दैवी संपदा ' विद्या '
आज अश्विन शुक्ल सप्तमी दिनांक 16.10.2018 मंगलवार
#या_देवी_सर्वभूतेषु_विद्यारूपेण_संस्थिता।
#नमस्तस्यै_नमस्तस्यै_नमस्तस्यै_नमो_नमः॥
जो देवी सब प्राणियों में विद्या के रूप में स्थित है, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है।
#या_कुन्देन्दुतुषारहारधवला_या_शुभ्रवस्त्रावृता
#या_वीणावरदण्डमण्डितकरा_या_श्वेतपद्मासना।
#या_ब्रह्माच्युत_शंकरप्रभृतिभिर्देवैः_सदा_वन्दिता
#सा_मां_पातु_सरस्वती_भगवती_निःशेषजाड्यापहा॥
(अर्थात् जो विद्या की देवी भगवती सरस्वती कुन्द के फूल, चंद्रमा, हिमराशि और मोती के हार की तरह धवल वर्ण की है और जो श्वेत वस्त्र धारण करती है, जिनके हाथ में वीणा-दण्ड शोभायमान है, जिन्होंने श्वेत कमलों पर आसन ग्रहण किया है तथा ब्रह्मा विष्णु एवं शंकर आदि देवताओं द्वारा जो सदा पूजित हैं, वही संपूर्ण जड़ता और अज्ञान को दूर कर देने वाली विद्या की देवी माँ सरस्वती हमारी रक्षा करें। मैं उनको बारंबार नमस्कार करता हूं।)
विद्या किसे कहते हैं ? इसकी परिभाषा करते हुए शास्त्रकारों ने सूत्र रूप में कह दिया है कि - #सा_विद्या_या_विमुक्तये - विद्या वह है कि जो मुक्ति प्रदान करे। जिसके द्वारा हम रोग, शोक, द्वेष, पाप, दीनता, दासता, गरीबी, बेकारी, अभाव, अज्ञान, दुर्गुण, कुसंस्कार आदि की दासता से मुक्ति प्राप्त कर सकें वह विद्या है। ऐसी विद्या को प्राप्त करने वाले विद्वान कहे जाते हैं।
प्राचीन समय में आज के जितने स्कूल कालेज न थे। पढ़ने वाले छात्रों को एक गधे के बोझ की बराबर पुस्तकें लादकर यों स्कूल न जाना पड़ता था। दिन-रात आवश्यक बातें रटाने की पद्धति की आज की शिक्षा प्रणाली का कहीं दर्शन भी न था। तो भी लोग विद्वान होते थे। उपयोगी शिक्षा और विद्या का इतना अधिक प्रचलन था कि हर ग्राम और नगर स्वतः एक कालेज था। वहाँ के निवासी अपने घर वालों, कुटुम्बियों और नगर निवासियों से ही बहुमूल्य ज्ञान प्राप्त कर लेते थे। तोता रटंत की अपेक्षा जीवन की उपयोगी और आवश्यक शिक्षा क्रियात्मक रीति से प्राप्त की जाती थी। प्रत्यक्ष प्रमाण और अनुभव द्वारा वे तथ्य शिक्षार्थियों को भली प्रकार हृदयंगम हो जाते थे।
विद्या के परिणाम स्वरूप विद्वान के लक्षण भगवद्गीता में वर्णित है :
#विद्याविनयसंपन्ने_ब्राह्मणे_गवि_हस्तिनि।
#शुनि_चैव_श्वपाके_च_पण्डिताः_समदर्शिनः॥ (भ ग ५/१८)
(अर्थात् : ज्ञानी महापुरुष विद्या विनययुक्त ब्राह्मणमें और चाण्डालमें तथा गाय हाथी एवं कुत्तेमें भी समरूप परमात्माको देखनेवाले होते हैं।)
लेकिन आज की शिक्षा उपरोक्त कसौटी पर कसे जाने के उपरान्त बिल्कुल निकम्मी सिद्ध होती है। जीवन का एक तिहाई भाग स्कूल कालेजों के कैद खाने में व्यतीत करने के बाद हमारे बालक जब बाहर आते हैं तो वे उपरोक्त बंधनों से छूटना तो दूर उलटे जब स्कूल में प्रवेश हुए थे उसकी अपेक्षा भी अधिक जकड़े हुए निकलते हैं। शील, स्वास्थ्य, संयम, विवेक, विनय, श्रद्धा, उत्साह, वीरत्व, सेवा, सहयोग आदि विद्या द्वारा प्राप्त होने वाले स्वाभाविक फल जब उनमें दृष्टिगोचर नहीं होते तो फिर किस प्रकार कहा जा सकता है कि उन्होंने विद्या प्राप्त की है या वे विद्वान हो गये हैं।
विद्या धन को सभी धनो से सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
#न_चोरहार्यं_न_च_राजहार्यं_न_भ्रातृभाज्यं_न_च_भारकारी।
#व्यये_कृते_वर्धते_एव_नित्यं_विद्याधनं_सर्वधन_प्रधानम्॥ (सुभाषित)
विद्यारुपी धन को कोई चुरा नहि सकता, राजा ले नहि सकता, भाईयों में उसका भाग नहि होता, उसका भार नहि लगता, (और) खर्च करने से बढता है। सचमुच, विद्यारुप धन सर्वश्रेष्ठ है।
नवरात्र के पावनपर्व पर हमारे अंदर छुपी माँ भगवती के विविध शक्तियों के स्वरुपों का हम उनकी ही दी हुई शक्ति से भावपूजन कर ' #विद्यासम्पन्न ' होकर माँ की #भक्तिभाव से आराधन कर रहे हैं।
नवरात्रि पर्व सभी मित्रों एवं माँ के भक्तों को हार्दिक अभिनंदन के साथ ढेरों शुभकामनाएं।
(क्रमशः)
जय श्री कृष्ण
🙏🙏🙏🙏🙏
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🕉 #शक्ति_उपासना_का_महापर्व_नवरात्र_महोत्सव 🕉
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#नमो_देव्यै_महादेव्यै_शिवायै_सततं_नम:।
#नमः_प्रकृत्यै_भद्रायै_नियताः_प्रणताः_स्मताम्॥
#या_देवी_सर्वभूतेषु_विद्यारूपेण_संस्थिता।
#नमस्तस्यै_नमस्तस्यै_नमस्तस्यै_नमो_नमः॥
जो देवी सब प्राणियों में विद्या के रूप में स्थित है, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है।
#या_कुन्देन्दुतुषारहारधवला_या_शुभ्रवस्त्रावृता
#या_वीणावरदण्डमण्डितकरा_या_श्वेतपद्मासना।
#या_ब्रह्माच्युत_शंकरप्रभृतिभिर्देवैः_सदा_वन्दिता
#सा_मां_पातु_सरस्वती_भगवती_निःशेषजाड्यापहा॥
(अर्थात् जो विद्या की देवी भगवती सरस्वती कुन्द के फूल, चंद्रमा, हिमराशि और मोती के हार की तरह धवल वर्ण की है और जो श्वेत वस्त्र धारण करती है, जिनके हाथ में वीणा-दण्ड शोभायमान है, जिन्होंने श्वेत कमलों पर आसन ग्रहण किया है तथा ब्रह्मा विष्णु एवं शंकर आदि देवताओं द्वारा जो सदा पूजित हैं, वही संपूर्ण जड़ता और अज्ञान को दूर कर देने वाली विद्या की देवी माँ सरस्वती हमारी रक्षा करें। मैं उनको बारंबार नमस्कार करता हूं।)
विद्या किसे कहते हैं ? इसकी परिभाषा करते हुए शास्त्रकारों ने सूत्र रूप में कह दिया है कि - #सा_विद्या_या_विमुक्तये - विद्या वह है कि जो मुक्ति प्रदान करे। जिसके द्वारा हम रोग, शोक, द्वेष, पाप, दीनता, दासता, गरीबी, बेकारी, अभाव, अज्ञान, दुर्गुण, कुसंस्कार आदि की दासता से मुक्ति प्राप्त कर सकें वह विद्या है। ऐसी विद्या को प्राप्त करने वाले विद्वान कहे जाते हैं।
प्राचीन समय में आज के जितने स्कूल कालेज न थे। पढ़ने वाले छात्रों को एक गधे के बोझ की बराबर पुस्तकें लादकर यों स्कूल न जाना पड़ता था। दिन-रात आवश्यक बातें रटाने की पद्धति की आज की शिक्षा प्रणाली का कहीं दर्शन भी न था। तो भी लोग विद्वान होते थे। उपयोगी शिक्षा और विद्या का इतना अधिक प्रचलन था कि हर ग्राम और नगर स्वतः एक कालेज था। वहाँ के निवासी अपने घर वालों, कुटुम्बियों और नगर निवासियों से ही बहुमूल्य ज्ञान प्राप्त कर लेते थे। तोता रटंत की अपेक्षा जीवन की उपयोगी और आवश्यक शिक्षा क्रियात्मक रीति से प्राप्त की जाती थी। प्रत्यक्ष प्रमाण और अनुभव द्वारा वे तथ्य शिक्षार्थियों को भली प्रकार हृदयंगम हो जाते थे।
विद्या के परिणाम स्वरूप विद्वान के लक्षण भगवद्गीता में वर्णित है :
#विद्याविनयसंपन्ने_ब्राह्मणे_गवि_हस्तिनि।
#शुनि_चैव_श्वपाके_च_पण्डिताः_समदर्शिनः॥ (भ ग ५/१८)
(अर्थात् : ज्ञानी महापुरुष विद्या विनययुक्त ब्राह्मणमें और चाण्डालमें तथा गाय हाथी एवं कुत्तेमें भी समरूप परमात्माको देखनेवाले होते हैं।)
लेकिन आज की शिक्षा उपरोक्त कसौटी पर कसे जाने के उपरान्त बिल्कुल निकम्मी सिद्ध होती है। जीवन का एक तिहाई भाग स्कूल कालेजों के कैद खाने में व्यतीत करने के बाद हमारे बालक जब बाहर आते हैं तो वे उपरोक्त बंधनों से छूटना तो दूर उलटे जब स्कूल में प्रवेश हुए थे उसकी अपेक्षा भी अधिक जकड़े हुए निकलते हैं। शील, स्वास्थ्य, संयम, विवेक, विनय, श्रद्धा, उत्साह, वीरत्व, सेवा, सहयोग आदि विद्या द्वारा प्राप्त होने वाले स्वाभाविक फल जब उनमें दृष्टिगोचर नहीं होते तो फिर किस प्रकार कहा जा सकता है कि उन्होंने विद्या प्राप्त की है या वे विद्वान हो गये हैं।
विद्या धन को सभी धनो से सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
#न_चोरहार्यं_न_च_राजहार्यं_न_भ्रातृभाज्यं_न_च_भारकारी।
#व्यये_कृते_वर्धते_एव_नित्यं_विद्याधनं_सर्वधन_प्रधानम्॥ (सुभाषित)
विद्यारुपी धन को कोई चुरा नहि सकता, राजा ले नहि सकता, भाईयों में उसका भाग नहि होता, उसका भार नहि लगता, (और) खर्च करने से बढता है। सचमुच, विद्यारुप धन सर्वश्रेष्ठ है।
नवरात्र के पावनपर्व पर हमारे अंदर छुपी माँ भगवती के विविध शक्तियों के स्वरुपों का हम उनकी ही दी हुई शक्ति से भावपूजन कर ' #विद्यासम्पन्न ' होकर माँ की #भक्तिभाव से आराधन कर रहे हैं।
नवरात्रि पर्व सभी मित्रों एवं माँ के भक्तों को हार्दिक अभिनंदन के साथ ढेरों शुभकामनाएं।
(क्रमशः)
जय श्री कृष्ण
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