धेनूनामस्मि कामधुक् कामधेनु गाय

🙏 सुप्रभात, आज कार्तिक कृष्ण अमावस्या शुक्रवार दिनांक ७.१२.२०१८ 🙏

🕉 #कृष्णं_वंदे_जगद्गुरूम् 🕉   



श्रीमद्भगवगिता में अपनी दैवीसंपदा एवं विभूति दर्शनमें प्रभु ने कहा है:
#आयुधानामहं_वज्रं_धेनूनामस्मि_कामधुक्।
#प्रजनश्चास्मि_कन्दर्पः_सर्पाणामस्मि_वासुकिः॥ (भ ग १०/२८)
अर्थात् :  शस्त्रोंमें मैं दधीचि ऋषिकी अस्थियोंसे बना हुआ वज्र हूँ। दूध देनेवाली गौओंमें कामधेनु - वसिष्ठको सब कामनारूप दूध देनेवाली अथवा सामान्य भावसे जो भी कामधेनु है वह मैं हूँ। प्रजाको उत्पन्न करनेवाला कामदेव मैं हुँ, और सर्पोंमें अर्थात् सर्पोके विविध प्रकारों में सर्पराज वासुकि मैं हूँ।

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कहते है की : धेनूनामस्मि_कामधुक् वसिष्ठको सब कामनारूप दूध देनेवाली अथवा सामान्य भावसे जो भी कामधेनु है वह मैं हूँ।

गाय को हमारी सनातन वैदिक संस्कृति में सबसे पुजनीय माना जाता है। गाय हमें सब कुछ देती है, दूध, स्वास्थ, धन और धान्य सभी कुछ हमें गाय प्रदान करती है। इसी कारण गाय को हिन्दू परंपरा में माता माना जाता है। कामधेनु गाय के बारे में चिंतन करते है।

#सर्वकामदुधे_देवि_सर्वतीर्थीभिषेचिनि।
#पावने_सुरभि_श्रेष्ठे_देवि_तुभ्यं_नमोस्तुते॥
अर्थात्।: हे सभी इच्छाओं और सभी वरदानो को पूर्ण करने वाली। सभी तीर्थ और पवित्र स्थानों की अवतार। हे शुद्ध अनपेक्षित और दिव्य माता का अवतार।
मैं आपको प्रार्थना करता हूं।
#यया_सर्वमिदं_व्याप्तं_जगत्_स्थावरजङ्गमम्।
#तां_धेनुं_शिरसा_वन्दे_भूतभव्यस्य_मातरम्॥
 अर्थात् : जिसने समस्त चराचर जगत् को व्याप्त कर रखा है, उस भूत और भविष्य की जननी गौ माता को मैं मस्तक झुका कर प्रणाम करता हूं॥

#दिव्य_कामधेनु_गाय :
कामधेनु हिन्दू धर्म में एक देवी  है जिनका स्वरूप गाय  का है। इन्हें 'सुरभि' भी कहते हैं। कामधेनु जिसके पास होती हैं वह जो कुछ कामना करता है (माँगता है) उसे वह मिल जाता है। (काम = इच्छा + धेनु = गाय = कामधेनु)। इनके जन्म के बारे में अलग-अलग कथाएँ हैं। कामधेनु गाय की उत्पत्ति भी समुद्र मंथन से हुई थी। यह एक चमत्कारी गाय होती थी जिसके दर्शन मात्र से ही सभी तरह के दु:ख-दर्द दूर हो जाते थे। दैवीय शक्तियों से संपन्न यह गाय जिसके भी पास होती थी उससे चमत्कारिक लाभ मिलता था। इस गाय का दूध अमृत के समान माना जाता था।

हमारे पुराणों के अनुसार ऐसी मान्यता है कि कामधेनु माता के अंगों में हमारे सभी ३३ करोड़ देवताओं सहित पूजनीय देवता तथा सभी १४ पौराणिक संसार मौजूद हैं।
• गाय के दोनो सींगों में ब्रह्मा और विष्णु ।
• विश्व की सारी जलों के स्त्रोत का स्थान सींग के जुड़ाव पर स्थित है।
• सिर पर भोले शंकर का स्थान है।
• सिर के किनारे पर माता पार्वती जी है।
• नासिका पर कार्तिकेय, दोनों नासिकाओं के छिद्र पर कम्बाला और अश्वतारा हैं।
• दोनों कानों पर अश्विनी कुमार
• सूर्य और चंद्रमा का स्थान दोनों आँखों में है
• वायु देव का स्थान दाँतों की पंक्तियों में तथा और वरुण देव जीभ पर निवास करते  हैं।
• गाय की आवाज में साक्षात् सरस्वती का वास है ।
• संध्या देवी होंठों पर और भगवान इंद्र गर्दन पर विराजमान हैं।
• रक्षा गणों का स्थान गर्दन के नीचे की पसलियों पर है।
• दिल में साध्य देवों का स्थान है।
• जांघ पर धर्म देव का ।
• गंधर्व खुर के बीच के स्थान में,पन्नगा खुर के कोने पर, अप्सराएं पक्षों पर
• ग्यारह रुद्र और यम पीठ पर, अष्टवसु पीठ की धारियों में
• पितृ देवता नाल के संयुक्त क्षेत्र में तथा १२ आदित्य पेट पर
• पूंछ पर सोमा देवी, बालों पर सूरज की किरणें, मूत्र में गंगा, गोबर में लक्ष्मी और यमुना, दूध में सरस्वती, दही में नर्मदा, और घी में अग्नि का वास है।
• गाय के बालों में ३३ कोटि देवताओं का निवास है।
• पेट में पृथ्वी।
•थन में सारे महासागर है।
• तीनों गुण भौंह के जड़ों में।
•बाल के छिद्रों में ऋषियों का निवास।
•साँसों में सभी पवित्र झीलों का वास है।
• होठों पर चंडिका।
•प्रजापति ब्रह्मा त्वचा पर हैं।
• वेदों के छह भागों का स्थान मुखड़े पर,
•चारों पैरों में चार वेद हैं।
•कुबेर और गरुड़ दाहिने ओर।
•यक्ष बाईं ओर और
•गंधर्व अंदर की ओर स्थित हैं।
• पैर के सामने में खेचरास।
•आंतों में नारायण।
•हड्डियों में पर्वत
 •धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पैरों में अवस्थित हैं।
• गाय के हूँकार में चारों वेदों कि ध्वनि है।

कामधेनु सबका पालन करने वाली है। यह माता स्वरूपिणी है, सब इच्छाएँ पूर्ण करने वाली है। कृष्ण कथा में अंकित सभी पात्र किसी न किसी कारणवश शापग्रस्त होकर जन्मे थे। कश्यप ऋषि ने वरुण से कामधेनु माँगी थी, लेकिन बाद में लौटायी नहीं। अत: वरुण के शाप से वे ग्वाले हुए। जैसे देवताओं में भगवान विष्णु, सरोवरों में समुद्र, नदियों में गंगा, पर्वतों में हिमालय, भक्तों में नारद, सभी पुरियों में कैलाश, सम्पूर्ण क्षेत्रों में केदार क्षेत्र श्रेष्ठ है, वैसे ही गऊओं में कामधेनु सर्वश्रेष्ठ है।

गाय हिन्दु्ओं के लिए सबसे पवित्र पशु है। इस धरती पर पहले गायों की कुछ ही प्रजातियां होती थीं। उससे भी प्रारंभिक काल में एक ही प्रजाति थी। आज से लगभग ९,५०० वर्ष पूर्व गुरु वशिष्ठ ने गाय के कुल का विस्तार किया और उन्होंने गाय की नई प्रजातियों को भी बनाया, तब गाय की ८ या १० नस्लें ही थीं जिनका नाम कामधेनु, सुरभि, कपिला, देवनी, नंदनी, भौमा आदि था। कामधेनु के लिए गुरु वशिष्ठ से विश्वामित्र सहित कई अन्य राजाओं ने कई बार युद्ध किया, लेकिन उन्होंने कामधेनु गाय को किसी को भी नहीं दिया। गाय के इस झगड़े में गुरु वशिष्ठ के १०० पुत्र मारे गए थे।

#गाय_की_सूर्यकेतु_नाड़ी :
गाय की पीठ पर रीढ़ की हड्डी में स्थित सूर्यकेतु स्नायु हानिकारक विकिरण को रोककर वातावरण को स्वच्छ बनाते हैं। यह पर्यावरण के लिए लाभदायक है। दूसरी ओर, सूर्यकेतु नाड़ी सूर्य के संपर्क में आने पर यह स्वर्ण का उत्पादन करती है। गाय के शरीर से उत्पन्न यह सोना गाय के दूध, मूत्र व गोबर में मिलता है। यह स्वर्ण दूध या मूत्र पीने से शरीर में जाता है और गोबर के माध्यम से खेतों में। कई रोगियों को स्वर्ण भस्म दिया जाता है।

#पंचगव्य :
पंचगव्य कई रोगों में लाभदायक है। पंचगव्य का निर्माण गाय के दूध, दही, घी, मूत्र, गोबर द्वारा किया जाता है। पंचगव्य द्वारा शरीर की रोग निरोधक क्षमता को बढ़ाकर रोगों को दूर किया जाता है। ऐसा कोई रोग नहीं है जिसका इलाज पंचगव्य से न किया जा सके।

गाय और गाय आधारित #पंचगव्य का कृषि एवं आयुर्वेद को लेकर कई तरह के वैज्ञानिक प्रयोग हो रहे हैं। गाय  के दूध,  दही,  घी,  गोमूत्र  और गोबर  का को सामूहिक रूप से पंचगव्य कहा जाता है। आयुर्वेद  में इसे औषधि की मान्यता है। हिन्दुओं  के कोई भी मांगलिक कार्य इनके बिना पूरे नहीं होते। आप लोग तो जानते हैं कि विदेशी वैज्ञानिकों को हमारे ग्रंथो में कितनी रूचि होती है।

शास्त्रों में गाय को ग्रास देने के लिए विशेष मंत्र बताया गया है, जो गोग्रास नैवेद्य मंत्र के रूप में भी जाना जाता है। सुख व ऐश्वर्य की कामना से आप भी हर रोज या श्राद्धपक्ष में गाय को भोजन का पहला ग्रास देते वक्त इस मंत्र को जरूर बोलें ;
#सुरभिस्त्वं_जगन्मातर्देवि_विष्णुपदे_स्थिता। 
#सर्वदेवमयी_ग्रासं_मया_दत्तमिमं_ग्रस॥

॥ जय गौमाता ॥

॥हरि: 🕉 तत्सत्॥

🔆  इदं न मम  🔆

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