शास्त्रार्थ - वाद
🙏 सुप्रभात, आज मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष द्वितीया सोमवार दिनांक २४.१२.२०१८ 🙏
🕉 #कृष्णं_वंदे_जगद्गुरूम् 🕉
जगद्गुरू आद्य शंकराचार्य के साथ तत्कालीन मिथिला नगरी के विद्वान पंडित मंडनमिश्र के साथ शास्त्रार्थ में निर्णायक की भूमिका में मंडनमिश्र की पत्नी शारदा।
श्रीमद्भगवगिता में अपनी दैवीसंपदा एवं विभूति दर्शनमें प्रभु ने कहा है:
#सर्गाणामादिरन्तश्च_मध्यं_चैवाहमर्जुन।
#अध्यात्मविद्या_विद्यानां_वादः_प्रवदतामहम्॥ (भ ग १०/३२)
अर्थात् हे अर्जुन ! सृष्टियोंका आदि, अन्त और मध्य अर्थात् उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय मैं हूँ। समस्त विद्याओं में जो कि मोक्ष देनेवाली होनेके कारण प्रधान है वह अध्यात्मविद्या मैं हूँ। और परस्पर शास्त्रार्थ करनेवालोंका (तत्त्व निर्णयके लिये किया जानेवाला) वाद मैं हूँ।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कहते है की :#वादः_प्रवदतामहम् परस्पर शास्त्रार्थ करनेवालोंका (तत्त्व निर्णयके लिये किया जानेवाला) वाद मैं हूँ।
प्राचीन भारत में दार्शनिक एवं धार्मिक वाद-विवाद, चर्चा या प्रश्नोत्तर को शास्त्रार्थ (शास्त्र+अर्थ) कहते थे। इसमें दो या अधिक व्यक्ति किसी गूढ़ विषय के असली अर्थ पर चर्चा करते थे।
किसी विषय के सम्बन्ध में सत्य और असत्य के निर्णय हेतु परोपकार के लिए जो वाद-विवाद होता है उसे शास्त्रार्थ कहते हैं। शास्त्रार्थ का शाब्दिक अर्थ तो शास्त्र का अर्थ है , वस्तुतः मूल ज्ञान का स्रोत शास्त्र ही होने से प्रत्येक विषय के लिए निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए शास्त्र का ही आश्रय लेना होता है अतः इस वाद-विवाद को शास्त्रार्थ कहते हैं जिसमे तर्क,प्रमाण और युक्तियों के आश्रय से सत्यासत्य निर्णय होता है। शास्त्रार्थ और डिबेट (debate) में बहुत अन्तर है।
शास्त्रार्थ विशेष नियमों के अंतर्गत होता है,अर्थात ऐसे नियम जिनसे सत्य और असत्य का निर्णय होने में आसानी हो सके इसके विपरीत डिबेट में ऐसे पूर्ण नियम नहीं होते। शास्त्रार्थ में महर्षि गौतम कृत न्यायदर्शन द्वारा प्रतिपादित विधि ही प्रामाणिक है।
शास्त्रतः का इतिहास लाखों वर्षो पुराना है, इतिहास कि दृष्टि से हम शास्त्रार्थ के इतिहास को तीन भागों में विभक्त कर सकते है।
#वैदिक_कालीन_शास्त्रार्थ :
वैदिक काल में एक से बढ़कर एक विद्वान ऋषि थे, उस काल में भी भी शास्त्रार्थ हुआ करता था, वैदिक काल में ज्ञान अपनी चरम सीमा पर था, उस काल में शास्त्रार्थ का प्रयोजन ज्ञान कि वृद्धि था क्यों कि उस काल कोई भ्रम नहीं था, ज्ञान के सूर्य ने धरती को प्रकाशित कर रखा था, उस काल शास्त्रार्थ प्रतियोगिताएं होती थी, न सिर्फ ऋषि अपितु ऋषिकाएँ भी एक से बढ़कर एक शास्त्रार्थ महारथी थी। वैदिक काल के शास्त्रार्थ में #गार्गी_और_याज्ञवल्क्य_का_शास्त्रार्थ मुख्य है।
#मध्यकालीन_शास्त्रार्थ :
जब महाभारत का युद्ध हुआ तो भारतवर्ष का सम्पूर्ण ज्ञान विज्ञानं नष्टप्रायः हो चला, इस तरह हजारों सालों तक यह सिलसिला चलता रहा, लोगों में भ्रम बढ़ते गए, कोई नास्तिक हो चला, कोई भोगवादी बन गया, इस तरह एक धर्म न रहकर असंख्य मजहब बनते चले गए, भारतवर्ष के बाहर के मजहब और अधिक अवैज्ञानिक बनते गए, इस तरह एक समय पूरे भारतवर्ष में जैन एवं बौद्ध मत का साम्राज्य फ़ैल गया, जैन और बौद्ध मत वेदों कि निंदा करते थे, ऐसे समय में दो महान शास्त्रार्थ महारथी भारतवर्ष में हुए जिन्होंने अकेले बौद्ध और जैन मत को पुरे भारतवर्ष में परास्त कर दिया। यह दो महारथी थे : #शंकराचार्य एवं #आचार्य_कुमारिल_भट्ट
#वर्तमान_शास्त्रार्थ_वाद :
वाद-विवाद या बहस, किसी विषय पर चर्चा की एक औपचारिक विधि है। वाद-विवाद में दो परस्पर विपरीत विचारों के समर्थक अपना-अपना तर्क रखते हैं और दूसरे के कथनों का खण्डन करने का प्रयत्न करते हैं। वाद-विवाद सार्वजनिक बैठकों में हो सकता है, शैक्षणिक सम्स्थानों में हो सकता है, विधायीका सभाओं (जैसे संसद, विधानसभा) में हो सकता है। वाद-विवाद एक औपचारिका चर्चा है जिसमें प्रतिभागियों के अलावा प्रायः एक संचालक होता है और श्रोता होते हैं।
तार्किक सुसंगति (consistency), तथ्यात्मक परिशुद्धता, तथा कुछ सीमा तक श्रोताओं से भावनात्मक जुड़ाव (अपील) वाद-विवाद के मुख्य अंग हैं। जब कोई औपचारिक वाद-विवाद प्रतियोगिता की जाती है तब आपसी मतभेदों पर चर्चा करने और उन्हें सलटाने के लिए नियम भी बनाए गये होते हैं।
वाद मे विवाद नहि संवाद अपेक्षित है।
॥हरि: 🕉 तत्सत्॥
🔆 इदं न मम 🔆
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