आत्मविद्या ' नचिकेता '

🙏 सुप्रभात, आज मार्गशीर्ष कृष्णपक्ष प्रथमा शनिवार दिनांक २३.१२.२०१८ 🙏 


🕉 #कृष्णं_वंदे_जगद्गुरूम् 🕉   
नचिकेता यमराज के द्वार पर आत्मविद्या के लिये प्रतीक्षा करते हुए

श्रीमद्भगवगिता में अपनी दैवीसंपदा एवं विभूति दर्शनमें प्रभु ने कहा है: 
#सर्गाणामादिरन्तश्च_मध्यं_चैवाहमर्जुन।
#अध्यात्मविद्या_विद्यानां_वादः_प्रवदतामहम्॥ (भ ग १०/३२)
अर्थात् हे अर्जुन ! सृष्टियोंका आदि, अन्त और मध्य अर्थात् उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय मैं हूँ। समस्त विद्याओं में जो कि मोक्ष देनेवाली होनेके कारण प्रधान है वह अध्यात्मविद्या मैं हूँ। और परस्पर शास्त्रार्थ करनेवालोंका (तत्त्व निर्णयके लिये किया जानेवाला) वाद मैं हूँ।

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कहते है की :#अध्यात्मविद्या_विद्यानां समस्त विद्याओं में जो कि मोक्ष देनेवाली होनेके कारण प्रधान है वह अध्यात्मविद्या मैं हूँ।

#आत्मविद्या :
कठोपनिषद में #नचिकेता की कहानी आती है, कथा इस प्रकार है कि किसी समय #वाजश्रवा ऋषि के पुत्र #वाजश्रवस_उद्दालक मुनि ने #विश्वजित_यज्ञ करके सर्वदक्षिणा दान का संकल्प कर अपना सम्पूर्ण धन और गौएं दान कर दीं। जिस समय ऋत्विजों द्वारा दक्षिणा में प्राप्त वे गौएं ले जाई जा रही थीं, तब उन्हें देखकर वाजश्रवस उद्दालक मुनि का पुत्र नचिकेता सोच में पड़ गया; क्योंकि वे गौएं अत्यधिक जर्जर हो चुकी थीं। वे न तो दूध देने योग्य थीं, न प्रजनन के लिए उपयुक्त थीं। उसने सोचा कि इस प्रकार की गौओं को दान करना दूसरों पर भार लादना है। इससे तो पाप ही लगेगा।

नचिकेता ने पिता से कहा,। अगर आप कुछ नहीं देना चाहते थे, तो आपको पहले यह नहीं कहना चाहिए था। अब आप यह बताइए कि ' आप मुझे किसको दान देंगे ?’

ऐसा विचार कर नचिकेता ने अपने पिता से कहा -' हे तात! यह आपने ठीक नहीं किया इससे अच्छा तो था कि आप मुझे ही दान कर देते। ' बार-बार ऐसा कहने पर पिता ने क्रोधित होकर कह दिया - ' मैं तुझे मृत्यु याने यमदेवता को दान देता हूं। '

पिता की आज्ञा का पालन करने के लिए नचिकेता यम के द्वार पर जा पहुंचा। यमदेवता की अनुपस्थिति में नचिकेता तीन दिन तक भोजन-पानी के बिना यम के द्वार पर इंतजार करता रहा। तीन दिन बाद यम लौटे तो उन्होंने भूखे, लेकिन पक्के इरादे वाले छोटे से बालक को देखा। 

तब यम बोले, ' मुझे यह अच्छा लगा कि तुम तीन दिन से मेरा इंतजार कर रहे हो। मैं खुश होकर तुम्हें तीन वरदान देता हूं। उसे वरदान देने की बात कही, तो नचिकेता ने पहला वरदान मांगा।

#पहला_वरदान :
 ' हे मृत्युदेव! जब मैं आपके पास से लौटकर घर जाऊं, तो मेरे पिता क्रोध छोड़, शान्त चित्त होकर, मुझसे प्रेमपूर्वक व्यवहार करें और अपनी शेष आयु में उन्हें कोई चिन्ता न सताये तथा वे सुख से सो सकें।' यमराज ने 'तथास्तु, 'अर्थात् 'ऐसा ही हो' कहकर पहला वरदान दिया। 

#दूसरा_वरदान
' हे मृत्युदेव! आप मुझे स्वर्ग के साधनभूत उस #अग्निज्ञान' को प्रदान करें, जिसके द्वारा स्वर्गलोक को प्राप्त हुए पुरुष अमरत्व को प्राप्त करते हैं। ' 

यमराज ने नचिकेता को उपदेश देते हुए कहा -' हे नचिकेता! तुम इस ' अग्निविद्या ' को एकाग्र मन से सुनो। स्वर्गलोक को प्राप्त कराने वाली यह विद्या अत्यन्त गोपनीय है। ' तदुपरान्त यमराज ने नचिकेता को समझाया कि ऐसा यज्ञ करने के लिए कितनी ईंटों की वेदी बनानी चाहिए और यज्ञ किस विधि से किया जाये तथा कौन-कौन से मन्त्र उसमें बोले जायें। अन्त में नचिकेता की परीक्षा लेने के लिए यमराज ने उससे अपने द्वारा बताये यज्ञ का विवरण पूछा, तो बालक नचिकेता ने अक्षरश: उस विधि को दोहरा दिया। उसे सुनकर यमराज बालक की स्मरणशक्ति और प्रतिभा को देखकर बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा-' हे नचिकेता! तेरे मांगे गये तीन वरदानों के अतिरिक्त मैं तुम्हें एक वरदान अपनी ओर से यह देता हूं कि मेरे द्वारा कही गयी यह 'अग्निविद्या' आज से तुम्हारे नाम से जानी जायेगी। तुम इस अनेक रूपों वाली, ज्ञान-तत्त्वमयी माला को स्विकार करो।' 

नचिकेता को दिव्य 'अग्निविद्या' प्राप्त हुई। इसलिए उस विद्या का नाम #नचिकेताग्नि' (लिप्त न होने वाले की विद्या) पड़ा। इस प्रकार की त्रिविध 'नचिकेत' विद्या का ज्ञाता, तीन सन्धियों को प्राप्त कर, तीन कर्म सम्पन्न करके जन्म-मृत्यु से पार हो जाता है और परम शान्ति प्राप्त करता है। आचार्यों ने नचिकेत विद्या को ' प्राप्ति ' ' अध्यायन ' और ' अनुष्ठान ' तीन विधियों से युक्त कहा है। साधक को इन तीनों के साथ आत्म-चेतना की सन्धि करनी पड़ती है, अर्थात् स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण शरीर को इस विद्या से अनुप्राणित करना पड़ता है। इस प्रक्रिया को #त्रिसन्धि' प्राप्ति कहा जाता है। कुछ आचार्य माता-पिता और गुरु से युक्त होने को त्रिसन्धि' कहते हैं। इन सभी को दिव्याग्नि के अनुरूप ढालते हुए साधक जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है। अब उसने यमराज से तीसरा वर मांगा। 

#तीसरा_वरदान 
' हे मृत्युदेव! मनुष्य के मृत हो जाने पर आत्मा का अस्तित्त्व रहता है, ऐसा ज्ञानियों का कथन है, परन्तु कुछ की मान्यता है कि मृत्यु के बाद आत्मा का अस्तित्व नहीं रहता। आप मुझे इस सन्देह से मुक्त करके बतायें कि मृत्यु के पश्चात् आत्मा का क्या होता है ? 

नचिकेता के तीसरे वरदान को सुनकर यमराज ने सवाल को टालने की कोशिश की।उसे समझाया कि यह विषय अत्यन्त गूढ़ हैं, देवता भी इस प्रश्न का उत्तर नहीं जानते।नचिकेता ने कहा, ' अगर देवता भी इसका उत्तर नहीं जानते और सिर्फ आप ही जानते हैं, तब आपको ही इसका उत्तर देना होगा। यमराज ने कहा इसके बदले वे उसे समस्त विश्व की सम्पदा और साम्राज्य तक दे सकते हैं, किन्तु वह यह न पूछे कि मृत्यु के बाद आत्मा का क्या होता है; क्योंकि इसे जानना और समझना अत्यन्त अगम्य है, परन्तु नचिकेता किसी भी रूप में यमराज के प्रलोभन में नहीं आया और अपने मांगे हुए वरदान पर ही अड़ा रहा।  'अगर आपको कुछ देना ही है तो मेरे इस प्रश्न का उत्तर दें अन्यथा रहने दें, क्योंकि मुझे अन्य कोई भी वस्तु नहीं चाहिए।'  नचिकेता ने अपनी जिद नहीं छोड़ी। ऐसे उच्च जिज्ञासु को अंत में यम ने नचिकेता को विस्तार से आत्मा का ज्ञान दिया।

#द्वितीय_वल्ली 
यमराज ने नचिकेता के हठ को देखा, तो कहा-' हे नचिकेता ! ' कल्याण ' और ' सांसारिक भोग्य पदार्थों ' का मार्ग अलग-अलग है। ये दोनों ही मार्ग मनुष्य के सम्मुख उपस्थित होते हैं, किन्तु बुद्धिमान जन दोनों को भली-भांति समझकर उनमें से एक अपने लिए चुन लेते हैं। जो अज्ञानी होते हैं, वे भोग-विलास का मार्ग चुनते हैं और जो ज्ञानी होते हैं, वे कल्याण का मार्ग चुनते हैं। प्रिय नचिकेता ! श्रेष्ठ आत्मज्ञान को जानने का सुअवसर बड़ी कठिनाई से प्राप्त होता है। इसे शुष्क तर्कवितर्क से नहीं जाना जा सकता।' 

यमराज ने बताया - ' प्रिय नचिकेता! ' #ॐ ' ही वह #परमपद है। ' ॐ ' ही #अक्षरब्रह्म है। इस अक्षरब्रह्म को जानना ही ' #आत्माज्ञान ' है, यही अध्यात्माविद्या है।साधक अपनी आत्मा से साक्षात्कार करके ही इसे जान पाता है; क्योंकि आत्मा ही ' ब्रह्म ' को जानने का प्रमुख आधार है। एक साधक मानव-शरीर में स्थित इस आत्मा को ही जानने का प्रयत्न करता है।' 

#न_जायते_म्रियते_वा_कदाचि_न्नायं_भूत्वा_भविता_वा_न_भूयः।
#अजो_नित्यः_शाश्वतोऽयं_पुराणो_न_हन्यते_हन्यमाने_शरीरे॥ (भ ग २/२०)
अर्थात् : यह आत्मा किसी काल में भी न जन्मता है और न मरता है और न यह एक बार होकर फिर अभावरूप होने वाला है। यह आत्मा अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है। शरीर के नाश होने पर भी इसका नाश नहीं होता।

' हे नचिकेता ! परमात्मा इस जीवात्मा के हृदय-रूपी गुफ़ा में अणु से भी अतिसूक्ष्म और महान से भी अतिमहान रूप में विराजमान हैं। निष्काम कर्म करने वाला तथा शोक-रहित कोई विरला साधक ही, परमात्मा को कृपा से उसे देख पाता है। दुष्कर्मों से युक्त, इन्द्रियासक्त और सांसारिक मोह में फंसा ज्ञानी व्यक्ति भी आत्मतत्त्व को नहीं जान सकता। 

#तृतीय_वल्ली 
' हे नचिकेता ! जो विवेकशील है, जिसने मन सहित अपनी समस्त इन्द्रियों को वश में कर लिया है, जो सदैव पवित्र भावों को धारण करने वाला है, वही उस आत्म-तत्त्व को जान पाता है; क्योंकि
#एष_सर्वेषु_भूतेषु_गूढात्मा_न_प्रकाशते। 
#दृश्यते_त्वग्रय्या_बुद्धिया_सूक्ष्मया_सूक्ष्मदर्शिभि:॥ 1/3/12
अर्थात् समस्त प्राणियों में छिपा हुआ यह आत्मतत्त्व प्रकाशित नहीं होता, वरन् यह सूक्ष्म दृष्टि रखने वाले तत्त्वदर्शियों को ही सूक्ष्म बुद्धि से दिखाई देता है।

वे उसे आशीर्वाद देते हुए बोले- 'वत्स, तुम ज्ञान प्राप्त करो और विद्या अध्ययन करो तो तुम्हें सिर्फ इसी प्रश्न का ही नहीं बल्कि संसार के सभी प्रश्नों का उत्तर प्राप्त हो सकता है, क्योंकि विद्या वह खजाना है जिसकी बराबरी संसार की कोई दूसरी वस्तु नहीं कर सकती।' 

उसके बाद यमराज ने नचिकेता को आशीर्वाद देकर उसे उसके पिता के पास वापस भेज दिया। वहां से लौटने के बाद नचिकेता अध्ययन में लग गया, क्योंकि जीवन की सही राह उसे प्राप्त हो चुकी थी। उसी राह पर चलकर ' नचिकेता ' को एक बहुत बड़ा विद्वान बना और सारे संसार में उसका नाम अमर हो गया।

आत्मज्ञान के सिद्ध नचिकेता का नाम इतिहास कितना महान है यह बात हमे स्वामी विवेकानंद के अनमोल वचन  से समज में आयेंगी : #मुझे_100_नचिकेता_दें_मैं_दुनिया_को_बदल_दूंगा !
#Swami_Vivekanand_said : 
#Give_me_100_NACHIKETA_I_will_change_the_world !

॥हरि: 🕉 तत्सत्॥

🔆  इदं न मम  🔆 

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