धाताऽहं विश्वतोमुखः
🙏 सुप्रभात, आज मार्गशीर्ष शुक्ल अष्टमी शनिवार दिनांक २९.१२.२०१८ 🙏
🕉 #कृष्णं_वंदे_जगद्गुरूम् 🕉
श्रीमद्भगवद्गीता में अपनी दैवीसंपदा एवं विभूति दर्शनमें प्रभु ने कहा है:
#अक्षराणामकारोऽस्मि_द्वन्द्वः_सामासिकस्य_च।
#अहमेवाक्षयः_कालो_धाताऽहं_विश्वतोमुखः॥ (भ ग १०/३३)
अर्थात्।: मैं अक्षरों (वर्णमाला) में अ कार और समासों में द्वन्द्व (नामक समास) हूँ मैं अक्षय काल अर्थात् कालका भी महाकाल तथा सब ओर मुखवाला विश्वतोमुख (विराट् स्वरूप) धाता हूँ भी मैं हूँ।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कहते है की : #धाताऽहं_विश्वतोमुखः सब ओर मुखवाला विश्वतोमुख (विराट् स्वरूप) विधाता भी मैं हूँ।
विश्वरूप अथवा विराट रूप भगवान योगेश्वर कृष्ण का सार्वभौमिक स्वरूप है। इस रूप का प्रचलित कथा भगवद्गीता के अध्याय ११ पर है, जिसमें भगवान कृष्ण अर्जुन को कुरुक्षेत्र युद्ध में विश्वरूप दर्शन कराते हैं। इसके संदर्भ में वेदव्यास कृत महाभारत ग्रंथ प्रचलित है। परंतु विश्वरूप दर्शन राजा बलि आदि ने भी किया है।
विश्वरूप के दर्शन हेतु अर्जुन की प्रार्थना....
भगवान से गीता मे गूढ़ अध्यात्मिक ज्ञान सुनने के पश्चात अर्जुन का मोह नष्ट हो गया। अब अर्जुन भगवान के वास्तविक स्वरूप को देखने के लिए तैयार है।
पश्चात अर्जुन भगवान क्रष्ण से कहते है - मुझ पर अनुग्रह करने के लिए आपने जो परम गोपनीय अध्यात्म विषयक वचन अर्थात उपदेश कहा, उससे मेरा यह अज्ञान नष्ट हो गया है। हे कमलनेत्र! मैंने आपसे भूतों की उत्पत्ति और प्रलय विस्तारपूर्वक सुने हैं तथा आपकी अविनाशी महिमा भी सुनी है। हे परमेश्वर ! आप अपने को जैसा कहते हैं, यह ठीक ऐसा ही है, परन्तु हे पुरुषोत्तम ! आपके ज्ञान, ऐश्वर्य, शक्ति, बल, वीर्य और तेज से युक्त ऐश्वर्य-रूप को मैं प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ। हे प्रभु ! यदि मेरे द्वारा आपका वह रूप देखा जाना सम्भव है - ऐसा आप मानते हैं, तो हे योगेश्वर ! उस अविनाशी स्वरूप का मुझे दर्शन कराइए।
#मन्यसे_यदि_तच्छक्यं_मया_द्रष्टुमिति_प्रभो।
#योगेश्वर_ततो_मे_त्वं_दर्शयाऽत्मानमव्ययम्॥ (भ ग ११/४)
अर्जुन कहता है, हे प्रभो ! यदि आप मानते हैं कि मेरे द्वारा वह आपका रूप देखा जाना संभव है। तो हे योगेश्वर आप अपने अव्यय रूप का दर्शन कराइये। कृपया मेरी प्रार्थना स्वीकार करें।
भगवानुवाच
#पश्य_मे_पार्थ_रूपाणि_शतशोऽथ_सहस्रशः।
#नानाविधानि_दिव्यानि_नानावर्णाकृतीनि_च। (भ ग ११/५)
श्री भगवान बोले- हे पार्थ! अब तू मेरे सैकड़ों-हजारों नाना प्रकार के और नाना वर्ण तथा नाना आकृति वाले अलौकिक रूपों को देख।
#दिव्यम_ददामि_ते_चक्षु_पश्य_मे_योगमेश्वर्यम - मैं तुझे दिव्य अर्थात अलौकिक चक्षु देता हूँ, इससे तू मेरी ईश्वरीय योग शक्ति को देख। बिना दिव्य अलौकिक नेत्रो के ईश्वर का स्वरूप देखा जाना संभव नही है। हे अर्जुन, तुम अपनी इन सांसारिक आँखों से मेरे दिव्य स्वरुप को देखने में सक्षम नहीं हो। इसलिए मै तुम्हे दिव्य चक्षु देता हूँ जिससे तुम मेरी योग शक्ति की मदद से मेरा एश्वर्य शाली स्वरुप देख पाओगें।
#दिव्यानि_रूपाणि_पश्य.... इनमे १२ आदित्य, ८ वसु, ११ रुद्र, २ अश्विनीकुमार, ४९ मरुतगण को और कई जिनको किसी ने भी आज तक नहीं देखा इन सब मेरे रूपों को देख।
#अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम्।
#अनेकदिव्याभरणं_दिव्यानेकोद्यतायुधम्॥ (भ ग ११/१०)
#दिव्यमाल्याम्बरधरं_दिव्यगन्धानुलेपनम्।
#सर्वाश्चर्यमयं_देवमनन्तं_विश्वतोमुखम्॥ (भ ग ११/११)
अनेक मुख और नेत्रों से युक्त, अनेक अद्भुत दर्शनों वाले, बहुत से दिव्य भूषणों से युक्त और बहुत से दिव्य शस्त्रों को धारण किए हुए और दिव्य गंध का सारे शरीर में लेप किए हुए, सब प्रकार के आश्चर्यों से युक्त, सीमारहित और सब ओर मुख किए हुए, यह सांसारिक ऐश्वर्य से अशंख्य गुना अधिक भगवान का वैभव। अनेको तरह की मालाएं, दिव्य गंध का सारे शरीर में लेप किए हुए, अनेक मुख सभी दिशाओं में देखने वाले, आकाश में हजार सूर्यों के एक साथ उदय होने से उत्पन्न जो प्रकाश हो, वह भी उस विश्व रूप परमात्मा के प्रकाश के सदृश कदाचित् ही हो। इस आश्चर्य स्वरुप को अर्जुन ने देखा। यह भगवान् का विराट स्वरुप था। विराट्स्वरूप परमदेव परमेश्वर को अर्जुन ने देखा।
अनेकोअनेक मुख, अनेको आँखे, अनेक दिव्य आभूषण, अनेकोअनेक दिव्य शस्त्रो को धारण किये हुए भगवान श्रीकृष्ण का यह रूप अर्जुन की कल्पना से परे था। संजय तो दृष्ट का वर्णन कर रहा था, धृतराष्ट्र सुन रहे थे और अर्जुन तो दिव्य दृष्टी से स्वयं परमात्मा को देख रहा था। परमात्मा का यह पहला चेहरा है अर्जुन के लिए। अर्जुन क्षत्रिय हो ने कारण उसे परमात्मा का यह ईश्वर और ऐश्वर्य वाला रूप अच्छा लगा। ईश्वर याने स्वामी या मालिक। क्षत्रिय तो स्वभाव से ही ऐश्वर प्राप्ति के लिए जीता और लड़ता है। वह गुलाम बन कर नहीं रह सकता। शायद इसीलिए श्रीकृष्ण ने अपना पहला ऐश्वर्ययुक्त रूप अर्जुन को दिखाया।
#अनेक_बाहू_उदर_वक्त्र_नेत्रं_पश्यामि...
अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण के विराट रूप को देख कर प्रार्थना करते हुए कहा, ओ मेरे स्वामी ! आप इस सारे ब्रह्माण्ड के स्वामी हैं, आप विश्वेश्वर हैं, मै आप में अनगिनत हाथों, उदर,चहरे, आँखें देख रहा हूँ. और आप को अनंत रूपों वाला देखता हूँ. मै आप का आदि, मध्य, या अंत स्वरुप नहीं देख पा रहा हूँ।
अर्जुन भगवान का यह स्वरुप देख कर पूर्ण रूप से सम्मोहित और श्रद्धा से भर गया था। अर्जुन की यह स्थिति समझ में आ सकती है, क्योकि उसे हजारों-हज़ार धरतीयों के लोगों के हाथ,पेट, मुख, दिख रहे थे – वो बोले भी तो क्या बोले ? इतना विशाल ब्रह्माण्ड स्वरुप है भगवान श्रीकृष्ण का. समस्त श्रष्टि का जोड़ है परमात्मा का स्वरुप. अगर हम इतनी अंतहीन नक्क्षत्रों और उनकी पृथ्वी की कल्पना भी करे तो भी वो हमारी कल्पनाशक्ति के बाहर है। अर्जुन निश्चय ही भाग्यशाली जिसने यह द्रश्य देखा। वह भगवान से पूँछ रहा है कि यह कैसा स्वरुप हे प्रभु जिसका न आदि है, न मध्य, और न ही जिसका अंत दिखाई देता है।
इस तरह #पश्यामि_देवांस्तव_देव_देहे_सर्वांस्तथा_भूतविशेषसङ्घान् .. (भ ग ११/१५) से लेकर #तेजोभिरापूर्य_जगत्समग्रं_भासस्तवोग्राः_प्रतपन्ति_विष्णो॥ (भ ग ११/३०) तक भगवान के विकराल रूप को देखने के पश्चात अर्जुन भगवान को प्रश्न करते है :
#आख्याहि_मे_को_भवानुग्ररूपो_नमोऽस्तु_ते_देववर_प्रसीद।
#विज्ञातुमिच्छामि_भवन्तमाद्यं_न_हि_प्रजानामि_तव_प्रवृत्तिम्॥ (भ ग ११/३१)
अर्थात् : मुझे बतलाइए कि आप उग्ररूप वाले कौन हैं ? हे देवों में श्रेष्ठ ! आपको नमस्कार हो। आप प्रसन्न होइए। आदि पुरुष आपको मैं विशेष रूप से जानना चाहता हूँ क्योंकि मैं आपकी प्रवृत्ति को नहीं जानता।
गीता अध्याय ११ श्लोक ३२ से ३६ के अनुसार श्री भगवान बोले- मैं लोकों का नाश करने वाला बढ़ा हुआ महाकाल हूँ। इस समय इन लोकों को नष्ट करने के लिए प्रवृत्त हुआ हूँ। इसलिए जो प्रतिपक्षियों की सेना में स्थित योद्धा लोग हैं, वे सब तेरे बिना भी नहीं रहेंगे अर्थात तेरे युद्ध न करने पर भी इन सबका नाश हो जाएगा। तुम इन्हें मारो या न मारो, ये तो सब मरने वाले है। इन्हें तुम नहीं मार रहे हो बल्कि इनका अपना कर्म ही इनके नाश का कारण है। दुर्योधन के कर्म और भीष्म और द्रोणाचार्य का चुप रहना उन्हें पाप का भगीदार बना देता है और उन्हें महाकाल का शिकार बना देता है।
अत एव तू उठ! यश प्राप्त कर और शत्रुओं को जीतकर धन-धान्य से सम्पन्न राज्य को भोग। ये सब शूरवीर पहले ही से मेरे ही द्वारा मारे हुए हैं। हे सव्यसाचिन! (बाएँ हाथ से भी बाण चलाने का अभ्यास होने से अर्जुन का नाम 'सव्यसाची' हुआ था) तू तो केवल निमित्तमात्र बन जा।
इस तरह #नाहं_वेदैर्न_तपसा_न_दानेन_न_चेज्यया.... भ ग ११/५३ न वेदों से, न तप से, न दान से और न यज्ञ से ही मैं इस प्रकार देखा जा सकने वाला चतुर्भुज वाला रूप जैसा कि अर्जुन ने देखकर अर्जुन को पश्चाताप होता है और भगवान के समक्ष स्वीकार करते है कि मैने आपको है कृष्णा, है यादव, है सखे इस प्रकार बिना सोचे समझे हठात् इसके लिए में क्षमा पार्थी हूँ।
अंत मे भगवान कहते है #मत्कर्मकृन्मत्परमो_मद्भक्तः_संगगवर्जितः....(भ ग११/५५)
हे अर्जुन! जो पुरुष केवल मेरे ही लिए सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मों को करने वाला है, मेरे परायण है, मेरा भक्त है, आसक्तिरहित है और सम्पूर्ण भूतप्राणियों में वैरभाव से रहित है (सर्वत्र भगवद्बुद्धि हो जाने से उस पुरुष का अति अपराध करने वाले में भी वैरभाव नहीं होता है, फिर औरों में तो कहना ही क्या है), वह अनन्य भक्तियुक्त पुरुष मुझको ही प्राप्त होता है।
॥हरि: 🕉 तत्सत्॥
🔆 इदं न मम 🔆
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