विभूति दर्शन ' ज्योस्मि '
🙏 सुप्रभात, आज अश्विन कृष्णपक्ष एकादशी दिनांक ३.११.२०१८ शनिवार
श्रीमद्भगवगिता में अपनी दैवीसंपदा एवं विभूतिदर्शन में प्रभु ने कहा है :
#द्यूतं_छलयतामस्मि_तेजस्तेजस्विनामहम्।
#जयोऽस्मि_व्यवसायोऽस्मि_सत्त्वं_सत्त्ववतामहम्॥ (भ ग १०/३६)
(भावार्थ : छल करनेवालोंमें जो पासोंसे खेलना आदि द्यूत और तेजस्वियोंका मैं तेज हूँ। जीतनेवालोंका मैं विजय हूँ। निश्चय करनेवालोंका निश्चय (उद्यमशीलोंका उद्यम) हूँ और सत्त्वयुक्त पुरुषोंका अर्थात् सात्त्विक पुरुषोंका मैं सत्त्वगुण हूँ।)
श्रीमद् भगवद्गीता मे प्रभु ने कहा है #जयोऽस्मि मैं विजेताओं की जय हुं।
अंग्रेज़ी में एक कहावत है #GOD_HELPS_THOSE_WHO_HELP_THEMSELVES. भगवान उसीकी सहायता करता है जिसमें साहस हो। साहस का अर्थ है ' मरने तक की तैयारी ' भगवान ने हमे मृत्यु का अभयदान SECURITY नहीं दी है।
#हतो_वा_प्राप्स्यसि_स्वर्गं_जित्वा_वा_भोक्ष्यसे_महीम्।
#तस्मादुत्तिष्ठ_कौन्तेय_युद्धाय_कृतनिश्चयः (भ ग२/३७)
अर्थात् : या तो तू युद्धमें मारा जाकर स्वर्गको प्राप्त होगा अथवा संग्राममें जीतकर पृथ्वीका राज्य भोगेगा। इस कारण हे अर्जुन ! तू युद्धके लिए कृतनिश्चयी होकर खडा हो जा।
प्रभु ने अर्जुन को भी SECURITY नहीं दी कि मैं तेरे साथ हुं तो तू जीतेगा ही। इसलिए जिसमें मृत्यु का भय न हो वहीं साहसी व्यक्ति होता है और उसकी विजय संभव है।
अर्जुन की समस्या धर्म अधर्म के लिये नही थी। अधर्म के विरुद्ध युद्ध के लिये तो वह रणागण में पहुचा था। लेकिन उसका विषाद प्रतिपक्ष में खड़े स्वजन को देख कर जगा। अर्जुन कायर नही था न उसे अपने मृत्यु की भीति थी। उल्ट वह भगवान को कह रहा था की एक तरफ गुरु, प्रपितामह, सगे संबंधियों को मारकर यदि मैं राज्य जीत भी जाऊंगा तो ऐसा राजसुख भोग क्या काम का ???
यहां अर्जुन के सामने #धर्म_अधर्म नही बल्की दो धर्म के बीच द्वंद्व खड़ा हुआ एक तरफ #क्षत्रिय_धर्म राजधर्म याने #समष्टि_धर्म दूसरी तरफ स्वजन हत्या से बचने का #व्यक्ति_धर्म था। ठीक.उसी तरह प्रभु श्री राम के समक्ष सीता त्याग के समय यह दो धर्म के बीच द्वंद्व खड़ा हुआ था। प्रभु ने गुप्त रूप से नगरचर्या दरम्यान जनता के मानस में चल रहे प्रश्न को भलीभांति पढ़ लिया था की ' इतने वर्षों तक रावण की कैद में रहने के पश्चात माँ जानकी पवित्र रही होंगी क्या ??? ' धोबी की शिकायत तो केवल समाज के प्रतिनिधि स्वरूप थी। लोग मनोमन सोच रहे थे। जबकि धोबी ने अपनी सोच को वाचा दे दी।
राजा राम साक्षात #मर्यादा_पुरुषोत्तम_श्रीहरि थे और माँ जानकी भी साक्षात #शक्ति थी। ' अंतर्यामी ब्रह्म और उनकी शक्ति। ' दोनों परस्पर जानते थे। न भगवान श्री राम को सीता की पवित्रता पर शंका थी न माता सगर्भा सीता को त्याग से कोई शिकायत थी। लेकिन आज की नारीवादी विचारधारा शिकायत करती है कि ' राम ने सगर्भा सीता का त्याग कर सीता के साथ अन्याय किया था। '
लेकिन उस समय भी मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के समक्ष दो धर्म खड़े हो गये थे। एक था सगर्भा सीता का #पतिधर्म यानी ' व्यक्तिधर्म ' और दूसरी तरफ अयोध्या नरेस राजा राम का #राज_धर्म की राजा कैसा होना चाहिए ??? राजा के चरित्र पर प्रजा का लेशमात्र भी संशय नही होना चाहिए। राजा राम ने सगर्भा पत्नी वियोग का दुःख सहन कर लिया, माता जानकी ने भी रावण की कैद से छूटने के बाद जब सुख भोगने के दिन आये तब बिना शिकायत वन वास स्वीकार कर लिया है। यह सुखत्याग क्यों ??? क्योंकि राजा के चरित्र जनता के समक्ष निशंक रहना चाहिए यह बात आज के राजा कहाँ समजेंगे !!! आज हजारों सालों के बाद भी आदर्श शासन व्यवस्था को #रामराज्य की उपमा दी जाती है। यह रामराज्य, नैतिक मूल्यों के जतन लिए त्याग, तपस्या बलिदान और कर्तव्य निष्ठा से खड़ा हुआ था। जिसकी आज भी हम कामना करतें है।
दो धर्मो के बीच संघर्ष केवल राम कृष्ण के समय में ही नही थे आज भी हमारे भीतर यह संघर्ष चलता है की जन्मदाता जनेता माँ की मानूं ? या सब.कुछ छोड़कर मेरे पीछे चली आई पत्नि की बात मानूं ?? ऐसे कितने ही संघर्ष आज हमारे सामने पग पग पर खड़े होते है। ऐसे संघर्षो में निर्णय हमें विवेक बुध्धि से लेना पड़ेंगा। और यह विवेक जागृति गीता जैसे जीवनलक्षी ग्रन्थों के #स्वाध्याय के माध्यम से ही होंगी। इसलिये हमारे दीर्घद्रष्टा ऋषिमुनियों ने शास्त्रों में कहा है : #तस्मात्_स्वाध्याय_प्रवचनाभ्यां_न_प्रमदितव्यम्'।
#स्वाध्यायान्मा_प्रमदः
स्वाध्याय के प्रति प्रमाद मत करो
योगेश्वर श्री कृष्ण ने अर्जुन को माध्यम बनाकर हमारे जीवनसंग्राम में मार्गदर्शन के लिये श्रीमद्भगवगिता कही है। ' तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ' उठ खड़ा हो और कृतनिश्चयी बनकर युद्ध कर अपनी विवेक बुद्धि जागृत रखकर अपने कर्म करो, इन कर्मो से तुम्हारे अंदर अहंकार पैदा न हो इसलिये उन कर्मो को मुजे अर्पण करो। '
डर के आगे जीत है।
🙏 जय श्री कृष्ण 🙏
॥हरि: 🕉 तत्सत्॥
🔆 इदं न मम 🔆
🙏🙏🙏🙏🙏
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🕉 #कृष्णं_वंदे_जगद्गुरूम् 🕉
#द्यूतं_छलयतामस्मि_तेजस्तेजस्विनामहम्।
#जयोऽस्मि_व्यवसायोऽस्मि_सत्त्वं_सत्त्ववतामहम्॥ (भ ग १०/३६)
(भावार्थ : छल करनेवालोंमें जो पासोंसे खेलना आदि द्यूत और तेजस्वियोंका मैं तेज हूँ। जीतनेवालोंका मैं विजय हूँ। निश्चय करनेवालोंका निश्चय (उद्यमशीलोंका उद्यम) हूँ और सत्त्वयुक्त पुरुषोंका अर्थात् सात्त्विक पुरुषोंका मैं सत्त्वगुण हूँ।)
श्रीमद् भगवद्गीता मे प्रभु ने कहा है #जयोऽस्मि मैं विजेताओं की जय हुं।
अंग्रेज़ी में एक कहावत है #GOD_HELPS_THOSE_WHO_HELP_THEMSELVES. भगवान उसीकी सहायता करता है जिसमें साहस हो। साहस का अर्थ है ' मरने तक की तैयारी ' भगवान ने हमे मृत्यु का अभयदान SECURITY नहीं दी है।
#हतो_वा_प्राप्स्यसि_स्वर्गं_जित्वा_वा_भोक्ष्यसे_महीम्।
#तस्मादुत्तिष्ठ_कौन्तेय_युद्धाय_कृतनिश्चयः (भ ग२/३७)
अर्थात् : या तो तू युद्धमें मारा जाकर स्वर्गको प्राप्त होगा अथवा संग्राममें जीतकर पृथ्वीका राज्य भोगेगा। इस कारण हे अर्जुन ! तू युद्धके लिए कृतनिश्चयी होकर खडा हो जा।
प्रभु ने अर्जुन को भी SECURITY नहीं दी कि मैं तेरे साथ हुं तो तू जीतेगा ही। इसलिए जिसमें मृत्यु का भय न हो वहीं साहसी व्यक्ति होता है और उसकी विजय संभव है।
अर्जुन की समस्या धर्म अधर्म के लिये नही थी। अधर्म के विरुद्ध युद्ध के लिये तो वह रणागण में पहुचा था। लेकिन उसका विषाद प्रतिपक्ष में खड़े स्वजन को देख कर जगा। अर्जुन कायर नही था न उसे अपने मृत्यु की भीति थी। उल्ट वह भगवान को कह रहा था की एक तरफ गुरु, प्रपितामह, सगे संबंधियों को मारकर यदि मैं राज्य जीत भी जाऊंगा तो ऐसा राजसुख भोग क्या काम का ???
यहां अर्जुन के सामने #धर्म_अधर्म नही बल्की दो धर्म के बीच द्वंद्व खड़ा हुआ एक तरफ #क्षत्रिय_धर्म राजधर्म याने #समष्टि_धर्म दूसरी तरफ स्वजन हत्या से बचने का #व्यक्ति_धर्म था। ठीक.उसी तरह प्रभु श्री राम के समक्ष सीता त्याग के समय यह दो धर्म के बीच द्वंद्व खड़ा हुआ था। प्रभु ने गुप्त रूप से नगरचर्या दरम्यान जनता के मानस में चल रहे प्रश्न को भलीभांति पढ़ लिया था की ' इतने वर्षों तक रावण की कैद में रहने के पश्चात माँ जानकी पवित्र रही होंगी क्या ??? ' धोबी की शिकायत तो केवल समाज के प्रतिनिधि स्वरूप थी। लोग मनोमन सोच रहे थे। जबकि धोबी ने अपनी सोच को वाचा दे दी।
राजा राम साक्षात #मर्यादा_पुरुषोत्तम_श्रीहरि थे और माँ जानकी भी साक्षात #शक्ति थी। ' अंतर्यामी ब्रह्म और उनकी शक्ति। ' दोनों परस्पर जानते थे। न भगवान श्री राम को सीता की पवित्रता पर शंका थी न माता सगर्भा सीता को त्याग से कोई शिकायत थी। लेकिन आज की नारीवादी विचारधारा शिकायत करती है कि ' राम ने सगर्भा सीता का त्याग कर सीता के साथ अन्याय किया था। '
लेकिन उस समय भी मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के समक्ष दो धर्म खड़े हो गये थे। एक था सगर्भा सीता का #पतिधर्म यानी ' व्यक्तिधर्म ' और दूसरी तरफ अयोध्या नरेस राजा राम का #राज_धर्म की राजा कैसा होना चाहिए ??? राजा के चरित्र पर प्रजा का लेशमात्र भी संशय नही होना चाहिए। राजा राम ने सगर्भा पत्नी वियोग का दुःख सहन कर लिया, माता जानकी ने भी रावण की कैद से छूटने के बाद जब सुख भोगने के दिन आये तब बिना शिकायत वन वास स्वीकार कर लिया है। यह सुखत्याग क्यों ??? क्योंकि राजा के चरित्र जनता के समक्ष निशंक रहना चाहिए यह बात आज के राजा कहाँ समजेंगे !!! आज हजारों सालों के बाद भी आदर्श शासन व्यवस्था को #रामराज्य की उपमा दी जाती है। यह रामराज्य, नैतिक मूल्यों के जतन लिए त्याग, तपस्या बलिदान और कर्तव्य निष्ठा से खड़ा हुआ था। जिसकी आज भी हम कामना करतें है।
दो धर्मो के बीच संघर्ष केवल राम कृष्ण के समय में ही नही थे आज भी हमारे भीतर यह संघर्ष चलता है की जन्मदाता जनेता माँ की मानूं ? या सब.कुछ छोड़कर मेरे पीछे चली आई पत्नि की बात मानूं ?? ऐसे कितने ही संघर्ष आज हमारे सामने पग पग पर खड़े होते है। ऐसे संघर्षो में निर्णय हमें विवेक बुध्धि से लेना पड़ेंगा। और यह विवेक जागृति गीता जैसे जीवनलक्षी ग्रन्थों के #स्वाध्याय के माध्यम से ही होंगी। इसलिये हमारे दीर्घद्रष्टा ऋषिमुनियों ने शास्त्रों में कहा है : #तस्मात्_स्वाध्याय_प्रवचनाभ्यां_न_प्रमदितव्यम्'।
#स्वाध्यायान्मा_प्रमदः
स्वाध्याय के प्रति प्रमाद मत करो
योगेश्वर श्री कृष्ण ने अर्जुन को माध्यम बनाकर हमारे जीवनसंग्राम में मार्गदर्शन के लिये श्रीमद्भगवगिता कही है। ' तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ' उठ खड़ा हो और कृतनिश्चयी बनकर युद्ध कर अपनी विवेक बुद्धि जागृत रखकर अपने कर्म करो, इन कर्मो से तुम्हारे अंदर अहंकार पैदा न हो इसलिये उन कर्मो को मुजे अर्पण करो। '
डर के आगे जीत है।
🙏 जय श्री कृष्ण 🙏
॥हरि: 🕉 तत्सत्॥
🔆 इदं न मम 🔆
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