ॐ
🙏 सुप्रभात, आज मार्गशीर्ष कृष्णपक्ष चतुर्थी बुधवार दिनांक २६.१२.२०१८ 🙏
🕉 #कृष्णं_वंदे_जगद्गुरूम् 🕉
श्रीमद्भगवगिता में अपनी दैवीसंपदा एवं विभूति दर्शनमें प्रभु ने कहा है:
#अक्षराणामकारोऽस्मि_द्वन्द्वः_सामासिकस्य_च।
#अहमेवाक्षयः_कालो_धाताऽहं_विश्वतोमुखः॥ (भ ग १०/३३)
अर्थात् : मैं अक्षरों (वर्णमाला) में अकार और समासों में द्वन्द्व (नामक समास) हूँ मैं अक्षय काल अर्थात् कालका भी महाकाल तथा सब ओर मुखवाला विश्वतोमुख (विराट् स्वरूप) धाता हूँ भी मैं हूँ।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कहते है की : #अक्षराणामकारोऽस्मि अर्थात अक्षर में 'अ' कार मैं ही हूँ।
#ॐकार
ॐ, ओ३म्, ओंकार को प्रणव या उदिग्थ कहा जाता है। यह ईश्वर का वाचक है। ॐकार परब्रह्म का प्रतीक है। ब्रह्मविद्या का समग्र अर्थ ॐकार में संकलित हुआ है। इसलिये तीन मात्राओं से समग्र सृष्टि को जो अपने में समा।लेता है और शेष बची हुई आधी मात्रा से सृष्टिकर्ता को जो अपने मे समाविष्ट कर लेता है। ॐ शब्द तीन ध्वनियों से बना हुआ है- अ, उ, म इन तीनों ध्वनियों का अर्थ उपनिषद में भी आता है - यह ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक भी है। और यह भू: लोक, भूव: लोक और स्वर्ग लोग का प्रतीक है।
#ओंकार_सर्वमंत्राणामुत्तम_परिकीर्तितः।
#ओंकारेण_प्लेवैनैव_संसाराब्धिंतरिष्यसि॥
अर्थात् सभी मंत्रो में ॐकार ही उत्तम मंत्र है। ॐकाररूपी नौका से ही संसार-सागर पार होंगा।
ब्रह्मवादि लोगों की यज्ञ, दान, तप इत्यादि क्रियाएं ॐकार का उच्चार करने से ही आरंभ होती है, ऐसा भगवान श्रीमद्भगवद्गीता में अर्जुन से कहते है ;
#तस्मादोमित्युदाहृत्य_यज्ञदानतपःक्रिया।
#प्रवर्तन्ते_विधानोक्ताः_सततं_ब्रह्मवादिनाम्॥ (भ ग १७/२४)
अन्वय (तस्मात् ओम् इति उदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रिया।
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम्॥)
भावार्थ : वेदमन्त्रों का उच्चारण करनेवाले श्रेष्ट पुरुषों के द्वारा शास्त्रविधान में निर्दिष्ट यज्ञ, दान, तप आदि कार्यों का प्रारम्भ ’ॐ’ इस पद का उच्चारण करते हुए किया जाता है।
#ओंकारं_बिन्दुसंयुक्तं_नित्यं_ध्यायन्ति_योगिनः।
#कामदं_मोक्षदं_चैव_ओंकाराय_नमो_नमः॥
अर्थात् : समग्र विश्व ॐ में समा जाता है। इच्छासिद्धि और मोक्षप्राप्ति सभी जिसमे समाविष्ट है ऐसे ॐकार का योगी सतत ध्यान करते है।
#हम_सामान्यों_को_ॐकार_का_जप_के_बारे_में_सावधानियां :
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ॐकार की उपासना करने के लिये योग्य अधिकारी होना चाहिए। जब तक दृश्य या श्रव्य स्थूल जगत के विषयों के लिए पूर्णतः विरक्ति निर्माण नही होती तब तक ॐकार की उपासना करने अनिधिकृत चेष्टा मानी जायेगी। '#द्रष्टानुश्रविकविषयवितृष्णास्य_वशिकारसंज्ञा_वैराग्यम्।' (योगसूत्र) जिसने जीवन के द्वन्दों में संतुलित रहने की शिक्षा ली है, जिसकी वृति अनासक्त और वैराग्यमय बनी है, वही ॐकार की उपासना का अधिकारी माना जाता है। निस्तेज, लाचार या आसक्तिग्रस्त मनुष्य को ॐकार की उपासना का आदेश या उपदेश ' टायफायड ' के मरीज को दूध पिलाने जैसा घोर कर्म है।
" ॐकार के उच्चारण के कई शारीरिक लाभ ध्यान में लेकर भी वह उपास्य के रूप में सार्वजनिक नही हो सकता। "
इसलिये ऐसे अनधिकारी सामान्य लोगों को ॐकार का जप करने की अपेक्षा सगुणोपासना भगवान की उपासना, भक्ति करनी चाहिए। इसलिये सामान्य लोगों में केवल ॐकार का जप नही किंतु ' #हरि:_ॐ ' ' #ॐ_नमः_शिवाय ' ' #ॐ_नमो_भगवते_वासुदेवाय ' आदि का जप करने की पद्धति है। पुराने समय मे तो केवल सन्यासी जन ही ॐ का जप करते थे।
ॐकार के विषय में सामान्य ज्ञान:
•ॐकार के प्रणव और उदिग्थ ऐसे दो नाम है।
•ॐकार यानी वेदत्रयी का सार।
•ॐकार की विद्या अक्षरविद्या है। अक्षर यानी जिसका क्षर-क्षय नही होता ऐसा अविनाशी ओर अविनाशी याने परब्रह्म।
•#ओमित्येकाक्षरं_ब्रह्म इन शब्दों से भगवान ने इसकी महिमा का वर्णन किया है।
•वेदमंत्रों को ॐ कार पूर्वक उच्चार क्या जाता है।
• ॐकार यह अक्षर मात्र नहीं है। यह ऊर्जा का प्रतीक भी है। जिसके साथ ॐ जुड़ जाता है, उसकी शक्ति में वृद्धि हो जाती है। इसी कारण सभी मंत्रों के जाप से पूर्व ॐ का उच्चारण किया जाता है ताकि संबंधित मंत्र शीघ्र सिद्धि प्रदान करे।
•कर्म के आरम्भ में अंधकार में दीपक या वीरान में पथ दिखनेवाले मार्गदर्शक के समान है।
•प्रारंभ किये हुए कार्य को अंत तक पहुचाने में ॐकार सहायता करता है इतनाही नही कर्म में रहे हुए दोष को भी दूर करता है।
•कर्मो के बंधन से छूटने के लिए ऋषियों ने एक तरकीब ढूंढ निकाली, कर्म के आरंभ में ' हरि: ॐ तत्सत् ' बोलने से यज्ञ, दान आदि कर्म बाधक न बनकर मोक्षदायक बनते है।
ॐकार के विषय मे अन्य रोचक तथ्य
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• ॐकार का उच्चारण बहुत आसान है। लेकिन हम इसके अधिकारी है की नही यह उपरोक्त सावधानियों में लक्ष्य में लेकर ॐकार उच्चारण, उपासना या जाप करना चाहिए।
•ॐकार शरीर व ब्रह्मांड की चेतना का प्रतीक है। इसके उच्चारण से ब्रह्मांड की सकारात्मक ऊर्जा का तन-मन में संचार होता है।
•यह तीन अक्षरों 'अ', 'ऊ' और 'म' के योग से बनता है। ये तीनों ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक हैं। ऊँ का जाप करने से मनुष्य को भूतकाल के पापों से छुटकारा मिलता है, वर्तमान संवरता है और विवेकपूर्ण ढंग से निर्णय लेने के कारण भविष्य सुनहरा होता है।
•ऊँ का उच्चारण शरीर में कंपन पैदा करता है। इसकी ध्वनि नाभि से उत्पन्न होती है। नाभि शरीर का ऊर्जा बिंदु माना जाता है। यहां से इस पवित्र ध्वनि का उदय होना शरीर को कई रोगों से मुक्त रखता है।
•ऊँ के उच्चारण का सबसे अच्छा असर मस्तिष्क पर होता है। मस्तिष्क संबंधी कई परेशानियों, जैसे तनाव, थकान, क्रोध, निराशा आदि में ऊँ के जाप से लाभ होता है।
•ऊँ जीवन में सकारात्मकता का संचार करता है। यह मनोबल को उच्च रखता है और निराशा के स्थान पर आशा का उदय करता है।
॥हरि: 🕉 तत्सत्॥
🔆 इदं न मम 🔆
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