गंधर्वराज चित्ररथ

🙏 सुप्रभात, आज कार्तिक कृष्ण नवमी शनिवार दिनांक १.१२.२०१८ 🙏

🕉 #कृष्णं_वंदे_जगद्गुरूम् 🕉 

श्रीमद्भगवगिता में अपनी दैवीसंपदा एवं विभूति दर्शनमें प्रभु ने कहा है:
#अश्वत्थः_सर्ववृक्षाणां_देवर्षीणां_च_नारदः।
#गन्धर्वाणां_चित्ररथः_सिद्धानां_कपिलो_मुनिः॥ (भ ग १०/२६)
अर्थात् :  समस्त वृक्षोंमें पीपलका वृक्ष; और देवर्षियोंमें अर्थात् जो देव होकर मन्त्रोंके द्रष्टा होनेके कारण ऋषि भावको प्राप्त हुए हैं उनमें मैं नारद हूँ। गन्धर्वोंमें मैं चित्ररथ नामक गन्धर्व हूँ; सिद्धोंमें अर्थात् जन्मसे ही अतिशय धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्यको प्राप्त हुए पुरुषोंमें मैं कपिलमुनि हूँ।

श्रीमद्भगवगिता में भगवान कहते है कि #गन्धर्वाणां_चित्ररथः गन्धर्वोंमें मैं चित्ररथ नामक गन्धर्व हूँ।

#चित्ररथ_गंधर्व
यक्ष गन्धर्व, किन्नर, विद्याधरी ये सब उपदेवताओं की श्रेणी में आते है। गन्धर्व स्वर्ग में रहने वाले निम्न वर्ग के देवता है; भारतीय संगीतज्ञ के रूप में जाने जाते हैं, गन्धर्व स्वर्ग में रहते हैं तथा अप्सराओं के पति हैं। गंधर्वराज पुष्पदंत  इंद्र  की सभा के गायक थे। हिन्दू धर्मशास्त्र में यह देवताओं तथा मनुष्यों के बीच दूत (संदेश वाहक) होते हैं। भारतीय परंपरा में आपसी तथा पारिवारिक सहमति के बिना गंधर्व विवाह  अनुबंधित होता है।

महाभारत कथानुसार पांडवों के जंगलवास दरम्यान पांडवों के साथ कुंती ने पांचाल देश की ओर प्रस्थान किया। मार्ग में गंगा के किनारे सोमाश्रयायण नामक तीर्थ पड़ता था। रात्रि की बेला में वे वहां जा रहे थे।

उस समय गंगा में गंधर्वराज अंगारपर्ण चित्ररथ अपनी पत्नी के साथ जलक्रीड़ा कर रहा थां उस एकांत में पांडवों की पदचाप सुनकर वह क्रुद्ध हो उठा। पांडवों में सबसे आगे हाथ में मशाल लिये अर्जुन चल रहे थे। चित्ररथ ने कहा कि रात्रि का समय गंधर्व, यक्ष तथा राक्षसों के विचरण के लिए निश्चित है अत: उनका आगमन अनुचित था। उसने अर्जुन पर प्रहार किया। अर्जुन ने उसपर आग्नेयास्त्र छोड़ दिया, जिससे वह मूर्च्छित हो गया।

उसकी पत्नी कुंभीनसी ने युधिष्ठिर की शरण ग्रहण की। पांडवों ने चित्ररथ को छोड़ दिया। चित्ररथ ने कृतज्ञता प्रदर्शन करते हुए उन्हें #चाक्षुषी_विद्या सिखायी। इस विद्या के प्रभाव से, जिसे जिस रूप में देखने की इच्छा हो, देखा जा सकता है।

चित्ररथ ने प्रत्येक पांडव को गंधर्वलोक के सौ-सौ घोड़े प्रदान किये जो स्वेच्छा से आकार-प्रकार तथा रंग बदलने में समर्थ थे। वे घोड़े कभी भी स्मरण करने पर उपस्थित हो सकते थे। अर्जुन ने चित्ररथ को दिव्यास्त्र (आग्नेयास्त्र) की विद्या प्रदान की। चित्ररथ का रथ उस युद्ध में खंडित हो गया था अत: उसने अपना नाम चित्ररथ के स्थान पर दग्धरथ रख लिया।

चित्ररथ कुबेर के सखा माने जाते हैं। ये गंधर्वराज, अगारपर्ण, दग्धरथ और कुबेरसख भी कहलाते हैं ।

॥हरि: 🕉 तत्सत्॥

🔆  इदं न मम  🔆

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