अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां

🙏 सुप्रभात, आज कार्तिक कृष्ण सप्तमी गुरुवार दिनांक २९.११.२०१८ 🙏

🕉 #कृष्णं_वंदे_जगद्गुरूम् 🕉   

श्रीमद्भगवगिता में अपनी दैवीसंपदा एवं विभूति दर्शनमें प्रभु ने कहा है:
#अश्वत्थः_सर्ववृक्षाणां_देवर्षीणां_च_नारदः।
#गन्धर्वाणां_चित्ररथः_सिद्धानां_कपिलो_मुनिः॥ (भ ग १०/२६)
अर्थात् :  समस्त वृक्षोंमें पीपलका वृक्ष; और देवर्षियोंमें अर्थात् जो देव होकर मन्त्रों के द्रष्टा होनेके कारण ऋषि भावको प्राप्त हुए हैं उनमें मैं नारद हूँ। गन्धर्वोंमें मैं चित्ररथ नामक गन्धर्व हूँ; सिद्धोंमें अर्थात् जन्मसे ही अतिशय धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्यको प्राप्त हुए पुरुषोंमें मैं कपिलमुनि हूँ।

श्रीमद्भगवगिता में भगवान कहते है कि : #अश्वत्थः_सर्ववृक्षाणा मैं समस्त वृक्षोंमें पीपलका वृक्ष हुँ।

भारतीय संस्कृति  में पीपल देववृक्ष है, इसके सात्विक प्रभाव के स्पर्श से अन्त: चेतना पुलकित और प्रफुल्लित होती है। स्कन्द पुराण  में वर्णित है कि
#मूलतः_ब्रह्म_रूपाय_मध्यतो_विष्णु_रुपिणः।
#अग्रतः_शिव_रुपाय_अश्वत्त्थाय_नमोनमः॥
अर्थात् : अश्वत्थ (पीपल) के मूल में विष्णु, तने में केशव, शाखाओं में नारायण, पत्तों में श्रीहरि और फलों में सभी देवताओं के साथ अच्युत सदैव निवास करते हैं। पीपल भगवान विष्णु का जीवन्त और पूर्णत: मूर्तिमान स्वरूप है।

भगवान कृष्ण  कहते हैं- समस्त वृक्षों में मैं पीपल का वृक्ष हूँ। स्वयं भगवान ने उससे अपनी उपमा देकर पीपल के देवत्व और दिव्यत्व को व्यक्त किया है। शास्त्रों में वर्णित है कि पीपल की सविधि पूजा-अर्चना करने से सम्पूर्ण देवता स्वयं ही पूजित हो जाते हैं। पीपल का वृक्ष लगाने वाले की वंश परम्परा कभी विनष्ट नहीं होती। पीपल की सेवा करने वाले सद्गति प्राप्त करते हैं।

पीपल (अंग्रेज़ी:  Sacred Fig,  संस्कृत: अश्वत्थ)  भारत,  नेपाल,  श्री लंका,  चीन  और  इंडोनेशिया  में पाया जाने वाला बरगद, या गूलर  की जाति का एक विशालकाय वृक्ष है जिसे भारतीय संस्कृति  में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है तथा अनेक पर्वों पर इसकी पूजा की जाती है। आज विज्ञान इस निष्कर्षपर पहुँचा है कि दुनिया का एक मात्र पीपल ही ऐसा वृक्ष है, जो दिन-रात चौबीसों घण्टे ऑक्सीजन का उत्सर्जन करता है तथा कार्बनडाई ऑक्साइड को ग्रहण करता है । इससे बड़ा मानवपकारी कौन हो सकता है ?

 बरगद और गूलर वृक्ष की भाँति इसके पुष्प भी गुप्त रहते हैं अतः इसे #गुह्यपुष्पक भी कहा जाता है। अन्य क्षीरी (दूध वाले) वृक्षों की तरह पीपल भी दीर्घायु होता है। इसके फल बरगद-गूलर की भांति बीजों से भरे तथा आकार में मूँगफली  के छोटे दानों जैसे होते हैं। बीज राई  के दाने के आधे आकार में होते हैं। परन्तु इनसे उत्पन्न वृक्ष विशालतम रूप धारण करके सैकड़ों वर्षो तक खड़ा रहता है। पीपल की छाया बरगद  से कम होती है, फिर भी इसके पत्ते अधिक सुन्दर, कोमल और चंचल होते हैं।

वसंत ऋतु में इस पर धानी रंग  की नयी कोंपलें आने लगती है। बाद में, वह हरी और फिर गहरी हरी हो जाती हैं। पीपल के पत्ते जानवरों को चारे के रूप में खिलाये जाते हैं, विशेष रूप से हाथियों  के लिए इन्हें उत्तम चारा माना जाता है। पीपल की लकड़ी ईंधन  के काम आती है किंतु यह किसी इमारती काम या फर्नीचर के लिए अनुकूल नहीं होती। स्वास्थ्य के लिए पीपल को अति उपयोगी माना गया है। पीलिया,  रतौंधी,  मलेरिया,  खाँसी  और दमा  तथा सर्दी  और सिर दर्द  में पीपल की टहनी, लकड़ी, पत्तियों, कोपलों और सीकों का प्रयोग का उल्लेख मिलता है।

भगवान बुद्घ ने पीपल के पेड़ के नीचे तपस्या की थी और उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ था। बौद्घ-धर्म के प्राय: सभी मन्दिरों में पीपल का वृक्ष पाया जाता है।

॥हरि: 🕉 तत्सत्॥

🔆  इदं न मम  🔆

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