कवीनामुशना_कविः

🙏 सुप्रभात, आज कार्तिक शुक्ल अष्टमी शुक्रवार दिनांक १६.११.२०१८ 🙏

🕉 #कृष्णं_वंदे_जगद्गुरूम् 🕉 

श्रीमद्भगवगिता में अपनी दैवीसंपदा एवं विभूति दर्शनमें प्रभु ने कहा है :
#वृष्णीनां_वासुदेवोऽस्मि_पाण्डवानां_धनंजयः।
#मुनीनामप्यहं_व्यासः_कवीनामुशना_कविः॥ (भ ग १०/३७)
अर्थात् : वृष्णिवंशियोंमें वासुदेव और पाण्डवोंमें धनञ्जय मैं हूँ। मुनियोंमें वेदव्यास और कवियोंमें शुक्राचार्य भी मैं हूँ।

भगवद्गीता में भगवान कहते है #कवीनामुशना_कविः कवियोंमें शुक्राचार्य भी मैं हूँ। आज योगानुयोग शुक्रवार को हम आसुराचार्य शुक्राचार्य का चिंतन कर रहे है।

#अमंत्रं_अक्षरं_नास्ति_नास्ति_मूलं_अनौषधं।
#अयोग्यः_पुरुषः_नास्ति_योजकः_तत्र_दुर्लभ:॥ - शुक्राचार्य (शुक्रनीति)
अर्थात् : कोई अक्षर ऐसा नहीं है जिससे (कोई) मन्त्र न शुरू होता हो, कोई ऐसा मूल (जड़) नहीं है, जिससे कोई औषधि न बनती हो और कोई भी आदमी अयोग्य नहीं होता, उसको काम में लेने वाले (मैनेजर) ही दुर्लभ हैं।

#शुक्राचार्य एक रहस्यमयी ऋषि हैं। उनके बारे में लोग सिर्फ इतना ही जानते हैं कि वे असुरों के गुरु थे। शुक्राचार्य के संबंध में काशी खंड महाभारत, पुराण आदि ग्रंथों में अनेक कथाएं वर्णित है। इतना ही नहीं उनके नाम पर शुक्रनीति का उल्लेख है। भगवान ने उनको विभूति यूँही नही माना है।

#देवताओं के #अधिपति_इन्द्र, #गुरु_बृहस्पति और #परम_ईष्ट_विष्णु हैं।
दूसरी ओर #दैत्यों के #अधिपति_हिरण्याक्ष और #हिरण्यकश्यप के बाद #विरोचन बने जिनके #गुरु_शुक्राचार्य और #परम_ईष्ट_शिव हैं। एक ओर जहां देवताओं के भवन, अस्त्र आदि के निर्माणकर्ता #विश्वकर्मा थे तो दूसरी ओर असुरों के #मयदानव। इन्द्र के भ्राताश्री #वरुणदेव देवता और असुर दोनों को प्रिय हैं।

असुरों में कई महान शिव भक्त असुर हुए हैं। #महर्षि_भृगु के पुत्र और #भक्त_प्रहलाद के भानजे शुक्राचार्य थे। महर्षि भृगु तथा हिरण्यकशिपु की पुत्री #दिव्या के पुत्र थे जो शुक्राचार्य  के नाम से अधिक विख्यात हैं। इनका जन्म का नाम '#शुक्र_उशनस' है। पुराणों  के अनुसार यह दैत्यों के गुरु तथा पुरोहित थे। मत्स्य पुराण के अनुसार शुक्राचार्य का वर्ण श्वेत है। इनका वाहन रथ है, उसमें अग्नि के समान आठ घोड़े जुते रहते हैं। रथ पर ध्वजाएं फहराती रहती हैं। इनका आयुध दण्ड है।

भगवान के वामनावतार  में तीन पग त्रिपदाभूमि प्राप्त करने के समय, यह राजा बलि  की झारी (सुराही) के मुख में जाकर बैठ गए थे और बलि द्वारा दर्भाग्र (कुशा) से सुराही को साफ करने की क्रिया में इनकी एक आँख फूट गई थी। इसीलिए यह #एकाक्ष भी कहे जाते थे।

पौराणिक कथा के अनुसार महर्षि शुक्राचार्य ने भगवान शिव की घोर तपस्या की थी और उनसे #मृतसंजीवनी मंत्र प्राप्त किया था, जिस मंत्र का प्रयोग उन्होंने देवासुर संग्राम में देवताओं के विरुद्ध किया था जब असुर देवताओं द्वारा मारे जाते थे, तब शुक्राचार्य उन्हें मृतसंजीवनी विद्या का प्रयोग करके जीवित कर देते थे। यह विद्या अति गोपनीय ओर कष्टप्रद साधनाओं से सिद्ध होती है।

#शुक्रनीति :

शुक्रनीतिके रचनाकार और उनके काल के बारे में कुछ निश्चितता नही है। लेकिन शुक्रनीति एक प्रसिद्ध नीतिग्रन्थ है। इसकी रचना करने वाले शुक्र का नाम महाभारत  में 'शुक्राचार्य' के रूप में मिलता है।

शुक्रनीति में २००० श्लोक हैं जो इसके चौथे अध्याय में उल्लिखित है। उसमें यह भी लिखा है कि इस नीतिसार का रात-दिन चिंतन करने वाला राजा अपना राज्य-भार उठा सकने में सर्वथा समर्थ होता है। इसमें कहा गया है कि तीनों लोकों में शुक्रनीति के समान दूसरी कोई नीति नहीं है और व्यवहारी लोगों के लिये शुक्र की ही नीति है, शेष सब 'कुनीति' है। इसके चार अध्यायों में से प्रथम अध्याय में राजा, उसके महत्व और कर्तव्य, सामाजिक व्यवस्था, मन्त्री और युवराज सम्बन्धी विषयों का विवेचन किया गया है।

प्राचीन भारतीय रानीतिक चिंतन में शुक्रनीति का महत्वपूर्ण स्थान है। शुक्रनीति इतना प्राचीन ग्रंथ होते हुए भी इसमें ऐसे अनेक विषयों का विवरण है जो आज भी प्रासांगिक हैं और उपयोगी भी है। शुक्रनीति चिंतन की गौरवशाली एवं समृद्ध परम्परा का ज्ञान होता है। कौटिल्य के‘अर्थशास्त्र‘ एवं मैकियावली  के‘द प्रिंस‘के समान शुक्र की शुक्रनीति में भी राजा को शासन करना सिखाया गया है। इस प्रकार इसमें राजनीति का सैद्धान्तिक नहीं वरन् व्यावहारिक पक्ष अधिक महत्वपूर्ण है। शुक्र के अनुसार, ' सभी आशंकाओं को त्यागकर राजा को ऐसी नीति का पालन करना चाहिए जिससे शत्रु को मारा जा सके अर्थात् विजय प्राप्त हो '।

शुक्राचार्य के अनुसार शुक्रनीति में धर्म, अर्थ, काम  का मुख्य कारण एवं मोक्ष को सुनिश्चित करने वाला तत्व नीतिशास्त्र को ही माना जा सकता है। शुक्रनीति में राजनीतिक चिंतन के समस्त महत्वपूर्ण पक्षों -
•दार्शनिक (Philosophical),
•अवधारणात्मक - वैचारिक (Conceptual),
•संरचनात्मक (Structural),
•प्रक्रियात्मक (Procedural) को पर्याप्त महत्व के साथ वर्णित किया गया है।
राज्य के प्रयोजन, राजसत्ता पर नियंत्रण आदि सैद्धान्तिक पक्षों के साथ-साथ दण्ड व न्यायिक प्रक्रिया, राज्य का प्रशासन, राज्य की सुरक्षा व युद्ध, अन्तरराज्य सम्बन्ध आदि ऐसे विषयों का जो राज्य के व्यावहारिक पक्षों से संबंधित हैं, विशद् विवेचन किया गया है।

विडंबना यह है कि हमारी भव्यदिव्य भारतिय संस्कृति में शुक्राचार्य, विदुर, कौटिल्य, चाणक्य जैसे विद्वानों ने जीवन के प्रत्येक विषय पर मार्गदर्शन करने वाले शास्त्रों की रचना की है जिसमे आज की सब समस्याओं का समाधान है। लेकिन हम प्याऊ के पानी पीने के आदि पाश्चात्य को आदर्श मान उनकी अन्धानुकरण करने को ही आधुनिकता समजकर अपनेआप में धन्यता मानते है।

🙏 जय श्री कृष्ण 🙏

॥हरि: 🕉 तत्सत्॥

🔆  इदं न मम  🔆

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Comments

Unknown said…
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