राजीव गांधी भारत के सबसे सांप्रदायिक प्रधानमंत्री !!!


राजीव गांधी भारत के सबसे सांप्रदायिक प्रधानमंत्री !!!

3,500 से अधिक नरसंहार करवाने वाला राजीव गांधी और उनके परिवार जन “मानवता के मसीहा” कैसे हो गए ?

आज जब कोंग्रेस अपने नेता राजीवगांधी को बिन सांप्रदायिक, धर्मनिरपेक्ष, सेक्युलर नेता के रूप में 75 वी जयंती मना रही है तब देश को उनकी 'वास्तविकता' से रूबरू होना चाहिए।

अगर 2002 के गुजरात दंगों को सुनियोजित और शासन-समर्थित समझा जाता है, तो इसमें भी शक की कोई गुंजाइश नहीं कि 1984 के सिख-विरोधी दंगे भी सुनियोजित और शासन-समर्थित थे।

मानसिक और वैचारिक तौर पर दिवालिया हो चुके जिन लोगों को 1984 के दंगों में 3 दिन के भीतर अकेले दिल्ही में 3,000 और भारत भर में कुल 3,500 से ज्यादा सिख लोगों का मार दिया जाना भीड़ के उन्माद की सामान्य घटना नज़र आती है, उन्हीं लोगों ने, गुजरात दंगे तो छोड़िए, उन्मादी भीड़ द्वारा दादरी में सिर्फ एक व्यक्ति की हत्या और रोहित बेमुला जैसी सिलेक्टिव घटनाओ को तूल देकर देश में असहिष्णुता का महा-विस्फोट करार दिया था।

दरअसल सेक्युलरिज़्म की तख्ती माथे पर चिपकाए ये वे सांप्रदायिक लोग हैं, जो इंसानी जानों की कीमत उनके संप्रदाय और ध्रुवीकृत होकर उनके वोट करने की प्रवृत्ति के आधार पर लगाते हैं। इसीलिए इन शातिर लोगों को 1984 में मारे गए लोगों की जान 2002 में मारे गए लोगों की जान से सस्ती लगती है। वास्तव में 1984 इस घटनाको दंगा परिभाषित करना भी सही नही है, दंगे दो कौमों के बीच या शासन व्यवस्था के विरूद्ध होते है। जबकि सचाई यह है कि 1984 का यह नरसंहार सिर्फ 2002 के दंगे से ही नहीं, आजाद भारत के किसी भी दूसरे दंगे से अधिक बड़ा और एक तरफा बीभत्स नरसंहार था।

अखलाक और रोहित बेमुला की मौत पर पूरे हिंदुओ और भारत को असहिष्णु बताने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी 1984 में या हाल में बंगाल जैसे कत्लेआम में मार डाले गए हजारों लोगों के लिए कौन रोता है इस देश में ???

अगर 1984 के सिखों की हत्या करवाने वाले कांग्रेस नेताओं को दंड मिल गया होता, तो देश आज दंगा-मुक्त होता। न बाबरी मस्जिद टूटती, न भागलपुर, मुंबई, गुजरात, मुज़फ्फरनगर, बंगाल के दंगे हुए होते। लेकिन सिखों के हत्यारों को तो खुद तत्कालीन प्रधानमंत्री संरक्षण दे रहे थे। उन्होंने कहा था कि "जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती ही है " मतलब साफ है कि प्रधानमंत्री खुद बदले की भावना से ग्रस्त थे और दो लोगों के गुनाहों की सजा पूरे समुदाय को देने पर तुले हुए थे।

इस घटना से दंगाई मानसिकता के लोगों ने देखा कि दंगा कराने वालों का इस देश में बाल भी बांका नहीं हो सकता, जिससे बाद के दिनों में उनका हौसला बढ़ गया। इसलिए मेरी नजर में 1984 के बाद से जितने भी दंगे हुए हैं, उनके लिए कांग्रेस पार्टी और 'धरती को हिलाने वाले' वही भारत-रत्न मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं। बाकी सब तो बस "महाजनो येन गत: स पंथा:" में यकीन करने वाले उनके फॉलोअर्स हैं।

इतना ही नहीं, जिस तरह का आंदोलन लेखकों, पत्रकारों, चिंतकों, बुद्धिजीवियों ने 1975 में इंदिरा गांधी की इमरजेंसी के खिलाफ किया था, या जिस तरह का माहौल 2002 के गुजरात दंगे के बाद बनाया या आज दादरी कांड जैसे जातिविशेष की मौत के बाद बना रहे हैं, अगर वैसा ही माहौल 1984 के सिख नरसंहार के बाद बनाया होता, तो भी शायद देश का बहुत भला हो गया होता।

लेकिन सच्चाई यह है कि 1984 का नरसंहार सिख समुदाय से बाहर के बुद्धिजीवियों को कभी उस तरह उद्वेलित नहीं कर सका, जिस तरह से वे गुजरात दंगे या दादरी कांड से हुए हैं। इसकी मुख्य वजह यह है कि अधिकांश बुद्धिजीवी राजनीतिक दलों के एजेंट की तरह काम करते हैं और राजनीतिक दलों को एक राज्य के बाहर सिखों की नाराजगी से कोई फर्क नहीं पड़ता।

इसलिए जो लोग यह समझते हैं कि बुद्धिजीवियों में मुसलमानों के लिए बहुत दर्द है, वे शायद पूरी तरह ठीक नहीं समझते हैं। अगर मुसलमान भी सिखों की तरह एकाध राज्यों में ही सिमटे होते, तो तमाम दंगों के बाद भी उन्हें वैसे ही इग्नोर कर दिया जाता, जैसे सिखों को किया गया था। मुसलमानों के लिए यह अच्छी बात है कि वे पूरे देश में फैले हुए हैं और आम हिन्दू घनघोर जातिवाद में बाटे हुए हैं, जिसकी वजह से राजनीतिक समीकरणों को बनाने-बिगाड़ने की मुसलमानों की क्षमता बनी हुई है।

बात कहने और सुनने में ज़रा कड़वी है, पर सच यही है कि इस देश में जो समुदाय वोट-बैंक नहीं बन पाएगा, उसका हाल सिखों जैसा ही होगा। और यह स्थिति भारत की धर्मनिरपेक्षता पर एक बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न है। असली धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र वही है, जो अपने सबसे कमजोर व्यक्तियों और समुदायों की भी रक्षा करने में सक्षम हो। सिर्फ मुसलमानों की हिफाजत के लिए चिंतित दिखाई देने से यह तय नहीं हो सकता कि भारत सही मायने में एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है।

मुसलमान तो मजबूत हैं और हिन्दू-मुस्लिम का झगड़ा दो ताकतवरों का झगड़ा है। जिस दिन सिखों, बौद्धों, जैनियों के लिए यह देश उतना ही चिंतित दिखेगा, उस दिन मानूंगा कि अब भारत में धर्म-निरपेक्षता आ गई है। हाल ही में जैन-पर्व के दौरान महाराष्ट्र में एक हफ्ते के मीट-बैन के खिलाफ दूसरे सभी समुदाय के लोग जिस तरह से आक्रामक हो गए थे, वह इस बात का सबूत है कि सबसे कमजोर के बारे में यह देश आज भी नहीं सोचता है।

और इसी फिलॉस्फी के हिसाब से, मेरी नजर में किसी भी हिन्दू-मुस्लिम दंगे की तुलना में 1984 का सिख-विरोधी नरसंहार इस देश के माथे पर बड़ा कलंक है। लेकिन 1984 के उस नरसंहार में जिंदा जला दिए गए और बिना किसी गुनाह के मार डाले गए हजारों लोगों के लिए कौन रोता है इस देश में ?

जो लोग 1984 और 2002 के दंगों की तुलना करना चाहते हैं, उन्हें राजीव गांधी और नरेंद्र मोदी की भी तुलना करनी चाहिए। जिसका आज तक ठीक से आंकलन नही हो पाया है। इसके ठीक से आंकलन नहीं हो पाने की कई वजहें रहीं ... मसलन,



  • यह नरसंहार एक ऐसे संप्रदाय के खिलाफ था, जिसका देश की आबादी में हिस्सा मात्र पौने दो प्रतिशत है और दुनिया में उसका अस्तित्व इसी अल्प भारतीय आबादी पर टिका है। इस शूरवीर और बलिदानी संप्रदाय के शौर्य और पराक्रम से हमारा अतीत गौरवशाली बना है और सैन्य को बल मिला है।
  • अपने श्रद्धास्थान अकाल तख्त पर जून 1984 में 'ऑपरेशन ब्ल्यूस्टार' दरम्यान हुए आक्रमण से कुंठित मानसिकता से व्यथित इंदिरा गांधी के ही अंगरक्षक केवल दो शिख हत्यारों की सजा पूरे शिख समुदाय को टारगेट कर दी गई थी।
  • यह नरसंहार एक ऐसे संप्रदाय के खिलाफ था, जिसकी पंजाब जैसे छोटे राज्य से बाहर राजनीति को प्रभावित करने की हैसियत नहीं थी।
  • यह नरसंहार एक ऐसे संप्रदाय के खिलाफ था, जिसके वोट के बिना भी इस देश में हत्यारी प्रवृत्ति के लोग ठाट से राज कर सकते हैं। यह प्रतिशोध राजीव गांधी के हत्यारे तमिल भाषी के साथ क्यों नही हुआ ?
  • जब यह नरसंहार हुआ, तब भारत में मीडिया इतना पावरफुल नहीं था न कोई सोशियल मीडिया था कि वह राजनीति और समाज की सोच को पल-पल प्रभावित कर सके। दृश्य-श्रव्य मीडिया (TV) का अस्तित्व न के बराबर था था तो मात्र सरकारी नियंत्रित दूरदर्शन, प्रिंट मीडिया का प्रसार भी इतना नहीं था। साक्षरता और संपन्नता कम होने से उनकी रीडरशिप भी कम थी। सोशल मीडिया तो था ही नहीं। देश की बड़ी आबादी के लिए सिर्फ सरकारी रेडियो आकाशवाणी था, जिसके जरिए सूचनाएं सेंसर होकर पहुंचती थीं।
  • जब यह नरसंहार हुआ, तब विपक्ष काफी कमजोर था और कांग्रेस की जड़ें इतनी गहरी थीं कि उसके लोग पब्लिक को जो समझा देते थे, उसे ही पुराण, कुरान और बाइबल समझ लिया जाता था।
  • जब यह नरसंहार हुआ, तब देश में बुद्धिजीवियों के एक बड़े समूह की आत्मा कांग्रेस के पास बंधक थी। बचे-खुचे बुद्धिजीवियों के दिमाग से भी शायद ज़ुल्मी इमरजेंसी का खौफ उतरा न था।
  • इंदिरा गांधी की हत्या से उपजी सहानुभूति की लहर पर सवार होकर कांग्रेस ने लोकसभा चुनावों में 533 में से 404 सीटें जीत लीं। जब सरकार इतनी ताकतवर हो, तो किसकी हिम्मत थी उसके सामने तनकर खड़े होने की ?

नतीजा यह हुआ कि दुनिया के सबसे बड़े धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र की राजधानी में एक अल्प आबादी वाले संप्रदाय के ख़िलाफ़ इतने भीषण नरसंहार के बाद उतना भी शोर नहीं हुआ, जितना हाल में हम सबने दादरी में सिर्फ एक व्यक्ति की हत्या के बाद सुना। खुशवंत सिंह और अमृता प्रीतम जैसे कतिपय सिख लेखकों को छोड़कर हिन्दू और मुस्लिम बिरादरी के ज्यादातर “धर्मनिरपेक्ष”, “प्रगतिशील” और “क्रांतिकारी” लेखक उन दिनों “सहिष्णुता” का अभ्यास कर रहे थे।

राजीव गांधी की सरकार ने निर्लज्जता की सारी हदें पार करते हुए नरसंहार की निष्पक्ष जांच कराना तो दूर, दंगाई समझे जाने वाले नेताओं को लगातार पुरस्कृत किया। हरकिशन लाल भगत राजीव के पूरे कार्यकाल में संसदीय कार्यमंत्री बने रहे। बीच में उन्हें सूचना प्रसारण मंत्रालय की भी जिम्मेदारी दी गई। इस दौरान भगत साहब ने दूरदर्शन को “राजीव का भगत” और “राजीव-दर्शन” बना डालने में अहम भूमिका निभाई।


इसी तरह, दंगाइयों के संरक्षक समझे जाने वाले दूसरे प्रमुख नेता जगदीश टाइटलर को भी नरसंहार के बाद के तीनों कांग्रेसी प्रधानमंत्रियों - राजीव गांधी, पीवी नरसिंह राव और मनमोहन सिंह ने अपनी कैबिनेट में महत्वपूर्ण जगहें दीं। यानी नरसंहार के 20 साल बाद तक वे कांग्रेस आलकमान और प्रधानमंत्रियों के दुलारे बने रहे। तीसरे आरोपी नेता सज्जन कुमार ने भी दंगों के 25 साल बाद तक मलाई चाटी। 1991 और 2004 में वे दोबारा और तिबारा सांसद बने एवं कई महत्वपूर्ण संसदीय समितियों के सदस्य रहे।

दंगों के सिलसिले में कांग्रेस के एक और बड़े नेता ललित माकन का नाम प्रमुखता से आया था। हालांकि बदला लेने के इरादे से खालिस्तान कमांडो फोर्स के उग्रवादियों ने 1985 में उनकी हत्या कर दी। उनकी मौत के बाद पार्टी ने ललित माकन के भतीजे अजय माकन को आगे बढ़ाया, जो न सिर्फ दिल्ली की शीला और केंद्र की मनमोहन सरकार में अहम पदों पर रहे, बल्कि आज भी कांग्रेस के पावरफुल नेता बने रहे हैं।

इतना ही नहीं, दंगों को देखकर अपनी आंखें बंद कर लेने वाले देश के तत्कालीन गृह मंत्री पीवी नरसिंह राव को भी पार्टी ने प्रोमोशन देकर 1991 में देश का प्रधानमंत्री बना दिया, लेकिन इसपर किसी ने वैसी हाय-तौबा नहीं मचाई, जैसी नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले और बाद में मचाई गई। साफ है कि 84 दंगों के खून से सिंचकर कई नेता लहलहा उठे और उन सबको हैसियत से बढ़कर पुरस्कार दिये गए।

अगर एक बार की मान भी ले की 2002 के गुजरात दंगों को सुनियोजित और शासन-समर्थित समझा जाता है, तो इसमें भी शक की कोई गुंजाइश नहीं कि 1984 के सिख-विरोधी नरसंहार भी सुनियोजित और शासन-समर्थित था। दंगों के दौरान दिल्ली पुलिस हाथ पर हाथ रखकर बैठ गई और कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं को नरसंहार की खुली छूट दी गई। कहीं भीड़ के स्वतःस्फूर्त उन्माद की वजह से दंगा नहीं भड़का, बल्कि कांग्रेस के नेताओं ने हमलावरों को पैसे, शराब और इनाम दे-देकर सिखों के कत्लेआम के लिए भेजे। जलाई गई कई बस्तियों में फायर-ब्रिगेड की गाड़ियां तक नहीं जाने दी गईं।

वैसे भी आम आदमी कहीं भी घूम-घूमकर बस्तियों में आग नहीं लगाता, न ही मासूम लोगों की हत्याएं करता है। सुनियोजित साजिश और शासन की मिलीभगत के बिना कभी भी कहीं भी इतने बड़े पैमाने पर नरसंहार संभव ही नहीं है। पिछले साल अप्रैल में अमेरिका के कैलिफोर्निया राज्य की असेंबली में भी इस बात को स्वीकार किया गया कि 1984 के सिख नरसंहार के लिए भारत की तत्कालीन कांग्रेस सरकार जिम्मेदार थी। विकीलीक्स के 2011 के खुलासों के मुताबिक, अमेरिकी प्रशासन भी यह मानता था कि तत्कालीन कांग्रेस सरकार में सिखों के लिए नफरत की भावना थी।

इसलिए जो लोग 1984 और 2002 के दंगों की तुलना करना चाहते हैं, उन्हें राजीव गांधी और नरेंद्र मोदी की भी तुलना करनी चाहिए।

  • 1984 में देश की राजधानी में हुए नरसंहार के समय राजीव देश के प्रधानमंत्री थे। 2002 में गुजरात में भड़के दंगे के समय मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे।
  • 1984 में अगर राजीव नये और अनुभवहीन प्रधानमंत्री थे, तो 2002 में मोदी भी नये और अनुभवहीन मुख्यमंत्री थे।
  • नरसंहार के बाद पहले नेता ने कहा- “बड़ा पेड़ गिरता है, तो धरती हिलती है” दूसरे नेता ने कहा - “हर क्रिया के बाद प्रतिक्रिया होती है”
  • इस्तीफा न पहले ने दिया, न दूसरे ने और दोनों अपनी-अपनी जगह राज करते रहे।
  • पहले ने तो गुनहगारों को सजा न दिलाई, हां दूसरे के शासन के मंत्री माया कोडनानी और राजनीतिक नेता बाबू बजरंगी को सजा जरूर हुई। 
फिर दोनों में फर्क क्या रहा ? फर्क ये रहा !

  • पहले के राज में 3,500 से ज्यादा मात्र सिखों का एकतरफा और निर्बाध कत्लेआम हुआ, और वो सेकुलर बना रहा। दूसरे के राज में हिन्दू (254) और मुसलमान (790) दोनों मारे गए और वो सांप्रदायिक हो गया !
  • पहला देश का प्रधानमंत्री था, बहुमत के विशाल पहाड़ पर था, निरंकुश था, इसलिए उसे “राज-धर्म” का पाठ पढ़ाने वाला कोई नहीं था, लेकिन दूसरा एक मझोले राज्य का मामूली मुख्यमंत्री था, सिस्टम में बहुत सारे लोग उससे ऊपर थे, इसलिए वह निरंकुश नहीं था और उसे “राज-धर्म” का पाठ पढ़ाने वाले उनकी ही पार्टिका शीर्ष नेतृत्व मौजूद था।
  • पहले नेता को दूसरी-तीसरी-चौथी पंक्ति के दंगाई नेताओं और हुड़दंगियों पर ज़िम्मेदारी डालकर हमेशा आरोप-मुक्त रखा गया, जबकि दूसरे नेता पर हर दंगाई की ज़िम्मेदारी डाल दी गई। इतनाही नही मोदी को मुख्यमंत्री रहते हुए कई बार घँटों तक केंद्रशासित जांच एजेंसियों के समक्ष रूबरू होकर प्रताड़ित होकर आखिर न्यायपालिका से उन्हें क्लिनचिट मिली।
  • पहले नेता ने 84 दंगे के बाद भी बार-बार सांप्रदायिक राजनीति की, जिनमें अयोध्या में विवादास्पद ढांचे का ताला खुलवाकर कई और दंगों व हज़ारों लोगों के मारे जाने की पृष्ठभूमि तैयार करना और शाहबानो केस में सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटकर देश के इतिहास की सबसे बड़ी न्यायिक हत्या करना शामिल है। दूसरे नेता ने 2002 के दंगों के बाद तुष्टीकरण और वोटबैंक की राजनीति से डरे बिना दशकों से लंबित ऐतिहासिक ट्रिपल तलाक, और धारा 370 हटवाने जैसे कहीं अहम फैसले कर मुस्लिमो की बहेतरी के मार्ग प्रसस्त किया है।
  • पहले नेता ने 1984 दंगे सांप्रदायिक प्रतिशोध से करवाये थे। और उसके बाद तो देश में सांप्रदायिक घटनाओं की परंपरा शरू हो गई। जबकि दूसरे नेता के कार्यकाल दरम्यान हुए 2002 के गुजरात के दंगे 59 निर्दोष और निहत्थे कारसेवकों को ज़िन्दा जलाने का जन प्रतिशोध और संरक्षणात्मक थे। 2002 के पहले प्रतिवर्ष गुजरात सांप्रदायिक आग से झुलसता था लेकिन वहाँ 2002 के बाद कोई भी सांप्रदायिक घटना नही घटी है।
1984 सिख विरोधी नरसंहार और 2002 के दंगों की वास्तविकता


1984 के सिख विरोधी जघन्य नरसंहार के लिए अब राहुल गांधी कांग्रेस को क्लीन चिट दे रहे हैं। राहुल गांधी ने यदि सिख विरोधी दंगों की किसी से जानकारी ली होती तो उन्हें मालूम चल जाता कि 31 अक्टूबर को इंदिरा गांधी की हत्या हुई और 1 नवंबर से देश में लोकतंत्र का खून हुआ। अगले तीन दिन में देशभर में हजारों सिख मारे गये। सबसे ज्यादा बुरी हालत थी दिल्ली में। अकेले दिल्ली में करीब 3,000 हजार से ज़्यादा सिखों की हत्या हुयी। पूरे भारत को मिलाकर 3,500 से ज्यादा सीखो की हत्या हुई थी इस नरसंहार में। इसके अलावा देशभरमे कई जगह कोंग्रेसी गुंडों द्वारा सेंकडो सीखो का कत्लेआम किया और मिलकतो को आग के हवाले किया।

पूर्वी दिल्ली में कल्याणपुरी, शाहदरा. पश्चिमी दिल्ली में सुल्तानपुरी, मंगोलपुरी, नांगलोई, दक्षिणी दिल्ली में पालम कॉलोनी और उत्तरी दिल्ली में सब्जी मंडी और कश्मीरी गेट जैसे कुछ ऐसे इलाके हैं जहां सिखों के पूरे-पूरे परिवार खत्म कर दिए गये। सागरपुर, महावीर एनक्लेव और द्वारकापुरी-दिल्ली कैंट के वो इलाके हैं जहां सिख विरोधी हिंसा में सबसे ज्यादा मौते हुईं। हिंसा के शिकार लोग जब पुलिस से मदद मांगने गये तो पुलिस ने उनकी शिकायत दर्ज करने से इंकार कर दिया। यह तो थी वास्तविकता या पुलिस की मजबूरी ऊपर का आदेश जो था !

जब अफसरों ने कहा ऊपर से आदेश था इसलिए पुलिस ने कोई एक्शन नहीं लिया।

काश, राहुल गांधी को पता होता कि जब कांग्रेस के नेता सिखों को मार और मरवा रहे थे, तब अटल बिहारी वाजपेयी सिखों को दंगाइयों से बचा रहे थे। अटल बिहारी वाजपेयी तब 6 रायसीना रोड के बंगले में रहते थे। उन्होंने 1 नवंबर 1984 को अपने घर के बाहर भयावह दृश्य देखा। वहां  टैक्सी स्टैंड पर काम करने वाले सिख ड्राइवरों पर हमला करने के लिए कांग्रेसी गुंडे पहुंच गए थे। वे तुरंत टैक्सी स्टैंड पर पहुंचे, उनके वहां पर पहुंचते ही खून के प्यासे गुंडे वहां से खिसक लिए। 

उसी दिन शाम को अटल जी केन्द्रीय गृह मंत्री पी.वी.नरसिंह राव से मिलने गए। उन्होंने नरसिंह राव से जलती दिल्ली को बचाने की पुरजोर अपील की। कंई बीजेपी नेताओं ने बिहार और यूपी के मूल निवासी कई आईपीएस अधिकारियों से और अनेकों छोटे अधिकारियों से जो उस वक्त दिल्ली पुलिस में तैनात थे, बात करके उनसे कुछ करने के लिए कहा था। उनका जवाब था कि “वे मजबूर हैं क्योंकि ऊपर का स्पष्ट आदेश है कि 72 घंटे तक कुछ नहीं करना है”

दुखद यह है कि इतने बड़े कत्लेआम के बाद भी राहुल गांधी कांग्रेस को तमाम आरोपों से मुक्त कर रहे हैं। अगर वे चाहें तो अब भी तिलक नगर के पास 1984 के दंगों की विधवाओं से उनके घरों में जाकर मिल सकते थे। लेकिन वे यह तो कभी नहीं करेंगे। 




गौर करें की राहुल गांधी के 1984 के दंगों की यादें ताजा करने के बाद कुछ बीमार मानसिकता वाले लोगों को अब 2002 में गुजरात में भड़के दंगे याद आने लगे हैं। वे दावा कर रहे हैं कि वो दंगे गुजरात की मोदी के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने भड़काए थे। मोदी को उन दंगों के लिए किसी भी जांच आयोग ने जिम्मेदार नहीं माना। उनके खिलाफ केन्द्र की यूपीए सरकार ने साक्ष्य जुटाने की हर संभव कोशिशें की लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। इन लोगों के दोहरे चेहरे तब सबके सामने आ जाते हैं, जब वे गोधरा में 59 कारसेवकों को जिंदा जलाने का कतई उल्लेख नहीं करते। वे यह भी नहीं बताते कि गुजरात के दंगे 59 निर्दोष और निहत्थे कारसेवकों को ज़िन्दा जलाने का जन प्रतिशोध था, न कि मात्र एक सत्तारूढ़ सर्वशक्तिमान राजनेता द्वारा अकाल तख़्त को ढाह देने के प्रतिशोध में एक सिरफिरे द्वारा सरकारी पिस्तौल से गोली चलाने के बदले में सरकार के इशारे पर दंगे को करवाने का आपराधिक षड्यंत्र।

कांग्रेस नीत संप्रग UPA सरकार में प्रमुख सहयोगी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी प्रमुख शरद पवार भी कह चुके हैं कि 2002 के गुजरात दंगों के लिए नरेंद्र मोदी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। शरद पवार कई बार कह चुके हैं कि 2002 के गुजरात दंगा मामले में जब कोर्ट ने नरेंद्र मोदी को दोषमुक्त कर दिया है तो फिर उन्हें इसके लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए। उन दंगों में UPA की केंद्र सरकार की SIT द्वारा मोदी को क्लीन चिट भी मिल चुकी है।


गुजरात के दंगे 59 निर्दोष और निहत्थे कारसेवकों को ज़िन्दा जलाने का जन प्रतिशोध था।
27 फरवरी 2002 को सुबह साबरमती एक्सप्रेस गोधरा स्टेशन पर पहुंची थी। उस ट्रेन में अयोध्या से लौट रहे सामान्य नागरिक बैठे थे, जो तीर्थयात्रा करके लौट रहे थे। उस ट्रेन को षड्यंत्र पूर्वक उन्मादी जिहादियों ने जलाया। उस हत्याकांड में 59 मासूम लोग जलकर राख हो गए। उस गोधरा कांड के बाद फैले भयानक दंगे ने जरूर 1044 लोगों की जान ले ली।

निश्चित रूप से उस भयावह दंगों को कोई भूल नहीं सकता। लेकिन मोदी को उन दंगों के लिए दोषी बताया जाना कहां तक मुनासिब है। जबकि उनपर कोई आरोप ही साबित नहीं हुआ. यह भी तो सोच लें कि 59 मौतों का प्रतिशोध यदि 1044 मौतों से हुआ तो एक मौत का बदला कई हज़ार हत्यायें करके सच को झूठ बताने की कोशिश क्यों? जून 2009 में गठित विशेष अदालत ने 22 फरवरी 2011 को सुनाए अपने फैसले में 27 फरवरी 2002 को हुए गोधरा कांड को एक पूर्व नियोजित साजिश करार दिया था। इस निर्णय ने साबित कर दिया था कि भारत की न्याय व्यवस्था की ईमानदारी पर सवालिया निशान नहीं लगाया जा सकता। पर जब कांग्रेस 1984 के सिख विरोधी दंगों के लिए बुरी तरह घिरी तो कुछ लोगों को गुजरात के दंगे याद आ गए। यही नहीं, वे उन दंगों की चर्चा करते वक्त गोधरा कांड के निर्दोष निहत्थे को जलाने की घटना को भूलना भी चाहते हैं। यह दोगलापन क्यों ?

इसलिए कुटिल कांग्रेसजन, विकृत वाम-मार्गी और बिके हुए बुद्धिजीवी चाहे जो भी कहें, यह सवाल तो उठना ही चाहिए कि अगर नरेंद्र मोदी “मौत के सौदागर”, तो राजीव गांधी और उनके परिवार के लोग “मानवता के मसीहा” कैसे हो गए ?

राजीव गांधी को सेक्युलर और मानवता मसीहा के रूप में महिमामंडन करने में सबसे बड़ा हाथ दरबारी मीडिया का है। यदि मीडिया निष्पक्ष होता तो भारत का चित्र कुछ अलग होता। 

अगर पत्रकारिता सही होती रहती तो ‘मीडिया’ के पहले ‘मेन्स्ट्रीम’ और ‘सोशल’ जैसे शब्द नहीं लगाने पड़ते। मीडिया तो मेनस्ट्रीम ही होनी चाहिए। वामपंथियों ने ‘सोशियल मीडिया’ को अलग कर दिया क्योंकि मेन्स्ट्रीम अपने काम से भटक रहा था। तकनीक की कमी कहिए या कुछ और, सोशल मीडिया को आने में समय ज़रूर लगा लेकिन सही मायनों में मीडिया या सूचना का लोकतांत्रीकरण अब ही हो पाया है। अब मीडिया के तोप सोशियल मीडिया के आगे रोजाना नंगे हो रहे हैं।

2014 के बाद इन माओवंशी कामपंथी लम्पटों के गिरोह को लगा कि अगर इन्होंने रिपोर्टिंग की टोन को बदलने के साथ-साथ हिटलर के गोएबल्स वाली नीति नहीं अपनाई, तो लम्बे दौर में उनका अस्तित्व संकट में पड़ जाएगा। फिर अभ्युदय हुआ चोरों के नए गिरोह का जिसमें क्विंट, वायर, स्क्रॉल जैसे अजेंडाबाजों ने बीबीसी और एनडीटीवी जैसे पुराने पापियों की सवारी करते हुए जगह बनानी शुरू की।

इन ओपिनियनबाजी में, तथाकथित सोशल वर्कर, एक्टिविस्ट, फलाँ मामलों के स्वघोषित जानकार, फर्जी की फाइस्टी फेमिनिस्ट से लेकर नकारे, कुंठित और पूर्वग्रह से ग्रस्त लोगों को एक ही विषय पर लगातार लिखने कहा जाता है। हर लेख का निष्कर्ष पहले से तय होता है कि अमित शाह और नरेन्द्र मोदी अब भारत को ‘हिन्दू राष्ट्र’ बना ही देगा ..., ये दोनों मुसलमानों को हंट कर रहे हैं ..., प्रेस फ्रीडम को दबाया जा रहा है..., डर का माहौल है ..., अघोषित आपातकाल यही है ...

सत्य यह है कि मोदी सरकार के पाँच सालों में सिवाय इनके लेखों के एक भी आरोप सही साबित नहीं हो पाया। न कोई घोटाला, न नीतिगत असफलता, न इकोनॉमी बर्बाद हुई, न दंगे हुए, न अल्पसंख्यक कहीं भी डर से जी रहा है। इसी मीडिया ने ये पूरा माहौल मैनुफैक्चर किया और पूरी कोशिश की कि लोग इनके हर अजेंडा को पत्थर की लकीर मान कर आगे बढ़ जाएँ।

हुआ इसके उलट यह बात कि अखलाख की भीड़ हत्या की हुई, तो ऐसे दसियों मामले सामने आए जहाँ मुसलमानों की भीड़ ने निर्दोष हिन्दू को काट दिया, रेत दिया, पीट कर मार दिया। बात गाय चुरा कर भागते मुसलमान गौतस्करों की हुई तो दसियों मामले ऐसे सामने आए जहाँ गौरक्षकों को, पुलिस वालों को इन्हीं गौतस्करों ने जान से मार दिया, उन पर गोली बारी की। बात मुसलमानों के डरे होने की हुई और कई मामले ऐसे सामने आए जहाँ उन्होंने बिना किसी कारण हिन्दू काँवड़ियों पर पत्थरबाजी की, उनके कई मंदिरों को लगातार तोड़ा।

याद कीजिए कि भारत अचानक से असहिष्णु कैसे हो गया था! याद कीजिए कि जिस रोहित वेमुला के सुसाइड नोट में विनती थी कि उसकी मौत को राजनैतिक रंग न दिया जाए, उसके साथ क्या हुआ! याद कीजिए मोदी को किस तरह की मीडिया कवरेज मिली चुनावों के दौरान (दोनों बार) और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भारत की छवि कैसे धूमिल करने की लगातार कोशिशें होती रहीं। याद कीजिए कैसे कठुआ कांड ने वैश्विक पटल तक तहलका मचा दिया था! याद कीजिए गौरी लंकेश की हत्या को कैसे दिखाया गया था! याद कीजिए कि इन्होंने ‘जय श्री राम’ को कैसे आतंक का नारा बनाने की कोशिश की!

अब याद कीजिए जुनैद को और उन तमाम गौरक्षकों को, पुलिस वालों को जिन्हें गौतस्करों ने मौत के घाट उतार दिया! अब याद कीजिए रोहित वेमुला के बाद आत्महत्या करने वाले कई दलित छात्र-छात्राओं को जिनका नाम भी कोई नहीं जानता! याद कीजिए ममता बनर्जी और अखिलेश यादव के कार्यकाल में हुए मजहबी दंगों को! याद कीजिए उन दसियों बच्चियों को जिनका बलात्कार मौलवियों ने मदरसे और मस्जिदों में किया! याद कीजिए गौरी लंकेश से पहले मार डाले गए बाईस पत्रकारों को जिन्हें ट्वीट भी नसीब नहीं हुआ! याद कीजिए उन ग्यारह खबरों को जहाँ मुसलमानों ने ‘जय श्री राम’ बुलवाने की झूठी बात फैलाई ताकि उन्हें कवरेज मिले!

अब ये नहीं चलेगा! लेकिन हाँ, इनकी नग्नता का सर्कस चलते रहना चाहिए इससे हमें फायदा है। हमें सिर्फ हेडलाइन पढ़ कर पता चल जाता है कि इनकी खबर जबरदस्ती का एंगल लिए हुए है। हमें पता चल जाता है कि हमें सच्ची खबर कहाँ ढूँढना है और असली खबर दस मिनट में में सामने आ जाती है कि तुमने ये पूरी स्टोरी सिर्फ हिन्दुओं को नीचा दिखाने के लिए की थी। इसलिए, बने रहो। अपने उसूलों से समझौता करते रहो। और हम तुम्हें नंगे करते रहेंगे।

इन्ही लिब्रान्डु पत्रकारिता के कारण ही आज हमारे जैसे कंई नौसिखिये पत्रकारों को जन्म हुआ है। भलेही वह पत्रकारिता के मापदंडों पे खरे नही उतरते होंगे, उनकी लेखनी में मौलिकता की कमी होंगी, इधर उधर से पढ़कर कुछेक बातें कॉपी पेस्ट होना भी शक्य है। समय बदल रहा है यह दरबारी मीडिया भूल रहे है की पहले का समय नही रहा आज जनता जागरूक हो गई है, निर्बुद्ध नही रही की तुम जो लिखोंगे, बताओगें, चित्रत करोंगे उसे पत्थर कि लकीर मान कर उसपर विश्वास होता रहेंगा। सबसे बडी बात है कि मोदी युग में देश मे राष्ट्रवाद की जड़े मजबूत हो रही है। देश मजबूती से विश्व पटल पर महाशक्ति के रूप में उभर रहा है। हमारी यह प्रगति विपक्ष के साथ अंदरूनी और बाह्य शत्रुओं को शूल की तरह चुभ रही है। 

कमजोर नेतृत्व, अति महत्वाकांक्षा, परिवारवाद औऱ चाटूकारों में फसी देश की सबसे पुरानी कोंग्रेस पार्टी अपने ही हथकंडों से आज जनाधार खोकर लुप्तप्राय होने के कगार पर है। पार्टि अब वैचारिक रूप से दो खेमों बटी हुई दिखती है। किसी भी क्षण तूट शक्ति है। क्षेत्रीय दलों का भी कमोबेश यही हाल है। लोकतंत्र के लिये यह घातक स्थिति है। वर्तमान परिस्थितियों में स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिये एक शसक्त विपक्ष की कमी भी महसूस हो रही है। खैर ... लेकिन अच्छी बात यह है की देशद्रोही ग़द्दारों की पहचान अपनेआप होने लगी है।

प्रस्तुत ब्लॉग पर ग़र मुझसे पूछेंगे तो मैं तो यही कहूंगा कि न सिर्फ 1984 का नरसंहार गुजरात के दंगों कंई गुना बड़ा और बीभत्स था, बल्कि राजीव गांधी भी नरेंद्रमोदी की तुलना में अधिक सांप्रदायिक, या यूं कहें भारत के इतिहास के सबसे सांप्रदायिक प्रधानमंत्री थे।

इस लेख में मेरे अपने विचारों के साथ संकलित माहिती और चित्र पोस्ट किये है।

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