बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि


🙏 सुप्रभात, आज कार्तिक शुक्ल चतुर्थी दिनांक ११.११.२०१८  🙏


🕉 #कृष्णं_वंदे_जगद्गुरूम् 🕉   

श्रीमद्भगवगिता में अपनी दैवीसंपदा एवं विभूति दर्शनमें प्रभु ने कहा है:
#बीजं_मां_सर्वभूतानां_विद्धि_पार्थ_सनातनम्।
#बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि_तेजस्तेजस्विनामहम्॥ (भ ग ७/१०)
(अतः हे पार्थ मुझे तू सब भूतोंका सनातन पुरातन बीज अर्थात् उनकी उत्पत्तिका मूल कारण जान। तथा मैं ही बुद्धिमानोंकी बुद्धि अर्थात् विवेकशक्ति और तेजस्वियों अर्थात् प्रभावशाली पुरुषोंका तेज प्रभाव हूँ।)

भगवान कहते है #बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि बुद्धिमानों की बुद्धि अर्थात विवेकशक्ति में हुँ :

संसार के समस्त प्राणियों में श्रेष्ठ प्राणी मनुष्य ही है। मनुष्य के मानस की बड़ी शक्ति विवेक है, जिसके पीछे मन और बुद्धि की भूमिका शामिल है। मन को विचारों का पुंज कहा गया है। यह अपनी सोच से बाहरी दुनिया का अनुभव करता रहता है। जब मन सोच-विचारों को स्वीकार करता है तो इसका नियमन बुद्धि करती है, जिससे यह बुद्धि मन से जुड़ी हुई है। यही बुद्धि #सुमति और #कुमति दो रूपों वाली है। जो कर्म-क्रिया की प्रेरक है। बुद्धिमान व्यक्ति ही सुमति से अपने कार्य का सफल निष्पादन कर लेता है। सुमति सद्बुद्धि से विवेक और कुमति अविवेक देती है।

#बुद्धि_और_विवेक_मे_अंतर :
★ विवेक का अर्थ है ' होंश का जीवन ' और बुद्धि का अर्थ है ' विचार का जीवन '।
★ विचार मे तर्क वितर्क होते है। जब व्यक्ति विचार करता है तो पक्ष विपक्ष दोनों चलते है और जो प्रभावी होता है उसे स्वीकार कर लेता है। 
★ विवेक मे तर्क वितर्क नहीं सतर्कता होती है स्वयमेव मार्ग मिल जाता है।
★ ' बुद्धि ज्ञान का बोझ है ' और ' विवेक का अर्थ बोध है '।
★ बोध से हल्कापन होता है और ज्ञान के बोझ से अहंकार।
★ विचार हमे भटकाते है और कभी कभी विकार का कारण भी बन जाते है। विचार मे जाग्रति नहीं रहती।
★ लेकिन जब विचार पर विवेक का अंकुश हो तब वह हमें काम आते है। विवेक हित-अहित ,कर्त्तव्य-अकर्तव्य, सर-असर,अच्छे -बुरे की पहचान करता है।
★ विवेक अन्दर से प्रकट होता है। विवेकी व्यक्ति अपने हितो के साथ दुसरे के हितो का भी ध्यान रखता है। विचारवान दुसरे के हितो का ध्यान तो रखेगा पर पहले अपने हितो का। विचारवान अपने आप को काँटों से बचाकर चलता है और विवेकी दुसरो को बचा कर। विवेक एक ऐसी जीवन पद्धति है जो आतंरिक अनुसाशन से प्रकट होती है।

ज्ञान मृत होता है, उसमें न तो स्‍वयं की चेतना होती है न स्‍वयं सक्रियता, उसे चेतन होने के लिये बुद्धि की आवश्‍कता होती है, और सक्रिय होने के लिये बुद्धि से संयोग की, लेकिन ज्ञान का सदुपयोग और सुसक्रियता हेतु विवेक की आवश्‍यकता होती है, विवेक ही उचित अनुचित में फर्क करता है, प्रज्ञा बुद्धि को स्थिर करती है। पुस्‍तक में बन्‍द पड़ा ज्ञान मृत ही रहेगा यदि उसे बुद्धि व विवेक का सामर्थ्‍य, सहयोग व सक्रियता न मिले।चतुर मनुष्‍य बुद्धि की साधना कर विवेक से ज्ञान का सदुपयोग करते हैं, मूर्ख मनुष्‍य ज्ञानी होकर भी बुद्धि के अभाव में उसका उपयोग नहीं कर पाते, और जड़ कहे जाते हैं, ज्ञान का दुरूपयोग करने वाले मनुष्‍यों में विवेक का अभाव होता है।
ज्ञान दहीं है - बुद्धि मथनी - और विवेक उसका घृत होता है।

श्रीमद्भगवगिता में भगवान ने बुद्धि की श्रेष्ठता के विषय मे कहा है :
#इन्द्रियाणि_पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः_परं_मनः ।
#मनसस्तु_परा_बुद्धिर्यो_बुद्धेः_परतस्तु_सः (भ ग ४/४२)
(अर्थात् : इन्द्रियोंको स्थूल शरीरसे पर (श्रेष्ठ) कहते हैं; इन्द्रियोंसे श्रेष्ठ मन है, मनसे भी पर बुद्धि है और जो बुद्धिसे भी पर है वह (आत्मा) है।)

परमात्मा के अंश आत्मा के बाद सर्वश्रेष्ठ कोई है तो वह बुद्धि ही है। लेकिन बुद्धि विवेकपूर्ण होनी चाहिये।

🙏 जय श्री कृष्ण 🙏

॥हरि: 🕉 तत्सत्॥

🔆  इदं न मम  🔆

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