सृष्टि सृजन उतप्ती-स्थिति-लय

🙏 सुप्रभात, आज मार्गशीर्ष शुक्ल पूर्णिमा शनिवार दिनांक २२.१२.२०१८ 🙏 

🕉 #कृष्णं_वंदे_जगद्गुरूम् 🕉   
योगेश्वर भगवान

श्रीमद्भगवगिता में अपनी दैवीसंपदा एवं विभूति दर्शनमें प्रभु ने कहा है: 
#सर्गाणामादिरन्तश्च_मध्यं_चैवाहमर्जुन।
#अध्यात्मविद्या_विद्यानां_वादः_प्रवदतामहम्॥ (भ ग १०/३२)
अर्थात् हे अर्जुन ! सृष्टियोंका आदि, अन्त और मध्य अर्थात् उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय मैं हूँ। समस्त विद्याओं में जो कि मोक्ष देनेवाली होनेके कारण प्रधान है वह अध्यात्मविद्या मैं हूँ। और परस्पर शास्त्रार्थ करनेवालोंका (तत्त्व निर्णयके लिये किया जानेवाला) वाद मैं हूँ।

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कहते है की : #सर्गाणामादिरन्तश्च_मध्यम्_चैवाहमर्जुन। सृष्टियोंका (सृजनका) आदि, अन्त और मध्य अर्थात् उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय मैं हूँ।

सृष्टि सृजन रचना उतप्ती -स्थिति -लय का विषय अत्यंत गहन है। इसे विस्तृतता से समजने का प्रयास करेंगे।

हमारे वैदिक ग्रन्थानुसार सृष्टि ब्रह्म की इच्छा से निर्मित हुई है। #बहुस्यां_प्रजायेयेति उसने (ब्रह्म) कामना की कि मैं एक से अनेक हो जाऊँ, तब उसने तप किया। क्रिया का प्रारमभ हो गया। जबकि विज्ञान कहता है की सृष्टि का निर्माण महाविस्फोट सिद्धांत-Big Bang Theory के साथ ही प्रारमभ हुई और परिवर्तन के कई चरणों से गुजरती हुई वर्तमान स्थिति में पहुँची है। 

सृष्टि उत्पत्ति, विकास, स्थिति और लय, में क्रमविकास और कार्य-कारण का सिद्धांत कार्य करता है। वेदों में सृष्टि रचना को वैज्ञानिक तरीके से भी समझाया गया है। वेदों में ब्रह्मांड उत्पत्ति का जो सिद्धांत है विज्ञान आज उसके नजदिक पहुंच गया है। अब लोगों को कहानी से ज्यादा तथ्य पर विश्वास होता है। यहां वेद-गीता के उत्पत्ति के सिद्धांत को समझने का प्रयास करते हैं।

सृष्टि की रचना व उत्पत्ति के प्रसंग में यह महत्वपूर्ण तथ्य है कि संसार में कोई भी रचना व उत्पत्ति बिना कर्त्ता के नहीं होती। यह सृष्टि व्यवस्थित रूप से अपना कार्य करती है। ब्रह्मांड में आकाशगंगा के ग्रह तारे सूर्य के चारों तरफ निश्चित समय से चक्कर लगाते है। पृथ्वी अपनी धुरी पर 24 घंटे में 1,674.4 किमी/घंटा कि गति से चक्कर लगाती है। याने सुपरसोनिक हवाईजहाज से भी ज्यादा गति। फिर भी पृथ्वी पर कुछ अस्तव्यस्त नही होता। जबकि हम 100km प्रतिघंटा की रफ्तार से दौडने वाली गाड़ी में पानी भरा ग्लास ठीक से रख नही पाते। जब सब कुछ व्यवस्थित हो रहा है तो इसे।चलाने वाला कोई व्यवस्थापक होंगा की नही ?

इसके साथ यह भी महत्वपर्ण तथ्य है कि कर्ता को अपने कार्य का पूर्ण ज्ञान होने के साथ उसको सम्पादित करने के लिए पर्याप्त शक्ति वा बल भी होना चाहिये। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि यह सृष्टि एक कर्ता जो ज्ञान व बल से युक्त है, उसी से बनी है। वह स्रष्टा कौन है ? संसार में ऐसी कोई सत्ता दृष्टिगोचर नहीं होती जिसे इस सृष्टि की रचना का अधिष्ठाता, रचयिता व उत्पत्तिकर्ता कहा व माना जा सके। अतः यह सुनिश्चित होता है कि वह सत्ता है तो अवश्य परन्तु वह अदृश्य सत्ता है।

सृष्टि उत्पत्ति विषयक सभी प्रश्नों का सत्य उत्तर हमें वेद और वैदिक साहित्य से ही प्राप्त होगा। सृष्टि की उत्पत्ति किससे हुई प्रश्न का उत्तर है कि यह सृष्टि ईश्वर कि जिसके ब्रह्म, परमात्मादि नाम हैं, जो सच्चिदानन्दादि लक्षणयुक्त है, जिसके गुण, कर्म, स्वभाव पवित्र हैं, जो सर्वज्ञ, निराकार, सर्वव्यापक, अजन्मा, अनन्त, सर्वशक्तिमान, दयालु, न्यायकारी, सब सृष्टि का कर्ता, धर्ता, हर्ता, सब जीवों को कर्मानुसार सत्य न्याय से फलदाता आदि लक्षण युक्त है, उसी से ही यह सृष्टि की उत्पत्ति हुई है। सृष्टि कब उत्पन्न हुई, का उत्तर है कि एक अरब छियानवें करोड़ आठ लाख त्रेपन हजार एक सौ पन्द्रह वर्ष पूर्व। यह काल गणना भी वैदिक परम्परा व ज्योतिष आदि शास्त्रों के आधार पर है। सृष्टि की रचना क्यों हुई का उत्तर है कि जीवात्माओं को उनके जन्म जन्मान्तरों के कर्मों के सुख व दुःख रूपी फलों वा भोगों को प्रदान करने के लिए परम दयालु परमेश्वर ने की। सृष्टि रचना व संचालन का कारण जीवों के कर्म व उनके सुख–दुःख रूपी फल प्रदान करना ही है। जीवात्मा को उसके लक्षणों से जाना जाता है। उसके शास्त्रीय लक्षण हैं, इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, ज्ञान, कर्म, अल्पज्ञता व नित्यता आदि।

सृष्टि उत्पत्ति विषयक वैदिक शास्त्रों में :

हिरण्यगर्भ शब्द भारतीय विचारधारा में सृष्टि का आरंभिक स्रोत माना जाता है। इसका शाब्दिक अर्थ है – प्रदीप्त गर्भ (या अंडा या उत्पत्ति-स्थान)। इस शब्द का प्रथमतः उल्लेख ऋग्वेद  में हुआ है।

#हिरण्यगर्भ_समवर्तताग्रे_भूतस्य_जात_पतिरेक_आसीत्।
#स_दाधार_पृथिवीं_द्यामुतेमां_कस्मै_देवाय_हविषा_विधेम॥ - ऋग्वेद सूक्त
अर्थात्  - सब सूर्यादि तेजस्वी पदार्थों का आधार जो जो जगत हो और होएगा उसका आधार परमात्मा डगत की उत्पत्ति के पूर्व विद्य़मान था। जिसने पृथ्वी और सूर्य-तारों का सृजन किया उस देव की प्रेम भक्ति किया करें। इस श्लोक से हिरण्यगर्भ ईश्वर का अर्थ लगाया जाता है - यानि वो गर्भ जहाँ हर कोई वास करता हो।

#नासदासीन्नो_सदासीत्तदानीं_नासीद्रजो_नो_व्योमाऽपरोयत्। 
#किमावरीवः_कुहकस्य_शर्मन्नभः_किमासीद्गहनं_गभीरम्॥ ऋग्वेद १०/१२९/१) 
अर्थात् : (नासदासीत्) जब यह कार्य सृष्टि उत्पन्न नहीं हुई थी, तब एक सर्वशक्तिमान् परमेश्वर और दूसरा जगत् का कारण विद्यमान था। असत् शून्य नाम आकाश भी उस समय नहीं था क्योंकि उस समय उसका व्यवहार नहीं था। (ना सदासीत्तदानीम्) उस काल में सत् अर्थात् सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण मिलाकर जो प्रधान कहाता है, वह भी नहीं था। (नासीद्रजः) उस समय परमाणु भी नहीं थे तथा (नो व्योमाऽपरोयत्) विराट अर्थात् जो सब स्थूल जगत् के निवास का स्थान है, वह (आकाश) भी नहीं था। (किमावरीव…….गभीरम्) जो यह वर्तमान जगत् है, वह भी अत्यन्त शुद्ध ब्रह्म को नहीं ढँक सकता है और उससे अधिक वा अथाह भी नहीं हो सकता है, जैसे कोहरे का जल पृथ्वी को नहीं ढँक सकता है तथा उस जल से नदी में प्रवाह नहीं आ सकता है और न वह कभी गहरा अथवा उथला हो सकता है।

फिर सृष्टि की उत्पत्ति कैसे हुई ? इस विषय में तैत्तिरीय उपनिषद् का कहना है : 
सो कामयत। 
बहुस्यां प्रजायेयेति। 
स तपोऽतप्यत। 
स तपस्तप्त्वा इदं सर्वमसृजत। 
यदि किञ्च। 
तत सृष्टावा तदेवानु प्राविशत्। 
तदनुप्रविश्य। 
सच्चत्यच्यामवत्। 
निरुक्तं चानिरुक्तं च। 
निलयन चानिलयन च। 
विज्ञानं चापिज्ञानं च। 
सत्यं चानृतं च। 
सत्यमभवत। 
यदिद किञ्च। 
तत्सत्यमित्या चक्षते। (तै.उप. ब्रह्मानन्दवल्ली अनुवाक ६) 
अर्थात् : उसने कामना की कि मैं एक से अनेक हो जाऊँ, तब उसने तप किया। क्रिया का प्रारमभ हो गया। जब यह क्रिया बढ़ते-बढ़ते उग्र रूप में पहुँची, तब उसे तप कहा गया। तप के प्रभाव से यह सब विश्व सृजा गया। सबकी सृष्टि करके वह ब्रह्म सृष्टि में अनुप्रविष्ट हो गया। संक्षिप्त में कहे तो ब्रह्म की इच्छा हुई और सृष्टि रचना की शरुआत हो गई।

अब विज्ञान पहले क्या कहता था औऱ नित्य नई खोजके आधार पर आज वह क्या मानने पर बाध्य हुआ है !!!

#महाविस्फोट_सिद्धान्त  #Big_Bang_Theory
सृष्टि की उत्पत्ति के विषय में विज्ञान का मानना तो यह है कि सृष्टि की उत्पत्ति Big Bang (भयंकर विस्फोट) के साथ ही प्रारमभ हुई और परिवर्तन के कई चरणों से गुजरती हुई वर्तमान स्थिति में पहुँची है। Big Bang के साथ ही आकाश और समय का कार्य प्रारमभ हुआ। सृष्टि उत्पत्ति का क्रम इस प्रकार रहा- आकाश, ज्वलनशील वायु, अग्नि, जल और निहारिका का मण्डल। निहारिका मण्डल में ही सौर मण्डलों ने स्थान पाया। पृथ्वी की उत्पत्ति सूर्य से छिटक कर अलग होने के बाद धीरे-धीरे परिवर्तित होकर वर्तमान रूप में हुई। श्वास लेने योग्य वायु के बनने, पानी के पीने योग्य होने पर पानी के अन्दर सर्वप्रथम जलचरों को जीवन मिला। फिर क्रमशः जल-स्थलचर, स्थलचर और आकाशचर प्राणियों की उत्पत्ति हुई। सृष्टि उत्पत्ति के पूर्व क्या था ? इस विषय में विज्ञान का कहना है कि Big Bang के बाद ही सृष्टि नियम विकसित हुए हैं और उनके आधार पर हम घोषित कर सकते हैं कि भविष्य में कब क्या होगा और वे घोषणाएँ सब सत्य सिद्ध हो रही हैं।

1964 के पहले तक विज्ञान कहता था कि हमें Big Bang के पूर्व की स्थिति को जानने की कोई आवश्यकता नहीं है। यह जाने बगर भी हम (विज्ञान) भविष्य में घटने वाली खगोलीय घटनाओं की भविष्यवाणी कर सकते है। लेकिन सतत जिज्ञासु मानव मन कहाँ शांत बैठता है। 

जीवन के करोड़ों स्वरूपों से दमकती इस सृष्टि को रचने वाला कौन है ? कोई दैवीय शक्ति या फिर विज्ञान की वो ताकत, जो गॉड पार्टिकल में छिपी है ? गॉड पार्टिकिल की कहानी करीब 14 अरब साल पहले शुरू होती है, जब इस ब्रह्मांड का जन्म हो रहा था।

14 अरब साल पहले जब ऊर्जा के महाविस्फोट के बाद पदार्थ के शुरुआती कणों ने जन्म लिया तो उन कणों का गुण-धर्म तय करने वाले कई दूसरे अनजाने कण भी अस्तित्व में आ गए मिसाल के तौर पर #सिंगल_टॉप_क्वार्क और #हिग्स_बोसॉन।

नोबल पुरस्कार विजेता बेल्जियम के #फ्रांसवा_इंगलर्ट और ब्रिटेन के #पीटर_हिग्स औऱ अन्य कई भौतिक विज्ञानियों ने मिलकर 1960 में ब्रह्मांड में मूलभूत पदार्थ की सरंचना को लेकर एक प्रक्रिया का सुझाव दिया था। इस प्रक्रिया में एक कण- हिग्स बोसोन- होने का अनुमान लगाया गया था। जेनेवा के परमाणु अनुसंधान संगठन सर्न के वैज्ञानिक 2012 में इस कण को खोज पाए। यूरोपियन पार्टिकल फिज़िक्स लैबोरेट्री ने जुलाई में इसका ऐलान किया था

#हिग्स_बोसॉन को ही #गॉड_पार्टिकल"कहने पर बाध्य हुआ विज्ञान। 
इस हिग्स बोसॉन को ही आधुनिक विज्ञान ने ' गॉड पार्टिकल ' ' ईश्वरीय कण ' माना है। विज्ञान जहाँ रुक जाता है वहाँ प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से #GK_God_Knows बोलकर अपनी अपूर्णता स्वीकार करता है। 

' गॉड पार्टिकल ' की खोज के लिए हज़ारों वैज्ञानिकों को लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर में प्रोटॉनों की टक्कर से मिले काफ़ी लंबे-चौड़े आंकड़ों को खंगालना पड़ा। लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर की लागत 10 अरब डॉलर यानी करीब 62 हज़ार करोड़ रुपए है और ये स्विटज़रलैंड और फ्रांस की सीमा पर 27 किलोमीटर में फ़ैला हुआ है।

कहने का तात्पर्य यह है की वह अणु जिसके विषय मे विज्ञान भी नही समज पाया और मानने पर बाध्य हुआ कि सृष्टि रचना में कोई ईश्वरीय कण (तत्व) है। यही बात हमारे शास्त्रों ने हजारों वर्ष पूर्व कही है जिसे आज विज्ञान स्विकार करने में बाध्य हुआ है।

इस सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और लय, प्रभु के कारण है। प्रतिदिन सुबह हम उठते हैं, यह हमारी उत्पत्ति है, सुबह से रात तक हम कार्य करते हैं, यह स्थिति है और रात को हम थक कर सो जाते हैं, यह लय है। ठीक उसी प्रकार प्रत्येक प्राणी अथवा पदार्थ का जन्म होता है, उसका जीवन होता है और अंत में मृत्यु भी होती है, यह स्वाभाविक है। 
               
संसार परिवर्तनशील हैं। एक वर्ष का बालक जब दस वर्ष का हो जाता है तो वह कभी भी कोई शिकायत नहीं करता कि मैं बडा़ क्यों हो गया। उसे इस परिवर्तन का आनंद है।     
भगवद्गीता मे कहा है :
#देहिनोऽस्मिन्यथा_देहे_कौमारं_यौवनं_जरा।
#तथा_देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र_न_मुह्यति॥ भ ग २/१३
अर्थात् : जिस प्रकार जीवात्मा को शरीर में बचपन, युवावस्था बुढापा और मृत्यु स्वाभाविक है, इस सत्य को स्वीकार करने वाला धीर पुरुष मोहित नहीं होता।      

जब हम रात को सोते हैं, तो हमें शांति मिलती है। सभी प्रकार की थकान दूर हो जाती है और सुबह उठते हैं, तो ताजगी का, प्रसन्नता का अनुभव करते हैं। रात को सोना, यह एक अल्प मृत्यु हैं। क्या हम शिकायत करते हैं कि मैं क्यों सो गया ?            

उसी तरह जब प्राणी की मृत्यु हो जाती है, तो उसे नया देह प्राप्त हो जाता है। वह फिर से उत्साह, स्फूर्ति और चैतन्य से भर जाता है और फिर से संसार में खेलने लगता है।             जो इस सनातन सत्य को स्वीकार कर लेते हैं ऐसे धीर पुरुष कभी भी मोहित नहीं होते।        मृत्यु को गीताकार ने वस्त्र की उपमा दी है। जिस प्रकार वस्त्र (कपड़े) पुराने हो जाते हैं, फट जाते हैं तो हम उसे बदल देते हैं। ठीक उसी प्रकार जब शरीर जीर्ण हो जाता है, तो जीवात्मा उसे त्याग कर नया शरीर धारण कर इस संसार में वापस लौट आता है।
               
॥हरि: 🕉 तत्सत्॥

🔆  इदं न मम  🔆 

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