मौनं चैवास्मि गुह्यानां

🙏 सुप्रभात, आज कार्तिक शुक्ल द्वादशी मंगलवार दिनांक २०.११.२०१८ 🙏

🕉 #कृष्णं_वंदे_जगद्गुरूम् 🕉   

श्रीमद्भगवगिता में अपनी दैवीसंपदा एवं विभूति दर्शनमें प्रभु ने कहा है :
#दण्डो_दमयतामस्मि_नीतिरस्मि_जिगीषताम्।
#मौनं_चैवास्मि_गुह्यानां_ज्ञानं_ज्ञानवतामहम्॥ (भ ग १०/३८)
अर्थात् : मैं दमन करनेवालोंका दण्ड (दमन करनेकी शक्ति) हूँ, जीतनेकी इच्छावालोंकी नीति हूँ, गुप्त रखनेयोग्य बातोंमें मौन हूँ और तत्त्वज्ञानीयों का ज्ञान हूँ।

भगवद्गीता में भगवान कहते है #मौनं_चैवास्मि_गुह्यानां गुप्त रखने योग्य बातोंमें मैं मौन हूँ।

#मौन ध्यान की ऊर्जा और सत्य का द्वार है। मौन से जहाँ मन शांत होता है वहीं मौन से मन की ‍शक्ति भी बढ़ती है। मौन का अर्थ अन्दर और बाहर से चुप रहना है। आमतौर पर हम ‘मौन’ का अर्थ होंठों का ना चलना माना जाता है। यह बड़ा सीमित अर्थ है।

मौन दो प्रकार के है।
•वाणी से मौन
 वाणी को वश में रखना, कम बोलना, नहीं बोलना, जरूरत के अनुसार शब्दोच्चार करना आदि वाणी के मौन कहे जाते हैं।
•मन से मौन
मन को स्थिर करना, मन में बुरे विचार नहीं लाना, अनात्म विचारों को हटा कर आत्म (अध्यात्म) विचार करना, बाह्य सुख की इच्छा से मुक्त होकर अंतर सुख में मस्त होना, और मन को आत्मा के वश रखना वगैरह मन का मौनव्रत कहलाता है।

केवल शब्दहीनता मौन नही है किसीको चुप देखकर ये मत समझ लेना कि वो मौन हो गया है। वो बहुत ज़ोर से चिल्ला रहा है, शब्दहीन होकर भी चिल्ला रहा है। बस उसके शब्द सुनाई नहीं दे रहे। वो बोल रहा है बस आवाज़ नहीं आ रही। शब्दहीनता को, ध्वनिहीनता को मौन समझ लेना गलत है।

मौनव्रत है - मन का शान्त हो जाना अर्थात मन कल्पनाओं की व्यर्थ उड़ान न भरे। आन्तरिक मौन में लगातार  बाहरी शब्द मौजूद भी रहें तो भी, मौन बना ही रहता है। उस मौन में साधक कुछ बोलते भी रहे तो उस मौन पर कोई अन्तर नहीं पड़ता।

मौन यह यौगिक साधना से सिद्ध की हुई अवस्था है। मौन से संकल्प शक्ति की वृद्धि तथा वाणी के आवेगों पर नियंत्रण होता है। मौन आन्तरिक तप है इसलिए यह आन्तरिक गहराइयों तक ले जाता है। मौन के क्षणों में आन्तरिक जगत के नवीन रहस्य उद्घाटित होते है। वाणी का अपब्यय रोककर मानसिक संकल्प के द्वारा आन्तरिक शक्तियों के क्षय को रोकना परम् मौन को उपलब्ध होना है। मौन से सत्य की सुरक्षा एवं वाणी पर नियंत्रण होता है। मौन के क्षणों में प्रकृति के नवीन रहस्यों के साथ परमात्मा से प्रेरणा मिल सकती है।

कबीरदास जी ने कहा है:
•#कबीरा_यह_गत_अटपटी_चटपट_लखि_न_जाए।
•#जब_मन_की_खटपट_मिटे_अधर_भया_ठहराय।

अधर याने होंठ। होंठ वास्तव में तभी ठहरेंगें, तभी शान्त होंगे, जब मन की खटपट मिट जायेगी। हमारे होंठ भी ज्यादा इसीलिए चलते हैं क्योंकि मन अशान्त है, और जब तक मन अशान्त है, तब तक होंठ चलें या न चलें कोई अन्तर नहीं क्योंकि मूल बात तो मन की अशान्ति है जो बनी हुई है।

यौगिक मौन साधना।:
अन्तरशक्ति बढ़ती है, इस आत्मशक्ति से बीड़ी, सिगरेट, तम्बाकू, चाय, शराब और अफीम वगैरह शरीर को अत्यन्त नुकसान करने वाले व्यसन के ऊपर काबू रखने की शक्ति आती है और धीरे धीरे खराब व्यसन छूट जाते हैं। मौनधारियों के वचन सत्य होते हैं, सुनने वाले को सम्पूर्ण विश्वास तथा सचोट असर होता है। अन्तःकरण, मन, बुद्धि, चित्त अहंकार में रहे हुए छह रिपु (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर) का नाश होता है, सुख और दुःख के समय सौम्य दृष्टि व संतोषवृत्ति उत्पन्न होती है, ज्ञानेन्द्रियों की स्थिरता जाती रहती है, नाभि में रही हुई परावाणी में से शब्द गुप्त रूप से प्रकट होते हैं। वे शब्द मनुष्य (अपने) कल्याण के पन्थ में ले जाने वाली आज्ञा है अपने शरीर में से उत्पन्न होने वाले शब्दों के आधार से भविष्य में जाने वाले सुख या दुःख के समाचार मिल सकते हैं।

🙏 जय श्री कृष्ण 🙏

॥हरि: 🕉 तत्सत्॥

🔆  इदं न मम  🔆

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