दैवी संपदा ' चैतन्य '
आज अश्विन शुक्ल पंचमी/षष्ठी दिनांक 14.10.2018 रविवार
#या_देवी_सर्वभूतेषु_चेतनेत्यभिधीयते।
#नमस्तस्यै_नमस्तस्यै_नमस्तस्यै_नमो_नमः॥
जो देवी सब प्राणियों में चेतना कहलाती हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है।
संसार के प्रत्येक प्राणी की सार्थकता तब तक है; जब तक उसमे चैतन्य, प्राण (Consciousness) है। प्राण-विहीन शरीर तो शव बन जाता है। प्राण विद्यमान होने के कारण ही वह प्राणी कहलाता है। शरीर मे जब तक प्राण रहता है तब तक उसमे चेतना रहती है। दूसरे अर्थों मे चेतना ही प्राण है। शरीर की यह चेतना उस परमाराध्या भगवती के अस्तित्व का ही द्योतक है। अतः स्पष्ट है कि वह देवी समस्त प्राणियों मे चेतना रूप मे विद्यमान है। इसलिए उन्हें बारंबार नमस्कार है।
सर्वसमान्यतः चैतन्य-चेतना को ही आत्मा समजा जाता है। लेकिन आत्मा और चैतन्य में भेद है। आत्मा #अणु_स्वरूप याने अत्यंत सूक्ष्म होती है। जीवात्मा भौतिक चक्षु से दिखाई नही देता। सूक्ष्म जीव से लेकर हाथी जैसे विशालकाय प्राणियों में आत्मा एक समान रूप से रहती है। आत्मा के विषय मे भगवान ने भगवद्गीता में कहा है :
#नैनं_छिन्दन्ति_शस्त्राणि_नैनं_दहति_पावक:।
#न_चैनं_क्लेदयन्त्यापो_न_शोषयति_मारुत:॥ (भ ग २/२३)
अर्थात् : इस आत्मा को न शस्त्र काट सकते हैं, न अग्नि जला सकती है, न इसे जल गिला कर सकता है और न ही वायु इसे सुखा सकती है। जबकि चेतना तो सारे शरीर में व्याप्त है। सिर से पाँव तक हमें सब जगह अनुभूति होती है।
मनोविज्ञान की दृष्टि से चेतना मानव में उपस्थित वह तत्व है जिसके कारण उसे सभी प्रकार की अनुभूतियाँ होती हैं। चेतना के कारण ही हम देखते, सुनते, समझते और अनेक विषय पर चिंतन करते हैं। इसी के कारण हमें सुख-दु:ख की अनुभूति भी होती है और हम इसी के कारण अनेक प्रकार के निश्चय करते तथा अनेक पदार्थों की प्राप्ति के लिए चेष्टा करते हैं।
ईश्वर ने ऐसी व्यवस्था कर रखी है। आत्मा एक ही स्थान पर रहता है, और #नस_नाड़ियों, #तंत्र_तंत्रिका के माध्यम से शरीर में अनुभूतियों की व्यवस्था कर रखी है। जैसे एक फैक्ट्री का मालिक अपने कार्यालय में एक जगह बैठा रहता है। और उसने फैक्ट्री के अलग अलग विभागों में वीडियो कैमरे लगा रखे हैं। उन कैमरों की सहायता से वह एक जगह बैठकर फैक्ट्री के अनेक विभागों की जानकारी करते रहता है। इसी प्रकार से मन, बुद्धि, इंद्रियाँ इन सारे उपकरणों के माध्यम से जीवात्मा को एक ही स्थान पर रहते हुए भी पूरे शरीर की बहुत सारी मोटा मोटी अनुभूतियाँ हो जाती है, लेकिन सारी नहीं।
आपको पेट में क्या गंभीर रोग हो रहा है ? वह आपको पता नहीं है। जब वो काफी बढ़ जाता है, दर्द होने लगता है, तो जाते हैं, डॉक्टर साहब के पास। फिर वह चेकअप करते हैं, एक्सरे, Eco, MRI, CT-Scan आदि जांच करवाने के बाद निदान कर बताते हैं कि साहब, ये बीमारी तो तीन साल से चल रही है। आपने चेकअप ही नहीं कराया, इसलिए तीन साल बाद पता चला। इस तरह आत्मा को सब बातों का पता नहीं चलती, मोटी-मोटी अनुभूतियाँ अवश्य हो जाती हैं। कहीं पेट दुख रहा है, पाँव दुख रहा है, सर दुख रहा है, जो भी हो रहा है, वह मोटा-मोटा पता चलता है। यह ईश्वर की व्यवस्था है।
मानव चेतना की तीन विशेषताएँ हैं :
#ज्ञानात्मक, #भावात्मक और #क्रियात्मक होती है। भारतीय दार्शनिकों ने इसे सच्चिदानंद रूप कहा है। चेतना और मनुष्य के चरित्र में मौलिक संबंध है। चेतना वह विशेष गुण है जो मनुष्य को जीवंत बनाती है और चरित्र उसका वह संपूर्ण संगठन है जिसके द्वारा उसके जीवित रहने की वास्तविकता व्यक्त होती है तथा जिसके द्वारा जीवन के विभिन्न कार्य चलाए जाते हैं।
चेतना के तीन अवस्था मानी गई हैं :
#चेतन, #अवचेतन और #अचेतन। चेतन स्तर पर वे सभी बातें रहती हैं जिनके द्वारा हम सोचते समझते और कार्य करते हैं। चेतना में ही मनुष्य का अहंभाव रहता है और यहीं विचारों का संगठन होता है। अवचेतन स्तर में वे बातें रहती हैं जिनका ज्ञान हमें तत्क्षण नहीं रहता, परंतु समय पर याद की जा सकती हैं। अचेतन स्तर में वे बातें रहती हैं जो हम भूल चुके हैं और जो हमारे यत्न करने पर भी हमें याद नहीं आतीं और विशेष प्रक्रिया से जिन्हें याद कराया जाता है। जो अनुभूतियाँ एक बार चेतना में रहती हैं, वे ही कभी अवचेतन और अचेतन मन में चली जाती हैं। ये अनुभूतियाँ सर्वथा निष्क्रिय नहीं होतीं, वरन् मानव को अनजाने ही प्रभावित करती रहती हैं।
#चैतन्य, #Consciousness, शब्द कई अर्थो में प्रयुक्त होता है :
Consciousness : चेतना, चैतन्य, भान, समझ, आपा, संज्ञा, सत्व, स्वत्व
Sentience : संवेदन, अनुभव
Self-Consciousness : आत्म-ज्ञान, बोध
Sense : समझ, अर्थ, बुद्धि, विवेक, होश,
Rationality : तर्क, तर्कसंगतता, तर्कशक्ति, युक्तता
Memory : स्मृति, याद, यादगार, स्मरणशक्ति, धारणा
Feeling : अनुभूति, अनुभव, बोध, सहानुभूति, मत
नवरात्र के पावनपर्व पर हमारे अंदर छुपी माँ भगवती के विविध शक्तियों के स्वरुपों का हम उनकी ही दी हुई शक्ति से भावपूजन कर पूर्ण #चैतन्यवान बनकर माँ की #भक्तिभाव से आराधन कर रहे हैं।
नवरात्रि पर्व सभी मित्रों एवं माँ के भक्तों को हार्दिक अभिनंदन के साथ ढेरों शुभकामनाएं।
(क्रमशः)
जय श्री कृष्ण
🙏🙏🙏🙏🙏
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🕉 #शक्ति_उपासना_का_महापर्व_नवरात्र_महोत्सव 🕉
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#नमो_देव्यै_महादेव्यै_शिवायै_सततं_नम:।
#नमः_प्रकृत्यै_भद्रायै_नियताः_प्रणताः_स्मताम्॥
#या_देवी_सर्वभूतेषु_चेतनेत्यभिधीयते।
#नमस्तस्यै_नमस्तस्यै_नमस्तस्यै_नमो_नमः॥
जो देवी सब प्राणियों में चेतना कहलाती हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है।
संसार के प्रत्येक प्राणी की सार्थकता तब तक है; जब तक उसमे चैतन्य, प्राण (Consciousness) है। प्राण-विहीन शरीर तो शव बन जाता है। प्राण विद्यमान होने के कारण ही वह प्राणी कहलाता है। शरीर मे जब तक प्राण रहता है तब तक उसमे चेतना रहती है। दूसरे अर्थों मे चेतना ही प्राण है। शरीर की यह चेतना उस परमाराध्या भगवती के अस्तित्व का ही द्योतक है। अतः स्पष्ट है कि वह देवी समस्त प्राणियों मे चेतना रूप मे विद्यमान है। इसलिए उन्हें बारंबार नमस्कार है।
सर्वसमान्यतः चैतन्य-चेतना को ही आत्मा समजा जाता है। लेकिन आत्मा और चैतन्य में भेद है। आत्मा #अणु_स्वरूप याने अत्यंत सूक्ष्म होती है। जीवात्मा भौतिक चक्षु से दिखाई नही देता। सूक्ष्म जीव से लेकर हाथी जैसे विशालकाय प्राणियों में आत्मा एक समान रूप से रहती है। आत्मा के विषय मे भगवान ने भगवद्गीता में कहा है :
#नैनं_छिन्दन्ति_शस्त्राणि_नैनं_दहति_पावक:।
#न_चैनं_क्लेदयन्त्यापो_न_शोषयति_मारुत:॥ (भ ग २/२३)
अर्थात् : इस आत्मा को न शस्त्र काट सकते हैं, न अग्नि जला सकती है, न इसे जल गिला कर सकता है और न ही वायु इसे सुखा सकती है। जबकि चेतना तो सारे शरीर में व्याप्त है। सिर से पाँव तक हमें सब जगह अनुभूति होती है।
मनोविज्ञान की दृष्टि से चेतना मानव में उपस्थित वह तत्व है जिसके कारण उसे सभी प्रकार की अनुभूतियाँ होती हैं। चेतना के कारण ही हम देखते, सुनते, समझते और अनेक विषय पर चिंतन करते हैं। इसी के कारण हमें सुख-दु:ख की अनुभूति भी होती है और हम इसी के कारण अनेक प्रकार के निश्चय करते तथा अनेक पदार्थों की प्राप्ति के लिए चेष्टा करते हैं।
ईश्वर ने ऐसी व्यवस्था कर रखी है। आत्मा एक ही स्थान पर रहता है, और #नस_नाड़ियों, #तंत्र_तंत्रिका के माध्यम से शरीर में अनुभूतियों की व्यवस्था कर रखी है। जैसे एक फैक्ट्री का मालिक अपने कार्यालय में एक जगह बैठा रहता है। और उसने फैक्ट्री के अलग अलग विभागों में वीडियो कैमरे लगा रखे हैं। उन कैमरों की सहायता से वह एक जगह बैठकर फैक्ट्री के अनेक विभागों की जानकारी करते रहता है। इसी प्रकार से मन, बुद्धि, इंद्रियाँ इन सारे उपकरणों के माध्यम से जीवात्मा को एक ही स्थान पर रहते हुए भी पूरे शरीर की बहुत सारी मोटा मोटी अनुभूतियाँ हो जाती है, लेकिन सारी नहीं।
आपको पेट में क्या गंभीर रोग हो रहा है ? वह आपको पता नहीं है। जब वो काफी बढ़ जाता है, दर्द होने लगता है, तो जाते हैं, डॉक्टर साहब के पास। फिर वह चेकअप करते हैं, एक्सरे, Eco, MRI, CT-Scan आदि जांच करवाने के बाद निदान कर बताते हैं कि साहब, ये बीमारी तो तीन साल से चल रही है। आपने चेकअप ही नहीं कराया, इसलिए तीन साल बाद पता चला। इस तरह आत्मा को सब बातों का पता नहीं चलती, मोटी-मोटी अनुभूतियाँ अवश्य हो जाती हैं। कहीं पेट दुख रहा है, पाँव दुख रहा है, सर दुख रहा है, जो भी हो रहा है, वह मोटा-मोटा पता चलता है। यह ईश्वर की व्यवस्था है।
मानव चेतना की तीन विशेषताएँ हैं :
#ज्ञानात्मक, #भावात्मक और #क्रियात्मक होती है। भारतीय दार्शनिकों ने इसे सच्चिदानंद रूप कहा है। चेतना और मनुष्य के चरित्र में मौलिक संबंध है। चेतना वह विशेष गुण है जो मनुष्य को जीवंत बनाती है और चरित्र उसका वह संपूर्ण संगठन है जिसके द्वारा उसके जीवित रहने की वास्तविकता व्यक्त होती है तथा जिसके द्वारा जीवन के विभिन्न कार्य चलाए जाते हैं।
चेतना के तीन अवस्था मानी गई हैं :
#चेतन, #अवचेतन और #अचेतन। चेतन स्तर पर वे सभी बातें रहती हैं जिनके द्वारा हम सोचते समझते और कार्य करते हैं। चेतना में ही मनुष्य का अहंभाव रहता है और यहीं विचारों का संगठन होता है। अवचेतन स्तर में वे बातें रहती हैं जिनका ज्ञान हमें तत्क्षण नहीं रहता, परंतु समय पर याद की जा सकती हैं। अचेतन स्तर में वे बातें रहती हैं जो हम भूल चुके हैं और जो हमारे यत्न करने पर भी हमें याद नहीं आतीं और विशेष प्रक्रिया से जिन्हें याद कराया जाता है। जो अनुभूतियाँ एक बार चेतना में रहती हैं, वे ही कभी अवचेतन और अचेतन मन में चली जाती हैं। ये अनुभूतियाँ सर्वथा निष्क्रिय नहीं होतीं, वरन् मानव को अनजाने ही प्रभावित करती रहती हैं।
#चैतन्य, #Consciousness, शब्द कई अर्थो में प्रयुक्त होता है :
Consciousness : चेतना, चैतन्य, भान, समझ, आपा, संज्ञा, सत्व, स्वत्व
Sentience : संवेदन, अनुभव
Self-Consciousness : आत्म-ज्ञान, बोध
Sense : समझ, अर्थ, बुद्धि, विवेक, होश,
Rationality : तर्क, तर्कसंगतता, तर्कशक्ति, युक्तता
Memory : स्मृति, याद, यादगार, स्मरणशक्ति, धारणा
Feeling : अनुभूति, अनुभव, बोध, सहानुभूति, मत
नवरात्र के पावनपर्व पर हमारे अंदर छुपी माँ भगवती के विविध शक्तियों के स्वरुपों का हम उनकी ही दी हुई शक्ति से भावपूजन कर पूर्ण #चैतन्यवान बनकर माँ की #भक्तिभाव से आराधन कर रहे हैं।
नवरात्रि पर्व सभी मित्रों एवं माँ के भक्तों को हार्दिक अभिनंदन के साथ ढेरों शुभकामनाएं।
(क्रमशः)
जय श्री कृष्ण
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