महर्षि भृगु
🙏 सुप्रभात, आज कार्तिक कृष्ण तृतीया सोमवार दिनांक २६.११.२०१८ 🙏
श्रीमद्भगवगिता में अपनी दैवीसंपदा एवं विभूति दर्शनमें प्रभु ने कहा है:
#महर्षीणां_भृगुरहं_गिरामस्म्येकमक्षरम्।
#यज्ञानां_जपयज्ञोऽस्मि_स्थावराणां_हिमालयः॥ (भ ग १०/२५)
अर्थात् : मैं महर्षियों में भृगु और वाणी (शब्दों) में एकाक्षर ओंकार हूँ। मैं यज्ञों में जपयज्ञ और स्थावरों (अचलों) में हिमालय हूँ।
श्रीमद्भगवगिता में भगवान कहते है कि #महर्षीणां_भृगुरहं मैं मैं महर्षियों में भृगुऋषि हूँ।
#महर्षि_भृगु :
भार्गववंश के मूलपुरुष महर्षि भृगु जिनको जनसामान्य ॠचाओं के रचईता एक ॠषि, भृगुसंहिता के रचनाकार, यज्ञों मे ब्रह्मा बनने वाले ब्राह्मण और त्रिदेवों की परीक्षा में भगवान विष्णु की छाती पर लात मारने वाले मुनि के नाते जाना जाता है।
ऐतिहासिक ग्रन्थों के आधार पर महर्षि भृगु का जन्म ५५०० ईसा पूर्व ब्रह्मलोक - सुषा नगर (वर्तमान ईरान) में हुआ था। इनके परदादा का नाम मरीचि ऋषि था। दादाजी का नाम कश्यप ऋषि, दादी का नाम अदिति था। इनके पिता प्रचेता - विधाता जो ब्रह्मलोक के राजा बनने के बाद प्रजापिता ब्रह्मा कहलाये। अपने माता-पिता अदिति -कश्यप के ज्येष्ठ पुत्र थे। महर्षि भृगुजी की माता का नाम वीरणी देवी था। ये अपने माता-पिता से सहोदर दो भाई थे। आपके बड़े भाई का नाम अंगिरा ऋषि था। जिनके पुत्र बृहस्पतिजी हुए जो देवगणों के पुरोहित-देवगुरू के रूप में जाने जाते हैं। महर्षि भृगु द्वारा रचित ज्योतिष ग्रंथ #भृगु_संहिता के लोकार्पण एवं गंगा सरयू नदियों के संगम के अवसर पर जीवनदायिनी गंगा नदी के संरक्षण और याज्ञिक परम्परा से महर्षि भृगु ने अपने शिष्य दर्दर के सम्मान में ददरी मेला प्रारम्भ किया।
मन्दराचल पर्वत पर हो रहे यज्ञ में ऋषि-मुनियों में इस बात पर विवाद छिड़ गया कि त्रिदेवों (#ब्रह्मा_विष्णु_महेश) में श्रेष्ठ देव कौन है ? देवों की परीक्षा के लिए ऋषि-मुनियों ने महर्षि भृगु को परीक्षक नियुक्त किया।
•त्रिदेवों की परीक्षा लेने के क्रम में महर्षि भृगु सबसे पहले भगवान शंकर के कैलाश (हिन्दूकुश पर्वत श्रृंखला के पश्चिम में काराकोरम कहते हैं) पहुॅचे उस समय भगवान शंकर अपनी पत्नी सती के साथ विहार कर रहे थे। नन्दी आदि रूद्रगणों ने महर्षि को प्रवेश द्वार पर ही रोक दिया। महर्षि भृगु द्वारा भगवान शंकर से मिलने की हठ करने पर रूद्रगणों ने महर्षि को अपमानित भी कर दिया। कुपित महर्षि भृगु ने भगवान शंकर को तमोगुणी घोषित करते हुए लिंग (शिश्न स्वरूप) में पूजित होने का शाप दिया।
•यहाँ से महर्षि भृगु ब्रह्मलोक (सुषानगर, पर्शिया ईरान) ब्रह्माजी के पास पहुँचे। ब्रह्माजी अपने दरबार में विराज रहे थे। सभी देवगण उनके समक्ष बैठे हुए थे। भृगु जी को ब्रह्माजी ने बैठने तक को नहीं कहा। तब महर्षि भृगु ने ब्रह्माजी को रजोगुणी घोषित करते हुए अपूज्य (जिसकी पूजा ही नहीं होगी) होने का शाप दिया। कैलाश और ब्रह्मलोक में मिले अपमान-तिरस्कार से क्षोभित महर्षि विष्णुलोक चल दिये।
•भगवान श्रीहरि विष्णु क्षीर सागर (श्रीनार फारस की खाड़ी) में सर्पाकार सुन्दर नौका (शेषनाग) पर अपनी पत्नी लक्ष्मी-श्री के साथ विहार कर रहे थे। उस समय श्री विष्णु जी शयन कर रहे थे। महर्षि भृगुजी को लगा कि हमें आता देख विष्णु सोने का नाटक कर रहे हैं। उन्होंने अपने दाहिने पैर का आघात श्री विष्णु जी की छाती पर कर दिया। महर्षि के इस अशिष्ट आचरण पर विष्णुप्रिया लक्ष्मी जो श्रीहरि के चरण दबा रही थी, कुपित हो उठी। लेकिन श्रीविष्णु जी ने महर्षि का पैर पकड़ लिया और कहा भगवन् ! मेरे कठोर वक्ष से आपके कोमल चरण में चोट तो नहीं लगी। महर्षि भृगु लज्जित भी हुए और प्रसन्न भी, उन्होंने श्रीहरि विष्णु को त्रिदेवों में श्रेष्ठ सतोगुणी घोषित कर दिया।
त्रिदेवों की इस परीक्षा में जहाँ एक बहुत बड़ी सीख छिपी है। वहीं एक बहुत बड़ी कूटनीति भी छिपी थी। इस घटना से एक लोकोक्ति बनी।
#क्षमा_बड़न_को_चाहिए_छोटन_को_उत्पात।
#का_हरि_को_घट्यो_गए_ज्यों_भृगु_मारि_लात॥
#भृगु_संहिता:
भृगु संहिता के अनुसार व्यक्ति के जीवन पर उसके भाग्य या किस्मत का बहुत गहरा प्रभाव माना जाता है। व्यक्ति के सुख-दुख, सफलता-विफलता अमीरी-गरीबी आदि सबका संबंध उसके भाग्य के साथ होता है। शास्त्रओं के अनुसार व्यक्ति को जो कुछ मिलता या जो भी उसके पास होता है वो उसे उसके भाग्य के कारण ही प्राप्त होता है। परंतु यदि व्यक्ति पुरुषार्ष करे तो उसके द्वारा उसका भाग्य बदला भी जा सकता है। हिंदू ज्योतिष शास्त्र भृगु संहिता एक एेसा ग्रंथ है जिसमें व्यक्ति के भाग्योदय से संबंधित कई बातें बताई गई है। तो आईए जानें इसमें बताई गई कुछ महत्वपूर्ण बातें।
महर्षि की इस संहिता द्वारा किसी भी जातक के तीन जन्मों का फल निकाला जा सकता है। इस ब्रह्माण्ड को नियंत्रित करने वाले सूर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुद्ध, बृहस्पति,शुक्र शनि आदि ग्रहों और नक्षत्रों पर आधारित वैदिक गणित के इस वैज्ञानिक ग्रंथ के माध्यम से जीवन और कृषि के लिए वर्षा आदि की भी भविष्यवाणियां की जाती थी।
#ऋषि :
ऋषि भारतीय परंपरा में श्रुति ग्रंथों को दर्शन करने (यानि यथावत समझ पाने) वाले जनों को कहा जाता है। आधुनिक बातचीत में मुनि, योगी (जोगी), सन्त अथवा कवि इनके पर्याय नाम हैं। ऋषि शब्द की व्युत्पत्ति 'ऋष' है जिसका अर्थ देखना होता है। ऋषि इस संसार के उस पार अदृश्य को देख सकते थे। आज की भाषा में उसे वैज्ञानिक कहते हैं। "THOSE WHO CAN SEE THE INVISIBLES, ARE CALLED SCIENTISTS" इस दृष्टि से देखा जाए तो पूरातन काल के ऋषि, वैज्ञानिक थे। दोनों मानव कल्याण के लिए कार्यरत रहते हैं। अंतर इतना हैं कि ऋषि आध्यात्मिक विश्व की खोज करते थे और आज के वैज्ञानिक भौतिक विश्व कि खोज करते हैं।
सामान्य व्यक्ति और वैज्ञानिक में अंतर इतना रहता है कि सामान्य व्यक्ति देखते हैं और वैज्ञानिक अवलोकन करते हैं। पेड़ से सेब गीरते हुए सब देखते हैं, परंतु अवलोकन सिर्फ न्यूटन ने किया था। उसने सोचा कि यदि सेब धरती पर गिरता है तो चंद्रमा, सुरज, तारें क्यों नहीं गिरते ? इस अवलोकन ने विश्व को गुरुत्वाकर्षण का नियम समझाया। और इससे वैज्ञानिकों के लिए अवकाश में मनुष्य को भेजना सरल हो गया और वह चांद पर जाकर आया।
पूरातन काल में ऋषि मंत्रदृष्टा थे। मानव कल्याण के लिए अपना सर्वस्य त्याग कर खोज में लगे रहते थे।
मेरे #गौत्र_पिता_महर्षि_भृगु एवं मंत्रद्रष्टा समस्त ऋषि मुनियों को कोटि कोटि प्रणाम।
॥हरि: 🕉 तत्सत्॥
🔆 इदं न मम 🔆
🙏🙏🙏🙏🙏
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🕉 #कृष्णं_वंदे_जगद्गुरूम् 🕉
श्रीमद्भगवगिता में अपनी दैवीसंपदा एवं विभूति दर्शनमें प्रभु ने कहा है:
#महर्षीणां_भृगुरहं_गिरामस्म्येकमक्षरम्।
#यज्ञानां_जपयज्ञोऽस्मि_स्थावराणां_हिमालयः॥ (भ ग १०/२५)
अर्थात् : मैं महर्षियों में भृगु और वाणी (शब्दों) में एकाक्षर ओंकार हूँ। मैं यज्ञों में जपयज्ञ और स्थावरों (अचलों) में हिमालय हूँ।
श्रीमद्भगवगिता में भगवान कहते है कि #महर्षीणां_भृगुरहं मैं मैं महर्षियों में भृगुऋषि हूँ।
#महर्षि_भृगु :
भार्गववंश के मूलपुरुष महर्षि भृगु जिनको जनसामान्य ॠचाओं के रचईता एक ॠषि, भृगुसंहिता के रचनाकार, यज्ञों मे ब्रह्मा बनने वाले ब्राह्मण और त्रिदेवों की परीक्षा में भगवान विष्णु की छाती पर लात मारने वाले मुनि के नाते जाना जाता है।
ऐतिहासिक ग्रन्थों के आधार पर महर्षि भृगु का जन्म ५५०० ईसा पूर्व ब्रह्मलोक - सुषा नगर (वर्तमान ईरान) में हुआ था। इनके परदादा का नाम मरीचि ऋषि था। दादाजी का नाम कश्यप ऋषि, दादी का नाम अदिति था। इनके पिता प्रचेता - विधाता जो ब्रह्मलोक के राजा बनने के बाद प्रजापिता ब्रह्मा कहलाये। अपने माता-पिता अदिति -कश्यप के ज्येष्ठ पुत्र थे। महर्षि भृगुजी की माता का नाम वीरणी देवी था। ये अपने माता-पिता से सहोदर दो भाई थे। आपके बड़े भाई का नाम अंगिरा ऋषि था। जिनके पुत्र बृहस्पतिजी हुए जो देवगणों के पुरोहित-देवगुरू के रूप में जाने जाते हैं। महर्षि भृगु द्वारा रचित ज्योतिष ग्रंथ #भृगु_संहिता के लोकार्पण एवं गंगा सरयू नदियों के संगम के अवसर पर जीवनदायिनी गंगा नदी के संरक्षण और याज्ञिक परम्परा से महर्षि भृगु ने अपने शिष्य दर्दर के सम्मान में ददरी मेला प्रारम्भ किया।
मन्दराचल पर्वत पर हो रहे यज्ञ में ऋषि-मुनियों में इस बात पर विवाद छिड़ गया कि त्रिदेवों (#ब्रह्मा_विष्णु_महेश) में श्रेष्ठ देव कौन है ? देवों की परीक्षा के लिए ऋषि-मुनियों ने महर्षि भृगु को परीक्षक नियुक्त किया।
•त्रिदेवों की परीक्षा लेने के क्रम में महर्षि भृगु सबसे पहले भगवान शंकर के कैलाश (हिन्दूकुश पर्वत श्रृंखला के पश्चिम में काराकोरम कहते हैं) पहुॅचे उस समय भगवान शंकर अपनी पत्नी सती के साथ विहार कर रहे थे। नन्दी आदि रूद्रगणों ने महर्षि को प्रवेश द्वार पर ही रोक दिया। महर्षि भृगु द्वारा भगवान शंकर से मिलने की हठ करने पर रूद्रगणों ने महर्षि को अपमानित भी कर दिया। कुपित महर्षि भृगु ने भगवान शंकर को तमोगुणी घोषित करते हुए लिंग (शिश्न स्वरूप) में पूजित होने का शाप दिया।
•यहाँ से महर्षि भृगु ब्रह्मलोक (सुषानगर, पर्शिया ईरान) ब्रह्माजी के पास पहुँचे। ब्रह्माजी अपने दरबार में विराज रहे थे। सभी देवगण उनके समक्ष बैठे हुए थे। भृगु जी को ब्रह्माजी ने बैठने तक को नहीं कहा। तब महर्षि भृगु ने ब्रह्माजी को रजोगुणी घोषित करते हुए अपूज्य (जिसकी पूजा ही नहीं होगी) होने का शाप दिया। कैलाश और ब्रह्मलोक में मिले अपमान-तिरस्कार से क्षोभित महर्षि विष्णुलोक चल दिये।
•भगवान श्रीहरि विष्णु क्षीर सागर (श्रीनार फारस की खाड़ी) में सर्पाकार सुन्दर नौका (शेषनाग) पर अपनी पत्नी लक्ष्मी-श्री के साथ विहार कर रहे थे। उस समय श्री विष्णु जी शयन कर रहे थे। महर्षि भृगुजी को लगा कि हमें आता देख विष्णु सोने का नाटक कर रहे हैं। उन्होंने अपने दाहिने पैर का आघात श्री विष्णु जी की छाती पर कर दिया। महर्षि के इस अशिष्ट आचरण पर विष्णुप्रिया लक्ष्मी जो श्रीहरि के चरण दबा रही थी, कुपित हो उठी। लेकिन श्रीविष्णु जी ने महर्षि का पैर पकड़ लिया और कहा भगवन् ! मेरे कठोर वक्ष से आपके कोमल चरण में चोट तो नहीं लगी। महर्षि भृगु लज्जित भी हुए और प्रसन्न भी, उन्होंने श्रीहरि विष्णु को त्रिदेवों में श्रेष्ठ सतोगुणी घोषित कर दिया।
त्रिदेवों की इस परीक्षा में जहाँ एक बहुत बड़ी सीख छिपी है। वहीं एक बहुत बड़ी कूटनीति भी छिपी थी। इस घटना से एक लोकोक्ति बनी।
#क्षमा_बड़न_को_चाहिए_छोटन_को_उत्पात।
#का_हरि_को_घट्यो_गए_ज्यों_भृगु_मारि_लात॥
#भृगु_संहिता:
भृगु संहिता के अनुसार व्यक्ति के जीवन पर उसके भाग्य या किस्मत का बहुत गहरा प्रभाव माना जाता है। व्यक्ति के सुख-दुख, सफलता-विफलता अमीरी-गरीबी आदि सबका संबंध उसके भाग्य के साथ होता है। शास्त्रओं के अनुसार व्यक्ति को जो कुछ मिलता या जो भी उसके पास होता है वो उसे उसके भाग्य के कारण ही प्राप्त होता है। परंतु यदि व्यक्ति पुरुषार्ष करे तो उसके द्वारा उसका भाग्य बदला भी जा सकता है। हिंदू ज्योतिष शास्त्र भृगु संहिता एक एेसा ग्रंथ है जिसमें व्यक्ति के भाग्योदय से संबंधित कई बातें बताई गई है। तो आईए जानें इसमें बताई गई कुछ महत्वपूर्ण बातें।
महर्षि की इस संहिता द्वारा किसी भी जातक के तीन जन्मों का फल निकाला जा सकता है। इस ब्रह्माण्ड को नियंत्रित करने वाले सूर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुद्ध, बृहस्पति,शुक्र शनि आदि ग्रहों और नक्षत्रों पर आधारित वैदिक गणित के इस वैज्ञानिक ग्रंथ के माध्यम से जीवन और कृषि के लिए वर्षा आदि की भी भविष्यवाणियां की जाती थी।
#ऋषि :
ऋषि भारतीय परंपरा में श्रुति ग्रंथों को दर्शन करने (यानि यथावत समझ पाने) वाले जनों को कहा जाता है। आधुनिक बातचीत में मुनि, योगी (जोगी), सन्त अथवा कवि इनके पर्याय नाम हैं। ऋषि शब्द की व्युत्पत्ति 'ऋष' है जिसका अर्थ देखना होता है। ऋषि इस संसार के उस पार अदृश्य को देख सकते थे। आज की भाषा में उसे वैज्ञानिक कहते हैं। "THOSE WHO CAN SEE THE INVISIBLES, ARE CALLED SCIENTISTS" इस दृष्टि से देखा जाए तो पूरातन काल के ऋषि, वैज्ञानिक थे। दोनों मानव कल्याण के लिए कार्यरत रहते हैं। अंतर इतना हैं कि ऋषि आध्यात्मिक विश्व की खोज करते थे और आज के वैज्ञानिक भौतिक विश्व कि खोज करते हैं।
सामान्य व्यक्ति और वैज्ञानिक में अंतर इतना रहता है कि सामान्य व्यक्ति देखते हैं और वैज्ञानिक अवलोकन करते हैं। पेड़ से सेब गीरते हुए सब देखते हैं, परंतु अवलोकन सिर्फ न्यूटन ने किया था। उसने सोचा कि यदि सेब धरती पर गिरता है तो चंद्रमा, सुरज, तारें क्यों नहीं गिरते ? इस अवलोकन ने विश्व को गुरुत्वाकर्षण का नियम समझाया। और इससे वैज्ञानिकों के लिए अवकाश में मनुष्य को भेजना सरल हो गया और वह चांद पर जाकर आया।
पूरातन काल में ऋषि मंत्रदृष्टा थे। मानव कल्याण के लिए अपना सर्वस्य त्याग कर खोज में लगे रहते थे।
मेरे #गौत्र_पिता_महर्षि_भृगु एवं मंत्रद्रष्टा समस्त ऋषि मुनियों को कोटि कोटि प्रणाम।
॥हरि: 🕉 तत्सत्॥
🔆 इदं न मम 🔆
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