक के नारों से फुदक फुदक कर नाच रहे थे ! इतनाही नही इनी नारों के सहारे चुनाव जीते है ! और तो और इंदिरा गांधी और सोनियागांधी को ' भारत की माँ ' बताने वाले दरबारी चाटुकारो तो वंशवादी कोंग्रेस की चापलूसी करते उनके नाकामयाब वारिश की कदमबोसी करते थकते नही है। अब भला बीजेपी के लोग मोदी को आदर्श मानकर अपने को उनके भक्त बता रहे हैं तो इसमें नया क्या है ? अब कांग्रेस के खेल में मोदी कांग्रेस को ही मात दे रहे हैं तो कांग्रेस को पेट में दर्द हो रहा है। इंदिरा गांधी करे तो मजेदार और मोदी करें तो अत्याचार।
अब इसे इतिहास इतनी आसानी से होने नहीं देगा। इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 में अचानक से रेडियो पर आकर एक बार देश को चौंकाया था ! तब देश में आपातकाल लागू हो गया था। पूरे देश को कैद बना दिया था, कोंग्रेसी विचारधारा से विपरीत सारे राजनेता, अधिकारी, संघ के कार्यकर्ता को बिना अपराध जैल में ठूस दिया था, मीडिया पर पाबंदी लग गई थी। यह स्वतंत्र भारत के इतिहास में सर्वाधिक काला अध्याय है। बस उम्मीद करनी चाहिए कि इसका पुनरावर्तन नही होना चाहिए ... न ऐसा होगा, क्योंकि मोदी ने इंदिरा गांधी के सफलता की किताब पढ़ी होगी, असफलता की किताब से दूरी बनाए रखेंगे।
घटते जनाधार और समय की नजाकत को समजे बगर कोंग्रेस का प्रत्येक कदम आत्मघाती साबित हो रहा है। समय बदल गया है आज प्रिंट मिडिया या ईलोक्ट्रॉनिक मीडिया से भी सोशियल मीडिया प्रभावकारी बन गया है। जनता को बेवकूफ समजना या जनता की नब्ज परखे बिना सियासत करने का समय अब नही है। कोंग्रेस पार्टी मोदी सरकार की आलोचना करते करते देश से गद्दारी कर रही है यह छबि जनता में स्पष्टता से उभरती जा रही है। यह बात केवल कोंग्रेस के लिए घातक नही है बल्कि स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिये भी नुकसानदेह साबित होंगी। स्वस्थ लोकत्रांतिक प्रक्रिया में सशक्त विपक्ष की भूमिका अहम होती है। लेकिन विडंबना है कि विपक्ष अपना राग विलापता बिखरा बिखरा है और क्षेत्रीय दल भी अपने काले करतूतों से टूटते जा रहे है।
नहेरुवंश से चले आ रहे वर्तमान नेतृत्व पर जनता के मन में ' राष्ट्रनिष्ठा ' पर पहले से ही शंसय था जिसे वर्तमान रवैये से पक्का विश्वास हो गया है। नाकाम नेतृत्व के बाद नई खोज की कवायद में कोंग्रेस दो धड़े में बटते दिखी है परिवारवादी धड़ा फिर से हावी हो गया। नेताओं के 370 के मुद्दे पर सकारात्मक और नकारात्मक ब्यानबाजी और वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम के 15 अगस्त के प्रधानमंत्री मोदी के ब्यान की तारीफ करना यह सब पार्टी के भविष्य के लिये प्रश्नार्थ चिन्ह लगाते है। कोंग्रेस किसी भी क्षण बिखर सकती है।
इन परिस्थितियों में भारतीय राजनीतिमे अपने इतिहास को सामने में रखकर स्वयं के अस्तित्व और देशहित को ध्यान में रखकर कोंग्रेस को सबकुछ छोड़कर कठोर आत्ममंथन कर कदम उठाने की आवश्यकता है।
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