विभूति दर्शन धृति धैर्य

आज अश्विन कृष्ण पक्ष द्वितीया दिनांक २६.१०.२०१८ शुक्रवार

 🕉 #कृष्णं_वंदे_जगद्गुरूम् 🕉   
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श्रीमद् भगवद्गीता के विभूति दर्शन में प्रभु ने कहा है :
#मृत्युः_सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च_भविष्यताम्।
#कीर्तिः_श्रीर्वाक्च_नारीणां_स्मृतिर्मेधा_धृतिः_क्षमा॥ (भ ग १०/३४)
(अर्थात् : मैं सर्वभक्षक मृत्यु और भविष्य में होने वालों की उत्पत्ति का कारण हूँ स्त्रियों में कीर्ति, श्री, वाक (वाणी), स्मृति, मेधा, धृति, और क्षमा हूँ।)

कीर्ति, श्री, वाणी, स्मृति, और मेधा का चिंतन हमने कीया, तत्पश्चात हम प्रभु के अद्भुत उपहार धृति, धैर्य, धीरज का चिंतन करने का प्रयास करेंगे।             

प्रकृति का नियम है जैसे जैसे गति बढती जाती हैं, धैर्य कम होने लगता है। पुरातन काल में बालक को 8 वर्ष की आयु में विद्योपार्जन के लिए गुरुकुल में भेजा जाता था। समय बदला 6 वर्ष की आयु में पाठशाला में भेजने लगे। तत्पश्चात 4 वर्ष की आयु में KG I मे भेजने लगे और अब 2.5 वर्ष की आयु में Pre Nursery में भेजने लगे। समय गतिशीलता का है और सबको अपने बच्चों को न्यूटन और आइन्सटाइन बनाना है। लेकिन सभी लोग यह भूल गए हैं कि शिक्षा एक स्वाभाविक प्रक्रिया हैं।

EDUCATION IS A SLOW AND NATURAL PROCESS THAT GROWS FROM WITHIN. IT CAN NOT BE ACCELERATED MERE USING NEW TECHNIQUES.

हम अधीर बन गये हैं। हम बच्चों से उसका बचपन छीन रहे हैं।                 

#धीरे_धीरे_रे_मना_धीरे_सब_कुछ_होय।
#माली_सिंचे_सौ_घडा_ऋतु_आवे_फल_होए।           
अतः हम कितने भी प्रयत्न करले, धैर्य रखना ही पड़ता है, कितना भी पानी सिंचलो आम का फल हमें ग्रीष्म ऋतु में ही मिलता है।   

आज हम जिसे प्रगति कहते है वह प्रकृष्ट + गति = प्रगति
अब वह प्रगति है या अधोगित ??? यह हमें सोचना है।
आज हम धैर्य, धिरज, PATIENCE खो बैठे हैं। अधीर होने का एक और नुकसान है। गतिशीलता के कारण, सबको अधिक से अधिक धनोपार्जन की जल्दी है। इस जल्दबाजी के कारण व्यक्ति, व्यक्ति के बीच की निकटता समाप्त होने लगी हैं। भाव संबंध, प्रेम संबंध समाप्त होने लगे हैं। दूरी भाव बढने लगा है। क्योंकि आज किसी के पास समय नहीं है। सबको आगे बढने की जल्दी हैं। धैर्य समाप्त होते जा रहा है।   

संत कवि तुलसीदासजी ने सुंदर कहा है
#धीरज_धर्म_मित्र_अरु_नारी।
#आपद_काल_परखिए_चारी॥
अत: विपत्ति का ही वह समय होता है जब हम अपने धीरज, धर्म, मित्र और पत्नी की परीक्षा कर सकते हैं। सुख में तो सभी साथ देते हैं। जो दुख में साथ दे वही हमारा सच्चा हितेशी है।

कलयुग में थोड़ा ही दुख पहाड़ के समान दिखाई देता है और दुख के वश अधिकांशत: धर्म और धीरज का साथ छुट जाता है। और धर्म और धीरज का साथ छुटते ही शुरू होता है और भी ज्यादा बुरा समय। ऐसे में दुख के भंवर में फंसे उस व्यक्ति के मित्र और उसकी पत्नी साथ दे दे तब ही वह बच सकता है। परंतु ऐसा होता बहुत ही कम है। अत: यह समय ही परीक्षा का समय होता है उस दुखी व्यक्ति के धर्म और धीरज की परीक्षा और परीक्षा उसके मित्र और पत्नी की।

जैसे जैसे गति बढती जाएगी, उतावलापन बढते जाएगा। तेज गति से बाइक चलाने वाला, परिणाम की परवाह कीए बगैर बाइक चलाएगा। उसमें धैर्य नहीं है क्योंकि वह गतिशील हैं, जबकि बैल गाड़ी वाला भीड़ कम होने की राह देखेगा, क्योंकि वह गतिशील नहीं है। इसलिए उसमें धैर्य होता है।                     

ऐसे समय मे हम परमात्मा के समक्ष केवल प्रार्थना ही कर सकते हैं "#सबको_सन्मति_दे_भगवान।"             
 
॥हरि: 🕉 तत्सत्॥
❇  इदं न मम  ❇   

जय श्री कृष्ण                 
🙏🙏🙏🙏🙏

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