सागर

🙏 सुप्रभात, आज कार्तिक कृष्ण द्वितीया रविवार दिनांक २५.११.२०१८ 🙏

🕉 #कृष्णं_वंदे_जगद्गुरूम् 🕉   


श्रीमद्भगवगिता में अपनी दैवीसंपदा एवं विभूति दर्शनमें प्रभु ने कहा है:
#पुरोधसां_च_मुख्यं_मां_विद्धि_पार्थ_बृहस्पतिम्।
#सेनानीनामहं_स्कन्दः_सरसामस्मि_सागरः॥ (भ ग१०/२४)
अर्थात् : हे पार्थ ! पुरोहितोंमें यानी राजपुरोहितोंमें तू मुझे प्रधान पुरोहित बृहस्पति समझ क्योंकि वे ही इन्द्रके मुख्य पुरोहित हैं। सेनापतियोंमें मैं देवोंका सेनापति कार्तिकेय हूँ तथा सरोवरोंमें अर्थात् जो देवनिर्मित सरोवर हैं उनमें समुद्र हूँ।

श्रीमद्भगवगिता में भगवान कहते है #सरसामस्मि_सागरः सरोवरोंमें अर्थात् जो देवनिर्मित सरोवर हैं उनमें #सागर_समुद्र मैं हूँ।

पृथ्वी  की सतह के 70 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र में फैला, सागर, खारे  पानी का एक सतत निकाय है। पृथ्वी पर जलवायु  को संयमित करने, भोजन  और ऑक्सीजन  प्रदान करने, जैव विविधता  को बनाये रखने और परिवहन  के क्षेत्र में सागर अत्यावश्यक भूमिका निभाते हैं। प्राचीन काल से लोग सागर की यात्रा करने और इसके रहस्यों को जानने की कोशिश में लगे रहे हैं। सागर का वैज्ञानिक अध्ययन जिसे समुद्र विज्ञान  कहते हैं आज भी जारी है। सागरकी गहराई और गहनता अगाध है। सागर का गुण हैं मर्यादा और संपुर्ण विश्व के खारेपन को अपने में समाविष्ट कर विश्व को मीठा जल प्रदान करना।                       

भारतिय संस्कृतिमें सागर को देव मान कर #सागरपूजन किया जाता है।
#सागरे_सर्व_तीर्थानि

श्रीमद्भगवगिता में स्थिर बुद्धि पुरुष को सागर की हीउपमा दी है।          #आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं_समुद्रमाप:_प्रविशन्ति_यद्वत्। 
#तद्भव्त्कामा_यं_प्रविशन्ति_सर्वे_स:शांतिमाप्नोति_न_कामकामी॥ (भ ग २/७०)
अर्थात् : जैसे सम्पूर्ण नदियोंका जल चारों ओरसे जलद्वारा परिपूर्ण समुद्रमें आकर मिलता है पर समुद्र अपनी मर्यादामें अचल प्रतिष्ठित रहता है। ऐसे ही सम्पूर्ण भोगपदार्थ जिस संयमी मनुष्यमें विकार उत्पन्न किये बिना ही उसको प्राप्त होते हैं वही मनुष्य परमशान्तिको प्राप्त होता है भोगोंकी कामनावाला नहीं।
         
#ॐ_पूर्णमद_पूर्णमिदं_पूर्णात्_पूर्ण_मुदच्यते, 
#पूर्णस्य_पूर्णमादाय_पूर्ण_मेवा_वशिष्यते। 
#ॐ_शांति_शांति_शांतिः॥
सागर प्रभु की तरह पूर्ण हैं। सागर में से कितना भी जल निकाले वह भरा ही रहता है। प्रभु प्रेम भी कभी कम नहीं होता। सागर अनेकों प्रकार के जीवो का निवास स्थान है। अनेक प्रकार के मोतियों का विपुल भंडार है।                   

कोई भी पदार्थ ठंडा होने पर सिकुड़ जाता है और गर्म होने पर फैलता है। जल भी ठंडा होने पर सिकुडता है, परंतु 4°सेल्सियस से निचे के तापमान पर फैलने लगता है और 0°सेल्सियस पर बर्फ बनकर तैरने लगता है। जिससे ऊपर बर्फ की चादर और निचे जल रहता है। जिससे ठंडे प्रदेशों में सभी प्रकार के जलचर जीवित रह सके। कितनी अद्भुत लीला हैं प्रभु की!                     

"सागर से उठा बादल बनके,
बादल से गिरा जल हो कर के। 
फिर नहर बना नदीयां गहरी, 
तेरे भिन्न प्रकार तूं एक ही है।"         

🙏 जय श्री कृष्ण 🙏

॥हरि: 🕉 तत्सत्॥

🔆  इदं न मम  🔆

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