ज्ञानं ज्ञानवतामहम्।
🙏 सुप्रभात, आज कार्तिक शुक्ल त्रयोदशी बुधवार दिनांक २१.११.२०१८ 🙏
श्रीमद्भगवगिता में अपनी दैवीसंपदा एवं विभूति दर्शनमें प्रभु ने कहा है :
#दण्डो_दमयतामस्मि_नीतिरस्मि_जिगीषताम्।
#मौनं_चैवास्मि_गुह्यानां_ज्ञानं_ज्ञानवतामहम्॥ (भ ग १०/३८)
अर्थात् : मैं दमन करनेवालोंका दण्ड (दमन करनेकी शक्ति) हूँ, जीतनेकी इच्छावालोंकी नीति हूँ, गुप्त रखनेयोग्य बातोंमें मौन हूँ और तत्त्वज्ञानीयों का ज्ञान हूँ।
भगवद्गीता में भगवान कहते है #ज्ञानं_ज्ञानवतामहम् मैं तत्त्वज्ञानीयों का ज्ञान हूँ। ज्ञान की महत्ता भगवान ने और भी कहा है:
#न_हि_ज्ञानेन_सदृशं_पवित्रमिह_विद्यते।
#तत्स्वयं_योगसंसिद्धः_कालेनात्मनि_विन्दति॥ (भ ग ४/३८)
अर्थात् : इस मनुष्यलोकमें ज्ञानके समान पवित्र करनेवाला दूसरा कोई साधन नहीं है। जिसका योग भलीभाँति सिद्ध हो गया है वह (कर्मयोगी) उस तत्त्वज्ञानको अवश्य ही स्वयं अपनेआपमें पा लेता है।
#ज्ञान - बोध, जानना, जानकारी, विद्या।
समान्यता आज माहिती-Information को ज्ञान कहा-समजा जाता है। समस्त सांसारिक व्यवहार सम्बंधित जानकारी को ज्ञान समजा जाता है। आज, हम एक ऐसी दुनिया में रहते हैं, जो सूचनाओं से भरा है और जानकारी प्राप्त करने के लिए कई स्रोत हैं। हम विभिन्न स्रोतों के माध्यम से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं ये किताबें, समाचार पत्र, इंटरनेट आदि हो सकती हैं। किसी व्यक्ति के पास एक निश्चित विषय के बारे में बहुत कुछ जानकारी हो सकती है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वह व्यक्ति ज्ञानी है। माहिती के माध्यम से व्यक्ति व्यवहारलक्षी निर्णय लेने में सफल हो सकता है।
जबकि ज्ञान, जानकारियों से अलग है। ज्ञान वह है, जिसमें बुद्धि का इस्तेमाल करते हुए कुछ अनुभव लेते हैं। निरपेक्ष सत्य की साधना से स्वानुभिति प्राप्त अनुभव ही ज्ञान है। और इस ज्ञान के आधार को जीवनमंत्र मान कर जीने वाले ज्ञानी कहलाते है। ज्ञान के माध्यम से जीवन का ध्येय सिद्ध किया जा सकता है।
मानव जीवन का अंतिम और परम ध्येय ' ज्ञान ' से ही :
•नर अपनी करनी से नर का नारायण बन सकता है।
•जीव से शिव, कंकर से शंकर, पुरूष से पुरुषोत्तम बन सकता है।
•#तेन_त्वं_असि, #तत्_त्वम्_असि, #अहं_ब्रह्मास्मि
जीवन की पूर्णता की अनुभूति ज्ञान से ही संभव है; यह पूर्णता, कैसे, किसे और कब प्राप्त होंगी ? इस संदर्भ में भगवान कहते है कि :
#बहूनां_जन्मनामन्ते_ज्ञानवान्मां_प्रपद्यते।
#वासुदेवः_सर्वमिति_स_महात्मा_सुदुर्लभः॥ (भ ग ७/१९)
अर्थात् : बहुत जन्मों के अन्त में ज्ञानप्राप्ति के लिये अविरत प्रयत्नशील पुरुष, जिनमें संस्कारों का संग्रह किया जाय ऐसे बहुतसे जन्मों का अंत-समाप्ति होने पर (अन्तिम जन्ममें) परिपक्व ज्ञान को प्राप्त हुआ ज्ञानी अन्तरात्मा रूप मुझ वासुदेव को सब कुछ वासुदेव ही है इस प्रकार प्रत्यक्षरूप से प्राप्त होता है। जो इस प्रकार सर्वात्मरूप मुझ परमात्मा को प्रत्यक्षरूप से प्राप्त हो जाता है वह महात्मा है उसके समान या उससे अधिक और कोई नहीं है। अतः कहा है कि हजारों मनुष्योंमें भी ऐसा पुरुष अत्यन्त दुर्लभ है।
🙏 जय श्री कृष्ण 🙏
॥हरि: 🕉 तत्सत्॥
🔆 इदं न मम 🔆
🙏🙏🙏🙏🙏
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🕉 #कृष्णं_वंदे_जगद्गुरूम् 🕉
श्रीमद्भगवगिता में अपनी दैवीसंपदा एवं विभूति दर्शनमें प्रभु ने कहा है :
#दण्डो_दमयतामस्मि_नीतिरस्मि_जिगीषताम्।
#मौनं_चैवास्मि_गुह्यानां_ज्ञानं_ज्ञानवतामहम्॥ (भ ग १०/३८)
अर्थात् : मैं दमन करनेवालोंका दण्ड (दमन करनेकी शक्ति) हूँ, जीतनेकी इच्छावालोंकी नीति हूँ, गुप्त रखनेयोग्य बातोंमें मौन हूँ और तत्त्वज्ञानीयों का ज्ञान हूँ।
भगवद्गीता में भगवान कहते है #ज्ञानं_ज्ञानवतामहम् मैं तत्त्वज्ञानीयों का ज्ञान हूँ। ज्ञान की महत्ता भगवान ने और भी कहा है:
#न_हि_ज्ञानेन_सदृशं_पवित्रमिह_विद्यते।
#तत्स्वयं_योगसंसिद्धः_कालेनात्मनि_विन्दति॥ (भ ग ४/३८)
अर्थात् : इस मनुष्यलोकमें ज्ञानके समान पवित्र करनेवाला दूसरा कोई साधन नहीं है। जिसका योग भलीभाँति सिद्ध हो गया है वह (कर्मयोगी) उस तत्त्वज्ञानको अवश्य ही स्वयं अपनेआपमें पा लेता है।
#ज्ञान - बोध, जानना, जानकारी, विद्या।
समान्यता आज माहिती-Information को ज्ञान कहा-समजा जाता है। समस्त सांसारिक व्यवहार सम्बंधित जानकारी को ज्ञान समजा जाता है। आज, हम एक ऐसी दुनिया में रहते हैं, जो सूचनाओं से भरा है और जानकारी प्राप्त करने के लिए कई स्रोत हैं। हम विभिन्न स्रोतों के माध्यम से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं ये किताबें, समाचार पत्र, इंटरनेट आदि हो सकती हैं। किसी व्यक्ति के पास एक निश्चित विषय के बारे में बहुत कुछ जानकारी हो सकती है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वह व्यक्ति ज्ञानी है। माहिती के माध्यम से व्यक्ति व्यवहारलक्षी निर्णय लेने में सफल हो सकता है।
जबकि ज्ञान, जानकारियों से अलग है। ज्ञान वह है, जिसमें बुद्धि का इस्तेमाल करते हुए कुछ अनुभव लेते हैं। निरपेक्ष सत्य की साधना से स्वानुभिति प्राप्त अनुभव ही ज्ञान है। और इस ज्ञान के आधार को जीवनमंत्र मान कर जीने वाले ज्ञानी कहलाते है। ज्ञान के माध्यम से जीवन का ध्येय सिद्ध किया जा सकता है।
मानव जीवन का अंतिम और परम ध्येय ' ज्ञान ' से ही :
•नर अपनी करनी से नर का नारायण बन सकता है।
•जीव से शिव, कंकर से शंकर, पुरूष से पुरुषोत्तम बन सकता है।
•#तेन_त्वं_असि, #तत्_त्वम्_असि, #अहं_ब्रह्मास्मि
जीवन की पूर्णता की अनुभूति ज्ञान से ही संभव है; यह पूर्णता, कैसे, किसे और कब प्राप्त होंगी ? इस संदर्भ में भगवान कहते है कि :
#बहूनां_जन्मनामन्ते_ज्ञानवान्मां_प्रपद्यते।
#वासुदेवः_सर्वमिति_स_महात्मा_सुदुर्लभः॥ (भ ग ७/१९)
अर्थात् : बहुत जन्मों के अन्त में ज्ञानप्राप्ति के लिये अविरत प्रयत्नशील पुरुष, जिनमें संस्कारों का संग्रह किया जाय ऐसे बहुतसे जन्मों का अंत-समाप्ति होने पर (अन्तिम जन्ममें) परिपक्व ज्ञान को प्राप्त हुआ ज्ञानी अन्तरात्मा रूप मुझ वासुदेव को सब कुछ वासुदेव ही है इस प्रकार प्रत्यक्षरूप से प्राप्त होता है। जो इस प्रकार सर्वात्मरूप मुझ परमात्मा को प्रत्यक्षरूप से प्राप्त हो जाता है वह महात्मा है उसके समान या उससे अधिक और कोई नहीं है। अतः कहा है कि हजारों मनुष्योंमें भी ऐसा पुरुष अत्यन्त दुर्लभ है।
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॥हरि: 🕉 तत्सत्॥
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