दैवी संपदा ' संतोष '
आज अश्विन शुक्ल अष्टमी दिनांक 17.10.2018 बुधवार
#या_देवी_सर्वभूतेषु_तुष्टिरूपेण_संस्थिता।
#नमस्तस्यै_नमस्तस्यै_नमस्तस्यै_नमो_नमः॥
जो देवी सब प्राणियों में तुष्टि - संतोष - तृप्ति के रूप में स्थित है, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है।
भगवद्गीता में संतोषी को भगवान ने अपना भक्त माना है।
#सन्तुष्टः_सततं_योगी_यतात्मा_दृढनिश्चयः।
#मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो_मद्भक्तः_स_मे_प्रियः॥ (भ ग १२/१४)
(अर्थात् : सब प्राणियोंमें द्वेषभावसे रहित, सबका मित्र (प्रेमी)' और दयालु, ममतारहित, अहंकाररहित, सुखदुःखकी प्राप्तिमें सम, क्षमाशील, निरन्तर सन्तुष्ट, योगी, शरीरको वशमें किये हुए दृढ़ निश्चयवाला मेरेमें अर्पित मनबुद्धिवाला जो मेरा भक्त है वह मेरेको प्रिय है।)
#संतोष_संतुष्ट क्या है ? शास्त्रों के अनुसार ‘अप्राप्य वस्तु के लिए चिंता न करना, प्राप्त वस्तु के लिए सम रहना ही सन्तोष है। ' इससे स्पष्ट है कि सन्तोष मनुष्य की वह दशा है, जिसमें वह अपनी वर्तमान अवस्था से तृप्त रहता है और उससे अधिक की कामना नहीं करता। संतोष सभी सुखों का दाता है, संतोष का गुण ही जीवन में सुख-शांति लाने की उत्तम औषधि है, और कहा भी जाता है जिस मनुष्य के पास संतोषरूपी गुण है, उसे पानी की बूँद भी समुद्र के समान प्रतीत होती है और जिसके पास यह गुण नहीं उसे समुद्र भी बूँद के समान प्रतीत होता है।
कबीरदासजी कहते हैं -
#चींटी_चावल_ले_चली_बीच_में मिल_गई_दाल।
#कहत_कबीरा_दो_ना_मिले_इक_ले_दूजी_डाल॥
अर्थात- एक चींटी अपने मुँह में चावल लेकर जा रही थी, चलते-चलते उसको रास्ते में दाल मिल गई। उसे भी लेने की इच्छा हुई, लेकिन चावल मुँह में रखने पर दाल कैसे मिलेगी ? दाल लेने को जाती तो चावल नहीं मिलता। चींटी का दोनों को लेना का प्रयत्न था।
' चींटी ' का यह दृष्टांत हमारे जीवन का एक उत्तम उदाहरण है। हमारी स्थिति भी उसी चींटी जैसी है। हम भी संसार के विषय-भोगों में फँसकर अतृप्त ही रहते हैं, एक चीज मिलती हैं तो चाहते हैं कि दूसरी भी मिल जाए, दूसरी मिलती हैं तो चाहते हैं कि तीसरी मिल जाए। यह मृगतृष्णा बंद ही नहीं होती और हमारे जाने का समय आ जाता है।
प्रारब्ध और पुरुषार्थ से जो कुछ प्राप्त है उसी में संतोष करना चाहिए, क्योंकि जो प्राप्त होने वाला नहीं है उसके लिए श्रम करना व्यर्थ ही है।
संसार के समस्त सुखों को त्याग कर संतोष को परम सुख मानकर आदर्श स्थापित करना सरल नहीं है। संतोष की भावना न आने तक शांति नहीं मिलती। सब भौतिक सुख पाने के बाद भी संतोष न आने पर जीवन अशांत बन जाता है।
नवरात्र के पावनपर्व पर हमारे अंदर छुपी माँ भगवती के विविध शक्तियों के स्वरुपों का हम उनकी ही दी हुई शक्ति से भावपूजन कर ' #आत्मसंतुष्टि ' पाकर माँ की #भक्तिभाव से आराधन कर रहे हैं।
नवरात्रि पर्व सभी मित्रों एवं माँ के भक्तों को हार्दिक अभिनंदन के साथ ढेरों शुभकामनाएं।
(क्रमशः)
जय श्री कृष्ण
🙏🙏🙏🙏🙏
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🕉 #शक्ति_उपासना_का_महापर्व_नवरात्र_महोत्सव 🕉
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#नमो_देव्यै_महादेव्यै_शिवायै_सततं_नम:।
#नमः_प्रकृत्यै_भद्रायै_नियताः_प्रणताः_स्मताम्॥
#या_देवी_सर्वभूतेषु_तुष्टिरूपेण_संस्थिता।
#नमस्तस्यै_नमस्तस्यै_नमस्तस्यै_नमो_नमः॥
जो देवी सब प्राणियों में तुष्टि - संतोष - तृप्ति के रूप में स्थित है, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है।
भगवद्गीता में संतोषी को भगवान ने अपना भक्त माना है।
#सन्तुष्टः_सततं_योगी_यतात्मा_दृढनिश्चयः।
#मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो_मद्भक्तः_स_मे_प्रियः॥ (भ ग १२/१४)
(अर्थात् : सब प्राणियोंमें द्वेषभावसे रहित, सबका मित्र (प्रेमी)' और दयालु, ममतारहित, अहंकाररहित, सुखदुःखकी प्राप्तिमें सम, क्षमाशील, निरन्तर सन्तुष्ट, योगी, शरीरको वशमें किये हुए दृढ़ निश्चयवाला मेरेमें अर्पित मनबुद्धिवाला जो मेरा भक्त है वह मेरेको प्रिय है।)
#संतोष_संतुष्ट क्या है ? शास्त्रों के अनुसार ‘अप्राप्य वस्तु के लिए चिंता न करना, प्राप्त वस्तु के लिए सम रहना ही सन्तोष है। ' इससे स्पष्ट है कि सन्तोष मनुष्य की वह दशा है, जिसमें वह अपनी वर्तमान अवस्था से तृप्त रहता है और उससे अधिक की कामना नहीं करता। संतोष सभी सुखों का दाता है, संतोष का गुण ही जीवन में सुख-शांति लाने की उत्तम औषधि है, और कहा भी जाता है जिस मनुष्य के पास संतोषरूपी गुण है, उसे पानी की बूँद भी समुद्र के समान प्रतीत होती है और जिसके पास यह गुण नहीं उसे समुद्र भी बूँद के समान प्रतीत होता है।
कबीरदासजी कहते हैं -
#चींटी_चावल_ले_चली_बीच_में मिल_गई_दाल।
#कहत_कबीरा_दो_ना_मिले_इक_ले_दूजी_डाल॥
अर्थात- एक चींटी अपने मुँह में चावल लेकर जा रही थी, चलते-चलते उसको रास्ते में दाल मिल गई। उसे भी लेने की इच्छा हुई, लेकिन चावल मुँह में रखने पर दाल कैसे मिलेगी ? दाल लेने को जाती तो चावल नहीं मिलता। चींटी का दोनों को लेना का प्रयत्न था।
' चींटी ' का यह दृष्टांत हमारे जीवन का एक उत्तम उदाहरण है। हमारी स्थिति भी उसी चींटी जैसी है। हम भी संसार के विषय-भोगों में फँसकर अतृप्त ही रहते हैं, एक चीज मिलती हैं तो चाहते हैं कि दूसरी भी मिल जाए, दूसरी मिलती हैं तो चाहते हैं कि तीसरी मिल जाए। यह मृगतृष्णा बंद ही नहीं होती और हमारे जाने का समय आ जाता है।
प्रारब्ध और पुरुषार्थ से जो कुछ प्राप्त है उसी में संतोष करना चाहिए, क्योंकि जो प्राप्त होने वाला नहीं है उसके लिए श्रम करना व्यर्थ ही है।
संसार के समस्त सुखों को त्याग कर संतोष को परम सुख मानकर आदर्श स्थापित करना सरल नहीं है। संतोष की भावना न आने तक शांति नहीं मिलती। सब भौतिक सुख पाने के बाद भी संतोष न आने पर जीवन अशांत बन जाता है।
नवरात्र के पावनपर्व पर हमारे अंदर छुपी माँ भगवती के विविध शक्तियों के स्वरुपों का हम उनकी ही दी हुई शक्ति से भावपूजन कर ' #आत्मसंतुष्टि ' पाकर माँ की #भक्तिभाव से आराधन कर रहे हैं।
नवरात्रि पर्व सभी मित्रों एवं माँ के भक्तों को हार्दिक अभिनंदन के साथ ढेरों शुभकामनाएं।
(क्रमशः)
जय श्री कृष्ण
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