दैवी संपदा ' शांति '

आज अश्विन शुक्ल षष्ठी दिनांक 15.10.2018 सोमवार
🕉 #शक्ति_उपासना_का_महापर्व_नवरात्र_महोत्सव 🕉
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#नमो_देव्यै_महादेव्यै_शिवायै_सततं_नम:।
#नमः_प्रकृत्यै_भद्रायै_नियताः_प्रणताः_स्मताम्॥ 

#या_देवी_सर्वभूतेषु_शांतिरूपेण_संस्थिता।
#नमस्तस्यै_नमस्तस्यै_नमस्तस्यै_नमो_नमः॥
जो देवी सब प्राणियों में शांति के रूप में स्थित है, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है।

#शांति / #Peace के कई प्रतिशब्द है।
Peace : शांति, अमन, चैन, शांतिसंधि, नीरवता, निस्तब्धता, स्थिरता, मौनता, सन्नाटा

आज मानव के पास दुनिया का पूरा वैभव और सुख-साधन उपलब्ध है परंतु शांति नहीं है। संसार में मनुष्यों द्वारा जितने भी कार्य अथवा उद्यम किए जा रहे हैं सबका एक ही उद्देश्य है ' शांति '।

धन-दौलत और संपदा से संसाधन खरीदे जा सकते हैं परंतु शांति नहीं। हम यही सोचते रह जाते हैं कि यह कर लूँगा तो शांति मिल जाएगी। आवश्यकताओं को पूरा करते-करते पूरा समय निकल जाता है और न तो शांति मिलती है और न ही खुशी।

बाह्य शोरगुल रहित भौतिक शांति अलग बात है। यह भौतिक शांति पहाड़ों पर निर्जन स्थानों पर संभवित है। लेकिन इस मंत्र में अभिप्रेरित शांति यह मन की अवस्था है। मन जब स्थिर हो जाता है तब शांति मिलती है। मन की चंचलता जब तक है तब तक मन अशांत रहता है। कामना वासना रहित मन की अवस्था ही शांति है। उदाहरणथा गहरी नींद में हम क्या रहते है ? कोई वासना-कामना नही उस मानसिक स्थिति को शांति कहते है। अभ्यास वैराग्य और साधना से शनै शनै जागृत अवस्था मे मन की वह स्थिति पाना ही सच्ची शांति है।

शांति पाने के लिये भगवद्गीता में भगवान ने कहा है :
#विहाय_कामान्यः_सर्वान्पुमांश्चरति_निःस्पृहः।
#निर्ममो_निरहंकारः_स_शांतिमधिगच्छति॥ (भ ग २/७१)
(अर्थात् : जो मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग करके निर्मम निरहंकार और निःस्पृह होकर विचरता है वह शान्तिको प्राप्त होता है।)

#ॐ_शांति_शांति_शांति: यह उच्चारण तीन बार ही क्यों ?

हमारी वैदिक संस्कृति में किसी भी पवित्र मंत्रोच्चार के बाद, ॐ शांति: शांति: शांति:  शब्द को तीन बार दोहराया जाता है। शांति का आवाहन करने के लिए हम प्रार्थना करते हैं। प्रार्थना से शोक और दुःख समाप्त होते हैं। ऐसी सब प्रार्थनाएं तीन बार शांति कह कर समाप्त की जाती है।  लेकिन आखिर तीन बार ही क्यों...

वैदिक संस्कृति की प्रत्येक मान्यता एवं परपंरा के पीछे कोई कारण छुपा होता है, और इसका भी एक कारण है कि मंत्रोच्चार के बाद शांति शब्द को तीन बार क्यों दोहराया जाता है। इसके पीछे सबसे बड़ा और गहन कारण है, त्रिवरम सत्यमं।

ऐसी मान्यता है कि " त्रिवरम सत्यमं " अर्थात तीन बार कहने से कई बात सत्य हो जाती हैं। यही कारण है कि हम अपनी बात पर बल देने के लिए भी उसे तीन बार दोहराते हैं।

हमारी सभी बाधाएं, समस्याएं और व्यथाएं तीन स्त्रोतों से उत्पन्न होती है :-
१) #आधिदैविक - उन अदृश्य , दैवी शक्तिओ के कारण जिन पर हमारा बहुत कम और बिल्कुल नियंत्रण नहीं होता।  जैसे भूकंप , बाढ़  , ज्वालामुखी इत्यादि।

२) #आधिभौतिक -  हमारे आस - पास के कुछ ज्ञात कारणों से जैसे दुर्घटना , मानवीय संपर्क, प्रदूषण, अपराध  इत्यादि।

३) #आध्यात्मिक - हमारी शारीरिक और मानसिक समस्याएं जैसे रोग, क्रोध, निराशा इत्यादि।

 जब हम मंत्रोच्चार कर किसी शब्द को तीन बार बोलते हैं, तो हम ईश्वर से सच्चे मन से प्रार्थना करते हैं कि कम से कम किसी विशेष कार्य के उत्तरदायित्व निभाते वक़्त या हमारे रोजमर्रा के काम काज में यह तीन तरीके की बाधाएं उत्पन्न न हो। अतः तीन बार शांति का उच्चारण किया जाता हैं।

पहली बार उच्च स्वर में दैवीय शक्ति को संबोधित किया जाता है। दूसरी बार कुछ धीमे स्वर में अपने आस-पास के वातावरण और व्यक्तियों को संबोधित किया जाता है और तीसरी बार बिलकुल धीमे स्वर में अपने आपको संबोधित किया जाता है।

नवरात्र के पावनपर्व पर हमारे अंदर छुपी माँ भगवती के विविध शक्तियों के स्वरुपों का  हम उनकी ही दी हुई शक्ति से भावपूजन कर ' मन की शांति ' पाकर माँ की #भक्तिभाव से आराधन कर रहे हैं।

नवरात्रि पर्व सभी मित्रों एवं माँ के भक्तों को हार्दिक अभिनंदन के साथ ढेरों शुभकामनाएं।
(क्रमशः)                 

जय श्री कृष्ण             
🙏🙏🙏🙏🙏

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