विक्रम संवत नुतनवर्ष, बलिप्रतिपदा, गौवर्धन पूजा
🙏 सुप्रभात, आज विक्रम संवत २०७६ कार्तिक शुक्ल प्रथमा नुतनवर्ष दिनांक २८.१०.२०१९ रविवार
भारतवर्ष में मनाए जाने वाले सभी त्यौहारों में दीपावली का सामाजिक और धार्मिक दोनों दृष्टि से अत्यधिक महत्त्व है। दीपावली यह पांच पर्वों का महापर्व धनत्रयोदशी, कालीचौदस, दीपावली, वर्षप्रतिपदा, और भैयादूज मिलाकर #दीपमहोत्सव हैं।
विक्रम संवत २०७६ नुतनवर्ष
वर्षप्रतिपदा
यह विक्रम संवत कालगणनाका आरंभ दिन है। ईसा पूर्व पहली शताब्दीमें शकोंने भारतपर आक्रमण किया। वर्तमान उज्जयिनी नगरीके राजा विक्रमादित्यने, मालवाके युवकोंको युद्धनिपुण बनाया। शकोंपर आक्रमण कर उन्हें देशसे निकाल भगाया एवं धर्माधिष्ठित साम्राज्य स्थापित किया। इस विजयके प्रतीकस्वरूप सम्राट विक्रमादित्यने विक्रम संवत् नामक कालगणना आरंभ की। यह संवत 57 ई.पू. आरम्भ होती है। इससे स्पष्ट होता है कि, कालगणनाकी संकल्पना भारतीय संस्कृतिमें कितनी पुरानी है। ईसा पूर्व कालमें संस्कृतिके वैभवकी, सर्वांगीण सभ्यताकी और एकछत्र राज्यव्यवस्थाकी यह एक निशानी है।
कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा वर्ष के साढेतीन प्रमुख शुभ मुहूर्तोंमेंसे आधा मुहूर्त है। इसलिए भी इस दिनका विशेष महत्त्व है। कार्तिक शुक्ल प्रतिपदाके दिन कुछ विशेष उद्देश्योंसे विविध धार्मिक विधियां करते हैं।
गुजरात में नव वर्ष कार्तिक माह में शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को प्रारम्भ होता है। गुजराती नव वर्ष #अन्नकूट_पूजा के दिन प्रारम्भ होता है। अन्नकूट पूजा को #गोवर्धन_पूजा के नाम से भी जाना जाता है।
गौवर्धनपूजा
गोवर्धन पूजा इसे अन्नकूट के नाम से भी जानते हैं। इस त्यौहार का भारतीय लोकजीवन में काफी महत्व है। इस पर्व में प्रकृति के साथ मानव का सीधा सम्बन्ध दिखाई देता है। इस पर्व की अपनी परंपरा और लोककथा है। गोवर्धन पूजा में गोधन यानी गायों की पूजा की जाती है। शास्त्रों में बताया गया है कि गाय उसी प्रकार पवित्र होती जैसे नदियों में गंगा। गाय को देवी लक्ष्मी का स्वरूप भी कहा गया है। देवी लक्ष्मी जिस प्रकार सुख समृद्धि प्रदान करती हैं उसी प्रकार गौ माता भी अपने दूध से स्वास्थ्य रूपी धन प्रदान करती हैं। इनका बछड़ा खेतों में अनाज उगाता है। इस तरह गौ सम्पूर्ण मानव जाती के लिए पूजनीय और आदरणीय है। गौ के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए ही कार्तिक शुक्ल पक्ष प्रतिपदा के दिन गोर्वधन की पूजा की जाती है।
परम्परा से चली आ रही इंद्रपूजा को भगवान श्रीकृष्ण ने लोकक्रांति करवाकर बंद करवाया। और समजाया कि हमारी जीवन जरूरियात प्रत्यक्ष गौवर्धन पर्वत पूर्ण करता है। गौधन गौवर्धन पर्वत पर चर कर गौधन पुष्ट होकर हमे दूध देता है, हमारी सारी जरूरते पूरी करता है। वृंदावनवासी श्रीकृष्ण के विचार से प्रभावित होकर इंद्रपूजा छोड़ गौवर्धन पूजा करने लगे। यह देख देवराज इंद्र ने क्रोधित होकर मुश्लाधार बारिस बरसाई। देवराज इन्द्र के अभिमान चूर करने हेतु भगवान श्री कृष्ण जो स्वयं लीलाधारी श्री हरि विष्णु के अवतार हैं ने एक लीला रची।
जब कृष्ण ने ब्रजवासियों को मूसलधार वर्षा से बचने के लिए सात दिन तक गोवर्धन पर्वत को अपनी सबसे छोटी उँगली पर उठाकर रखा और गोप-गोपिकाएँ उसकी छाया में सुखपूर्वक रहे। सातवें दिन भगवान ने गोवर्धन को नीचे रखा और हर वर्ष गोवर्धन पूजा करके अन्नकूट उत्सव मनाने की आज्ञा दी। तभी से यह उत्सव अन्नकूट के नाम से मनाया जाने लगा।
गुजराती नव वर्ष वह समय होता है जिस दिन पुरानी खाता पुस्तकों को बंद किया जाता है और नई खाता पुस्तकों का शुभारम्भ किया जाता है। गुजरात में पारम्परिक खाता पुस्तकों को चोपड़ा के नाम से जाना जाता है। #दीवाली_लक्ष्मी_पूजा के दौरान देवी लक्ष्मीजी की उपस्थिति में नई खाता पुस्तकों जिसे चोपड़ा कहते है, उनका शुभारम्भ किया जाता है और लक्ष्मीजी के आशीर्वाद की प्रार्थना की जाती है। इस धार्मिक उत्सव को चोपड़ा पूजन के नाम से जाना जाता है। वित्तीय वर्ष को लाभदायक बनाने के लिए चोपड़ा पूजा के दौरान नई खाता पुस्तकों पर शुभ चिह्न बनाये जाते हैं।
दीपावली और विक्रम संवत २०७५ नववर्ष पर सभी मित्रों को शुभकामनाएं एवं हार्दिक अभिनंदन
🙏 जय श्री कृष्ण 🙏
॥हरि: 🕉 तत्सत्॥
🔆 इदं न मम 🔆
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🕉 कृष्णं वंदे जगद्गुरूम् 🕉
गौवर्धन पूजा
भारतवर्ष में मनाए जाने वाले सभी त्यौहारों में दीपावली का सामाजिक और धार्मिक दोनों दृष्टि से अत्यधिक महत्त्व है। दीपावली यह पांच पर्वों का महापर्व धनत्रयोदशी, कालीचौदस, दीपावली, वर्षप्रतिपदा, और भैयादूज मिलाकर #दीपमहोत्सव हैं।
विक्रम संवत २०७६ नुतनवर्ष
वर्षप्रतिपदा
यह विक्रम संवत कालगणनाका आरंभ दिन है। ईसा पूर्व पहली शताब्दीमें शकोंने भारतपर आक्रमण किया। वर्तमान उज्जयिनी नगरीके राजा विक्रमादित्यने, मालवाके युवकोंको युद्धनिपुण बनाया। शकोंपर आक्रमण कर उन्हें देशसे निकाल भगाया एवं धर्माधिष्ठित साम्राज्य स्थापित किया। इस विजयके प्रतीकस्वरूप सम्राट विक्रमादित्यने विक्रम संवत् नामक कालगणना आरंभ की। यह संवत 57 ई.पू. आरम्भ होती है। इससे स्पष्ट होता है कि, कालगणनाकी संकल्पना भारतीय संस्कृतिमें कितनी पुरानी है। ईसा पूर्व कालमें संस्कृतिके वैभवकी, सर्वांगीण सभ्यताकी और एकछत्र राज्यव्यवस्थाकी यह एक निशानी है।
कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा वर्ष के साढेतीन प्रमुख शुभ मुहूर्तोंमेंसे आधा मुहूर्त है। इसलिए भी इस दिनका विशेष महत्त्व है। कार्तिक शुक्ल प्रतिपदाके दिन कुछ विशेष उद्देश्योंसे विविध धार्मिक विधियां करते हैं।
गुजरात में नव वर्ष कार्तिक माह में शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को प्रारम्भ होता है। गुजराती नव वर्ष #अन्नकूट_पूजा के दिन प्रारम्भ होता है। अन्नकूट पूजा को #गोवर्धन_पूजा के नाम से भी जाना जाता है।
गौवर्धनपूजा
गोवर्धन पूजा इसे अन्नकूट के नाम से भी जानते हैं। इस त्यौहार का भारतीय लोकजीवन में काफी महत्व है। इस पर्व में प्रकृति के साथ मानव का सीधा सम्बन्ध दिखाई देता है। इस पर्व की अपनी परंपरा और लोककथा है। गोवर्धन पूजा में गोधन यानी गायों की पूजा की जाती है। शास्त्रों में बताया गया है कि गाय उसी प्रकार पवित्र होती जैसे नदियों में गंगा। गाय को देवी लक्ष्मी का स्वरूप भी कहा गया है। देवी लक्ष्मी जिस प्रकार सुख समृद्धि प्रदान करती हैं उसी प्रकार गौ माता भी अपने दूध से स्वास्थ्य रूपी धन प्रदान करती हैं। इनका बछड़ा खेतों में अनाज उगाता है। इस तरह गौ सम्पूर्ण मानव जाती के लिए पूजनीय और आदरणीय है। गौ के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए ही कार्तिक शुक्ल पक्ष प्रतिपदा के दिन गोर्वधन की पूजा की जाती है।
परम्परा से चली आ रही इंद्रपूजा को भगवान श्रीकृष्ण ने लोकक्रांति करवाकर बंद करवाया। और समजाया कि हमारी जीवन जरूरियात प्रत्यक्ष गौवर्धन पर्वत पूर्ण करता है। गौधन गौवर्धन पर्वत पर चर कर गौधन पुष्ट होकर हमे दूध देता है, हमारी सारी जरूरते पूरी करता है। वृंदावनवासी श्रीकृष्ण के विचार से प्रभावित होकर इंद्रपूजा छोड़ गौवर्धन पूजा करने लगे। यह देख देवराज इंद्र ने क्रोधित होकर मुश्लाधार बारिस बरसाई। देवराज इन्द्र के अभिमान चूर करने हेतु भगवान श्री कृष्ण जो स्वयं लीलाधारी श्री हरि विष्णु के अवतार हैं ने एक लीला रची।
जब कृष्ण ने ब्रजवासियों को मूसलधार वर्षा से बचने के लिए सात दिन तक गोवर्धन पर्वत को अपनी सबसे छोटी उँगली पर उठाकर रखा और गोप-गोपिकाएँ उसकी छाया में सुखपूर्वक रहे। सातवें दिन भगवान ने गोवर्धन को नीचे रखा और हर वर्ष गोवर्धन पूजा करके अन्नकूट उत्सव मनाने की आज्ञा दी। तभी से यह उत्सव अन्नकूट के नाम से मनाया जाने लगा।
गुजराती नव वर्ष वह समय होता है जिस दिन पुरानी खाता पुस्तकों को बंद किया जाता है और नई खाता पुस्तकों का शुभारम्भ किया जाता है। गुजरात में पारम्परिक खाता पुस्तकों को चोपड़ा के नाम से जाना जाता है। #दीवाली_लक्ष्मी_पूजा के दौरान देवी लक्ष्मीजी की उपस्थिति में नई खाता पुस्तकों जिसे चोपड़ा कहते है, उनका शुभारम्भ किया जाता है और लक्ष्मीजी के आशीर्वाद की प्रार्थना की जाती है। इस धार्मिक उत्सव को चोपड़ा पूजन के नाम से जाना जाता है। वित्तीय वर्ष को लाभदायक बनाने के लिए चोपड़ा पूजा के दौरान नई खाता पुस्तकों पर शुभ चिह्न बनाये जाते हैं।
दीपावली और विक्रम संवत २०७५ नववर्ष पर सभी मित्रों को शुभकामनाएं एवं हार्दिक अभिनंदन
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