पितृश्राद्ध
🙏 सुप्रभात, आज मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्थी मंगलवार दिनांक ११.१२.२०१८ 🙏
श्रीमद्भगवगिता में अपनी दैवीसंपदा एवं विभूति दर्शनमें प्रभु ने कहा है:
#अनन्तश्चास्मि_नागानां_वरुणो_यादसामहम्।
#पितृ़णामर्यमा_चास्मि_यमः_संयमतामहम्॥ (भ ग १०/२९)
अर्थात् : नागोंके नाना भेदोंमें मैं अनन्त हूँ अर्थात् नागराज शेष हूँ और जलसम्बन्धी देवोंमें उनका राजा वरुण मैं हूँ। मैं पितरोंमें अर्यमा नामक पितृराज हूँ और शासन करनेवालोंमें यमराज हूँ।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कहते है की : #पितृ़णामर्यमा_चास्मि मैं पितरोंमें अर्यमा नामक पितृराज हूँ।
#ॐ_अर्यमा_न_त्रिप्य्ताम_इदं_तिलोदकं_तस्मै_स्वधा_नमः।
#ॐ_मृत्योर्मा_अमृतं_गमय॥
अर्थात : पितरों में अर्यमा श्रेष्ठ है। अर्यमा पितरों के देव हैं। अर्यमा को प्रणाम। हे! पिता, पितामह, और प्रपितामह। हे! माता, मातामह और प्रमातामह आपको भी बारम्बार प्रणाम। आप हमें मृत्यु से अमृत की ओर ले चलें।
ऋषि कश्यप की पत्नीं अदिति के 12 पुत्रों में से एक अर्यमन थे। ये बारह हैं:-
•अंशुमान
•इंद्र
•अर्यमन
•त्वष्टा
•धातु
•पर्जन्य
•पूषा
•भग
•मित्र
•वरुण
•विवस्वान
•त्रिविक्रम (वामन)
#अर्यमा का परिचय :
अदिति के तीसरे पुत्र और आदित्य नामक सौर-देवताओं में से एक अर्यमन या अर्यमा को पितरों का देवता भी कहा जाता है। आकाश में आकाशगंगा उन्हीं के मार्ग का सूचक है। सूर्य से संबंधित इन देवता का अधिकार प्रात: और रात्रि के चक्र पर है। चंद्रमंडल में स्थित पितृलोक में अर्यमा सभी पितरों के अधिपति नियुक्त हैं। वे जानते हैं कि कौन सा पितृत किस कुल और परिवार से है।
आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक #श्राद्धपक्ष में ऊपर की किरण (अर्यमा) और किरण के साथ पितृ प्राण पृथ्वी पर व्याप्त रहता है। पितरों में श्रेष्ठ है अर्यमा। अर्यमा पितरों के देव हैं। ये महर्षि कश्यप की पत्नी देवमाता अदिति के पुत्र हैं और इंद्रादि देवताओं के भाई। पुराण अनुसार उत्तरा-फाल्गुनी नक्षत्र इनका निवास लोक है।
इनकी गणना नित्य पितरों में की जाती है जड़-चेतन मयी सृष्टि में, शरीर का निर्माण नित्य पितृ ही करते हैं। इनके प्रसन्न होने पर पितरों की तृप्ति होती है। श्राद्ध के समय इनके नाम से जलदान दिया जाता है। यज्ञ में मित्र (सूर्य) तथा वरुण (जल) देवता के साथ स्वाहा का 'हव्य' और श्राद्ध में स्वधा का 'कव्य' दोनों स्वीकार करते हैं।
पितृ : शाब्दिक अर्थों में ‘पितृ’ से अर्थ ‘ पिता, पितर या पूर्वज’ आदि होता है, किंतु धार्मिक मान्यताओं में जब पितृपक्ष या पितरों की बात आती है तो इससे अर्थ उन मृत परिजनों से लगाया जाता है जिन्हें मृत्यु के पश्चात किसी विशेष मनोकामना की पूर्ति न होने के कारण मोक्ष नहीं मिला और प्रेत योनि में जाकर निवास करना पड़ रहा है। पितर अर्थात मृत परिजन आपसे सीधे संवाद नहीं कर सकते, इसलिए आपके जीवन में असामान्य रूप से होने वाली अच्छी या बुरी घटनाओं के द्वारा अपने भाव प्रकट करते हैं। पितरों की प्रसन्नता जहां हर प्रकार से सम्मान और सफलता दिलाता है, वहीं इनकी अप्रसन्नता जीवन में अनावश्यक ही विवाद पैदा करते हुए खुशी की हर संभावना छिनने के समान स्थितियां पैदा करती हैं।
#श्राद्ध_तर्पण :
पितृपक्ष में, तीन पीढ़ियों तक के पितापक्ष के तथा तीन पीढ़ियों तक के माता पक्ष के पूर्वजों के लिए तर्पण किया जाता है। इन्हीं को पितर कहते हैं। दिव्य पितृ तर्पण, देव तर्पण, ऋषि तर्पण और दिव्य मनुष्य तर्पण के पश्चात ही स्वयं पितृ तर्पण किया जाता है। पितर चाहे किसी भी योनि में हों वे अपने पुत्र, पुत्रियों एवं पौत्रों के द्वारा किया गया श्राद्ध का अंश स्वीकार करते हैं। इससे पितृगण पुष्ट होते हैं और उन्हें नीच योनियों से मुक्ति भी मिलती है। यह कर्म कुल के लिए कल्याणकारी है। जो लोग श्राद्ध नहीं करते, उनके पितृ उनके दरवाजे से वापस दुखी होकर चले जाते हैं। पूरे वर्ष वे लोग उनके श्राप से दुखी रहते हैं। पितरों को दुखी करके कौन सुखी रह सकता है?
#सर्व_पितृमोक्ष_अमावस्याका_महत्व :
भाद्रपद पूर्णिमा से अमावस्या के दौरान 15 दिनों तक पितृपक्ष मनाया जाता है और उनकी प्रसन्नता, मुक्ति के लिए दान, श्राद्ध कर्म किए जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दौरान किए ये काम पितरों को मुक्ति दिलाते हैं। जिससे प्रसन्न होकर वे आपको आशीर्वाद देते हैं। इसलिए पितरों को प्रसन्न करने के लिए श्राद्ध पक्ष के दौरान कई तरह के उपाय किए जाते हैं।
॥हरि: 🕉 तत्सत्॥
🔆 इदं न मम 🔆
🙏🙏🙏🙏🙏
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🕉 #कृष्णं_वंदे_जगद्गुरूम् 🕉
॥ पितृश्राद्ध ॥
#अनन्तश्चास्मि_नागानां_वरुणो_यादसामहम्।
#पितृ़णामर्यमा_चास्मि_यमः_संयमतामहम्॥ (भ ग १०/२९)
अर्थात् : नागोंके नाना भेदोंमें मैं अनन्त हूँ अर्थात् नागराज शेष हूँ और जलसम्बन्धी देवोंमें उनका राजा वरुण मैं हूँ। मैं पितरोंमें अर्यमा नामक पितृराज हूँ और शासन करनेवालोंमें यमराज हूँ।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कहते है की : #पितृ़णामर्यमा_चास्मि मैं पितरोंमें अर्यमा नामक पितृराज हूँ।
#ॐ_अर्यमा_न_त्रिप्य्ताम_इदं_तिलोदकं_तस्मै_स्वधा_नमः।
#ॐ_मृत्योर्मा_अमृतं_गमय॥
अर्थात : पितरों में अर्यमा श्रेष्ठ है। अर्यमा पितरों के देव हैं। अर्यमा को प्रणाम। हे! पिता, पितामह, और प्रपितामह। हे! माता, मातामह और प्रमातामह आपको भी बारम्बार प्रणाम। आप हमें मृत्यु से अमृत की ओर ले चलें।
ऋषि कश्यप की पत्नीं अदिति के 12 पुत्रों में से एक अर्यमन थे। ये बारह हैं:-
•अंशुमान
•इंद्र
•अर्यमन
•त्वष्टा
•धातु
•पर्जन्य
•पूषा
•भग
•मित्र
•वरुण
•विवस्वान
•त्रिविक्रम (वामन)
#अर्यमा का परिचय :
अदिति के तीसरे पुत्र और आदित्य नामक सौर-देवताओं में से एक अर्यमन या अर्यमा को पितरों का देवता भी कहा जाता है। आकाश में आकाशगंगा उन्हीं के मार्ग का सूचक है। सूर्य से संबंधित इन देवता का अधिकार प्रात: और रात्रि के चक्र पर है। चंद्रमंडल में स्थित पितृलोक में अर्यमा सभी पितरों के अधिपति नियुक्त हैं। वे जानते हैं कि कौन सा पितृत किस कुल और परिवार से है।
आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक #श्राद्धपक्ष में ऊपर की किरण (अर्यमा) और किरण के साथ पितृ प्राण पृथ्वी पर व्याप्त रहता है। पितरों में श्रेष्ठ है अर्यमा। अर्यमा पितरों के देव हैं। ये महर्षि कश्यप की पत्नी देवमाता अदिति के पुत्र हैं और इंद्रादि देवताओं के भाई। पुराण अनुसार उत्तरा-फाल्गुनी नक्षत्र इनका निवास लोक है।
इनकी गणना नित्य पितरों में की जाती है जड़-चेतन मयी सृष्टि में, शरीर का निर्माण नित्य पितृ ही करते हैं। इनके प्रसन्न होने पर पितरों की तृप्ति होती है। श्राद्ध के समय इनके नाम से जलदान दिया जाता है। यज्ञ में मित्र (सूर्य) तथा वरुण (जल) देवता के साथ स्वाहा का 'हव्य' और श्राद्ध में स्वधा का 'कव्य' दोनों स्वीकार करते हैं।
पितृ : शाब्दिक अर्थों में ‘पितृ’ से अर्थ ‘ पिता, पितर या पूर्वज’ आदि होता है, किंतु धार्मिक मान्यताओं में जब पितृपक्ष या पितरों की बात आती है तो इससे अर्थ उन मृत परिजनों से लगाया जाता है जिन्हें मृत्यु के पश्चात किसी विशेष मनोकामना की पूर्ति न होने के कारण मोक्ष नहीं मिला और प्रेत योनि में जाकर निवास करना पड़ रहा है। पितर अर्थात मृत परिजन आपसे सीधे संवाद नहीं कर सकते, इसलिए आपके जीवन में असामान्य रूप से होने वाली अच्छी या बुरी घटनाओं के द्वारा अपने भाव प्रकट करते हैं। पितरों की प्रसन्नता जहां हर प्रकार से सम्मान और सफलता दिलाता है, वहीं इनकी अप्रसन्नता जीवन में अनावश्यक ही विवाद पैदा करते हुए खुशी की हर संभावना छिनने के समान स्थितियां पैदा करती हैं।
#श्राद्ध_तर्पण :
पितृपक्ष में, तीन पीढ़ियों तक के पितापक्ष के तथा तीन पीढ़ियों तक के माता पक्ष के पूर्वजों के लिए तर्पण किया जाता है। इन्हीं को पितर कहते हैं। दिव्य पितृ तर्पण, देव तर्पण, ऋषि तर्पण और दिव्य मनुष्य तर्पण के पश्चात ही स्वयं पितृ तर्पण किया जाता है। पितर चाहे किसी भी योनि में हों वे अपने पुत्र, पुत्रियों एवं पौत्रों के द्वारा किया गया श्राद्ध का अंश स्वीकार करते हैं। इससे पितृगण पुष्ट होते हैं और उन्हें नीच योनियों से मुक्ति भी मिलती है। यह कर्म कुल के लिए कल्याणकारी है। जो लोग श्राद्ध नहीं करते, उनके पितृ उनके दरवाजे से वापस दुखी होकर चले जाते हैं। पूरे वर्ष वे लोग उनके श्राप से दुखी रहते हैं। पितरों को दुखी करके कौन सुखी रह सकता है?
#सर्व_पितृमोक्ष_अमावस्याका_महत्व :
भाद्रपद पूर्णिमा से अमावस्या के दौरान 15 दिनों तक पितृपक्ष मनाया जाता है और उनकी प्रसन्नता, मुक्ति के लिए दान, श्राद्ध कर्म किए जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दौरान किए ये काम पितरों को मुक्ति दिलाते हैं। जिससे प्रसन्न होकर वे आपको आशीर्वाद देते हैं। इसलिए पितरों को प्रसन्न करने के लिए श्राद्ध पक्ष के दौरान कई तरह के उपाय किए जाते हैं।
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