विभूति दर्शन ' वाणी' '

आज अश्विन शुक्ल त्रयोदशी दिनांक २२.१०.२०१८ सोमवार

 🕉 #कृष्णं_वंदे_जगद्गुरूम् 🕉   
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श्रीमद् भगवद्गीता के विभूति दर्शन में प्रभु ने कहा है :
#मृत्युः_सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च_भविष्यताम्।
#कीर्तिः_श्रीर्वाक्च_नारीणां_स्मृतिर्मेधा_धृतिः_क्षमा॥ (भ ग १०/३४)
(अर्थात् : मैं सर्वभक्षक मृत्यु और भविष्य में होने वालों की उत्पत्ति का कारण हूँ स्त्रियों में कीर्ति, श्री, वाक (वाणी), स्मृति, मेधा, धृति, और क्षमा हूँ।)

कीर्ति और श्री का चिंतन हमने कीया, तत्पश्चात हम प्रभु के अद्भुत उपहार वाणी का चिंतन करने का प्रयास करेंगे।             

विज्ञान कहता है कि वाणी स्वर यंत्र में SOUND BOX में उत्पन्न होती है। SOUND BOX हमारे गले में रहता है। परंतु स्वर कैसे उत्पन्न होता है, यह विज्ञान ने नहीं समझाया !!!

#पाणिनीय_व्याकरण_अष्टाध्यायी में वाणी की उत्पत्ति को सूत्रबद्ध किया है :

#आत्मा_बुद्धया_समेत्यार्थान्_मनो_युऽंक्ते_विवक्षया।    
#मनः_कायाग्निमाहन्ति_स_प्रेरयति_मारुतम्॥   
#मारुतस्तूरसि_चरन्_मन्द्रं_जनयति_स्वरम् ।"     
(अर्थात् : आत्मा और बुद्धि दोनों मिलकर निश्चित करते हैं कि क्या बोलना है ? वह उसे मन की ओर भेज देते हैं। मन शरीर में स्थित एक अग्नि पर प्रहार करता है, जिससे एक वायु उत्पन्न होती है। जो घूमते घूमते, स्वर यंत्र (Sound Box) में पहुंचती है और वहां स्वर उत्पन्न करती है।) यह सब कुछ (Micro Second) मे हो जाता है। कितनी अद्भुत रचना है प्रभु की !

वैदिके ऋषियों ने यह प्रभुदत्त वाणी को चार भागों में बाँटा है-
1) वैखारी वाणी
2) मध्यमा वाणी
3) पश्यंती वाणी और
4) परा वाणी
ये वाणियाँ कंठ, ऊर्ध्व प्रदेश, हृदय और नाभि से निसृत (निकलती) होती हैं।

१) #वैखरी_वाणी : प्रतिदिन के बोलचाल की भाषा वैखरी वाणी है। ज्यादातर लोग बगैर सोचे-समझे बोलते हैं और कुछ ऐसी बातें भी होती है जिसमें बहुत सोच-विचार की आवश्यकता नहीं होती।
२) #मध्यमा_वाणी : कुछ विचार कर बोली जाने वाली मध्यमा वाणी कहलाती है। किसी सवाल का उत्तर, किसी समस्या के समाधन और भावावेश में या सोच-समझकर की गई किसी क्रिया की प्रतिक्रिया पर सोच-समझकर बोलने की आवश्यकता होती है।
३)  #पश्यंती_वाणी : हृदयस्थल से बोली गई भाषा पश्यंती वाणी कहलाती है। पश्यंती गहन, निर्मल, निच्छल और रहस्यमय वाणी होती है। उदाहरणार्थ रामकृष्ण परमहंस जैसे बालसुलभ मन वाले साधुओं की वाणी।
४) #परा_वाणी : परा वाणी दैवीय होती है। निर्विचार की दशा में बोली गई वाणी होती है या फिर जब मन शून्य अवस्था में हो और किसी दैवीय शक्ति का अवतरण हो जाए। उदाहरणार्थ भगवद्गीता में अर्जुन को गीताकार दिया हुआ ज्ञान :

#अनुद्वेगकरं_वाक्यं_सत्यं_प्रियहितं_च_यत्।
#स्वाध्यायाभ्यसनं_चैव_वाङ्मयं_तप_उच्यते॥ (भ ग १७/१५)
अर्थात् : जो वाक्य (भाषण) उद्वेग उत्पन्न करने वाला नहीं है; जो प्रिय हितकारक और किसी का मन दुखी न हो ऐसा सत्य है तथा वेदों का स्वाध्याय अभ्यास वाङ्मय (वाणी का) तप कहलाता है।

भगवान ने हमें दो मुंह दिए हैं। एक खाने वाला और दुसरा बोलने वाला। अन्य प्राणियों को सिर्फ खाने वाला मुंह दिया है। यदि हम इसका दुरुपयोग करते हैं, तो भगवान अगले जन्म में सिर्फ खाने वाला मुंह ही देदेते है।           

#है_आंख_जो_भगवान_का_दर्शन_किया_करें, 
#हैं_शिश_जो_प्रभु_चरण_में_वंदन_किया_करें।          
#बेकार_है_वो_मुख_जो_रहे_व्यर्थ_बातों_में, 
#मुख_वो_है_जो_हरी_नामका_सुमिरन_किया_करें। 
#हीरे_मोती_से_नहीं_शोभा_है_हाथ_की,
#है_हाथ_जो_भगवानका_पूजन_किया_करें।                  
#मरकर_भी_अमर_नाम_है_उस_जीव_का_जग_में, 
#प्रभु_प्रेम_में_बलिदान_जो_जीवन_किया_करें। 

वाणी की अधिष्ठात्री देवी माँ सरस्वती के चरणों मे यह भावपुष्प अर्पण है।

(क्रमशः)       

जय श्री कृष्ण                 
🙏🙏🙏🙏🙏🙏

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