आयुधानामहं वज्रं महर्षि दधीचि
🙏 सुप्रभात, आज कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी गुरुवार दिनांक ६.१२.२०१८🙏
श्रीमद्भगवगिता में अपनी दैवीसंपदा एवं विभूति दर्शनमें प्रभु ने कहा है:
#आयुधानामहं_वज्रं_धेनूनामस्मि_कामधुक्।
#प्रजनश्चास्मि_कन्दर्पः_सर्पाणामस्मि_वासुकिः॥ (भ ग १०/२८)
अर्थात् : शस्त्रोंमें मैं दधीचि ऋषिकी अस्थियोंसे बना हुआ वज्र हूँ। दूध देनेवाली गौओंमें कामधेनु - वसिष्ठको सब कामनारूप दूध देनेवाली अथवा सामान्य भावसे जो भी कामधेनु है वह मैं हूँ। प्रजाको उत्पन्न करनेवाला कामदेव मैं हुँ, और सर्पोंमें अर्थात् सर्पोके विविध प्रकारों में सर्पराज वासुकि मैं हूँ।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कहते है की : #आयुधानामहं_वज्रं : आयुधों में मैं वज्र हूं।
#वज्र : वज्र संस्कृत शब्द है जिसके दो अर्थ हैं - आकाशीय बिजली और हीरा। इसके अतिरिक्त वज्र का अर्थ युद्ध में जीता गया शस्त्र भी है।
#पौराणिक_कथानुसार_महर्षि_दधीचि_द्वारा_अस्थियों_का_दान :
देवलोक पर वृत्रासुर नामक राक्षस के अत्याचार दिन-प्रतिदिन बढ़ते ही जा रहे थे। वह देवताओं को भांति-भांति से परेशान कर रहा था। अन्ततः देवराज इन्द्र को इन्द्रलोक की रक्षा व देवताओं की भलाई के लिए और अपने सिंहासन को बचाने के लिए देवताओं सहित महर्षि दधीचि की शरण में जाना ही पड़ा। महर्षि दधीचि ने इन्द्र को पूरा सम्मान दिया तथा आश्रम आने का कारण पूछा। इन्द्र ने महर्षि को अपनी व्यथा सुनाई तो दधीचि ने कहा कि- " मैं देवलोक की रक्षा के लिए क्या कर सकता हूँ। " देवताओं ने उन्हें ब्रह्मा, विष्णु व महेश की कहीं हुई बातें बताईं तथा उनकी अस्थियों का दान माँगा देवताओं के मुख से यह जानकर की मात्र दधीचि की अस्थियों से निर्मित वज्र द्वारा ही असुरों का संहार किया जा सकता है, महर्षि दधीचि ने बिना किसी हिचकिचाहट के अपना शरीर त्याग कर अस्थियों का दान कर दिया।
उन्होंने समाधी लगाई और अपनी देह त्याग दी। उस समय उनकी पत्नी आश्रम में नहीं थी। अब देवताओं के समक्ष ये समस्या आई कि महर्षि दधीचि के शरीर के माँस को कौन उतारे। इस कार्य के ध्यान में आते ही सभी देवता सहम गए। तब इन्द्र ने कामधेनु गाय को बुलाया और उसे महर्षि के शरीर से मांस उतारने को कहा। कामधेनु ने अपनी जीभ से चाट-चाटकर महर्षि के शरीर का माँस उतार दिया। अब केवल अस्थियों का पिंजर रह गया था। उनकी अस्थियों से देवताओं ने वज्र नामक अस्त्र बनाकर #वृत्रासुर का वध किया।
#गभस्तिनी_की_जिद : महर्षि दधीचि ने तो अपनी देह देवताओ की भलाई के लिए त्याग दी, लेकिन जब उनकी पत्नी #गभस्तिनी वापस आश्रम में आई तो अपने पति की देह को देखकर विलाप करने लगी तथा सती होने की जिद करने लगी। तब देवताओ ने उन्हें बहुत मना किया, क्योंकि वह गर्भवती थी। देवताओं ने उन्हें अपने वंश के लिए सती न होने की सलाह दी। लेकिन गभस्तिनी नहीं मानी। तब सभी ने उन्हें अपने गर्भ को देवताओं को सौंपने का निवेदन किया। इस पर गभस्तिनी राजी हो गई और अपना गर्भ देवताओं को सौंपकर स्वयं सती हो गई। देवताओं ने गभस्तिनी के गर्भ को बचाने के लिए पीपल को उसका लालन-पालन करने का दायित्व सौंपा। कुछ समय बाद वह गर्भ पलकर शिशु हुआ तो पीपल द्वारा पालन पोषण करने के कारण उसका नाम #पिप्पलाद रखा गया। इसी कारण दधीचि के वंशज #दाधीच कहलाते हैं।
पौराणिक कथाऐं लक्षणात्मक होती है। कथा के माध्यम से समाज को बोध कराना ही पुराणों की रचना का उद्देश्य है। ' इस कथा का बोध है की संस्कृति रक्षा के लिए हमारे कर्मयोगी ऋषि-मुनियों ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया है, संस्कृति रक्षण औऱ जतन के लिये अपनी हड्डियों का खाद करके संस्कृति का संवर्धन किया है। '
॥हरि: 🕉 तत्सत्॥
🔆 इदं न मम 🔆
🙏🙏🙏🙏🙏
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🕉 #कृष्णं_वंदे_जगद्गुरूम् 🕉
देवराज इंद्र के नेतृत्व में देवताओं ने वृत्रासुर के त्रास से बचने के लिये वज्र बनाने क़े लिये महर्षि दधीचि से अस्थियों याचना।
महर्षि दधीचि के देहत्याग पश्चात कामधेनु गाय द्वारा जीभ से मास चाट कर अस्थियों को अलग करना।
देवराज इंद्र के नेतृत्व में देवताओं ने वृत्रासुर के त्रास से बचने के लिये वज्र बनाने क़े लिये महर्षि दधीचि से अस्थियों याचना।
महर्षि दधीचि के देहत्याग पश्चात कामधेनु गाय द्वारा जीभ से मास चाट कर अस्थियों को अलग करना।
महर्षि दधीचि की अस्थियों से निर्मित वज्र से देवराज इंद्र ने वृत्रासुर का।वध कर देवताओ को त्रासमुक्त किया।
श्रीमद्भगवगिता में अपनी दैवीसंपदा एवं विभूति दर्शनमें प्रभु ने कहा है:
#आयुधानामहं_वज्रं_धेनूनामस्मि_कामधुक्।
#प्रजनश्चास्मि_कन्दर्पः_सर्पाणामस्मि_वासुकिः॥ (भ ग १०/२८)
अर्थात् : शस्त्रोंमें मैं दधीचि ऋषिकी अस्थियोंसे बना हुआ वज्र हूँ। दूध देनेवाली गौओंमें कामधेनु - वसिष्ठको सब कामनारूप दूध देनेवाली अथवा सामान्य भावसे जो भी कामधेनु है वह मैं हूँ। प्रजाको उत्पन्न करनेवाला कामदेव मैं हुँ, और सर्पोंमें अर्थात् सर्पोके विविध प्रकारों में सर्पराज वासुकि मैं हूँ।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कहते है की : #आयुधानामहं_वज्रं : आयुधों में मैं वज्र हूं।
#वज्र : वज्र संस्कृत शब्द है जिसके दो अर्थ हैं - आकाशीय बिजली और हीरा। इसके अतिरिक्त वज्र का अर्थ युद्ध में जीता गया शस्त्र भी है।
#पौराणिक_कथानुसार_महर्षि_दधीचि_द्वारा_अस्थियों_का_दान :
देवलोक पर वृत्रासुर नामक राक्षस के अत्याचार दिन-प्रतिदिन बढ़ते ही जा रहे थे। वह देवताओं को भांति-भांति से परेशान कर रहा था। अन्ततः देवराज इन्द्र को इन्द्रलोक की रक्षा व देवताओं की भलाई के लिए और अपने सिंहासन को बचाने के लिए देवताओं सहित महर्षि दधीचि की शरण में जाना ही पड़ा। महर्षि दधीचि ने इन्द्र को पूरा सम्मान दिया तथा आश्रम आने का कारण पूछा। इन्द्र ने महर्षि को अपनी व्यथा सुनाई तो दधीचि ने कहा कि- " मैं देवलोक की रक्षा के लिए क्या कर सकता हूँ। " देवताओं ने उन्हें ब्रह्मा, विष्णु व महेश की कहीं हुई बातें बताईं तथा उनकी अस्थियों का दान माँगा देवताओं के मुख से यह जानकर की मात्र दधीचि की अस्थियों से निर्मित वज्र द्वारा ही असुरों का संहार किया जा सकता है, महर्षि दधीचि ने बिना किसी हिचकिचाहट के अपना शरीर त्याग कर अस्थियों का दान कर दिया।
उन्होंने समाधी लगाई और अपनी देह त्याग दी। उस समय उनकी पत्नी आश्रम में नहीं थी। अब देवताओं के समक्ष ये समस्या आई कि महर्षि दधीचि के शरीर के माँस को कौन उतारे। इस कार्य के ध्यान में आते ही सभी देवता सहम गए। तब इन्द्र ने कामधेनु गाय को बुलाया और उसे महर्षि के शरीर से मांस उतारने को कहा। कामधेनु ने अपनी जीभ से चाट-चाटकर महर्षि के शरीर का माँस उतार दिया। अब केवल अस्थियों का पिंजर रह गया था। उनकी अस्थियों से देवताओं ने वज्र नामक अस्त्र बनाकर #वृत्रासुर का वध किया।
#गभस्तिनी_की_जिद : महर्षि दधीचि ने तो अपनी देह देवताओ की भलाई के लिए त्याग दी, लेकिन जब उनकी पत्नी #गभस्तिनी वापस आश्रम में आई तो अपने पति की देह को देखकर विलाप करने लगी तथा सती होने की जिद करने लगी। तब देवताओ ने उन्हें बहुत मना किया, क्योंकि वह गर्भवती थी। देवताओं ने उन्हें अपने वंश के लिए सती न होने की सलाह दी। लेकिन गभस्तिनी नहीं मानी। तब सभी ने उन्हें अपने गर्भ को देवताओं को सौंपने का निवेदन किया। इस पर गभस्तिनी राजी हो गई और अपना गर्भ देवताओं को सौंपकर स्वयं सती हो गई। देवताओं ने गभस्तिनी के गर्भ को बचाने के लिए पीपल को उसका लालन-पालन करने का दायित्व सौंपा। कुछ समय बाद वह गर्भ पलकर शिशु हुआ तो पीपल द्वारा पालन पोषण करने के कारण उसका नाम #पिप्पलाद रखा गया। इसी कारण दधीचि के वंशज #दाधीच कहलाते हैं।
पौराणिक कथाऐं लक्षणात्मक होती है। कथा के माध्यम से समाज को बोध कराना ही पुराणों की रचना का उद्देश्य है। ' इस कथा का बोध है की संस्कृति रक्षा के लिए हमारे कर्मयोगी ऋषि-मुनियों ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया है, संस्कृति रक्षण औऱ जतन के लिये अपनी हड्डियों का खाद करके संस्कृति का संवर्धन किया है। '
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