वायु - पवन
🙏 सुप्रभात, आज मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्दशी शुक्रवार दिनांक २१.१२.२०१८ 🙏
#पवनः_पवतामस्मि_रामः_शस्त्रभृतामहम्।
#झषाणां_मकरश्चास्मि_स्रोतसामस्मि_जाह्नवी॥ (भ ग १०/३१)
अर्थात् : पवित्र करनेवालोंमें वायु और शस्त्रधारियोंमें दशरथपुत्र राम मैं हूँ? मछली आदि जलचर प्राणियोंमें मकर नामक जलचरोंकी जातिविशेष मैं हूँ। स्रोतोंमें - नदियोंमें मैं जाह्नवी - गङ्गा हूँ।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कहते है की : #पवनः_पवतामस्मि पवित्र करनेवालोंमें वायु-पवन मैं हूँ।
वायु को भगवान ने पवित्र कहा है ! पवित्र किसे कहते है ? जो घीस जाता है, वहीं पवित्र है। चंदन घीसकर सुगंध देता है इसलिए यह पवित्र हैं। दिपक जल कर प्रकाश फैलाता है इसलिए पवित्र है। धूप जल कर सुगंध फैलाती हैं इसलिए पवित्र हैं। माता-पिता बच्चों के लिए घीस जातें हैं, इसलिए पवित्र हैं। ठीक इसी तरह वायु - पवन - हवा पवित्र है यह स्वयं भगवान ने कहा है ! हमारे जीवन में वायु का कितना महत्व है। यह समजने का नम्र प्रयास करेंगे।
वायु पंचमहाभूतों पृथिवी, जल, वायु, अग्नि व आकाश मे एक हैं। गतिशील वायु को पवन (Wind), हवा (Air) कहते हैं।
•वायु को #मातरिश्वा कहा है।
•हवा पृथ्वी का वायुमंडल है।
•इसके बिना मनुष्य जीवित नहीं रह सकता है।
•इसके बिना संभवतः पृथ्वी पर रहने वाले सभी सजीवों का जीवित रहना असंभव है।•इसका आकार (shape) और आयतन (volume) अनिश्चित होता है।
•यह बहुत सारे गैसों और धुल के कणों का मिश्रण है।
•यह एक द्रव्य (matter) है।
•इसका कोई वास्तविक रंग नहीं होता है।
•यह गंधहीन होता है।
•वायु सभी दिशाओं में दबाव डालती है।
•इसे संकुचित (compressed) किया जा सकता है।
#हवा_का_उपयोग
पृथ्वी पर हर जीवित चीज़ यानी सजीव, वायु का इस्तेमाल कई अलग-अलग चीजों के लिए करते हैं, जैसे –
•पेड़-पौधे अपना खाना बनाने के लिए इस्तेमाल करते हैं।
•चिड़िया उड़ने के लिए वायु का इस्तेमाल करती हैं।
•पानी के अंदर तैरने वाले (जैसे नदी, समुद्र) में सास लेने के लिए “ऑक्सीजन से भरे टैंक” का इस्तेमाल करते हैं।
•जो वायु को संपीडित (compressed) करके बनाये जाते हैं।
•वायु के ज़रिये “पवन चक्कियों (windmills)” को चलाकर विद्युत (electric) उत्पन्न किया जाता है।
•किसी भी ईंधन को जलाने में इसका का होना ज़रूरी होता है।
•नदी और समुद्र में “पालोंवाला जहाज़ (sailboats)” को चलाने के लिए।
•बिना इंजन का हवाई जहाज़ो (gliders) को चलाने के लिए।
•वाहन के टायरों में इस्तेमाल होता है।
•इसके अलावा वायु के सृष्टि संचालन में कई महत्व पूर्ण योगदान है।
•प्रकृति में वायु शुद्धिकरण का कार्य अत्यंत प्रभावि रूप से करतीं हैं।
•यह अशुद्ध जल का बाष्पिकरण कर शुद्ध जल में रूपांतरित करने का कार्य करती हैं।
•सभी प्रकार की दुर्गंध को अपने में विलीन कर वातावरण को स्वच्छ कर देती है। •अग्नि को ओक्सीजन देकर ज्वलन में सहायक होती है। ऐसे अनेक उपकार करती हैं।
•वेदों में उसे 'मातरिश्वा' का पद दिया है।
•अर्थात सभी कार्यों को शक्ति प्रदान करने वाला।
वायु मानव जाति के लिए पंचमहाभूतों में का एक बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण तत्व है।#पंचप्राण का अर्थ योग के अनुसार उस वायु से है जो हमारे शरीर को जीवित रखती है। शरीर के अंतर्गत इस वायु को ही कुछ लोग प्राण कहने से जीवात्मा मानते हैं, लेकिन जीवात्मा अलग है। इस वायु का मुख्य स्थान हृदय में है।
इस वायु के आवागमन को अच्छे से समझकर जो इसे साध लेता है वह लंबे काल तक जीवित रहने का रहस्य जान लेता है। क्योंकि वायु ही शरीर के भीतर के पदार्थ को अमृत या जहर में बदलने की क्षमता रखती है।
#प्राणायाम :
#अष्टांग_योग के आठ अंगों में से एक है। प्राणायाम = प्राण + आयाम। इसका का शाब्दिक अर्थ है - 'प्राण (श्वसन) को लम्बा करना' या 'प्राण (जीवनीशक्ति) को लम्बा करना'। (प्राणायाम का अर्थ 'स्वास को नियंत्रित करना' या कम करना नहीं है।) उपर 'प्राण' का अर्थ जाना और अब आयाम का अर्थ : आयाम के दो अर्थ है- प्रथम नियंत्रण या रोकना, द्वितीय विस्तार और दिशा। व्यक्ति जब जन्म लेता है तो गहरी श्वास लेता है और जब मरता है तो पूर्णत: श्वास छोड़ देता है। प्राण जिस आयाम से आते हैं उसी आयाम में चले जाते हैं। प्राणायाम करते या श्वास लेते समय हम तीन क्रियाएं करते हैं - 1.पूरक 2.कुम्भक 3.रेचक। अर्थात श्वास को लेना, रोकना और छोड़ना। अंतर रोकने को आंतरिक कुम्भक और बाहर रोकने को बाह्म कुम्बक कहते हैं। इस श्वसन तंत्र के नियंत्रण अभ्यास को ही प्राणायाम कहा जाता है।
#पंचप्राण का कार्य :
हम जब श्वास लेते हैं तो भीतर जा रही हवा या वायु पांच भागों में विभक्त हो जाती है या कहें कि वह शरीर के भीतर पांच जगह स्थिर और स्थित हो जाता हैं। लेकिन वह स्थिर और स्थित रहकर भी गतिशिल रहती है। (१) व्यानवायु, (२) समानवायु, (३) अपानवायु, (४) उदानवायु, (५) प्राणवायु
#व्यानवायु :
यह वायु समस्त शरीर में धूमती है। इसी वायु के प्रभाव से रस, रक्त तथा अन्य जीवनोपयोगी तत्व सारे शरीर में बहते रहते हैं। शरीर के समस्त कार्यकलाप और कार्य करनें की चेष्टायें बिना व्यान वायु के सम्पन्न नहीं हो सकती हैं। जब यह कुपित होती है तो समस्त शरीर के रोग पैदा करती है।
#समानवायु :
समानवायु नाभिस्थान पर स्थित रहती है। यह वायु पाचनतंत्र में रहनें वाली अग्नि, जिसे जठराग्नि कहते हैं, से मिलकर अन्न का पाचन करती है और मलमूत्र को पृथक पृथक करती है। जब यह वायु कुपित होती है तब मन्दाग्नि, अतिसार और वायु गोला प्रभृति रोग होते हैं।
#अपानवायु ;
यह वायु पाचनतंत्र में रहती है तथा इसका कार्य मल, मूत्र, शुक्र, गर्भ और आर्तव को बाहर निकालना है। जब यह कुपित होती है तब मूत्राशय और गुदा से संबंधित रोग होते हैं। अपानवायु गुदा में स्थित है।
#उदानवायु :
उदान वायु गले में रहती है। इसी वायु की शक्ति से मनुष्य स्वर निकालता हैं, बोलता है, गीत गाता है और निम्न, मध्यम और उच्च स्वर में बात करता है।
#प्राणवायु : प्राणवायु हर्दय में स्थित है। श्वासोच्छवास के माध्यम से हवा अंदर बहार की प्रक्रिया, खाये हुए अन्नजल को पचाना, अन्न को मल, पानी को पसीना अथवा मूत्र बनाना, रस से वीर्य बनाना प्राणवायु का कार्य है।
इसके अलावा #पांच_उपवायु नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त ओर धनन्जय वायुके माध्यम से
डकार निकालना #नागवायु का कर्म है।
नेत्रों के पलक लगाना खोलना #कूर्म_वायु का कर्म है।
छींक करना #कृकलवायु का कर्म है।
जम्हाई लेना #देवदत्तवायु का कर्म है।
और #धनंजयवायु सर्व शरीर में व्याप्त रहता है। मृत्यु शरीर में भी चार घंटे तक रहता है ।
इस प्रकार यह दस वायु आप ही जीव के अभ्यास से कल्पित होकर सुख दुःख का सम्बन्ध जीव को कराती हैं ।
वायु के इस पांच तरह से रूप बदलने के कारण ही व्यक्ति की चेतना में जागरण रहता है, स्मृतियां सुरक्षित रहती है,। बोलना चलना, पाचन क्रिया सही चलती रहती है और हृदय में रक्त प्रवाह चलते रहता है। इनके कारण ही मन के विचार बदलते रहते या स्थिर रहते हैं।
उक्त में से एक भी जगह दिक्कत है तो सभी जगहें उससे प्रभावित होती है और इसी से शरीर, मन तथा चेतना भी रोग और शोक से घिर जाते हैं। मन-मस्तिष्क, चरबी-मांस, आंत, गुर्दे, मस्तिष्क, श्वास नलिका, स्नायुतंत्र और खून आदि सभी प्राणायाम से शुद्ध और पुष्ट रहते हैं। इसके काबू में रहने से मन और शरीर काबू में रहता है।
वायु मानव जाति के लिए बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण तत्त्व है। अतः हमें इसे प्रदुषित नहीं करना चाहिए। जितना हो सके उतना पेड़ और पौधे ज़रूर लगायें और पर्यावरण का जतन कर हमारे स्तर से सृष्टि संचालन में संतुलित बनाये रखने में योगदान करेंएवं अन्यों को इसके लिये प्रेरित करे।
॥हरि: 🕉 तत्सत्॥
🔆 इदं न मम 🔆
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🕉 #कृष्णं_वंदे_जगद्गुरूम् 🕉
गङ्गा मैया
पवन ऊर्जा
श्रीमद्भगवगिता में अपनी दैवीसंपदा एवं विभूति दर्शनमें प्रभु ने कहा है:
#पवनः_पवतामस्मि_रामः_शस्त्रभृतामहम्।
#झषाणां_मकरश्चास्मि_स्रोतसामस्मि_जाह्नवी॥ (भ ग १०/३१)
अर्थात् : पवित्र करनेवालोंमें वायु और शस्त्रधारियोंमें दशरथपुत्र राम मैं हूँ? मछली आदि जलचर प्राणियोंमें मकर नामक जलचरोंकी जातिविशेष मैं हूँ। स्रोतोंमें - नदियोंमें मैं जाह्नवी - गङ्गा हूँ।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कहते है की : #पवनः_पवतामस्मि पवित्र करनेवालोंमें वायु-पवन मैं हूँ।
वायु को भगवान ने पवित्र कहा है ! पवित्र किसे कहते है ? जो घीस जाता है, वहीं पवित्र है। चंदन घीसकर सुगंध देता है इसलिए यह पवित्र हैं। दिपक जल कर प्रकाश फैलाता है इसलिए पवित्र है। धूप जल कर सुगंध फैलाती हैं इसलिए पवित्र हैं। माता-पिता बच्चों के लिए घीस जातें हैं, इसलिए पवित्र हैं। ठीक इसी तरह वायु - पवन - हवा पवित्र है यह स्वयं भगवान ने कहा है ! हमारे जीवन में वायु का कितना महत्व है। यह समजने का नम्र प्रयास करेंगे।
वायु पंचमहाभूतों पृथिवी, जल, वायु, अग्नि व आकाश मे एक हैं। गतिशील वायु को पवन (Wind), हवा (Air) कहते हैं।
•वायु को #मातरिश्वा कहा है।
•हवा पृथ्वी का वायुमंडल है।
•इसके बिना मनुष्य जीवित नहीं रह सकता है।
•इसके बिना संभवतः पृथ्वी पर रहने वाले सभी सजीवों का जीवित रहना असंभव है।•इसका आकार (shape) और आयतन (volume) अनिश्चित होता है।
•यह बहुत सारे गैसों और धुल के कणों का मिश्रण है।
•यह एक द्रव्य (matter) है।
•इसका कोई वास्तविक रंग नहीं होता है।
•यह गंधहीन होता है।
•वायु सभी दिशाओं में दबाव डालती है।
•इसे संकुचित (compressed) किया जा सकता है।
#हवा_का_उपयोग
पृथ्वी पर हर जीवित चीज़ यानी सजीव, वायु का इस्तेमाल कई अलग-अलग चीजों के लिए करते हैं, जैसे –
•पेड़-पौधे अपना खाना बनाने के लिए इस्तेमाल करते हैं।
•चिड़िया उड़ने के लिए वायु का इस्तेमाल करती हैं।
•पानी के अंदर तैरने वाले (जैसे नदी, समुद्र) में सास लेने के लिए “ऑक्सीजन से भरे टैंक” का इस्तेमाल करते हैं।
•जो वायु को संपीडित (compressed) करके बनाये जाते हैं।
•वायु के ज़रिये “पवन चक्कियों (windmills)” को चलाकर विद्युत (electric) उत्पन्न किया जाता है।
•किसी भी ईंधन को जलाने में इसका का होना ज़रूरी होता है।
•नदी और समुद्र में “पालोंवाला जहाज़ (sailboats)” को चलाने के लिए।
•बिना इंजन का हवाई जहाज़ो (gliders) को चलाने के लिए।
•वाहन के टायरों में इस्तेमाल होता है।
•इसके अलावा वायु के सृष्टि संचालन में कई महत्व पूर्ण योगदान है।
•प्रकृति में वायु शुद्धिकरण का कार्य अत्यंत प्रभावि रूप से करतीं हैं।
•यह अशुद्ध जल का बाष्पिकरण कर शुद्ध जल में रूपांतरित करने का कार्य करती हैं।
•सभी प्रकार की दुर्गंध को अपने में विलीन कर वातावरण को स्वच्छ कर देती है। •अग्नि को ओक्सीजन देकर ज्वलन में सहायक होती है। ऐसे अनेक उपकार करती हैं।
•वेदों में उसे 'मातरिश्वा' का पद दिया है।
•अर्थात सभी कार्यों को शक्ति प्रदान करने वाला।
वायु मानव जाति के लिए पंचमहाभूतों में का एक बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण तत्व है।#पंचप्राण का अर्थ योग के अनुसार उस वायु से है जो हमारे शरीर को जीवित रखती है। शरीर के अंतर्गत इस वायु को ही कुछ लोग प्राण कहने से जीवात्मा मानते हैं, लेकिन जीवात्मा अलग है। इस वायु का मुख्य स्थान हृदय में है।
इस वायु के आवागमन को अच्छे से समझकर जो इसे साध लेता है वह लंबे काल तक जीवित रहने का रहस्य जान लेता है। क्योंकि वायु ही शरीर के भीतर के पदार्थ को अमृत या जहर में बदलने की क्षमता रखती है।
#प्राणायाम :
#अष्टांग_योग के आठ अंगों में से एक है। प्राणायाम = प्राण + आयाम। इसका का शाब्दिक अर्थ है - 'प्राण (श्वसन) को लम्बा करना' या 'प्राण (जीवनीशक्ति) को लम्बा करना'। (प्राणायाम का अर्थ 'स्वास को नियंत्रित करना' या कम करना नहीं है।) उपर 'प्राण' का अर्थ जाना और अब आयाम का अर्थ : आयाम के दो अर्थ है- प्रथम नियंत्रण या रोकना, द्वितीय विस्तार और दिशा। व्यक्ति जब जन्म लेता है तो गहरी श्वास लेता है और जब मरता है तो पूर्णत: श्वास छोड़ देता है। प्राण जिस आयाम से आते हैं उसी आयाम में चले जाते हैं। प्राणायाम करते या श्वास लेते समय हम तीन क्रियाएं करते हैं - 1.पूरक 2.कुम्भक 3.रेचक। अर्थात श्वास को लेना, रोकना और छोड़ना। अंतर रोकने को आंतरिक कुम्भक और बाहर रोकने को बाह्म कुम्बक कहते हैं। इस श्वसन तंत्र के नियंत्रण अभ्यास को ही प्राणायाम कहा जाता है।
#पंचप्राण का कार्य :
हम जब श्वास लेते हैं तो भीतर जा रही हवा या वायु पांच भागों में विभक्त हो जाती है या कहें कि वह शरीर के भीतर पांच जगह स्थिर और स्थित हो जाता हैं। लेकिन वह स्थिर और स्थित रहकर भी गतिशिल रहती है। (१) व्यानवायु, (२) समानवायु, (३) अपानवायु, (४) उदानवायु, (५) प्राणवायु
#व्यानवायु :
यह वायु समस्त शरीर में धूमती है। इसी वायु के प्रभाव से रस, रक्त तथा अन्य जीवनोपयोगी तत्व सारे शरीर में बहते रहते हैं। शरीर के समस्त कार्यकलाप और कार्य करनें की चेष्टायें बिना व्यान वायु के सम्पन्न नहीं हो सकती हैं। जब यह कुपित होती है तो समस्त शरीर के रोग पैदा करती है।
#समानवायु :
समानवायु नाभिस्थान पर स्थित रहती है। यह वायु पाचनतंत्र में रहनें वाली अग्नि, जिसे जठराग्नि कहते हैं, से मिलकर अन्न का पाचन करती है और मलमूत्र को पृथक पृथक करती है। जब यह वायु कुपित होती है तब मन्दाग्नि, अतिसार और वायु गोला प्रभृति रोग होते हैं।
#अपानवायु ;
यह वायु पाचनतंत्र में रहती है तथा इसका कार्य मल, मूत्र, शुक्र, गर्भ और आर्तव को बाहर निकालना है। जब यह कुपित होती है तब मूत्राशय और गुदा से संबंधित रोग होते हैं। अपानवायु गुदा में स्थित है।
#उदानवायु :
उदान वायु गले में रहती है। इसी वायु की शक्ति से मनुष्य स्वर निकालता हैं, बोलता है, गीत गाता है और निम्न, मध्यम और उच्च स्वर में बात करता है।
#प्राणवायु : प्राणवायु हर्दय में स्थित है। श्वासोच्छवास के माध्यम से हवा अंदर बहार की प्रक्रिया, खाये हुए अन्नजल को पचाना, अन्न को मल, पानी को पसीना अथवा मूत्र बनाना, रस से वीर्य बनाना प्राणवायु का कार्य है।
इसके अलावा #पांच_उपवायु नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त ओर धनन्जय वायुके माध्यम से
डकार निकालना #नागवायु का कर्म है।
नेत्रों के पलक लगाना खोलना #कूर्म_वायु का कर्म है।
छींक करना #कृकलवायु का कर्म है।
जम्हाई लेना #देवदत्तवायु का कर्म है।
और #धनंजयवायु सर्व शरीर में व्याप्त रहता है। मृत्यु शरीर में भी चार घंटे तक रहता है ।
इस प्रकार यह दस वायु आप ही जीव के अभ्यास से कल्पित होकर सुख दुःख का सम्बन्ध जीव को कराती हैं ।
वायु के इस पांच तरह से रूप बदलने के कारण ही व्यक्ति की चेतना में जागरण रहता है, स्मृतियां सुरक्षित रहती है,। बोलना चलना, पाचन क्रिया सही चलती रहती है और हृदय में रक्त प्रवाह चलते रहता है। इनके कारण ही मन के विचार बदलते रहते या स्थिर रहते हैं।
उक्त में से एक भी जगह दिक्कत है तो सभी जगहें उससे प्रभावित होती है और इसी से शरीर, मन तथा चेतना भी रोग और शोक से घिर जाते हैं। मन-मस्तिष्क, चरबी-मांस, आंत, गुर्दे, मस्तिष्क, श्वास नलिका, स्नायुतंत्र और खून आदि सभी प्राणायाम से शुद्ध और पुष्ट रहते हैं। इसके काबू में रहने से मन और शरीर काबू में रहता है।
वायु मानव जाति के लिए बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण तत्त्व है। अतः हमें इसे प्रदुषित नहीं करना चाहिए। जितना हो सके उतना पेड़ और पौधे ज़रूर लगायें और पर्यावरण का जतन कर हमारे स्तर से सृष्टि संचालन में संतुलित बनाये रखने में योगदान करेंएवं अन्यों को इसके लिये प्रेरित करे।
॥हरि: 🕉 तत्सत्॥
🔆 इदं न मम 🔆
🙏🙏🙏🙏🙏
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