दण्डो_दमयतामस्मि
🙏 सुप्रभात, आज कार्तिक शुक्ल नवमी शनि दिनांक १७.११.२०१८ 🙏
श्रीमद्भगवगिता में अपनी दैवीसंपदा एवं विभूति दर्शन में प्रभु ने कहा है :
#दण्डो_दमयतामस्मि_नीतिरस्मि_जिगीषताम्।
#मौनं_चैवास्मि_गुह्यानां_ज्ञानं_ज्ञानवतामहम्॥ (भ ग १०/३८)
अर्थात् : मैं दमन करनेवालोंका दण्ड (दमन करनेकी शक्ति) हूँ, जीतनेकी इच्छावालोंकी नीति हूँ, गुप्त रखनेयोग्य बातोंमें मौन हूँ और तत्त्वज्ञानीयों का ज्ञान हूँ।
भगवद्गीता में भगवान कहते है #दण्डो_दमयतामस्मि दमन करनेवालोंका मैं दण्ड हुँ।
राजा, राज्य और छत्र की शक्ति और संप्रभुता का द्योतक और किसी अपराधी को उसके अपराध के निमित्त दी गयी सजा को दण्ड कहते हैं। एक दूसरे सन्दर्भ में, राजनीतिशास्त्र के चार उपायों - #साम, #दाम, #दंड और #भेद में एक उपाय दण्ड का शाब्दिक अर्थ #सजा #Law #डण्डा (छड़ी) है जिससे किसी को सजा के रूप में दंडित किया जाता है-पीटा जाता है।
दण्ड की उत्पत्ति राज्यसंस्था की उत्पत्ति के साथ हुई। मनुस्मृति और महाभारत में यह कहा गया है कि मानव जाति की प्रारंभिक स्थिति अत्यंत पवित्र स्वभाव, दोषरहित कर्म, सत्वप्रकृति और ऋतु की थी। उस समय :
#न_राज्यं_न_च_राजासीत_न_दण्डो_न_च_दाण्डिकः।
#स्वयमेव_प्रजाः_सर्वा_रक्षन्ति_स्म_परस्परम॥
अर्थात् : जब न तो किसी राजा की स्थिति थी, न राज्य था, न दंड था, न दंडी था और सभी लोग धर्म के द्वारा ही एक दूसरे की रक्षा करते थे।
किंतु कालांतर में क्रमशः राजस और तामस गुणों का प्राबल्य बढ़ने लगा, मनुष्य समाज अपनी आदिम सत्व प्रकृति से च्युत हो गया और #मात्स्य_न्याय (शक्तिशाली छोटे या दुर्बल को उसी प्रकार नष्ट कर देता है जिस प्रकार बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है।) छा गया। बलवान कमजोरों को खाने लगे। ऐसी स्थिति में राज्य और राजा की उत्पत्ति हुई और सबको सही रास्तों पर रखने के लिये दंड का विधान हुआ। दंड राज्य शक्ति का प्रतीक हुआ जो सारी प्रजाओं का शासक, रक्षक तथा सभी के सोते हुए जागनेवाला था।
आधुनिक विधिशास्त्री ' दण्ड ' ' Law ' के चार सिद्धान्त मानते हैं --
•प्रतीकारात्मक (Deterrent)
•निषेघात्मक (Retributive)
•अवरोधक (Preventive) और
•सुधारात्मक (Reformative)
#प्रतीकारात्मक_दंड #(Deterrent) :
सभी देशों में समाज की अत्यंत प्रारंभिक अवस्था प्रतीकारात्मक - निवारक दंड की थी, जिसमें आँख के बदले आँख और दाँत के बदले दाँत (फोड़ देने और उखाड़ देने) का सिद्धांत चलता था। वैदिक साहित्य की "जीवगृभ" जैसी संज्ञाएँ इस बात की द्योतक हें कि भारतीय इतिहास के अत्यंत प्रारंभिक काल का न्याय कठोर और प्रतीकारात्मक ही था। इस सिद्धान्त की मान्यता है कि एक अपराधी को कठोर दण्ड देने से दूसरे लोग अपराध करने से डरते हैं।
#निषेघात्मक_दंड #Retributive
निषेधात्मक सिद्धान्त की मान्यता है कि अपराधी को दण्ड देने से जिसके प्रति अपराध हुआ है उसे उसका 'बदला' मिल जाता है। यह सभी सिद्धान्तों में सबसे बुरा सिद्धान्त है क्योंकि इसमें समाज का कल्याण या समाज की सुरक्षा की भावना नहीं है।
#अवरोधक_दंड - #निरोधक #Preventive
मध्यकालीन और कुछ हद तक आधुनिक काल के प्रारंभ तक के दंडों का विवेचन करें तो यह कहना होगा कि वे अत्यन्त ही क्रूर और आधुनिक दृष्टि से बर्बर थे। उनका उद्देशय था औरों में अपराध करने के प्रति भय उत्पन्न करना। इनमें अंग-भंग, जीवित जला दिया जाना, मृत्युदंड, आजीवन कारावास और असह्य यातनाओं से भरे हुए दंड होते हैं।
निरोधक दंडों में अपराध के कारण अथवा उसके भविष्य के कर्ता को ही उससे रोक देने का उपाय किया जाता है, जो उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता छीनकर संपन्न होता है। भारतवर्ष का निरोधक जेल विधान (Preventive Detention Act) इसी श्रेणी में है।
#सुधारात्मक #Reformative
चौथा और सर्वोत्तम दंड का प्रकार है सुधारात्मक। सभ्यता के विकास के क्रम में भी यद्यपि आज भी सभी देशों में संभावित दोषियों के प्रति दोषों के गंभीर परिणाम और दंडयातनाओं का भय उपस्थित करने के लिय कठोर अवरोधक दंड दिए जाते हैं, पर कभी-कभी सुधारात्मक प्रवृत्तियाँ भी उठती रही हैं।
हमारे देश मे #भारतीय_दण्ड_संहिता #Indian_Penal_Code #IPC ब्रिटिश काल में सन् १८६२ में लागू हुई। इसके बाद इसमे समय-समय पर संशोधन होते रहे। विशेषकर भारत के स्वतन्त्र होने के बाद। पाकिस्तान और बांग्लादेश ने भी भारतीय दण्ड संहिता को ही लागू किया। लगभग इसी रूप में यह विधान तत्कालीन अन्य ब्रिटिश उपनिवेशों बर्मा, श्रीलंका, मलेशिया, सिंगापुर, ब्रुनेई आदि में भी लागू की गयी थी।
भगवान श्रीकृष्ण ने दोषियों को दण्ड और सरल साधु प्रवृत्ति वालों को मदद - प्रोत्साहित किया है :
#परित्राणाय_साधूनां_विनाशाय_च_दुष्कृताम्।
दण्ड के विषय मे आज भी विश्व मे मानवाधिकार के नाम से कई अलग अलग विचारधारा चल रही है।
🙏 जय श्री कृष्ण 🙏
॥हरि: 🕉 तत्सत्॥
🔆 इदं न मम 🔆
🙏🙏🙏🙏🙏
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🕉 #कृष्णं_वंदे_जगद्गुरूम् 🕉
श्रीमद्भगवगिता में अपनी दैवीसंपदा एवं विभूति दर्शन में प्रभु ने कहा है :
#दण्डो_दमयतामस्मि_नीतिरस्मि_जिगीषताम्।
#मौनं_चैवास्मि_गुह्यानां_ज्ञानं_ज्ञानवतामहम्॥ (भ ग १०/३८)
अर्थात् : मैं दमन करनेवालोंका दण्ड (दमन करनेकी शक्ति) हूँ, जीतनेकी इच्छावालोंकी नीति हूँ, गुप्त रखनेयोग्य बातोंमें मौन हूँ और तत्त्वज्ञानीयों का ज्ञान हूँ।
भगवद्गीता में भगवान कहते है #दण्डो_दमयतामस्मि दमन करनेवालोंका मैं दण्ड हुँ।
राजा, राज्य और छत्र की शक्ति और संप्रभुता का द्योतक और किसी अपराधी को उसके अपराध के निमित्त दी गयी सजा को दण्ड कहते हैं। एक दूसरे सन्दर्भ में, राजनीतिशास्त्र के चार उपायों - #साम, #दाम, #दंड और #भेद में एक उपाय दण्ड का शाब्दिक अर्थ #सजा #Law #डण्डा (छड़ी) है जिससे किसी को सजा के रूप में दंडित किया जाता है-पीटा जाता है।
दण्ड की उत्पत्ति राज्यसंस्था की उत्पत्ति के साथ हुई। मनुस्मृति और महाभारत में यह कहा गया है कि मानव जाति की प्रारंभिक स्थिति अत्यंत पवित्र स्वभाव, दोषरहित कर्म, सत्वप्रकृति और ऋतु की थी। उस समय :
#न_राज्यं_न_च_राजासीत_न_दण्डो_न_च_दाण्डिकः।
#स्वयमेव_प्रजाः_सर्वा_रक्षन्ति_स्म_परस्परम॥
अर्थात् : जब न तो किसी राजा की स्थिति थी, न राज्य था, न दंड था, न दंडी था और सभी लोग धर्म के द्वारा ही एक दूसरे की रक्षा करते थे।
किंतु कालांतर में क्रमशः राजस और तामस गुणों का प्राबल्य बढ़ने लगा, मनुष्य समाज अपनी आदिम सत्व प्रकृति से च्युत हो गया और #मात्स्य_न्याय (शक्तिशाली छोटे या दुर्बल को उसी प्रकार नष्ट कर देता है जिस प्रकार बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है।) छा गया। बलवान कमजोरों को खाने लगे। ऐसी स्थिति में राज्य और राजा की उत्पत्ति हुई और सबको सही रास्तों पर रखने के लिये दंड का विधान हुआ। दंड राज्य शक्ति का प्रतीक हुआ जो सारी प्रजाओं का शासक, रक्षक तथा सभी के सोते हुए जागनेवाला था।
आधुनिक विधिशास्त्री ' दण्ड ' ' Law ' के चार सिद्धान्त मानते हैं --
•प्रतीकारात्मक (Deterrent)
•निषेघात्मक (Retributive)
•अवरोधक (Preventive) और
•सुधारात्मक (Reformative)
#प्रतीकारात्मक_दंड #(Deterrent) :
सभी देशों में समाज की अत्यंत प्रारंभिक अवस्था प्रतीकारात्मक - निवारक दंड की थी, जिसमें आँख के बदले आँख और दाँत के बदले दाँत (फोड़ देने और उखाड़ देने) का सिद्धांत चलता था। वैदिक साहित्य की "जीवगृभ" जैसी संज्ञाएँ इस बात की द्योतक हें कि भारतीय इतिहास के अत्यंत प्रारंभिक काल का न्याय कठोर और प्रतीकारात्मक ही था। इस सिद्धान्त की मान्यता है कि एक अपराधी को कठोर दण्ड देने से दूसरे लोग अपराध करने से डरते हैं।
#निषेघात्मक_दंड #Retributive
निषेधात्मक सिद्धान्त की मान्यता है कि अपराधी को दण्ड देने से जिसके प्रति अपराध हुआ है उसे उसका 'बदला' मिल जाता है। यह सभी सिद्धान्तों में सबसे बुरा सिद्धान्त है क्योंकि इसमें समाज का कल्याण या समाज की सुरक्षा की भावना नहीं है।
#अवरोधक_दंड - #निरोधक #Preventive
मध्यकालीन और कुछ हद तक आधुनिक काल के प्रारंभ तक के दंडों का विवेचन करें तो यह कहना होगा कि वे अत्यन्त ही क्रूर और आधुनिक दृष्टि से बर्बर थे। उनका उद्देशय था औरों में अपराध करने के प्रति भय उत्पन्न करना। इनमें अंग-भंग, जीवित जला दिया जाना, मृत्युदंड, आजीवन कारावास और असह्य यातनाओं से भरे हुए दंड होते हैं।
निरोधक दंडों में अपराध के कारण अथवा उसके भविष्य के कर्ता को ही उससे रोक देने का उपाय किया जाता है, जो उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता छीनकर संपन्न होता है। भारतवर्ष का निरोधक जेल विधान (Preventive Detention Act) इसी श्रेणी में है।
#सुधारात्मक #Reformative
चौथा और सर्वोत्तम दंड का प्रकार है सुधारात्मक। सभ्यता के विकास के क्रम में भी यद्यपि आज भी सभी देशों में संभावित दोषियों के प्रति दोषों के गंभीर परिणाम और दंडयातनाओं का भय उपस्थित करने के लिय कठोर अवरोधक दंड दिए जाते हैं, पर कभी-कभी सुधारात्मक प्रवृत्तियाँ भी उठती रही हैं।
हमारे देश मे #भारतीय_दण्ड_संहिता #Indian_Penal_Code #IPC ब्रिटिश काल में सन् १८६२ में लागू हुई। इसके बाद इसमे समय-समय पर संशोधन होते रहे। विशेषकर भारत के स्वतन्त्र होने के बाद। पाकिस्तान और बांग्लादेश ने भी भारतीय दण्ड संहिता को ही लागू किया। लगभग इसी रूप में यह विधान तत्कालीन अन्य ब्रिटिश उपनिवेशों बर्मा, श्रीलंका, मलेशिया, सिंगापुर, ब्रुनेई आदि में भी लागू की गयी थी।
भगवान श्रीकृष्ण ने दोषियों को दण्ड और सरल साधु प्रवृत्ति वालों को मदद - प्रोत्साहित किया है :
#परित्राणाय_साधूनां_विनाशाय_च_दुष्कृताम्।
दण्ड के विषय मे आज भी विश्व मे मानवाधिकार के नाम से कई अलग अलग विचारधारा चल रही है।
🙏 जय श्री कृष्ण 🙏
॥हरि: 🕉 तत्सत्॥
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