नराणं च नाराधिपम्
🙏 सुप्रभात, आज कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी बुधवार दिनांक ५.१२.२०१८ 🙏
श्रीमद्भगवगिता में अपनी दैवीसंपदा एवं विभूति दर्शनमें प्रभु ने कहा है:
#उच्चैःश्रवसमश्वानां_विद्धि_माममृतोद्भवम्।
#ऐरावतं_गजेन्द्राणां_नराणां_च_नराधिपम्॥ (भ ग १०/२७)
अर्थात् : अश्वों में अमृतके साथ समुद्रमंथन से प्रकट होनेवाले उच्चैःश्रवा नामक घोड़ेको श्रेष्ठ, हाथियोंमें ऐरावत नामक हाथीको और मनुष्योंमें राजाको मेरी विभूति मानो।
श्रीमद्भगवगिता में भगवान कहते है कि #नराणां_च_नराधिपम् मनुष्योंमें राजाको मेरी विभूति मानो।
मनुस्मृति और महाभारत औऱ हमारे शास्त्रों में यह कहा गया है कि मानव जाति की प्रारंभिक स्थिति अत्यंत पवित्र स्वभाव, दोषरहित कर्म, सत्वप्रकृति और ऋतु की थी। उस समय :
#न_राज्यं_न_च_राजासीत_न_दण्डो_न_च_दाण्डिकः।
#स्वयमेव_प्रजाः_सर्वा_रक्षन्ति_स्म_परस्परम॥
अर्थात् : जब न तो किसी राजा की स्थिति थी, न राज्य था, न दंड था, न दंडी था और सभी लोग स्वधर्मसे, स्वकर्तव्य से अपने अंदर के नैतिक मूल्यों से परस्पर एक दूसरे की रक्षा करते थे।
यह कोई अराजकता, अव्यवस्था, Anarchy नही थी। विश्व के चिंतकों ने #अराजकतावाद_Anarchism राज्यहीन स्वयं शासित समाज व्यवस्था - Self Govrerned Society की कल्पना की है। यूनानी दार्शनिक प्लेटो द्वारा ३८० ईसापूर्व के आसपास रचित ग्रन्थ ' रिपब्लिक ' के अनुसार जब सभी वर्ग अपना कार्य करेंगे तथा दूसरे के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे और अपना कर्तव्य निभाएंगे तब समाज व राज्य में न्याय की स्थापना होगी। अर्थात् जब प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्य का निर्वाह करेगा, तब समाज में न्याय स्थापित होगा और बना रहेगा। लेकिन हमारे वशिष्ठ जैसे राजर्षि ने स्वयं शासित समाज का यशस्वी प्रयोग करके दिखाया है।
किंतु कालांतर में क्रमशः राजस और तामस गुणों का प्राबल्य बढ़ने लगा, मनुष्य समाज अपनी आदिम सत्व प्रकृति से च्युत हो गया और मात्स्य न्याय (शक्तिशाली छोटे या दुर्बल को उसी प्रकार नष्ट कर देता है जिस प्रकार बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है।) छा गया। बलवान कमजोरों को खाने लगे। ऐसी स्थिति में राज्य और राजा की उत्पत्ति हुई।
#रामराज्य
आज भी प्रत्येक व्यक्ति जिसकी झंखना करता है, और शासक जिसे बनाने की घोषणा औऱ वादे करते है ऐसी उत्कृष्ट #राजप्रजासत्ताक_रामराज्य में उत्तरोत्तर निम्न प्रकार की व्यवस्था थी।
•#पौरजनपद - प्रजा द्वारा निर्वाचित मंडल
•#अमात्य_मण्डल (मंत्रिमंडल) - पौरजन मण्डल में से विशुद्ध चरित्र और शीलवान ( जिसमे व्यक्ति के संपूर्ण व्यक्तित्व का विचार होता हैं) व्यक्तिमत्व के अष्ट अमात्य की संस्था। अमात्य मण्डल राज्याश्रित था।
•#राजा - उत्कृष्ट चरित्र और शीलवान ही राजा बन सके - यह रामराज्य का पहला नियम था। ( इक्ष्वाकुवंश में सगर पुत्र असमंजस नाम के अनुसार गुणवाला, पूर्णतः योग्यता पात्र वाला युवराज राज्यका उत्तराधिकारी था किंतु प्रजा के विरोध के चलते उसे राजा नही बनाया था और उसे वनवास दे दिया था। क्योंकि उसका चारित्र्य ठीक नही था)
•#अष्ट ऋषि मण्डल - अमात्य मण्डल राज्याश्रित था इसलिये वह राजसत्ता से कनिष्ठ मानी जाती है। राज्याश्रय के कारण वह राजसत्ता पर अंकुश लगाने में नैतिकता की दृष्टि से असक्षम मानी जाती है। इसलिए राजसत्ता को नियंत्रित करने के लिये वैराग्य और ज्ञानसभर रुषिमंडल राज्यसत्ता के ऊपर माना जाता था।
• #धर्मसत्ता - अष्टऋषिमंडल भी मोहवश राज्यसत्ता के प्रति नियमन करने में कर्तव्य च्युत हो तो उसके ऊपर नैतिक मूल्यों से प्रस्थापित धर्मसत्ता का नियमन था।
आज भी प्रत्येक व्यक्ति जिसकी झंखना करता है, और शासक जिसे बनाने की घोषणा औऱ वादे करते है ऐसी उत्कृष्ट #राजप्रजासत्ताक_रामराज्य में प्रत्येक व्यक्ति राजा था। नैतिक मूल्यों के आत्मनियमन से राजसत्ता का नियमन स्वल्प था। मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम ने स्वयं त्याग तप और परिश्रम से समाज जीवन मे ऊंच नैतिक मूल्यों का प्रस्थापन किया है। राज्याभिषेक के अगले दिन वचन प्रतिबद्धता के लिय १४ वर्ष का।वनवास, जनमानस के अभ्यास से रावण के कब्जे में रही सीतामाई के प्रति शंका के चलते व्यक्तिधर्म को एकबाजू रखकर समष्टिधर्म के चलते सीतामाता का त्याग.... अद्भुत है।
इसलिये आज हजारों वर्षों के पश्चात भी प्रभु श्री राम केवल अयोध्या के सम्राट नही अपितु हमारे जनमानस के ह्रदयसम्राट बने रहे है।
राजा (King) राजतंत्रात्मक शासन तंत्र का सर्वोच्च पद है। प्रायः यह वंशानुगत होता है। कुछ उदाहरण ऐसे जरूर मिलते हैं जहाँ राजा का चुनाव वंश परंपरा के बाहर के लोगों में से किया गया है। वह अपने मंत्रियों की सलाह से अपने राज्य पर शासन करता है। वह अपने शासन क्षेत्र, अधिपत्य या नियंत्रण वाले क्षेत्रों के लोगों के लिए नियम और नीतियाँ बनाता है। उसकी सहायता के लिए दरबार में विभिन्न स्तर के पद होते हैं। राजा के गुण और कर्तव्यों पर महाभारत सहित अनेक ग्रंथों में प्रकाश डाला गया है।
#राजसत्ता_से_ऊपर_धर्मसत्ता :
हमारी सनातन वैदिक संस्कृति में राजसत्ता को नियंत्रित करने के लिये राजसत्ता के ऊपर धर्मसत्ता का नियंत्रण मान्य किया है। जब जब राज्यसत्ता ने धर्मसत्ता की अवमानना किया है उस समय समाज जीवन का पतन हुआ है। ऋषिकाल में राज्याभिषेक के समय राजा सत्ता के मद में आकर अपनी सर्वोपरिता सिद्ध करने के लिये #अदंडोस्मी_अदंडोस्मी_अदंडोस्मी कहता तब राज्य पुरोहित राजा के मस्तिष्क पर धर्मदंड से प्रहार करके कहते थे। राजन आपके ऊपर धर्मसत्ता का नियंत्रण रहेंगा #धर्मदंडोस्यि_धर्मदंडोस्यि_धर्मदंडोस्यि।
#राजधर्म का अर्थ है - ' राजा का धर्म ' या ' राजा का कर्तव्य '। राजवर्ग को देश का संचालन कैसे करना है, इस विद्या का नाम ही 'राजधर्म' है। राजधर्म की शिक्षा के मूल वेद हैं। मनुस्मृति, शुक्रनीति, महाभारत के विदुर प्रजागर तथा शान्तिपर्व तथा चाणक्य द्वारा रचित प्रसिद्ध ग्रन्थ अर्थशास्त्र आदि में भी राजधर्म की बहुत सी व्याख्या है। स्वामी दयानन्द सरस्वती ने भी सत्यार्थ प्रकाश में एक पूरा समुल्लास राजधर्म पर लिखा है। महाभारत में इसी नाम का एक उपपर्व है जिसमें राजधर्म का विस्तृत विवेचन किया गया है। धर्मसूत्रों में भी राजधर्म का विवेचन किया गया है।
#महाभारत_में_राजधर्म
महाभारत युद्घ के समाप्त होने के बाद महाराज युधिष्ठिर को भीष्म ने राजधर्म का उपदेश दिया था। युधिष्ठर को समझाते हुए भीष्म पितामह कहते हैं :
राजन जिन गुणों को आचरण में लाकर राजा उत्कर्ष लाभ करता है, वे गुण छत्तीस हैं। राजा को चाहिए कि वह इन गुणों से युक्त होने का प्रयास करें। यह गुण निम्नवत हैं।
1. राजा स्वधर्मों का (राजकीय कार्यों के संपादन हेतु नियत कर्तव्यों और दायित्वों का न्यायपूर्वक निर्वाह) आचरण करे, परंतु जीवन में कटुता न आने दें।
2. आस्तिक रहते हुए दूसरे के साथ प्रेम का व्यवहार न छोड़ें।
3. क्रूरता का व्यवहार न करते हुए प्रजा से अर्थ संग्रह करे।
4. मर्यादा का उल्लंघन न करते हुए प्रजा से अर्थ संग्रह करे।
5. दीनता न दिखाते हुए ही प्रिय भाषण करे।
6. शूरवीर बने परंतु बढ़ चढ़कर बातें न करे। इसका अर्थ है कि राजा को मितभाषी और शूरवीर होना चाहिए।
7. दानशील हो, परंतु यह ध्यान रखे कि दान अपात्रों को न मिले।
8. राजा साहसी हो, परंतु उसका साहस निष्ठुर न होने पाए।
9. दुष्ट लोगों के साथ कभी मेल-मिलाप न करे, अर्थात राष्ट्रद्रोही व समाजद्रोही लोगों को कभी संरक्षण न दे।
10. बंधु बांधवों के साथ कभी लड़ाई झगड़ा न करे।
11. जो राजभक्त न हों ऐसे भ्रष्ट और निकृष्ट लोगों से कभी भी गुप्तचरी का कार्य न कराये।
12. किसी को पीड़ा पहुंचाए बिना ही अपना काम करता रहे।
13. दुष्टों अपना अभीष्ट कार्य न कहें, अर्थात उन्हें अपनी गुप्त योजनाओं की जानकारी कभी न दें।
14. अपने गुणों का स्वयं ही बखान न करे।
15. श्रेष्ठ पुरूषों (किसानों) से उनका धन (भूमि) न छीने।
16. नीच पुरूषों का आश्रय न ले, अर्थात अपने मनोरथ की पूर्ति के लिए कभी नीच लोगों का सहारा न लें, अन्यथा देर सबेर उनके उपकार का प्रतिकार अपने सिद्घांतों की बलि चढ़ाकर देना पड़ सकता है।
17. उचित जांच पड़ताल किये बिना (क्षणिक आवेश में आकर) किसी व्यक्ति को कभी भी दंडित न करे।
18. अपने लोगों से हुई अपनी गुप्त मंत्रणा को कभी भी प्रकट न करे।
19. लोभियों को धन न दे।
20. जिन्होंने कभी अपकार किया हो, उन पर कभी विश्वास न करें।
21. ईर्ष्यारहित होकर अपनी स्त्री की सदा रक्षा करे।
22. राजा शुद्घ रहे, परन्तु किसी से घृणा न करे।
23. स्त्रियों का अधिक सेवन न करे। आत्मसंयमी रहे।
24. शुद्घ और स्वादिष्ट भोजन करे, परन्तु अहितकार भोजन कभी न करे।
25. उद्दण्डता छोड़कर विनीत भाव से मानवीय पुरूषो का सदा सम्मान करे।26. निष्कपट भाव से गुरूजनों की सेवा करे।
27. दम्भहीन होकर विद्वानों का सत्कार करे, अर्थात विद्वानों को अपने राज्य का गौरव माने।
28. ईमानदारी से (उत्कोचादि भ्रष्ट साधनों से नही) धन पाने की इच्छा करे।
29. हठ छोड़कर सदा ही प्रीति का पालन करे।
30. कार्यकुशल हो परंतु अवसर के ज्ञान से शून्य न हो।31. केवल पिण्ड छुड़ाने के लिए किसी को सांवना या भरोसा न दे, अपितु दिये गये विश्वास पर खरा उतरने वाला हो।
32. किसी पर कृपा करते समय उस पर कोई आक्षेप न करे।
33. बिना जाने किसी पर कोई प्रहार न करे।
34. शत्रुओं को मारकर किसी प्रकार का शोक न करे।
35. बिना सोचे समझे अकस्मात किसी पर क्रोध न करे।
36. कोमल हो, परन्तु तुम अपकार करने वालों के लिए नहीं।
#मनुस्मृति_में_राजधर्म :
मनुस्मृति के ७वें अध्याय में राजधर्म की चर्चा की गयी है। भगवान मनु ने आदिकाल में मानव जीवन को उन्नत प्रगतिशील और राष्ट्ररक्षा, राजधर्म और मानव धर्म के मापदण्डों के द्वारा राष्ट्र को सुबल और सुव्यवस्थित बनाने का भी महत्वपूर्ण कार्य किया है। उन्होने अपने ग्रन्थ में मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त जहाँ संस्कारों का वर्णन किया है वहीं मनुष्य के जीवन को सुखमय बनाने के लिए राजधर्म का भी वर्णन किया है। उन्होने इस महान् ग्रन्थ के द्वारा मानव समाज को संगठित वा उन्नत बनाने के लिये अनेक माध्यमों से राजधर्म की व्याख्या कर राजा, मंत्री, सभासद्, प्रजा तथा इन पर प्रयुक्त होने वाले दण्ड विधान, कर व्यवस्था, तथा न्याय व्यवस्था, का बहुत सुन्दर ही वर्णन किया है।
#पुत्र_इव_पितृगृहे_विषये_यस्य_मानवाः।
#निर्भया_विचरिष्यन्ति_स_राजा_राजसत्तम॥ (मनुस्मृति)
अर्थात् : जैसे पुत्र अपने पिताके गृह में निर्भयता से विचरण करता है, उसी तरह जिनकी प्रजा राज्य में निर्भयता से विचरण करती है वह राजा सर्वश्रेष्ठ है।
#कौटिल्य_अर्थशास्त्र_में_राजधर्म :
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में राजधर्म की चर्चा है।
#प्रजासुखे_सुखं_राज्ञः_प्रजानां_च_हिते_हितम्।
#नात्मप्रियं_प्रियं_राज्ञः_प्रजानां_तु_प्रियं_प्रियम्॥ (अर्थशास्त्र १/१९)
अर्थात् : प्रजा के सुख में राजा का सुख निहित है, प्रजा के हित में ही उसे अपना हित दिखना चाहिए । जो स्वयं को प्रिय लगे उसमें राजा का हित नहीं है, उसका हित तो प्रजा को जो प्रिय लगे उसमें है ।
#तस्मात्_स्वधर्म_भूतानां_राजा_न_व्यभिचारयेत्।
#स्वधर्म_सन्दधानो_हि_प्रेत्य_चेह_न_नन्दति॥ (अर्थशास्त्र १/३)
अर्थात् : राजा प्रजा को अपने धर्म से च्युत न होने दे। राजा भी अपने धर्म का आचरण करे। जो राजा अपने धर्म का इस भांति आचरण करता है, वह इस लोक और परलोक में सुखी रहता है।
#तस्मान्नित्योत्थितो_राजा_कुर्यादर्थानुशासनम्।
#अर्थस्य_मूलमुत्थानमनर्थस्य_विपर्ययः॥
अर्थात् : इसलिए राजा को चाहिए कि वह नित्यप्रति उद्यमशील होकर अर्थोपार्जन तथा शासकीय व्यवहार संपन्न करे। उद्यमशीलता ही अर्थ (संपन्नता) का मूल है एवं उसके विपरीत उद्यमहीनता अर्थहीनता का कारण है।
शासन व्यवस्था द्वारा प्रजा के सुखसुविधा से नियमन करनेवाला राज्य का सर्वोच्च पद राजा है। लेकिन और अपने मन को वश में रखकर इन्द्रिय निग्रह से ऊंच नैतिक मूल्य, शुद्ध चारित्र्य से जीवन व्यतीत कर प्रजा के लोकमानस पर शासन करने वाले महाराज कहलाते है।
॥हरि: 🕉 तत्सत्॥
🔆 इदं न मम 🔆
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🕉 #कृष्णं_वंदे_जगद्गुरूम् 🕉
श्रीमद्भगवगिता में अपनी दैवीसंपदा एवं विभूति दर्शनमें प्रभु ने कहा है:
#उच्चैःश्रवसमश्वानां_विद्धि_माममृतोद्भवम्।
#ऐरावतं_गजेन्द्राणां_नराणां_च_नराधिपम्॥ (भ ग १०/२७)
अर्थात् : अश्वों में अमृतके साथ समुद्रमंथन से प्रकट होनेवाले उच्चैःश्रवा नामक घोड़ेको श्रेष्ठ, हाथियोंमें ऐरावत नामक हाथीको और मनुष्योंमें राजाको मेरी विभूति मानो।
श्रीमद्भगवगिता में भगवान कहते है कि #नराणां_च_नराधिपम् मनुष्योंमें राजाको मेरी विभूति मानो।
मनुस्मृति और महाभारत औऱ हमारे शास्त्रों में यह कहा गया है कि मानव जाति की प्रारंभिक स्थिति अत्यंत पवित्र स्वभाव, दोषरहित कर्म, सत्वप्रकृति और ऋतु की थी। उस समय :
#न_राज्यं_न_च_राजासीत_न_दण्डो_न_च_दाण्डिकः।
#स्वयमेव_प्रजाः_सर्वा_रक्षन्ति_स्म_परस्परम॥
अर्थात् : जब न तो किसी राजा की स्थिति थी, न राज्य था, न दंड था, न दंडी था और सभी लोग स्वधर्मसे, स्वकर्तव्य से अपने अंदर के नैतिक मूल्यों से परस्पर एक दूसरे की रक्षा करते थे।
यह कोई अराजकता, अव्यवस्था, Anarchy नही थी। विश्व के चिंतकों ने #अराजकतावाद_Anarchism राज्यहीन स्वयं शासित समाज व्यवस्था - Self Govrerned Society की कल्पना की है। यूनानी दार्शनिक प्लेटो द्वारा ३८० ईसापूर्व के आसपास रचित ग्रन्थ ' रिपब्लिक ' के अनुसार जब सभी वर्ग अपना कार्य करेंगे तथा दूसरे के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे और अपना कर्तव्य निभाएंगे तब समाज व राज्य में न्याय की स्थापना होगी। अर्थात् जब प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्य का निर्वाह करेगा, तब समाज में न्याय स्थापित होगा और बना रहेगा। लेकिन हमारे वशिष्ठ जैसे राजर्षि ने स्वयं शासित समाज का यशस्वी प्रयोग करके दिखाया है।
किंतु कालांतर में क्रमशः राजस और तामस गुणों का प्राबल्य बढ़ने लगा, मनुष्य समाज अपनी आदिम सत्व प्रकृति से च्युत हो गया और मात्स्य न्याय (शक्तिशाली छोटे या दुर्बल को उसी प्रकार नष्ट कर देता है जिस प्रकार बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है।) छा गया। बलवान कमजोरों को खाने लगे। ऐसी स्थिति में राज्य और राजा की उत्पत्ति हुई।
#रामराज्य
आज भी प्रत्येक व्यक्ति जिसकी झंखना करता है, और शासक जिसे बनाने की घोषणा औऱ वादे करते है ऐसी उत्कृष्ट #राजप्रजासत्ताक_रामराज्य में उत्तरोत्तर निम्न प्रकार की व्यवस्था थी।
•#पौरजनपद - प्रजा द्वारा निर्वाचित मंडल
•#अमात्य_मण्डल (मंत्रिमंडल) - पौरजन मण्डल में से विशुद्ध चरित्र और शीलवान ( जिसमे व्यक्ति के संपूर्ण व्यक्तित्व का विचार होता हैं) व्यक्तिमत्व के अष्ट अमात्य की संस्था। अमात्य मण्डल राज्याश्रित था।
•#राजा - उत्कृष्ट चरित्र और शीलवान ही राजा बन सके - यह रामराज्य का पहला नियम था। ( इक्ष्वाकुवंश में सगर पुत्र असमंजस नाम के अनुसार गुणवाला, पूर्णतः योग्यता पात्र वाला युवराज राज्यका उत्तराधिकारी था किंतु प्रजा के विरोध के चलते उसे राजा नही बनाया था और उसे वनवास दे दिया था। क्योंकि उसका चारित्र्य ठीक नही था)
•#अष्ट ऋषि मण्डल - अमात्य मण्डल राज्याश्रित था इसलिये वह राजसत्ता से कनिष्ठ मानी जाती है। राज्याश्रय के कारण वह राजसत्ता पर अंकुश लगाने में नैतिकता की दृष्टि से असक्षम मानी जाती है। इसलिए राजसत्ता को नियंत्रित करने के लिये वैराग्य और ज्ञानसभर रुषिमंडल राज्यसत्ता के ऊपर माना जाता था।
• #धर्मसत्ता - अष्टऋषिमंडल भी मोहवश राज्यसत्ता के प्रति नियमन करने में कर्तव्य च्युत हो तो उसके ऊपर नैतिक मूल्यों से प्रस्थापित धर्मसत्ता का नियमन था।
आज भी प्रत्येक व्यक्ति जिसकी झंखना करता है, और शासक जिसे बनाने की घोषणा औऱ वादे करते है ऐसी उत्कृष्ट #राजप्रजासत्ताक_रामराज्य में प्रत्येक व्यक्ति राजा था। नैतिक मूल्यों के आत्मनियमन से राजसत्ता का नियमन स्वल्प था। मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम ने स्वयं त्याग तप और परिश्रम से समाज जीवन मे ऊंच नैतिक मूल्यों का प्रस्थापन किया है। राज्याभिषेक के अगले दिन वचन प्रतिबद्धता के लिय १४ वर्ष का।वनवास, जनमानस के अभ्यास से रावण के कब्जे में रही सीतामाई के प्रति शंका के चलते व्यक्तिधर्म को एकबाजू रखकर समष्टिधर्म के चलते सीतामाता का त्याग.... अद्भुत है।
इसलिये आज हजारों वर्षों के पश्चात भी प्रभु श्री राम केवल अयोध्या के सम्राट नही अपितु हमारे जनमानस के ह्रदयसम्राट बने रहे है।
राजा (King) राजतंत्रात्मक शासन तंत्र का सर्वोच्च पद है। प्रायः यह वंशानुगत होता है। कुछ उदाहरण ऐसे जरूर मिलते हैं जहाँ राजा का चुनाव वंश परंपरा के बाहर के लोगों में से किया गया है। वह अपने मंत्रियों की सलाह से अपने राज्य पर शासन करता है। वह अपने शासन क्षेत्र, अधिपत्य या नियंत्रण वाले क्षेत्रों के लोगों के लिए नियम और नीतियाँ बनाता है। उसकी सहायता के लिए दरबार में विभिन्न स्तर के पद होते हैं। राजा के गुण और कर्तव्यों पर महाभारत सहित अनेक ग्रंथों में प्रकाश डाला गया है।
#राजसत्ता_से_ऊपर_धर्मसत्ता :
हमारी सनातन वैदिक संस्कृति में राजसत्ता को नियंत्रित करने के लिये राजसत्ता के ऊपर धर्मसत्ता का नियंत्रण मान्य किया है। जब जब राज्यसत्ता ने धर्मसत्ता की अवमानना किया है उस समय समाज जीवन का पतन हुआ है। ऋषिकाल में राज्याभिषेक के समय राजा सत्ता के मद में आकर अपनी सर्वोपरिता सिद्ध करने के लिये #अदंडोस्मी_अदंडोस्मी_अदंडोस्मी कहता तब राज्य पुरोहित राजा के मस्तिष्क पर धर्मदंड से प्रहार करके कहते थे। राजन आपके ऊपर धर्मसत्ता का नियंत्रण रहेंगा #धर्मदंडोस्यि_धर्मदंडोस्यि_धर्मदंडोस्यि।
#राजधर्म का अर्थ है - ' राजा का धर्म ' या ' राजा का कर्तव्य '। राजवर्ग को देश का संचालन कैसे करना है, इस विद्या का नाम ही 'राजधर्म' है। राजधर्म की शिक्षा के मूल वेद हैं। मनुस्मृति, शुक्रनीति, महाभारत के विदुर प्रजागर तथा शान्तिपर्व तथा चाणक्य द्वारा रचित प्रसिद्ध ग्रन्थ अर्थशास्त्र आदि में भी राजधर्म की बहुत सी व्याख्या है। स्वामी दयानन्द सरस्वती ने भी सत्यार्थ प्रकाश में एक पूरा समुल्लास राजधर्म पर लिखा है। महाभारत में इसी नाम का एक उपपर्व है जिसमें राजधर्म का विस्तृत विवेचन किया गया है। धर्मसूत्रों में भी राजधर्म का विवेचन किया गया है।
#महाभारत_में_राजधर्म
महाभारत युद्घ के समाप्त होने के बाद महाराज युधिष्ठिर को भीष्म ने राजधर्म का उपदेश दिया था। युधिष्ठर को समझाते हुए भीष्म पितामह कहते हैं :
राजन जिन गुणों को आचरण में लाकर राजा उत्कर्ष लाभ करता है, वे गुण छत्तीस हैं। राजा को चाहिए कि वह इन गुणों से युक्त होने का प्रयास करें। यह गुण निम्नवत हैं।
1. राजा स्वधर्मों का (राजकीय कार्यों के संपादन हेतु नियत कर्तव्यों और दायित्वों का न्यायपूर्वक निर्वाह) आचरण करे, परंतु जीवन में कटुता न आने दें।
2. आस्तिक रहते हुए दूसरे के साथ प्रेम का व्यवहार न छोड़ें।
3. क्रूरता का व्यवहार न करते हुए प्रजा से अर्थ संग्रह करे।
4. मर्यादा का उल्लंघन न करते हुए प्रजा से अर्थ संग्रह करे।
5. दीनता न दिखाते हुए ही प्रिय भाषण करे।
6. शूरवीर बने परंतु बढ़ चढ़कर बातें न करे। इसका अर्थ है कि राजा को मितभाषी और शूरवीर होना चाहिए।
7. दानशील हो, परंतु यह ध्यान रखे कि दान अपात्रों को न मिले।
8. राजा साहसी हो, परंतु उसका साहस निष्ठुर न होने पाए।
9. दुष्ट लोगों के साथ कभी मेल-मिलाप न करे, अर्थात राष्ट्रद्रोही व समाजद्रोही लोगों को कभी संरक्षण न दे।
10. बंधु बांधवों के साथ कभी लड़ाई झगड़ा न करे।
11. जो राजभक्त न हों ऐसे भ्रष्ट और निकृष्ट लोगों से कभी भी गुप्तचरी का कार्य न कराये।
12. किसी को पीड़ा पहुंचाए बिना ही अपना काम करता रहे।
13. दुष्टों अपना अभीष्ट कार्य न कहें, अर्थात उन्हें अपनी गुप्त योजनाओं की जानकारी कभी न दें।
14. अपने गुणों का स्वयं ही बखान न करे।
15. श्रेष्ठ पुरूषों (किसानों) से उनका धन (भूमि) न छीने।
16. नीच पुरूषों का आश्रय न ले, अर्थात अपने मनोरथ की पूर्ति के लिए कभी नीच लोगों का सहारा न लें, अन्यथा देर सबेर उनके उपकार का प्रतिकार अपने सिद्घांतों की बलि चढ़ाकर देना पड़ सकता है।
17. उचित जांच पड़ताल किये बिना (क्षणिक आवेश में आकर) किसी व्यक्ति को कभी भी दंडित न करे।
18. अपने लोगों से हुई अपनी गुप्त मंत्रणा को कभी भी प्रकट न करे।
19. लोभियों को धन न दे।
20. जिन्होंने कभी अपकार किया हो, उन पर कभी विश्वास न करें।
21. ईर्ष्यारहित होकर अपनी स्त्री की सदा रक्षा करे।
22. राजा शुद्घ रहे, परन्तु किसी से घृणा न करे।
23. स्त्रियों का अधिक सेवन न करे। आत्मसंयमी रहे।
24. शुद्घ और स्वादिष्ट भोजन करे, परन्तु अहितकार भोजन कभी न करे।
25. उद्दण्डता छोड़कर विनीत भाव से मानवीय पुरूषो का सदा सम्मान करे।26. निष्कपट भाव से गुरूजनों की सेवा करे।
27. दम्भहीन होकर विद्वानों का सत्कार करे, अर्थात विद्वानों को अपने राज्य का गौरव माने।
28. ईमानदारी से (उत्कोचादि भ्रष्ट साधनों से नही) धन पाने की इच्छा करे।
29. हठ छोड़कर सदा ही प्रीति का पालन करे।
30. कार्यकुशल हो परंतु अवसर के ज्ञान से शून्य न हो।31. केवल पिण्ड छुड़ाने के लिए किसी को सांवना या भरोसा न दे, अपितु दिये गये विश्वास पर खरा उतरने वाला हो।
32. किसी पर कृपा करते समय उस पर कोई आक्षेप न करे।
33. बिना जाने किसी पर कोई प्रहार न करे।
34. शत्रुओं को मारकर किसी प्रकार का शोक न करे।
35. बिना सोचे समझे अकस्मात किसी पर क्रोध न करे।
36. कोमल हो, परन्तु तुम अपकार करने वालों के लिए नहीं।
#मनुस्मृति_में_राजधर्म :
मनुस्मृति के ७वें अध्याय में राजधर्म की चर्चा की गयी है। भगवान मनु ने आदिकाल में मानव जीवन को उन्नत प्रगतिशील और राष्ट्ररक्षा, राजधर्म और मानव धर्म के मापदण्डों के द्वारा राष्ट्र को सुबल और सुव्यवस्थित बनाने का भी महत्वपूर्ण कार्य किया है। उन्होने अपने ग्रन्थ में मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त जहाँ संस्कारों का वर्णन किया है वहीं मनुष्य के जीवन को सुखमय बनाने के लिए राजधर्म का भी वर्णन किया है। उन्होने इस महान् ग्रन्थ के द्वारा मानव समाज को संगठित वा उन्नत बनाने के लिये अनेक माध्यमों से राजधर्म की व्याख्या कर राजा, मंत्री, सभासद्, प्रजा तथा इन पर प्रयुक्त होने वाले दण्ड विधान, कर व्यवस्था, तथा न्याय व्यवस्था, का बहुत सुन्दर ही वर्णन किया है।
#पुत्र_इव_पितृगृहे_विषये_यस्य_मानवाः।
#निर्भया_विचरिष्यन्ति_स_राजा_राजसत्तम॥ (मनुस्मृति)
अर्थात् : जैसे पुत्र अपने पिताके गृह में निर्भयता से विचरण करता है, उसी तरह जिनकी प्रजा राज्य में निर्भयता से विचरण करती है वह राजा सर्वश्रेष्ठ है।
#कौटिल्य_अर्थशास्त्र_में_राजधर्म :
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में राजधर्म की चर्चा है।
#प्रजासुखे_सुखं_राज्ञः_प्रजानां_च_हिते_हितम्।
#नात्मप्रियं_प्रियं_राज्ञः_प्रजानां_तु_प्रियं_प्रियम्॥ (अर्थशास्त्र १/१९)
अर्थात् : प्रजा के सुख में राजा का सुख निहित है, प्रजा के हित में ही उसे अपना हित दिखना चाहिए । जो स्वयं को प्रिय लगे उसमें राजा का हित नहीं है, उसका हित तो प्रजा को जो प्रिय लगे उसमें है ।
#तस्मात्_स्वधर्म_भूतानां_राजा_न_व्यभिचारयेत्।
#स्वधर्म_सन्दधानो_हि_प्रेत्य_चेह_न_नन्दति॥ (अर्थशास्त्र १/३)
अर्थात् : राजा प्रजा को अपने धर्म से च्युत न होने दे। राजा भी अपने धर्म का आचरण करे। जो राजा अपने धर्म का इस भांति आचरण करता है, वह इस लोक और परलोक में सुखी रहता है।
#तस्मान्नित्योत्थितो_राजा_कुर्यादर्थानुशासनम्।
#अर्थस्य_मूलमुत्थानमनर्थस्य_विपर्ययः॥
अर्थात् : इसलिए राजा को चाहिए कि वह नित्यप्रति उद्यमशील होकर अर्थोपार्जन तथा शासकीय व्यवहार संपन्न करे। उद्यमशीलता ही अर्थ (संपन्नता) का मूल है एवं उसके विपरीत उद्यमहीनता अर्थहीनता का कारण है।
शासन व्यवस्था द्वारा प्रजा के सुखसुविधा से नियमन करनेवाला राज्य का सर्वोच्च पद राजा है। लेकिन और अपने मन को वश में रखकर इन्द्रिय निग्रह से ऊंच नैतिक मूल्य, शुद्ध चारित्र्य से जीवन व्यतीत कर प्रजा के लोकमानस पर शासन करने वाले महाराज कहलाते है।
॥हरि: 🕉 तत्सत्॥
🔆 इदं न मम 🔆
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