नामजप जपयज्ञ
🙏 सुप्रभात, आज कार्तिक कृष्ण पंचमी मंगलवार दिनांक २७.११.२०१८ 🙏
श्रीमद्भगवगिता में अपनी दैवीसंपदा एवं विभूति दर्शनमें प्रभु ने कहा है:
#महर्षीणां_भृगुरहं_गिरामस्म्येकमक्षरम्।
#यज्ञानां_जपयज्ञोऽस्मि_स्थावराणां_हिमालयः॥ (भ ग १०/२५)
अर्थात् : मैं महर्षियों में भृगु और वाणी (शब्दों) में एकाक्षर ओंकार हूँ। मैं यज्ञों में जपयज्ञ और स्थावरों (अचलों) में हिमालय हूँ।
श्रीमद्भगवगिता में भगवान कहते है कि : #यज्ञानां_जपयज्ञोऽस्मि मैं यज्ञों में जपयज्ञ हूँ। भगवान ने नामजप को बहोत महत्व दिया है। उसे ही जपयज्ञ कहा गया है।
इस यज्ञ का द्रव्य क्या है ? वाणी के द्वारा पुनः पुनः उच्चारण किया जाने वाला " मंत्र " या कोई श्री सच्चिदानन्द परमात्मा का नाम ' जपयज्ञ ' है।
#जकारो_जन्मविच्छेद_पकारो_पापनाशन:।
#जन्मकर्महरो_यस्मात्_तस्माज्जप_इति_स्मृत:॥
' ज ' कार याने जन्ममृत्यु के फेरे से मुक्ति, ' प ' कार याने सर्व पापों का नाश। अर्थात जो साधक को जन्ममृत्यु की जंजाल से मुक्त करता है वह ' जप '। वाणी के द्वारा पुनः पुनः उच्चारण किया जाने वाला " मंत्र " या कोई उन श्री सच्चिदानन्द का नाम जपयज्ञ है।
कहने को लोग बड़ी सरलता से कहते हैँ कि " हम तो रोज जपमाला के मनके फिरो कर ' जपयज्ञ ' कर रहेँ है, यानी उस श्री सच्चिदानन्द जी नामजप कर रहे हैँ, मंत्र का जप कर रहे हैँ। पर यह इतना सरल नहीँ है, बड़ा टेढ़ा है मामला है।
क्योँकि यज्ञ के अन्दर जो सामग्री ड़ालेँगे , वह शुद्ध होनी चाहिये। कीड़ा खाये हुए गेँहूँ से तो यज्ञ होने वाला नही है। जिस तिल का तेल निकल चुका है, उस बचे हुए खली से भी यज्ञ नही होना है और जो चावल सड़ चुका है, उससे भी यज्ञ होने वाला नही है। यज्ञ करने के लिये द्रव्य शुद्ध होना चाहिये।
•अगर #जपयज्ञ करते हैँ तो पहले विचार करना पड़ेगा कि वाणी मेँ कोई अशुद्धि तो नही है। वाणी की सब से बड़ी अशुद्धि झूठ बोलना है। इसलिय हमारे मंत्रद्रष्टा शास्त्रकारोँ ने पहले से ही कह दिया है कि # कलियुग मेँ रहने वालोँ को मंत्रसिद्धि नही होंगी ! इसका मुख्य कारण है #असत्यवदन ( असत्य बोलना) के द्वारा वाणी दग्ध हो गई है। जैसे जला हुआ पदार्थ यज्ञ के काम का नहीँ है, इसी प्रकार जो वाणी झूठ बोलती है, उससे क्या " जपयज्ञ " हो सकेगा !
•ऐसे ही दूसरे की निन्दा करना भी वाणी का दोष है। जो व्यक्ति अपनी वाणी से किसी दूसरे की निन्दा करता है, क्या वह " जपयज्ञ " कर सकेगा ? इसलिये " द्रव्ययाग " करना सरल है, " जपयज्ञ " करना कठीन है। कहने को लोग बड़ी जल्दी कह देते हैँ कि " हम जपयज्ञ करेँगे। " अच्छे चावलोँ को बीनना सरल है, धी बढ़िया खरीद कर लाना सरल है, तिलोँ को भी अच्छा चुनकर लाना सरल है, लेकिन वाणी को शुद्ध रखना बड़ा कठीन है।
#माला_तो_कर_में_फिरै_जीभ_फिरै_मुख_माहिं।
#मनुवा_तो_चहुँदिसि_फिरै_यह_ते_सुमिरन_नाहिं॥
कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य हाथ में माला फेरते हुए जीभ से परमात्मा का नाम लेता है पर उसका मन दसों दिशाओं में भागता है। यह कोई भक्ति नहीं है।
नामजप हमारी सभी आध्यात्मिक समस्याओं को दूर करता है और मृत्यु के उपरांत भी हमारा ध्यान रखता है। केवल एक नामजप साधना ही है जो निरंतर की जा सकती है। उदा: हम न तो दिन के पूरे २४ घंटे ध्यान के लिए बैठ सकते हैं, न योगासन कर सकते हैं, न भक्ति गीत गा सकते हैं और न ही हर समय तीर्थ यात्रा कर सकते हैं; परंतु अपना प्रत्येक दायित्त्त्व निभाते हुए जैसे घर, बच्चे, नौकरी को संभालते हुए भी हम हर समय नामजप कर सकते हैं। यदि हम ईश्वर से एकरूप होना चाहते हैं तो हमारी साधना निरंतर एवं अखंड होनी चाहिए। यह केवल नामजप से ही संभव है ।
नामजप हमारे अंतर्मन को भी शुद्ध करता है, जिससे चित्त एकाग्रता, ध्यान लगता है। नामजप से हमारे इस जन्म के एवं पूर्व जन्मों के पापों को भी भस्म करता है, जिससे हमारे लिए जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति पाना संभव हो सके। यह हमारे अहंकार को नष्ट करता है और अंतर्मन में श्रद्धा और भक्ति निर्मित करता है जिससे हमें एवं हमारे आस-पास के सभी लोगों को लाभ होता है।
सम्पूर्ण जीवन मेँ ऐसे शुद्ध वाणी रूपी द्रव्य से भी प्रभु नाम के मंत्र की एक माला भी होंगी तो वह ' जपयज्ञ ' सिद्ध हो जायेगा। नामजप यह साधना है, साध्य है। लेकिन कलयुग में बड़ा कठीन है परंतु असंभव नही है।
॥हरि: 🕉 तत्सत्॥
🔆 इदं न मम 🔆
🙏🙏🙏🙏🙏
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🕉 #कृष्णं_वंदे_जगद्गुरूम् 🕉
श्रीमद्भगवगिता में अपनी दैवीसंपदा एवं विभूति दर्शनमें प्रभु ने कहा है:
#महर्षीणां_भृगुरहं_गिरामस्म्येकमक्षरम्।
#यज्ञानां_जपयज्ञोऽस्मि_स्थावराणां_हिमालयः॥ (भ ग १०/२५)
अर्थात् : मैं महर्षियों में भृगु और वाणी (शब्दों) में एकाक्षर ओंकार हूँ। मैं यज्ञों में जपयज्ञ और स्थावरों (अचलों) में हिमालय हूँ।
श्रीमद्भगवगिता में भगवान कहते है कि : #यज्ञानां_जपयज्ञोऽस्मि मैं यज्ञों में जपयज्ञ हूँ। भगवान ने नामजप को बहोत महत्व दिया है। उसे ही जपयज्ञ कहा गया है।
इस यज्ञ का द्रव्य क्या है ? वाणी के द्वारा पुनः पुनः उच्चारण किया जाने वाला " मंत्र " या कोई श्री सच्चिदानन्द परमात्मा का नाम ' जपयज्ञ ' है।
#जकारो_जन्मविच्छेद_पकारो_पापनाशन:।
#जन्मकर्महरो_यस्मात्_तस्माज्जप_इति_स्मृत:॥
' ज ' कार याने जन्ममृत्यु के फेरे से मुक्ति, ' प ' कार याने सर्व पापों का नाश। अर्थात जो साधक को जन्ममृत्यु की जंजाल से मुक्त करता है वह ' जप '। वाणी के द्वारा पुनः पुनः उच्चारण किया जाने वाला " मंत्र " या कोई उन श्री सच्चिदानन्द का नाम जपयज्ञ है।
कहने को लोग बड़ी सरलता से कहते हैँ कि " हम तो रोज जपमाला के मनके फिरो कर ' जपयज्ञ ' कर रहेँ है, यानी उस श्री सच्चिदानन्द जी नामजप कर रहे हैँ, मंत्र का जप कर रहे हैँ। पर यह इतना सरल नहीँ है, बड़ा टेढ़ा है मामला है।
क्योँकि यज्ञ के अन्दर जो सामग्री ड़ालेँगे , वह शुद्ध होनी चाहिये। कीड़ा खाये हुए गेँहूँ से तो यज्ञ होने वाला नही है। जिस तिल का तेल निकल चुका है, उस बचे हुए खली से भी यज्ञ नही होना है और जो चावल सड़ चुका है, उससे भी यज्ञ होने वाला नही है। यज्ञ करने के लिये द्रव्य शुद्ध होना चाहिये।
•अगर #जपयज्ञ करते हैँ तो पहले विचार करना पड़ेगा कि वाणी मेँ कोई अशुद्धि तो नही है। वाणी की सब से बड़ी अशुद्धि झूठ बोलना है। इसलिय हमारे मंत्रद्रष्टा शास्त्रकारोँ ने पहले से ही कह दिया है कि # कलियुग मेँ रहने वालोँ को मंत्रसिद्धि नही होंगी ! इसका मुख्य कारण है #असत्यवदन ( असत्य बोलना) के द्वारा वाणी दग्ध हो गई है। जैसे जला हुआ पदार्थ यज्ञ के काम का नहीँ है, इसी प्रकार जो वाणी झूठ बोलती है, उससे क्या " जपयज्ञ " हो सकेगा !
•ऐसे ही दूसरे की निन्दा करना भी वाणी का दोष है। जो व्यक्ति अपनी वाणी से किसी दूसरे की निन्दा करता है, क्या वह " जपयज्ञ " कर सकेगा ? इसलिये " द्रव्ययाग " करना सरल है, " जपयज्ञ " करना कठीन है। कहने को लोग बड़ी जल्दी कह देते हैँ कि " हम जपयज्ञ करेँगे। " अच्छे चावलोँ को बीनना सरल है, धी बढ़िया खरीद कर लाना सरल है, तिलोँ को भी अच्छा चुनकर लाना सरल है, लेकिन वाणी को शुद्ध रखना बड़ा कठीन है।
#माला_तो_कर_में_फिरै_जीभ_फिरै_मुख_माहिं।
#मनुवा_तो_चहुँदिसि_फिरै_यह_ते_सुमिरन_नाहिं॥
कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य हाथ में माला फेरते हुए जीभ से परमात्मा का नाम लेता है पर उसका मन दसों दिशाओं में भागता है। यह कोई भक्ति नहीं है।
नामजप हमारी सभी आध्यात्मिक समस्याओं को दूर करता है और मृत्यु के उपरांत भी हमारा ध्यान रखता है। केवल एक नामजप साधना ही है जो निरंतर की जा सकती है। उदा: हम न तो दिन के पूरे २४ घंटे ध्यान के लिए बैठ सकते हैं, न योगासन कर सकते हैं, न भक्ति गीत गा सकते हैं और न ही हर समय तीर्थ यात्रा कर सकते हैं; परंतु अपना प्रत्येक दायित्त्त्व निभाते हुए जैसे घर, बच्चे, नौकरी को संभालते हुए भी हम हर समय नामजप कर सकते हैं। यदि हम ईश्वर से एकरूप होना चाहते हैं तो हमारी साधना निरंतर एवं अखंड होनी चाहिए। यह केवल नामजप से ही संभव है ।
नामजप हमारे अंतर्मन को भी शुद्ध करता है, जिससे चित्त एकाग्रता, ध्यान लगता है। नामजप से हमारे इस जन्म के एवं पूर्व जन्मों के पापों को भी भस्म करता है, जिससे हमारे लिए जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति पाना संभव हो सके। यह हमारे अहंकार को नष्ट करता है और अंतर्मन में श्रद्धा और भक्ति निर्मित करता है जिससे हमें एवं हमारे आस-पास के सभी लोगों को लाभ होता है।
सम्पूर्ण जीवन मेँ ऐसे शुद्ध वाणी रूपी द्रव्य से भी प्रभु नाम के मंत्र की एक माला भी होंगी तो वह ' जपयज्ञ ' सिद्ध हो जायेगा। नामजप यह साधना है, साध्य है। लेकिन कलयुग में बड़ा कठीन है परंतु असंभव नही है।
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