मृत्यु
🙏 सुप्रभात, आज मार्गशीर्ष शुक्ल नवमी रविवार दिनांक ३०.१२.२०१८ 🙏
🕉 #कृष्णं_वंदे_जगद्गुरूम् 🕉
महाकाल
श्रीमद्भगवगिता में अपनी दैवीसंपदा एवं विभूति दर्शनमें प्रभु ने कहा है:
#मृत्युः_सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च_भविष्यताम्।
#कीर्तिः_श्रीर्वाक्च_नारीणां_स्मृतिर्मेधा_धृतिः_क्षमा॥ (भ ग १०/३४)
अर्थात् : मैं सर्वभक्षक मृत्यु और भविष्य में होने वालों की उत्पत्ति का कारण हूँ स्त्रियों में कीर्ति, श्री, वाक (वाणी), स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा हूँ।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कहते है की : #मृत्युः_सर्वहरश्चाहम् #सर्वनाशक_मृत्यु_मैं_ही_हुं।
★ जगत में सबसे अधिक भयावह बात है तो वह है मृत्यु !!!
•लेकिन स्वयं भगवान जब कहते है कि सबका नाश करने वाली #सर्वहर_मृत्युः मैं हूँ। जब मृत्यु भगवान है तो फिर भगवान से डर कैसा ??? लेकिन फिर भी भय तो लगता ही हैं। तो प्रभु ! हमेंने या तो आपके यह ' शब्द ' ही नहीं सुनें हैं और सुने हैं तो इन शब्दों पर विश्वास नहीं है। जब हम तुम्हारे शब्दों पर ही विश्वास न करें तब हमारा कैसा वैराग्य और कैसी भक्ति ?
मृत्यु अमंगल नही #मंगल_घटना है ! #जीव_शिव का मिलन है। मृत्यु जीवन की वास्तविकता है। भगवतद्रष्टि से मृत्यु केवल वस्त्र बदलने जैसी सामान्य घटना है :
#वासांसि_जीर्णानि_यथा_विहाय,
#नवानि_गृह्णाति_नरोऽपराणि।
#तथा_शरीराणि_विहाय_जीर्णा,
#न्यन्यानि_संयाति_नवानि_देही॥ (भ ग २/२२)
(अर्थात् : जैसे मनुष्य जीर्ण वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नये वस्त्रों को धारण करता है। वैसे ही देही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्याग कर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है।)
भगवान ने मृत्यु का भय निकाल दिया है। जिस प्रकार पूराने वस्त्र फट जाने पर हम उसे बदल देतें हैं और नए धारण कर लेते हैं, ठीक उसी तरह जीवात्मा पूराने शरीर को त्याग कर नया शरीर धारण कर, नए उत्साह से, चैतन्य से सृष्टि में खेलने को आ जाता है।
#फिर_मृत्य_का_भय_क्यों ?
साधारणतया शायद ही कोई ऐसा हो जिसे मृत्यु का भय न हो। प्रत्येक जीवमात्र भयभीत होता है और यह स्वाभाविक है। मृत्यु के बाद कहाँ जाना है ? पता नहीं, वहां क्या व्यवस्था होगी ? पता नहीं।
मानलो किसी व्यक्ति का पुत्र मुंबई में रहता है और उसने उसके पिता के लिए सभी प्रकार की व्यवस्था की है, तो वह व्यक्ति निश्चिंत होकर मुंबई जाएगा। उसे अपने पुत्र पर संपूर्ण विश्वास है। उसी प्रकार यदि हमें प्रभु पर पूर्ण श्रद्धा हो, तो मृत्यु से भयभीत होने का कोई कारण नहीं है।
एक प्रसिद्ध दोहा है :
#जब_दांत_न_थे_तब_दूध_दियो,
#अब_दांत_दीये_तो_अन्न_न_दे ?
जब हम इस सृष्टि में आए, तब हमारे मुंह में दांत नहीं थे, तो दुध की व्यवस्था कर दी थी और जब दांत दिए तो अन्न की व्यवस्था कर दी। हमारी श्वास प्रश्वास निरंतर वहीं चलाता है। हमारा भोजन वहीं पचाता है। संपूर्ण जीवन वहीं चलाता है। तो क्या मृत्यु के पश्चात् वह मेरी व्यवस्था नहीं करेंगा ? अवश्य करेंगा। ऐसा दृढ़ विश्वास मृत्यु के भय से हमें मुक्ति दिलाता है।
#कर_ले_श्रृंगार_चतुर_अलबेली_साजन_के_घर_जाना_होंगा।
#मिट्टी_उढावन_मिट्टी_बिछावन_मिट्टी_में_मिल_जाना_होंगा।
#नाह_ले_धो_ले_शीश_गुंथा_ले_फिर_वहाँ_से_नही_आना_होंगा।
कितने ही समाज मे मृत्युदेह को बाजे गाजे के साथ स्मशान तक लेजाने की रूढ़ि के पीछे यही संकेत है।
कबीरदास के इस दोहे से मृत्यु के दुःख की कन्याविदाई के साथ तुलना की जा सकती है। नववधु को पतिगृह जाने का दुःख नही है, उलट आनंद है; दुःख है मायके को छोड़ने का। उसी तरह मरनेवाले को जहाँ जाना है उसका दुःख होने का कारण नही, परंतु यहाँ बने हुए भावसंबंधों को छोड़कर जाना पड़ता है। यह वियोग का दुःख है। ऐसी स्थिति अर्जुन जैसे विद्वान की भी हो गयी थी। तभी उस विषाद में से भगवद्गीता का उद्भव हुंआ और विश्व को अमूल्य ग्रंथ मिला।
मृत्यु तो जीवन का सौंदर्य है, जीवन का श्रृंगार है। मृत्यु यदि न हो तो शायद जीवन की इतनी महिमा ही न होती। मृत्यु है इसलिये तो जीवन में आंनद है, जीवन मे काव्य है, जीवन रसमय है।
मृत्यु यदि न होतो क्या होगा ? सृष्टि की व्यवस्था ही चरमरा जाएगी। प्रत्येक घर में कितने लोग जमा हो जाएंगे ? बेटे, पिता, दादा, परदादा, उनके दादा!
#ॐ_त्र्यम्बकं_यजामहे_सुगन्धिं_पुष्टिवर्धनम्।
#उर्वारुकमिव_बन्धनान्_मृत्योर्मुक्षीय_मामृतात्॥
है महामृत्युंजय नाथ हमारे जीवन से आपकी याने मृत्यु की भीति दूर करो।
॥हरि: 🕉 तत्सत्॥
🔆 इदं न मम 🔆
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