वरुणदेव
🙏 सुप्रभात, आज मार्गशीर्ष शुक्ल तृतीया सोमवार दिनांक १०.१२.२०१८ 🙏
श्रीमद्भगवगिता में अपनी दैवीसंपदा एवं विभूति दर्शनमें प्रभु ने कहा है:
#अनन्तश्चास्मि_नागानां_वरुणो_यादसामहम्।
#पितृ़णामर्यमा_चास्मि_यमः_संयमतामहम्॥ (भ ग १०/२९)
अर्थात् : नागोंके नाना भेदोंमें मैं अनन्त हूँ अर्थात् नागराज शेष हूँ और जलसम्बन्धी देवोंमें उनका राजा वरुण मैं हूँ। मैं पितरोंमें अर्यमा नामक पितृराज हूँ और शासन करनेवालोंमें यमराज हूँ।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कहते है की : #वरुणो_यादसामहम् जलसम्बन्धी देवोंमें उनका राजा वरुण मैं हूँ।
#वरुणदेव :
पंचमहाभूतों में से एक मुख्य तत्व जल, आप, पानी के देव #वरुण हिन्दू धर्म के एक प्रमुख देवता हैं। ' वरुण देवता ' देवताओं के देवता है। देवताओं के तीन वर्गो (पृथ्वी स्थान, वायु स्थान और आकाश स्थान) में वरुण का सर्वोच्च स्थान है। देवताओं में तीसरा स्थान 'वरुण' का माना जाता है, जिसे समुद्र का देवता, विश्व के नियामक और शासक सत्य का प्रतीक, ऋतु परिवर्तन एवं दिन-रात का कर्ता-धर्ता, आकाश, पृथ्वी एवं सूर्य का निर्माता के रूप में जाना जाता है।
मगरमच्छ जिनका वाहन है ऐसे मकर पर विराजमान मित्र और वरुण देव दोनों भाई हैं और यह जल जगत के देवता है। उनकी गणना देवों और दैत्यों दोनों में की जाती है। भागवत पुराण के अनुसार वरुण और मित्र को कश्यप ऋषि की पत्नीं अदिति की क्रमशः नौंवीं तथा दसवीं संतान बताया गया है। मित्र और वरुण दोनों को ऋग्वेद में अलग और प्राय: एक साथ भी वर्णन है, अधिकांश पुराणो में #मित्रावरुण इस एक ही शब्द द्वारा उल्लेख है।। ये द्वादश आदित्य में भी गिने जाते हैं। ये दोनों जल पर सार्वभौमिक राज करते हैं, जहां ' मित्र ' सागर की गहराईयों एवं गहनता से संबद्ध है वहीं वरुण सागर के ऊपरी क्षेत्रों, नदियों एवं तटरेखा पर शासन करते हैं। मित्र सूर्योदय और दिवस से संबद्ध हैं जो कि सागर से उदय होता है, जबकि वरुण सूर्यास्त एवं रात्रि से संबद्ध हैं जो सागर में अस्त होती है।
दोनों देवता पृथ्वी एवं आकाश को जल से संबद्ध किये रहते हैं तथा दोनों ही चंद्रमा, सागर एवं ज्वार से जुड़े रहते हैं। भौतिक मानव शरीर में मित्र शरीर से मल को बाहर निकालते हैं जबकि वरुण पोषण को अंदर लेते हैं, इस प्रकार मित्र शरीर के निचले भागों (गुदा एवं मलाशय) से जुड़े हैं वहीं वरुण शरीर के ऊपरी भागों (मुख एवं जिह्वा) पर शासन करते हैं। मित्र, वरुण एवं अग्नि को ईश्वर के नेत्र स्वरूप माना जाता है।
प्राचीन वैदिक धर्म में उनका स्थान बहुत ही महत्त्वपूर्ण था पर वेदों में उसका रूप इतना अमूर्त (अव्यक्त) हैं कि उसका प्राकृतिक चित्रण मुश्किल है। माना जाता है कि वरुण की स्थिति अन्य वैदिक देवताओं की अपेक्षा प्राचीन है, इसीलिए वैदिक युग में वरुण किसी प्राकृतिक उपादान का वाचक नहीं है। अग्नि व इंद्र की अपेक्षा वरुण को संबोधित सूक्तों की मात्रा बहुत कम है फिर भी उसका महत्व कम नहीं है।
इंद्र को महान योद्धा के रूप में जाना जाता है तो वरुण को नैतिक शक्ति का महान पोषक माना गया है, वह ऋत (सत्य) का पोषक है। अधिकतर सूक्तों में वस्र्ण के प्रति उदात्त भक्ति की भावना दिखाई देती है। ऋग्वेद के अधिकतर सूक्तों में वरुण से किए गए पापों के लिए क्षमा प्रार्थना की गई हैं। वरुण को अन्य देवताओं जैसे इंद्र आदि के साथ भी वर्णित किया गया है। वरुण से संबंधित प्रार्थनाओं में भक्ति भावना की पराकाष्ठा दिखाई देती है। उदाहरण के लिए ऋग्वेद के सातवें मंडल में वस्र्ण के लिए सुंदर प्रार्थना गीत मिलते हैं।
वरुण देव के अवतार #झूलेलाल या #दरियालाल यह #सिंधी समाज ( पाकिस्तान सिंध प्रांत में बसनेवाले हिन्दुओं = सिंधी) और गुजराती #लोहाणा समाज के उपास्य देव हैं। जिन्हें 'इष्ट देव' के रूप में पूजा जाता है। उनके उपासक उन्हें वरुण (जल देवता) का अवतार मानते हैं। वरुण देव को सागर के देवता, सत्य के रक्षक और दिव्य दृष्टि वाले देवता के रूप में सिंधी-लोहाणा समाज भी पूजता है। जल से सभी सुखों की प्राप्ति होती है और जल ही जीवन है। विश्व की अन्य सभ्यताओं में वरुण देवता को।पूज्य माना गया है।
वरुण को ईरान पारसी धर्म में #अहुरमज्द' तथा यूनान में #यूरेनस के नाम से जाना जाता है। वरुण देवता ऋतु के संरक्षक थे इसलिए इन्हें #ऋतस्यगोप भी कहा जाता था। वरुण के साथ मित्र का भी उल्लेख है इन दोनों को मिलाकर मित्र वरुण कहते हैं।
#ॐ_अपां_पतये_वरुणाय_नमः।
॥हरि: 🕉 तत्सत्॥
🔆 इदं न मम 🔆
🙏🙏🙏🙏🙏
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#अनन्तश्चास्मि_नागानां_वरुणो_यादसामहम्।
#पितृ़णामर्यमा_चास्मि_यमः_संयमतामहम्॥ (भ ग १०/२९)
अर्थात् : नागोंके नाना भेदोंमें मैं अनन्त हूँ अर्थात् नागराज शेष हूँ और जलसम्बन्धी देवोंमें उनका राजा वरुण मैं हूँ। मैं पितरोंमें अर्यमा नामक पितृराज हूँ और शासन करनेवालोंमें यमराज हूँ।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कहते है की : #वरुणो_यादसामहम् जलसम्बन्धी देवोंमें उनका राजा वरुण मैं हूँ।
#वरुणदेव :
पंचमहाभूतों में से एक मुख्य तत्व जल, आप, पानी के देव #वरुण हिन्दू धर्म के एक प्रमुख देवता हैं। ' वरुण देवता ' देवताओं के देवता है। देवताओं के तीन वर्गो (पृथ्वी स्थान, वायु स्थान और आकाश स्थान) में वरुण का सर्वोच्च स्थान है। देवताओं में तीसरा स्थान 'वरुण' का माना जाता है, जिसे समुद्र का देवता, विश्व के नियामक और शासक सत्य का प्रतीक, ऋतु परिवर्तन एवं दिन-रात का कर्ता-धर्ता, आकाश, पृथ्वी एवं सूर्य का निर्माता के रूप में जाना जाता है।
मगरमच्छ जिनका वाहन है ऐसे मकर पर विराजमान मित्र और वरुण देव दोनों भाई हैं और यह जल जगत के देवता है। उनकी गणना देवों और दैत्यों दोनों में की जाती है। भागवत पुराण के अनुसार वरुण और मित्र को कश्यप ऋषि की पत्नीं अदिति की क्रमशः नौंवीं तथा दसवीं संतान बताया गया है। मित्र और वरुण दोनों को ऋग्वेद में अलग और प्राय: एक साथ भी वर्णन है, अधिकांश पुराणो में #मित्रावरुण इस एक ही शब्द द्वारा उल्लेख है।। ये द्वादश आदित्य में भी गिने जाते हैं। ये दोनों जल पर सार्वभौमिक राज करते हैं, जहां ' मित्र ' सागर की गहराईयों एवं गहनता से संबद्ध है वहीं वरुण सागर के ऊपरी क्षेत्रों, नदियों एवं तटरेखा पर शासन करते हैं। मित्र सूर्योदय और दिवस से संबद्ध हैं जो कि सागर से उदय होता है, जबकि वरुण सूर्यास्त एवं रात्रि से संबद्ध हैं जो सागर में अस्त होती है।
दोनों देवता पृथ्वी एवं आकाश को जल से संबद्ध किये रहते हैं तथा दोनों ही चंद्रमा, सागर एवं ज्वार से जुड़े रहते हैं। भौतिक मानव शरीर में मित्र शरीर से मल को बाहर निकालते हैं जबकि वरुण पोषण को अंदर लेते हैं, इस प्रकार मित्र शरीर के निचले भागों (गुदा एवं मलाशय) से जुड़े हैं वहीं वरुण शरीर के ऊपरी भागों (मुख एवं जिह्वा) पर शासन करते हैं। मित्र, वरुण एवं अग्नि को ईश्वर के नेत्र स्वरूप माना जाता है।
प्राचीन वैदिक धर्म में उनका स्थान बहुत ही महत्त्वपूर्ण था पर वेदों में उसका रूप इतना अमूर्त (अव्यक्त) हैं कि उसका प्राकृतिक चित्रण मुश्किल है। माना जाता है कि वरुण की स्थिति अन्य वैदिक देवताओं की अपेक्षा प्राचीन है, इसीलिए वैदिक युग में वरुण किसी प्राकृतिक उपादान का वाचक नहीं है। अग्नि व इंद्र की अपेक्षा वरुण को संबोधित सूक्तों की मात्रा बहुत कम है फिर भी उसका महत्व कम नहीं है।
इंद्र को महान योद्धा के रूप में जाना जाता है तो वरुण को नैतिक शक्ति का महान पोषक माना गया है, वह ऋत (सत्य) का पोषक है। अधिकतर सूक्तों में वस्र्ण के प्रति उदात्त भक्ति की भावना दिखाई देती है। ऋग्वेद के अधिकतर सूक्तों में वरुण से किए गए पापों के लिए क्षमा प्रार्थना की गई हैं। वरुण को अन्य देवताओं जैसे इंद्र आदि के साथ भी वर्णित किया गया है। वरुण से संबंधित प्रार्थनाओं में भक्ति भावना की पराकाष्ठा दिखाई देती है। उदाहरण के लिए ऋग्वेद के सातवें मंडल में वस्र्ण के लिए सुंदर प्रार्थना गीत मिलते हैं।
वरुण देव के अवतार #झूलेलाल या #दरियालाल यह #सिंधी समाज ( पाकिस्तान सिंध प्रांत में बसनेवाले हिन्दुओं = सिंधी) और गुजराती #लोहाणा समाज के उपास्य देव हैं। जिन्हें 'इष्ट देव' के रूप में पूजा जाता है। उनके उपासक उन्हें वरुण (जल देवता) का अवतार मानते हैं। वरुण देव को सागर के देवता, सत्य के रक्षक और दिव्य दृष्टि वाले देवता के रूप में सिंधी-लोहाणा समाज भी पूजता है। जल से सभी सुखों की प्राप्ति होती है और जल ही जीवन है। विश्व की अन्य सभ्यताओं में वरुण देवता को।पूज्य माना गया है।
वरुण को ईरान पारसी धर्म में #अहुरमज्द' तथा यूनान में #यूरेनस के नाम से जाना जाता है। वरुण देवता ऋतु के संरक्षक थे इसलिए इन्हें #ऋतस्यगोप भी कहा जाता था। वरुण के साथ मित्र का भी उल्लेख है इन दोनों को मिलाकर मित्र वरुण कहते हैं।
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