मुनीनामप्यहं_व्यासः
🙏 सुप्रभात, आज कार्तिक शुक्ल अष्टमी गुरुवार दिनांक १५.११.२०१८ 🙏
श्रीमद्भगवगिता में अपनी दैवीसंपदा एवं विभूति दर्शनमें प्रभु ने कहा है :
#वृष्णीनां_वासुदेवोऽस्मि_पाण्डवानां_धनंजयः।
#मुनीनामप्यहं_व्यासः_कवीनामुशना_कविः॥ (भ ग १०/३७)
अर्थात् : वृष्णिवंशियोंमें वासुदेव और पाण्डवोंमें धनञ्जय मैं हूँ। मुनियोंमें वेदव्यास और कवियोंमें शुक्राचार्य भी मैं हूँ।
भगवद्गीता में भगवान कहते है #मुनीनामप्यहं_व्यासः अर्थात मुनियों में वेद व्यास मैं हूं।
#नारायणं_नमस्कृत्य_नरं_चैव_नरोत्तम:।
#देवी_सरस्वती_व्यासं_ततो_जयमुदीरयेत॥
आदि पुरुष नारायण, नरों में उत्तम नर ऋषि, विद्या की देवी सरस्वती तथा महामुनि वेद व्यास जी को नमस्कार करके ही हमें महाभारत इत्यादि ग्रंथों का अध्ययन करना चाहिए।
महर्षि वेदव्यास को भगवान का ही रूप माना जाता है, इन श्लोकों से यह सिद्ध होता है।
' अचतुर्वदनो ब्रह्मा ' -
#अचतुर्वदनो_ब्रह्मा_द्विबाहुरपरो_हरिः।
#अभाललोचनः_शम्भुर्भगवान्_बादरायणः॥
अर्थात् : उनके चार मुख नहीं, फिर भी जो ब्रह्मा है; दो बाहु है, फिर भी हरि (विष्णु) है; मस्तिष्क पर तीसरा नेत्र नहीं, फिर भी शम्भु है; ऐसे भगवान श्री बादरायण (व्यास मुनि) है ।
#व्यासाय_विष्णुरूपाय_व्यासरूपाय_विष्णवे।
#नमो_वै_ब्रह्मनिधये_वासिष्ठाय_नमो_नम:॥
अर्थात् - व्यास विष्णु के रूप है तथा विष्णु ही व्यास है ऐसे वसिष्ठ-मुनि के वंशज का मैं नमन करता हूँ। (वसिष्ठ के पुत्र थे 'शक्ति'; शक्ति के पुत्र पराशर, और पराशर के पुत्र पाराशर (तथा व्यास) )
#व्यास अथवा #वेदव्यास हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान नारायण के ही कलावतार थे। व्यास जी के पिता का नाम पराशर ऋषि तथा माता का नाम सत्यवती था। जन्म लेते ही इन्होंने अपने पिता-माता से जंगल में जाकर तपस्या करने की इच्छा प्रकट की। प्रारम्भ में इनकी माता सत्यवती ने इन्हें रोकने का प्रयास किया, किन्तु अन्त में इनके माता के स्मरण करते ही लौट आने का वचन देने पर उन्होंने इनको वन जाने की आज्ञा दे दी।
प्रत्येक द्वापर युग में विष्णु व्यास के रूप में अवतरित होकर वेदों के विभाग प्रस्तुत करते हैं। इस प्रकार अट्ठाईस बार वेदों का विभाजन किया गया। पहले द्वापर में स्वयं ब्रह्मा वेदव्यास हुए, दूसरे में प्रजापति, तीसरे द्वापर में शुक्राचार्य , चौथे में बृहस्पति वेदव्यास हुए। इसी प्रकार सूर्य, मृत्यु, इन्द्र, धनजंय, कृष्ण द्वैपायन अश्वत्थामा आदि अट्ठाईस वेदव्यास हुए।
समय-समय पर वेदों का विभाजन किस प्रकार से हुआ, इसके लिए यह एक उदाहरण प्रस्तुत है। कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने ब्रह्मा की प्रेरणा से चार शिष्यों को चार वेद पढ़ाये-
•मुनि पैल को ॠग्वेद
•वैशम्पायन को यजुर्वेद
•जैमिनि को सामवेद
•तथा सुमंतु को अथर्ववेद पढ़ाया।
व्यास का अर्थ व्यास का अर्थ है 'संपादक'। यह उपाधि अनेक पुराने ग्रन्थकारों को प्रदान की गयी है, किन्तु विशेषकर वेदव्यास उपाधि वेदों को व्यवस्थित रूप प्रदान करने वाले उन महर्षि को दी गयी है जो चिरंजीव होने के कारण 'आश्वत' कहलाते हैं। यही नाम महाभारत के संकलनकर्ता, वेदान्तदर्शन के स्थापनकर्ता तथा पुराणों के व्यवस्थापक को भी दिया गया है। ये सभी व्यक्ति वेदव्यास कहे गये है। विद्वानों में इस बात पर मतभेद है कि ये सभी एक ही व्यक्ति थे अथवा विभिन्न। भारतीय परम्परा इन सबको एक ही व्यक्ति मानती है।
महाभारतकार व्यास ऋषि पराशर एवं सत्यवती के पुत्र थे, ये साँवले रंग के थे तथा यमुना के बीच स्थित एक द्वीप में उत्पन्न हुए थे। अतएव ये साँवले रंग के कारण #कृष्ण तथा जन्मस्थान के कारण #द्वैपायन कहलाये।
इनकी माता ने बाद में शान्तनु से विवाह किया, जिनसे उनके दो पुत्र हुए, जिनमें बड़ा चित्रांगद युद्ध में मारा गया और छोटा विचित्रवीर्य संतानहीन मर गया। कृष्ण द्वैपायन ने धार्मिक तथा वैराग्य का जीवन पसंद किया, किन्तु माता के आग्रह पर इन्होंने विचित्रवीर्य की दोनों सन्तानहीन रानियों द्वारा नियोग के नियम से दो पुत्र उत्पन्न किये जो धृतराष्ट्र तथा पाण्डु कहलाये, इनमें तीसरे विदुर भी थे। पुराणों में अठारह व्यासों का उल्लेख है जो ब्रह्मा या विष्णु के अवतार कहलाते हैं एवं पृथ्वी पर विभिन्न युगों में वेदों की व्याख्या व प्रचार करने के लिए अवतीर्ण होते हैं।
भगवान वेद व्यास जी अष्ट चिरंजीवियों में शामिल हैं। आदि शंकराचार्य जी को वेद व्यास जी के दर्शन हुए। वेद, पुराण के वक्ता जिस आसन पर सुशोभित होते हैं उन्हें #व्यास_गद्दी या #व्यासपीठ कहा जाता है और वेद व्यास जी का जन्म दिवस गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। गुरु ही हमारे भीतर अज्ञान रूपी अंधकार को नष्ट कर ज्ञान रूपी प्रकाश करते हैं।
ऐसा कहा जाता है की जगत में ऐसा कोई भी विचार नही है जिस को महर्षि वेदव्यास ने स्पर्श न् किया हो - याने जगत और जीवन के सभी विषय व्यासमुनि की जूठन है :
#व्यासोच्छिष्ट_जगत_सर्वं
#तस्मै_श्री_गुरुवे_नमः।
🙏 जय श्री कृष्ण 🙏
॥हरि: 🕉 तत्सत्॥
🔆 इदं न मम 🔆
🙏🙏🙏🙏🙏
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🕉 #कृष्णं_वंदे_जगद्गुरूम् 🕉
श्रीमद्भगवगिता में अपनी दैवीसंपदा एवं विभूति दर्शनमें प्रभु ने कहा है :
#वृष्णीनां_वासुदेवोऽस्मि_पाण्डवानां_धनंजयः।
#मुनीनामप्यहं_व्यासः_कवीनामुशना_कविः॥ (भ ग १०/३७)
अर्थात् : वृष्णिवंशियोंमें वासुदेव और पाण्डवोंमें धनञ्जय मैं हूँ। मुनियोंमें वेदव्यास और कवियोंमें शुक्राचार्य भी मैं हूँ।
भगवद्गीता में भगवान कहते है #मुनीनामप्यहं_व्यासः अर्थात मुनियों में वेद व्यास मैं हूं।
#नारायणं_नमस्कृत्य_नरं_चैव_नरोत्तम:।
#देवी_सरस्वती_व्यासं_ततो_जयमुदीरयेत॥
आदि पुरुष नारायण, नरों में उत्तम नर ऋषि, विद्या की देवी सरस्वती तथा महामुनि वेद व्यास जी को नमस्कार करके ही हमें महाभारत इत्यादि ग्रंथों का अध्ययन करना चाहिए।
महर्षि वेदव्यास को भगवान का ही रूप माना जाता है, इन श्लोकों से यह सिद्ध होता है।
' अचतुर्वदनो ब्रह्मा ' -
#अचतुर्वदनो_ब्रह्मा_द्विबाहुरपरो_हरिः।
#अभाललोचनः_शम्भुर्भगवान्_बादरायणः॥
अर्थात् : उनके चार मुख नहीं, फिर भी जो ब्रह्मा है; दो बाहु है, फिर भी हरि (विष्णु) है; मस्तिष्क पर तीसरा नेत्र नहीं, फिर भी शम्भु है; ऐसे भगवान श्री बादरायण (व्यास मुनि) है ।
#व्यासाय_विष्णुरूपाय_व्यासरूपाय_विष्णवे।
#नमो_वै_ब्रह्मनिधये_वासिष्ठाय_नमो_नम:॥
अर्थात् - व्यास विष्णु के रूप है तथा विष्णु ही व्यास है ऐसे वसिष्ठ-मुनि के वंशज का मैं नमन करता हूँ। (वसिष्ठ के पुत्र थे 'शक्ति'; शक्ति के पुत्र पराशर, और पराशर के पुत्र पाराशर (तथा व्यास) )
#व्यास अथवा #वेदव्यास हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान नारायण के ही कलावतार थे। व्यास जी के पिता का नाम पराशर ऋषि तथा माता का नाम सत्यवती था। जन्म लेते ही इन्होंने अपने पिता-माता से जंगल में जाकर तपस्या करने की इच्छा प्रकट की। प्रारम्भ में इनकी माता सत्यवती ने इन्हें रोकने का प्रयास किया, किन्तु अन्त में इनके माता के स्मरण करते ही लौट आने का वचन देने पर उन्होंने इनको वन जाने की आज्ञा दे दी।
प्रत्येक द्वापर युग में विष्णु व्यास के रूप में अवतरित होकर वेदों के विभाग प्रस्तुत करते हैं। इस प्रकार अट्ठाईस बार वेदों का विभाजन किया गया। पहले द्वापर में स्वयं ब्रह्मा वेदव्यास हुए, दूसरे में प्रजापति, तीसरे द्वापर में शुक्राचार्य , चौथे में बृहस्पति वेदव्यास हुए। इसी प्रकार सूर्य, मृत्यु, इन्द्र, धनजंय, कृष्ण द्वैपायन अश्वत्थामा आदि अट्ठाईस वेदव्यास हुए।
समय-समय पर वेदों का विभाजन किस प्रकार से हुआ, इसके लिए यह एक उदाहरण प्रस्तुत है। कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने ब्रह्मा की प्रेरणा से चार शिष्यों को चार वेद पढ़ाये-
•मुनि पैल को ॠग्वेद
•वैशम्पायन को यजुर्वेद
•जैमिनि को सामवेद
•तथा सुमंतु को अथर्ववेद पढ़ाया।
व्यास का अर्थ व्यास का अर्थ है 'संपादक'। यह उपाधि अनेक पुराने ग्रन्थकारों को प्रदान की गयी है, किन्तु विशेषकर वेदव्यास उपाधि वेदों को व्यवस्थित रूप प्रदान करने वाले उन महर्षि को दी गयी है जो चिरंजीव होने के कारण 'आश्वत' कहलाते हैं। यही नाम महाभारत के संकलनकर्ता, वेदान्तदर्शन के स्थापनकर्ता तथा पुराणों के व्यवस्थापक को भी दिया गया है। ये सभी व्यक्ति वेदव्यास कहे गये है। विद्वानों में इस बात पर मतभेद है कि ये सभी एक ही व्यक्ति थे अथवा विभिन्न। भारतीय परम्परा इन सबको एक ही व्यक्ति मानती है।
महाभारतकार व्यास ऋषि पराशर एवं सत्यवती के पुत्र थे, ये साँवले रंग के थे तथा यमुना के बीच स्थित एक द्वीप में उत्पन्न हुए थे। अतएव ये साँवले रंग के कारण #कृष्ण तथा जन्मस्थान के कारण #द्वैपायन कहलाये।
इनकी माता ने बाद में शान्तनु से विवाह किया, जिनसे उनके दो पुत्र हुए, जिनमें बड़ा चित्रांगद युद्ध में मारा गया और छोटा विचित्रवीर्य संतानहीन मर गया। कृष्ण द्वैपायन ने धार्मिक तथा वैराग्य का जीवन पसंद किया, किन्तु माता के आग्रह पर इन्होंने विचित्रवीर्य की दोनों सन्तानहीन रानियों द्वारा नियोग के नियम से दो पुत्र उत्पन्न किये जो धृतराष्ट्र तथा पाण्डु कहलाये, इनमें तीसरे विदुर भी थे। पुराणों में अठारह व्यासों का उल्लेख है जो ब्रह्मा या विष्णु के अवतार कहलाते हैं एवं पृथ्वी पर विभिन्न युगों में वेदों की व्याख्या व प्रचार करने के लिए अवतीर्ण होते हैं।
भगवान वेद व्यास जी अष्ट चिरंजीवियों में शामिल हैं। आदि शंकराचार्य जी को वेद व्यास जी के दर्शन हुए। वेद, पुराण के वक्ता जिस आसन पर सुशोभित होते हैं उन्हें #व्यास_गद्दी या #व्यासपीठ कहा जाता है और वेद व्यास जी का जन्म दिवस गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। गुरु ही हमारे भीतर अज्ञान रूपी अंधकार को नष्ट कर ज्ञान रूपी प्रकाश करते हैं।
ऐसा कहा जाता है की जगत में ऐसा कोई भी विचार नही है जिस को महर्षि वेदव्यास ने स्पर्श न् किया हो - याने जगत और जीवन के सभी विषय व्यासमुनि की जूठन है :
#व्यासोच्छिष्ट_जगत_सर्वं
#तस्मै_श्री_गुरुवे_नमः।
🙏 जय श्री कृष्ण 🙏
॥हरि: 🕉 तत्सत्॥
🔆 इदं न मम 🔆
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